रचनाएँ खोजकर पढ़ें

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -


विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


एक घर की दास्‍तान- अंधी बूढ़ी माँ फुल्‍लो का दर्द और अंधा समाज ( आँखोंदेखा वृत्तांत) - आत्‍माराम यादव पीव

साझा करें:

एक घर की दास्‍तान- अंधी बूढ़ी माँ फुल्‍लो का दर्द और अंधा समाज ( आँखोंदेखा वृत्तांत) आत्‍माराम यादव पीव ज्‍येष्ठ का महीना था। धरती पर सूरज आ...

एक घर की दास्‍तान- अंधी बूढ़ी माँ फुल्‍लो का दर्द और अंधा समाज

( आँखोंदेखा वृत्तांत)

आत्‍माराम यादव पीव

ज्‍येष्ठ का महीना था। धरती पर सूरज आग उगल रहा था नर्मदा नदी से तीन किलोमीटर दूर पहाड़ की तलछटी और जंगलों से घिरा हुआ एक गाँव है बगवाड़ा जो सीहोर जिले की बुदनी तहसील में आता है। तब आने जाने के साधन के नाम पर बैलगाड़ी हुआ करती थी जिससे नर्मदा नदी का तीन चार किलोमीटर रास्‍ता पैदल और बीमारों को बैलगाड़ी से पार करना होता। सरपंच के पास साईकिल थी बाकी दूर तक इस अभाव था। गाँव पहुंचने के लिये सुबह, दोपहर और शाम तय समय पर सडकमार्ग पर बसें रूक जाया करती थी। गाँव के करीब आते ही बसों में लम्‍बा भोंपू या सायरन बजता तो लोग घरों से टेकरा की ओर भागते थे। टेकरा पर हाथ हिलाने के बाद सड़क पर बस कन्‍डक्‍टर बसों को रोक लेता था। बाकी पूरे समय सड़कों पर सन्‍नाटा छाया रहता था। भीषण गर्मी से बगवाड़ा भी अछूता नहीं रहा। गाँव के पूर्व-उत्‍तर का अन्तिम घर फुल्‍लो अम्‍मा का था। घर के बाद एक किलोमीटर तक टेकरानुमा सपाट मैदान था जिसमें सुबह शाम गाँव भर के गाय-भैंस आदि एकत्र होते और सभी चरवाहे वहाँ से उन्‍हें जंगल की ओर ले जाते।

दाड़ी पर एक फेफर का बड़ा पेड़ और एक बरगद का पेड़ था जिनके नीचे बनी मढि़या में नगरा बाबा, खूबतबाबा, लालमन बाबा और ग्‍वाल बाबा को पत्‍थर की पिण्डियों के रूप में पूजते थे। तब दाने बाबा की पूजा के लिये लोग मूक पशुओं में मेड़ा, बकरे बकरियों की बलि चढ़ाकर प्रसन्‍न करते थे लेकिन बाबा पर बलि के रूप में काटे गये अपने पशुओं का मांसाहार लोग स्‍वीकार नहीं करते थे और बलि में चढ़ाये पशुओं का मांस लेने वे समाज के लोग आते जो मांसाहार के शौकीन थे। गाँव के बुजुर्ग दाने बाबा के प्रकोप से डरते थे इसलिये यह सब चलता रहा। गाँव के अनेक बुजुर्ग थे जो चबूतरों पर घूमते जिनके शीश में ये देवता सवारी करते थे। एक बार सभी गाँव वालों ने‍ विचार किया हर साल दाने बाबा को अनेक घरों से निरीह पशुओं की बलि के रूप में भेंट दी जाती है जिसे कोई प्रसाद के रूप में खाता नहीं तब सभी ने चबूतरे पर बैठक में बाबा के शीश आते ही उनसे निवेदन किया कि आपका प्रसाद कोई गाँववाला नहीं लेता। सभी शाकाहारी है इसलिये बाबाजी आप भी हमसे शाकाहारी प्रसाद स्‍वीकार कर इन पशुओं की बलि को रूकवा दो , तब बाबा ने गुड मलीदा का प्रसाद चढ़ाने पर सभी गाँववालों पर प्रसन्‍न रहने की बात की तब यह बलि प्रथा समाप्‍त हुई और दाने बाबा की पूजा में अब भी गुड मलीदा से वे प्रसन्‍न रहते हैं। जबकि खूबत बाबा को मीठे पुआ का प्रसाद आज भी चढ़ता है और पीरबाबा को चना चिरोंजी पंसद है जबकि मरई मैईया और सती मैईया की पूजा एक विशेष गोत्र के लोग करते हैं पर अब वह पूजा होते नहीं दिखती जबकि गाँव से डेढ़ किलोमीटर पूर्व में नर्मदातट पर खेड़ापति मईया की पूजा साल में एक बार करने सभी जाते हैं जहाँ प्रसादी के बाद भण्‍डारा होता है।

