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तुम ही को सोचने को जी चाहता है.. Namita Gupta"मनसी" की कविताएँ

कविता लिखने के बाद..

..किस तरह कहूं कि
अब भी
छूट जाता है कहीं "कुछ"
कविता लिखने के बाद !!

..रह जाती है
रिक्तता कहीं जरूरत से ज्यादा
और कहीं..
रोक देती है
भावों की विह्वलता !!

चाहकर भी
अव्यक्त ही रहती है
आकांक्षाएं शब्दों की ,
कि रह जाता है "कुछ"
मन ही मन में !!

अक्सर..
भटक से जाते हैं शब्द
चक्रव्यूह में
असंमंजसताओं के ,
.. और
रह जाते हैं
शीर्षक भी अधूरे ही !!

Namita Gupta"मनसी"

क्यों तुम नजर आते नहीं..

सुनों जिंदगी..
तुमको महसूस किया, कल भी.. आज भी
तुम होते तो हो, क्यों नजर आते नहीं !!

सदियां बीतीं, मौसम गुजरे..गुजरना ही था
देकर खुशियां, क्यों अब भी मुस्कराते नहीं!!

बस में नहीं कुछ, करे भी मन..ये क्या करे
मिलकर भी न मिले, क्यों तुम लौट आते नहीं!!

ये मन, हां ये मन, बातों से अब बहलता नही
कहा जो, समझा भी, ये शब्द जताते क्यों नहीं!!   

Namita Gupta"मनसी"


यूं लगा कि..

जब भी स्पर्श किया तुमऩे
भावनाओं को मेरी ,
यूं लगा कि..
हजारों बसंत खिलें हों एक साथ !!

जब कभी गुजर जाते हो
मेरे शब्दों की गलियों से ,
यूं लगा कि..
स्वत: ही मुस्कराती हों कविताएं !!

सुनों,
जब से शामिल हो तुम सोच में मेरी
यूं लगा कि..
बदलने लगे हों जीवन के अभिप्राय !!

Namita Gupta"मनसी"


सार्थकताओं में..

मैं न थी..
तुम न थे..तब भी
कहीं कुछ तो था
कुछ मुझसा..
कुछ तुमसा..
कि ढूंढ रहे हैं प्रतिध्वनियों में
अब भी वही शब्द ,
और..
खोज रहे हैं सार्थकताएं
उनके सच होने की !!

Namita Gupta"मनसी"

कि शायद..

..कि शायद
यही शुरुआत हो नई ,
कि शायद
हो जाएं अंकुरित बीज फिर से ,
कि शायद
मुस्कराएं इंद्रधनुष फिर कोई ,
कि शायद
सहेजें गुलाब फिर से किताबों में ,
कि शायद
कोंपलें फूटने लगें फिर ,

कि शायद फिर से सहें हम दर्द
..सुखद अंत की तलाश में !!

Namita Gupta"मनसी"

साथ तुम्हारा

रहे उलझे से अब तक शिकायतों में ही
साथ तुम्हारा हर सवाल का जवाब !!

यूं तो चांद-तारों से भी बहलता था मन
आना तुम्हारा मानों धुंध में प्रकाश !!

पढ़ लिये थे फलसफे जिंदगी के सभी
तुमने फिर से पढ़ाई अपठित वो किताब!!

जिदें कुछ वक्त की थीं, कुछ अपनी भी रहीं
तुमने हद में भी दिया वो बेहद सा खिताब!!

Namita Gupta"मनसी"

तुम ही को सोचने को जी चाहता है..


बुलबुला है जिंदगी, है तो है ही न
फिर से चमकने को जी चाहता है !!

रोका बहुत मन के जज्बातों को
फिर से बिखरने को जी चाहता है !!

क्यों अब रुकूं, उड़ानें मन की उडूं
फिर से पंख फैलानें का जी चाहता है !!

जब तक रहूं, सांस जी भर जिऊं
कि तुम ही को सोचने का जी चाहता है !!

Namita Gupta"मनसी"

मैंने कभी नहीं चाहा..

मैंने कभी नहीं चाहा
सिर्फ कवि होना
कि घेर लूं कुछ जगह
अखबारों में ,
कि मिल जाएं कुछ पन्नें
किताबों में ,
कि बटोर लूं बिकाऊ
सर्टिफिकेट ,
या कि खो जाऊं शोर में
तालियों की ,

.. सिर्फ चाहती हूं इतना
कि पहचान लो मुझको
मेरे ही "शब्दों" से !!

Namita Gupta"मनसी"

पानी का दर्द

कभी बूंद..कभी बादल..
कभी नदी..कभी सागर..
यूं ही
शुरुआत से अंत
और..
अंत से अनंत !!

कभी समझ सके हो
कि कितनीं यात्राएं हैं
पानी की
"पानी होने' में ,
तृप्ता होकर
रहता है प्यासा ही ,
वो मोक्षा है
पर आती हैं हिस्से में
सिर्फ यात्राएं ही !!

Namita Gupta"मनसी"

बस, एक बार..

वक्त है.. है तो है, गुजर जाने दो..
एक बार.. बस एक बार, बिखर जाने दो !!

शब्द हैं.. अर्थ हैं, समझ तो आने दो..
एक बार.. बस एक बार, उलझ तो जाने दो !!

यकीं है..साथ है, संवर तो जाने दो..
एक बार.. बस एक बार, बहक तो जाने दो !!

है जिंदगी.. गुजरेगी ही..
एक बार.. बस एक बार, हद से गुजर जाने दो !!

Namita Gupta"मनसी"

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