रविवार, 11 जनवरी 2015

मंतव्य 2 - अवधेश प्रीत का संस्मरण : रॉबिन शॉ ‘पुष्प’: ‘सेल्फ आईडेंटिटी’ की तलाश

 

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश अनंत का लघु उपन्यास लालटेन यहाँ पढ़ें)

मील का पत्थर

रॉबिन शॉ ‘पुष्प’: ‘सेल्फ आईडेंटिटी’ की तलाश

अवधेश प्रीत

बेहतर इलाज और स्थान परिवर्तन के लिए उन्हें दिल्ली ले जाया

गया, लेकिन दस दिन में ही उन्होंने घर वापस जाने की ज़िद शुरू

कर दी। 30 अक्टूबर को सुमित पुष्प जी और गीता जी को लेकर

वे पटना पहुँचे। बहादुरपुर स्थित घर ‘रवीन्द्रांगन’ में वह अपने बिस्तर पर लेटे और फिर लेटे ही रह गये।

वह घर जिसे उन्होंने बेहद प्यार और श्रम से बनवाया था, सदा के लिए छूट गया

 

घर का छूटना एक लेखक के लिए महज ईंट-गारों से बनी दीवारों, कमरों और छत का छूटना भर नहीं होता। यह ‘छूटना’ अपनी जड़ों से, अपनी पहचान से भी छूटना होता है। रॉबिन शॉ पुष्प का ‘घर’ भी बार-बार छूटता रहा। वह बार-बार विस्थापित होते रहे। उनके व्यक्तित्व में इस ‘छूटने’ और ‘टूटने’ का इतना गहरा असर था कि वह बार-बार अपनी जड़ों की ओर लौटते और उसी से जीवनी-शक्ति संचित कर अपना रचना-संसार निर्मित करते। अंत-अंत तक वह इसी विस्थापन के बीच ‘सेल्फ आईडेंटिटी’ की तलाश करते रहे।

इस 20 दिसंबर को वह अपनी उम्र के अस्सी वर्ष पूरे करते। कह सकते हैं, आठ दशक की उनकी इस जीवन-यात्रा में विस्थापन उनके जन्म के साथ ही दर्ज़ हो चुका था। 20 दिसंबर, 1934 को उनका जन्म मुंगेर (बिहार) के ‘पोलो ग्राउण्ड’ में हुआ। भूकंप की वजह से तमाम लोगों की तरह उनका घर भी जमींदोज़ हो चुका था। ‘पोलो ग्राउण्ड’ में, शरणार्णी शिविर में जन्मे रॉबिन शॉ पुष्प को उनकी माँ लिली ग्रेस शॉ ने नाम दिया था ‘रवीन्द्रनाथ’। हिन्दी, बांग्ला का साहित्य पढ़ने वाली उनकी माँ रवीन्द्रनाथ टैगोर से प्रभावित थीं, लिहाजा यह उनका दिया नाम था, लेकिन यह उनका नाम नहीं रह पाया। वह घर में फैली अंग्रेजियत की वजह से रॉबिन हो गया। उनमें ‘सेल्फ आईडेंटिटी’ की तलाश का बीज भी शायद यहीं से पड़ गया।

रॉबिन शॉ पुष्प की पहली कहानी प्रतिद्वंदी ‘धर्मयुग’ में 1957 में छपी और उनका आत्म-कथात्मक उपन्यास ‘गवाह बेगमसराय’ सन् 2013 में आया। इस तरह देखें, तो पिछले छह दशकों की लम्बी कालावधि में हिन्दी साहित्य के कई आंदोलनों और पीढ़ियों के बीच उनका रचना कर्म सतत जारी रहा।

इस दौरान उन्होंने आधा दर्ज़न से अधिक उपन्यास, एक दर्ज़न से अधिक कहानी संग्रह, आधा दर्ज़न बाल उपन्यास, दर्ज़नों बाल कहानियाँ, कविताएँ और नाटक, आधा दर्ज़न से अधिक रेडियो नाटक, संगीत रूपक