गाँव में 40 के लगभग मकान ग्‍वालों के बने थे जिनका अपना एक कुंआ था जिससे सुबह चार बजे से सुबह 8 बजे तक और शाम को चार बजे से छह बजे तक ग्‍वालिनें पानी भरने आती और सुबह 9 बजे के बाद कुंये पर युवकों की टोली स्‍नान करते दिखती। गाँव के बीचोंबीच एक चौपाल लगती थी। गाँववाले अपने-अपने घरों में दूध दुहने के बाद जानवरों को चारा-सानी रखकर चौपाल की ओर चले आते थे। शाम को चार पांच बजे से ही हर घर में चूल्‍हा जल जाता और परिवार के लिये माता-बहिनें खाना पका कर रखती थी। कुछ लोग खाना खाकर चौपाल पर आते और देररात तक बैठते। चौपाल पर गाँव के हर व्‍यक्ति के सुख दुख की बातें होती। ऐसा ही आलम सुबह शाम कुंये पर देखने को मिलता जहाँ पानी भरने आती महिलायें एक दूसरे के घरों में होने वाले सुख दुख की बातें करती। कुंये पर पता चलता किसके घर में झगडा हुआ है, किसकी सास ने किस बहु पर गुस्‍सा निकाला है, किसको बुखार आया, किसके घर शराब पीकर झगड़ा हुआ। कुंये की अधिकांश बातें महिलायें रात को अपने पति और घर में बताती फिर वही बातें चौपाल पर होती ।

शाम ढ़लने से पहले आकाश में पक्षियों का कलरव दिल मोह लेता था। हजारों की सॅख्‍या में पक्षी झुंड बनाकर दानापानी चुगकर घरों को लौटते थे। दो-तीन घन्‍टे तक आकाश में यह नजारा रहता और और हर झुण्‍ड का नेतृत्‍व एक पक्षी आगे दिखता और अनगिनत उसके पीछे होते। दोपहर में कौओं की कांवकांव गाँव में गूंजती और सैकडों की संख्‍या में गिद्ध आकाश में विचरते थे और जहाँ गाँव के मरे जानवरों को एक समाजवर्ग के लोग उठाकर उस जानवर की खाल उतार लाते उस स्‍थान पर यह गिद्ध जिन्‍हें लोग चील के नाम से भी पुकारते वे आ टपकते। ऐसा आलम हर गाँव के आकाश में देखने को मिलता था। दाना चुगने के लिये लाखों की संख्या में तोते खेतों में आते और घर-बाडे सहित पेड़ों पर बैठ कर मधुर कलरव करते थे। फसल की रखवारी के लिये लोग अपने खेतों के बीच मुंडेर बनाकर उसपर चढ़कर गोपिया में पत्‍थर रखकर तोतों के झुण्‍ड को भगाया करते थे। जैसे शाम को आकाश लाखों पक्षियों को हर गाँव की परिधि में अपने अपने अंक में लिये होता वैसा ही नजारा सुबह होता जब पक्षी सूर्योदय से पूर्व ही वापिस जंगलों की ओर जाते दिखते और कुछ पक्षी गांवों के खेतों में दाना चुगते थे। तब गाँव में बिजली नहीं आयी थी। हर घर में चिमनी, लालटेन का प्रकाश बिखरा होता था।

गाँव की चौपाल पर ही एक परिवार ने अपने घर के हिस्‍से की जमीन दे दी जिसमें गाँववालों ने शिवजी का मंदिर बना लिया और सुबह शाम इस मंदिर में आरति को एकत्र होते। युवाओं में तब पहलवानी का जोश था इसलिये वहीं खाली जमीन पर सबने अखाड़ा बना लिया जिसमें पहलवान जोर आजमाईश करते। कुछ युवाओं ने रामायण मण्‍डल बना लिया जो हर शनिवार ओर मंगलवार को गाँव के किसी एक घर में जाता और ढोलक, झॉझ मजीरों के साथ रामायण का पाठ होता। गाँव में जब भी शादी विवाह होते तो गैसबत्‍ती के लाईट में बारातें लगती और गैसबत्‍ती बंद होने पर मेंथल लगाकर हवा भरने वाले व्‍यक्ति का बहुत सम्‍मान हुआ करता था। कहते हैं इस गाँव में 1940 में मोतीझिरा नामक बीमारी आयी थी जिसे लोगों ने बड़ीमाता नाम दिया था। इस बड़ी माता में इस गाँव के शोभाराम और उनकी पत्‍नी फुल्‍लो बाई की आंखों की रोशनी चली गयी थी। शोभाराम गाँव के धनाडयों में गिने जाते थे,उनके पास खेती बाड़ी थी पर जब दोनों पति पत्‍नी की आँखें चली गयी तो उन्‍होंने कुछ लोगों को मदद के लिये जमीन की देखभाल के लिये रखा तब उनकी बड़ी बेटी 14 साल की थी और छोटी छह महीने की तब शोभाराम जी चल बसे। उनकी मौत के बाद उनके द्वारा मटकों में धन छिपाकर रखा था उसकी जानकारी फुल्‍लो अम्‍मा को थी वे जब मटकों से धन लेने पहुंची तो सभी खाली मिले, निश्चित ही किसी ने पहले ही जांच परखकर यह धन चुराया था। दूसरी ओर उनकी जितनी भी खेती की जमीनें थी उसकी देखरेख वे ही करते जिन्‍हें दी थी और वे परिवार के भरण पोषण के लिये अनाज दे देते। फुल्‍लो अम्‍मा जिनका मूल नाम फूलवती बाई था के मायके में 30 एकड़ से ज्‍यादा जमीन थी जिसे उन्‍होंने होशंगाबाद में अपने भाई ओमकार को दे दी। समय आने पर ओमकार ने जमीन का कब्‍जा नहीं छोड़ा और उधर गाँव की जमीनों पर जो रिश्‍तेदार नौकर थे, वे मालिक बन गये, मजबूरी में फुल्‍लो अम्‍मा खेतों की मेढ़ों पर जाकर चारा लाती और अपने गाय भैसों के चारे की व्‍यवस्‍था करती ।फुल्‍लो अम्‍मा के दोनों बेटे गाय,बकरी पालते,चराते और महुआ बीनने के लिये सुबह 4 बजे जंगल निकल जाते, तेंदू लाते, तेज दोपहरी में आचार, तेंदूपत्‍ता, बॉस काटकर लाते और उन्‍हें बेचकर अपना पेट पालते।

बात 1970-71 की है जब फुल्‍लो बाई के बड़े बेटे हेमराज की बारात गाँव से बैलगाड़ी से निकली थी और होशंगाबाद में सिवनीनाके के पास धूमधाम से लगी थी। बहू आने पर फुल्‍लो अम्‍मा बहुत खुश थी। कुछ दिनों बाद उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा जब बड़ी बहू ने एक सुन्‍दर सुडौल बेटे को जन्‍म देकर इस परिवार का पहला वारिस दिया। महिनों तक बच्‍चों को खिलाने उसकी सभी बुआओं का डेरा गांव में रहा। दो ढाई साल बाद बेटा बीमार हो गया तब हेमराज और उनकी पत्‍नी बेटे को होशंगाबाद इलाज के लिये पहुंचे परन्‍तु उन्‍होंने बच्‍चों को डाक्‍टर को नहीं दिखाया। किसी की सलाह पर हेमराज अपने बेटे को बाबई के पास बीकोर गाँव में झड़वाने-फुकवाने ले गये। वहाँ बच्‍चे ने दम तोड़ दिया तब दोनों बीकारे से सात आठ किलोमीटर पैदल बाबई आये और बाबई में भी उन्‍हें किसी बस वाले ने सिर्फ इसलिये नहीं बैठने दिया क्योंकि उनके हाथ में उनके बेटे का शव था जिसे वे गले में चिपकाये थे। आखिरकार हेमराज और उनकी पत्‍नी ने तीन चार घन्‍टे में 9 किलोमीटर का रास्‍ता तय कर किया । तब तवापुल के आधे भाग पर पु‍ल था और आधे भाग को पैदल जाना होता था। बरसात में यह मार्ग 4 महिने बंद हो जाया करता था। दोनों बहुत दुखी और परेशान थे, साथ में उनकी गोदी में बेटे का शव था और उनके घर गाँव का रास्‍ता पैदल में डेढ़ दिन का था। शाम हो गयी थी उन्‍होंने बच्‍चे के शव को गाँव ले जाना उचित नहीं समझ कर वहीं तवापुल की रेत में गाड़कर वे बस में सवार होकर होशंगाबाद पहुँचे। हेमराज की ससुराल पहले सिवनी नाके के पास थी लेकिन 1973 की भीषण बाढ़ में मकान ध्‍वस्‍त हो जाने पर उनके श्‍वसुर स्‍टेशन के पास रहने लगे थे जहाँ दोनों पहुँचे जिन्‍हें परिजनों ने ढांढस दिलाया और अगले ही दिन सुबह 10 बजे घर से निकलकर नर्मदाघाट स्थित नावघाट पहुँचे जहां नाव में सवार हो उस पार उतरे और पैदल जोशीपुर के खेतों से होते हुये अपने गाँव बगवाडे़ पहुँचे।

इधर बच्‍चे के बीमार होने की खबर आग की तरह पूरे परिवार में फैल गयी। क्‍योंकि शोभाराम जी के परिवार में बडे बेटे हेमराज के ज्‍येष्‍ठ पु्त्र के रूप में पहला वारिस मिला था । हेमराज की सभी सातों बहनें रामकली, सुन्‍दो बाई, कस्‍तूरी बाई, गोरा बाई, भगवती बाई, प्रेम बाई एवं सातों बाई अपने भतीजे की कुशलक्षेम जानने को एक दिन पहले ही डेरा डाल चुकी थी। जैसे ही हेमराज और बहू पहुंची तब उनकी गोद में बेटा नहीं पाकर बहनों ने पूछा- हमारा भतीजा कहॉ है। किसके पास खेल रहा है। तब रोते हुये बड़ी बहू ने अपनी ननदों को सारी दास्‍तान बता दी तब तक गाँव की अनेक बुजुर्ग मातायें, बहुयें वहाँ एकत्र हो गयी थी। जैसे ही बड़ी बहू और बेटे ने पुत्र के मरने तथा साधन नहीं मिलने के कारण तवा की रेत में दफनाने की बात सुनाई, इस पर बहनों ने बड़ी बहू को खरी खरी सुनाई परन्‍तु भग्‍गो बाई अपना आपा खो चुकी थी और उसने बड़ी बहू की जमकर पिटाई कर दी। बड़ी बहू के साथ मायके से एक सदस्‍य आया था जिसने बड़ी बहू के पिता को खबर भेज दी। खबर मिलते ही बडी बहू के पिता आ गये और परिवार को सान्‍तवना देने की बजाय अपनी बेटी का पक्ष लेकर गाली बकते हुये अपनी बेटी को अपने घर ले गये और बोल गये कि मेरी बेटी आपके घर नहीं आयेगी । समाज के सभी लोगों ने बूढ़ी अंधी फुल्‍लों की स्थिति बतलाते हुये घर तोड़ने की बजाय घर बसाने की सलाह दी लेकिन उन्‍हें समझाने की सारी कोशिश बेकार गयी और वे टस से मस नहीं हुये और उन्‍होंने कहा कि जैसे मेरा बड़ा जंवाई घरजंवाई बनकर रह रहा है, वैसे अब हेमराज भी रहेगा, लेकिन मेरी बेटी कभी बगवाड़ा नहीं जायेगी।

इस घटना को बीते दिन, महीने, साल गुजरते गये पर बड़ी बहू आने को तैयार नहीं। आखिरकार पूरा परिवार बच्‍चे का गम भुलाकर सुलह को तैयार थे कि किसी तरह बड़ी बहू घर आ जाये पर बड़ी बहू दो टूक कह चुकी थी कि मै मर जाऊंगी पर अपनी ससुराल नहीं जाऊंगी। तब ऐसे मसलों का हल करने के लिये लोग पुलिस थाने कोर्ट कचहरी नहीं जाते थे और समाज की पंचायतों के माध्‍यम से सुलह किये जाने का रिवाज था। आखिरकर बगवाड़े के बुजुर्गों और हेमराज के सभी रिश्‍तेदारों ने विचार किया कि समाज की पंचायत बुलवाकर निर्णय करा ले। उस समय ग्‍वालटोली काली मंदिर होशंगाबाद में ग्‍वाल समाज की पंचायत का न्‍याय सर्वोपरि था, यह पंचायत सभी छावनियों में न्‍याय के लिये सुप्रीमकोर्ट का दर्जा हासिल किये हुये थी। होशंगाबाद,बगवाड़ा जोशीपुर, जर्रापुर, गडरिया नाला, बुदनी, बुदनीघाट, छैघरा,बाबई शुक्‍करवाड़ा और बेरखेड़ी तक के सरपंच एकमत होकर इसमें शामिल होते थे और तब पंचों की सॅख्‍या सात सौ तक पहुंच जाती थी। फुल्‍लोबाई को अपनी बहू लाने के लिये इस पंचायत पर विश्‍वास था। पंचायत आखिरी विकल्‍प हुआ करती थी, इसके पहले परिवार में बातें होती, जहाँ नहीं बनती तब कुटुम्‍ब के लोग बातें करते, तीसरे विकल्‍प के रूप में रिश्‍तेदार सुलह कराते, जब सभी असफल हो जाते तब समाज की पंचायत ही निर्णायक होती और हेमराज को भी इस पंचायत से आखिरी उम्‍मीद थी।

हेमराज नींम की छाव में अपनी खटिया पर कथरी बिछाकर सोया था। गर्मी से बचने के लिये उसने पानी की नांद में जाकर चादर को गीला कर निचोड़कर ओढ़ रखी थी। आज शनिवार का दिन था, कल होशंगाबाद में पंचायत होना है। पूरे सप्‍ताह वह घर के पास स्थित महुआवाले खेत से सटी घास की बीड़ काटकर पूला बनाकर गंजी तैयार करता रहा था । उसे तब दिनभर की मजदूरी के 1 रूपये मिलते थे, सुबह ही उसे एक सप्‍ताह की मजदूरी 6 रूपये मिले थे जो उसने अपनी अंधी बूढ़ी माँ जिन्‍हें वह अईयो कहता था कि हथेली पर रख दिये थे। शाम को समाज की पंचायत से उसे न्‍याय मिलेगा और उसकी पत्‍नी आ जायेगी इसी उधेड़बुन में वह बहुत ही प्रसन्‍न था और खुशी खुशी में अपनी हैसियत के 25 पैसे के धोबी साबुन को न खरीदकर रईसों के लिये समझे जाने वाले 60 पैसे का खुशबूदार सनलाईट साबुन ले आया और अपने कपड़े धोये । उसे नींद नहीं आ रही थी इसलिये वह मन को समझाने के लिये राधा कृष्‍ण प्रसंग के सवैया गाकर रोमांचित था। शाम को 4 बजे घर से होशंगाबाद जाते समय फुल्‍लो अम्‍मा ने उसे चार रूपये दिये और 2 रूपये घर खर्च के रख लिये। हेमराज नर्मदा तट पर आया वहाँ से नाव में बैठकर होशंगाबाद आया।

हेमराज अपनी ससुराल पहुंचा और ससुर से मिलकर फिर अपनी पत्‍नी को पहुंचाने के लिये हाथ जोड़े पर ससुर ने कहा जा पंचायत करा ले, पंचायत कहेगी तो भेज देंगे तभी वहां उनके बड़े साले तुलसीराम ने उनकी बेइज्जती कर बहिन को भेजने से मना कर दिया। वह अपनी सास से मिलने पहुंचा जहाँ सालों ने फरमान सुना दिया, हमारी बहिन तुम्‍हारे घर नहीं जायेगी, तुम चाहो तो हमारे घर आकर बहिन के साथ रह सकते हो। मायूस हेमराज अपने बड़े जीजाओं, मामा ओमकार के घर गया और पूरे घटनाक्रम को बताया। तब सभी ने पंचायत के महाते, चौधरी, दीवान, जमादार को बताया और उनकी सलाह से अगले दिन पंचायत करने की सहमति दे दी। शाम को ही पंचायत का बुलउआ की खबर खबास को दे दी और सुबह 6 बजे ग्‍वालटोली के सभी मोहल्‍लों में खबास से पंचायत का हंका दे दिया। दूसरे स्‍थानों पर खबास ने सुबह ही खबर भिजवा दी। शाम चार बजे काली मंदिर ग्‍वालटोली पर पंचायत के लिये पंचों का आना शुरू हो गया था। काली मंदिर परिसर सहित पूरा मैदान खचाखच समाज के लोगों से भरा गया था और हेमराज अपने सप्‍ताह में कमाये पैसों से खरीदी गयी बीड़ी के बन्‍डल, माचिक, सुपाड़ी,तम्‍बाखू, लोंग इलायची आदि सहित पीने के पानी पंचों के समक्ष खबास के द्वारा बंटवा रहा था। सभी पंच विराजमान हो गये थे और महाते को छोड़ सभी पदाधिकारी अपना अपना स्‍थान ले चुके थे। तब नियम था जब तक महाते नहीं आये तब तक पंचायत शुरू नहीं होती थी, पर विषयवस्‍तु को लेकर चर्चायें और विचारों आ आदान प्रदान जरूर चलने लगता था। महाते का इंतजार करते तीन चार घन्‍टे बीत गये पर महाते पंचायत में नहीं पहुँचे और वे घर पर भी नहीं थे, पंचों के बार बार कहने पर उन्‍हें तलाशा जाता पर वे नहीं मिले, तब हेमराज से पूछा क्‍या तुमने उन्‍हें खबर नहीं की, तब हेमराज द्वारा कहे जाने कि मैंने उनसे बात करने के बाद अनुमति लेकर पंचायत बुलाई है तब सब शांत हो जाते। इस पंचायत में महाते के नहीं मौजूद होने से सभी पंचगण अगली पंचायत इतवार को करने की सहमति देकर चले गये ।

एक साल तक हर महीने हर इतवार को काली मंदिर ग्‍वालटोली में पंचायत में अनेक मसले आते और उनका निर्णय हो जाता लेकिन जैसे ही हेमराज का यह मामला शुरू होता उसमें सकल पंच,पदाधिकारी आते लेकिन मुख्‍य न्‍यायिक पदाधिकारी मथुरा महाते गायब रहकर अनुपस्थित रहते और हेमराज की मेहनत मजदूरी की पूरी कमाई पंचायत की आवभगत, व्‍यवस्‍था में चौपट हो जाती। हर पंचायत में लकड़ी पक्ष से उनके पिता को बुलाया जाता लेकिन वे कभी मौजूद नहीं हुये, पता चला पंचायत के प्रमुख महाते जी की उनसे रिश्‍तेदारी है और वे जब भी हेमराज द्वारा पंचायत बुलायी जाती वे लड़की के पिता के साथ होते और इस पंचायत बिना प्रमुख के किसी निर्णय पर नहीं पहुंचती। आखिर में पंचों ने पंचायत में आने से मना कर दिया हेमराज और उसकी बूढी अंधी माँ और पूरा परिवार न्‍याय के लिये इस पंचायत से वंचित रहा। हेमराज हर प्रयास कर चुका था कि उनकी पत्‍नी उनके घर पहुंच जाये पर गरीबी उसकी कमजोरी थी और पंचायतों में जो पंच लोग पक्ष-विपक्ष में बहस कर निर्णय तक पहुंचाते थे वे हेमराज के साथ नहीं थे। अपनी पत्‍नी को अपने घर पर नहीं ला पाने के कारण हेमराज पूरी तरह टूट चुका था। वह अब रोज शाम को जोशीपुर जाता और वहाँ से कच्‍ची शराब पीकर लड़खड़ाता लौटता और माँ को देखकर चिल्‍लाता अईओ मैं क्‍या करूं, जीने का मन नहीं होता और मैं अपनी बीबी के बिना नहीं रह सकता। यह क्रम रोजाना का हो गया था इससे हेमराज का स्‍वास्‍थ्‍य भी बिगड़ने लगा।

अंधी बूढी माँ अपने बेटे को इस पर रोजाना रोता और तड़फता नहीं देख सकती थी इसलिये उसने अपनी छाती पर पत्‍थर रखकर कहा बेटा, तू बहू के मायके चला जा और वहीं घरजवाई बन कर रहना, कम से कम रोज तिल तिल यह जानलेवा शराब पीकर तेरी जान जाये इससे अच्‍छा है तू भले नजरों के सामने नहीं होगा, पर तेरी जान तो सलामत रहेगी। हेमराज ने सभी को समझाते माँ से कहा -अईओ, अगर मैं वहाँ गया तो फिर वे न मुझे तुझसे मिलने देंगे और न ही मेरी किसी बहन के घर आ जा सकूंगा, सबसे रिश्‍ता तोड़कर उनकी शर्त में वही जीना होगा। मां रोती पर आंखों में आंसू नहीं आने देती उसकी चाहत थी कि वह किसी तरह अपनी बहू बेटे के साथ अपना बुढावा गुजार दे और बेटा बहू उसकी आँख बन जाये, पर नियति को कुछ और मंजूर था। फुल्‍लो अम्‍मा ने उस दिन हेमराज को बुलाकर गले से लगाया और खूब रोयी। हेमराज ने अपनी आँखों में काजल लगाया था और वह गबरू जवान अपनी रौबीली मूछों की शान के कारण गाँव में जाना जाता था, वह अपना घर, गाँव और माँ को सदा के लिये त्‍यागने से पहले माँ से चिपककर ऐसे बिलख रहा था जैसे कोई बच्‍चा रोता है। दूसरे कमरे में छोटा बेटा और छोटी बहू भी इस मंजर को देखकर दुखी थे जैसे उनका सब कुछ लुटने जा रहा है। घर की दालान में लालटेन टिमटिमाने लगी तब छोटी बहू आयी और उसने घासलेट भरा, शाम को रोज दो चिमनी घर में जलती थी और एक लालटेन दालान में तथा एक बाहर के लिये थी जब गायों की सार में गायों को चारा डालने, दुहने के लिये या किसी को शौच, लघुशंका आने पर उसका इस्‍तेमाल बाहर ही होता था।

वह रात उस अंधी फुल्‍लो के जीवन की सबसे भयानक और डरावनी थी। शाम ढ़लते ही माँ ने अपने हाथों से चूल्‍हा जलाकर कंडों और लकड़ी जलाकर मिटटी की हांडी में घर की बेला में लगी बल्‍लर और बाडे से लाल लाल टमाटर की सब्‍जी बनाई और मिटटी का कल्‍ला/तवा रखकर रोटी पकाकर बेटे को परौसकर खुश थी। क्‍या रोशनी,क्‍या अंधेरा कभी फुल्‍लो अम्‍मा को भान नहीं होता था , आँखें की रोशनी खाने के बाद उनके कदम आँखवालों से तेज चलते थे और रास्‍ते का आभास हो जाता था। घर हो या बाड़ा सभी चीजें उनकी पकड़ में थी। आँखों के बिना कभी चूल्‍हे में रोटी जली हो यह कभी हुआ नहीं। हाथों से टटोल कर वह जान जाती थी कि आग ठण्‍डी हो गयी या नहीं, बस एक लकड़ी के टुकडे से चूल्‍हे से आग निकालकर रोटी सेंकती थी। सुबह हेमराज को अपने ससुर की शर्तों के पालन करने ससुराल में सदा के लिये बस जाना था और आज वह माँ के पास उसके खपरैल मकान के पटमे के नीचे आराम सो रहा था। हेमराज गहरी नींद में था पर उनकी माँ फुल्‍लो अम्‍मा की आँखों में नीद नहीं थी वह सारी रात उसके पलंग के पास बैठ उसकी हथेली की ऊंगलियों के पोरों का स्‍पर्श करती रही। पास ही दूसरी खटिया पर छोटा बेटा लेटा था और उसकी आँखों में भी नींद नहीं थी उसे अपने बड़े भाई के बिछड़ने का दुख था और वह खाट पर बिछी कथरी में मुंह छिपाकर रो रहा था ताकि फुल्‍लो अम्‍मा को पता न चल जाये। जब आधी रात हो गयी तो वह चुपके से उठकर माँ के कन्‍धों पर हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाया अम्‍मा सो जाओ। माँ और छोटा बेटा चूल्‍हे के पास पहुंचकर रोने लगे जिन्‍हें छोटी बहू ने रोते हुये सोने को कहा। चूल्‍हे के पास बैठे बहुत समय हो गया तब माँ ने जान लिया कि रात का तीसरा पहर गुजर गया है। उसने छोटे बेटे और बहू को सोने भेज दिया लेकिन वे सोये नहीं। माँ के कानों में पड़ोस के घरों में जागने वालों की आवाजें सुनाई दी। पूरे गाँव के लोग सुबह 4 बजे उठ आते थे और अपने अपने गाय-भैसों को रहट चराने के लिये ले जाते और छह बजे लेकर लौट आते। फिर सभी दूध दुहने के बाद शहर में बेचने निकल जाते।

जब सांझ फुल्‍लो अम्‍मा रोटी बना रही थी तब उन्‍होंने गेहूँ के चून/आटा के बर्तन को खाली देख लिया था। उसे पता था सुबह हेमराज के लिये रोटी बनाकर खिलाना है इसलिये वो एक परात में गेहूँ लेकर चकिया के पास पहुंची और चकिया को साफ करके धीरे-धीरे गेहूं पीसना शुरू किया और कब चून का बर्तन भर गया उसने चकिया बंद कर चूल्‍हे में आग सुलगा ली। छोटा बेटा चकिया में आटा पीसे जाने के दरमयान घर से रस्‍सी बाल्‍टी,गुंड घघरा लेकर कुंये पर पहुंच गया और छोटी बहू भी कुंए से पानी लाने में जुटी और कुछ समय में जरूरत का पानी भरकर रस्‍सी लपेटकर आ गये, पता नहीं चला। जब माँ ने चूल्‍हा जला लिया था तब तब छोटा बेटा बहू दूध दुह चुके थे। तब उनके पास 100 से ज्‍यादा बकरियां थी जिनमें 30 के लगभग बकरियां दूध देने वाली थी, जिन्‍हें बहू बेटे ने मिलकर दुहा और घर में पीतल के तीन बड़े तसले जिसमें डेढ़ सौ लीटर दूध रखने की क्षमता थी लेकिन इनके पास 40 लीटर दूध होता था जो 20 पैसे लीटर घर से एक व्‍यक्ति ले जाता ओर शहर में बेचकर अपना मुनाफा निकाल लेता था। एक समय था जब इस घर में तीनों तसले दूध से भरे होते थे, जिसमें एक तसले में गाय का दूध एक में बकरी का दूध और एक तसले में भैसों का दूध अलग अलग रखते थे। तब मलाई निकालने के लिये अलग डबला था और दही के लिये बडी हांडी थी।

सुबह हुई, यह सुबह हेमराज की थी जो उसके गृहस्‍थ जीवन की दुबारा जीने का शुभ संकेत लेकर आने वाली थी। यह सुबह हेमराज के ससुराल में उनकी पत्‍नी की थी। फुल्‍लो अम्‍मा के जीवन में अंधेरा ही अंधेरा था। ऊपरवाले ने पहले नेत्र की रोशनी छीन ली, जब हेमराज का जन्‍म हुआ तो उन्‍हें खुशी हुई कि यह बेटा जीवन में रोशनी भर देगा, पर यह सपना आज टूटने जा रहा था। कुछ साल गुजरने के बाद फुल्‍लो अम्‍मा के पति उनका साथ छोड़कर चले गये और उनके जीवन का अंधकार दुगुना हो गया। पति के जाने के बाद फुल्‍लों अम्‍मा की तीन बेटियां एवं दो बेटों के भरण पोषण का प्रश्‍न था। उनके पति के खेत,खलियान, गौधन सब करीबी रिश्‍तेदारों ने इस शर्त पर कि बच्‍चों का लालन पोषण व शादी कर देंगे अपने अपने पास रख लिया और बाद में सभी ने उनकी सम्‍पत्ति हड़प ली। सब कुछ खोने के बाद भी फुल्‍लो अम्‍मा को जितना दुख नहीं पहुंचा उतना दुख उन्‍हें आज अपने बड़े बेटे को घर से ससुराल में घरजमाई बनकर रहने की रजामंदी में हुआ। फुल्‍लो अम्‍मा का दर्द चरम पर था पर वह अंधी रो भी नहीं सकती थी। उसे याद है जब वह ससुराल आयी तब पति का आधे गाँव पर साम्राजय था और वही मायके में उनकी इतनी सम्‍पत्ति थी कि वह आज करोड़ों की स्‍वामिनी होती, पर आँख न होने का सभी ने फायदा उठाकर उन्‍हें छला पर वे कभी अस्थिर नहीं रही। बड़े बेटे हेमराज के जाने के बाद फुल्‍लो अम्‍मा कई दिनों तक खामोश रहीं और किसी से बातें न कर रोती रहती। सब समझाते पर वह सुनकर भी अनसुनी करती। उसके मस्तिष्‍क में सैकड़ों सवाल इस समाज के लिये उठते कि मुझे तो ऊपरवाले ने नेत्रहीन बना दिया लेकिन यह समाज मुझ जैसे लोगों के प्रति दया दिखाने की बजाय इतना कठोर क्‍यों हो गया जो मुझे अपने बेटे के लिये बहू घर लिवाने में सहायक होने की बजाय पूरा समाज और पंचायत अंधी हो गयी जो न्‍याय नहीं कर सकी। फुल्‍लो अम्‍मा शून्‍य में ताकते हुये अंधे समाज, अन्‍याय के खिलाफ बेटे के घर लौटने का इंतजार करती रही लेकिन कई बरस गुजर जाने के बाद उसका बेटा ससुराल में पहुंचकर सरकारी नौकरी करते हुये कभी माँ के पास नहीं आया। ससुराल में बेटे के दिमाग में ऐसा क्‍या फितूर भरा गया जिससे वह अपनी माँ के घर और अपनी सभी बहनों के घर होने वाले किसी भी सुख-दुख एवं वैवाहिक आयोजनों में नहीं पहुंचा और न ही बड़ी बहू ही शामिल हुई जैसे सवाल फुल्‍लो अम्‍मा को मरने तक कुचेटते रहे।

--

आत्‍माराम यादव (पीव) वरिष्‍ठ पत्रकार

सिटीपोस्‍ट आफिस के पास, उर्मिल किराना दूकान गली, मोरछली चौक होशंगाबाद मध्‍यप्रदेश

-----****-----

|दिलचस्प रचनाएँ:_$type=blogging$count=5$src=random$page=1$va=0$au=0$meta=0

|समग्र रचनाओं की सूची:_$type=list$count=8$page=1$va=1$au=0$meta=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: एक घर की दास्‍तान- अंधी बूढ़ी माँ फुल्‍लो का दर्द और अंधा समाज ( आँखोंदेखा वृत्तांत) - आत्‍माराम यादव पीव
एक घर की दास्‍तान- अंधी बूढ़ी माँ फुल्‍लो का दर्द और अंधा समाज ( आँखोंदेखा वृत्तांत) - आत्‍माराम यादव पीव
https://1.bp.blogspot.com/-J14_qvVV3kA/XhyDctLQs6I/AAAAAAABQoA/Nr5qF9gdx54eellntOFzXeJMie1q-qFJQCK4BGAYYCw/s320/IMG_20191029_133317-760365.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-J14_qvVV3kA/XhyDctLQs6I/AAAAAAABQoA/Nr5qF9gdx54eellntOFzXeJMie1q-qFJQCK4BGAYYCw/s72-c/IMG_20191029_133317-760365.jpg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/03/blog-post_65.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/03/blog-post_65.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