और टेली फिल्मों के निर्माण से लेकर कुछ फीचर फिल्मों के लिए पटकथा और संवाद लेखन का विपुल रचनात्मक अवदान उनकी सतत् सक्रियता और अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों और विधाओं में आवाजाही भर नहीं है, एक स्वतंत्र लेखक का आत्मसंघर्ष भी है। रॉबिन शॉ पुष्प आजीवन मसिजीवी रहे। कहीं कोई नौकरी नहीं की। ऐसे में लिखना उनकी अनिवार्यता थी और वह हर उपलब्ध अवसर का उपयोग करते रहे। लेखन ही उनके जीविकोपार्जन का स्रोत भी था। आश्चर्य यह कि वह अपने सीमित साधनों के बीच भी खुश ही नहीं रहे, दूसरों की मदद और आतिथ्य-सत्कार में भी फराख़दिल रहे। उनकी ज़िन्दादिली से मैं तो सन् 1984 में परिचित हुआ और उनके आख़िरी दिनों तक उसे उनके व्यक्तित्व में मुतवतिर देखता रहा।

रॉबिन शॉ पुष्प से मेरी पहली मुलाकात रंगकर्मी सुरूर अली अंसारी ने कराई थी। यह सन् 1984 का कोई महीना था। मैं कुमायूं विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद शोध करने के लिए बीएचयू आया था। एक लम्बी हड़ताल के दौरान खगौल चला आया था। यहीं सुरूर से मुलाक़ात हुई थी। वह ‘सूत्राधार’ नाट्य संस्था चलाता था। पटना के निकट का यही क़स्बा उन दिनों रंगकर्म की गतिविधियों के लिए जाना जाता था। इसी संस्था से जुड़ा था आज का मशहूर पेंटर सुबोध गुप्ता। मेरी साहित्यिक रुचि देखकर सुरूर मुझे साथ लेकर पटना गया था और सब्ज़ीबाग़ में एक छोटी-सी चश्मे की दुकान पर बैठे रॉबिन शॉ पुष्प से मेरा परिचय कराया था। लुंगी-कुर्ता में बैठे, औसत कद के लगातार सिगरेट पीते जा रहे रॉबिन शॉ पुष्प को देखकर मेरे अंदर ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’, ‘कहानी’ आदि में पढ़ी उनकी कई-कई कहानियाँ घुमड़ने लगी थीं। मैंने उनका ज़िक्र किया। जब मैंने उन्हें बताया कि उनका उपन्यास ‘काँपती आंखें, ठहरी दीवारें’ मेरे पास है, तो वह चौंक पड़े। उन्होंने कहा, ‘‘अरे यह उपन्यास तो आउट ऑफ़ प्रिंट हो चुका है। मेरे पास भी नहीं है। तुम मुझे उपलब्ध करा सकते हो क्या?’’ मैंने अगली मुलाक़ात में वह उपन्यास उन्हें दिया। उपन्यास हाथ में लेकर वे बड़ी देर तक उसे महसूसते रहे। उस दिन मैं उनके सब्ज़ीबाग़वाले घर में मिला था। इस घर का नाम था ‘रवीन्द्रांगन’। यह घर किराये का था, लेकिन दिलचस्प यह कि इस घर के मालिक बदलते रहे। किरायेदार नहीं बदला। यह किराये का घर ही दशकों तक रॉबिन शॉ पुष्प का स्थायी पता रहा। इसी घर में देश भर के लेखकों, कलाकारों और विद्वानों का आना-जाना लगा रहा। इसी घर में रहते हुए रॉबिन शॉ पुष्प ने अपनी रचनाओं का विस्तृत संसार रचा। यह घर पटना के लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों के लिए तब तक जीवंत पीठ बना रहा, जब तक वह, बहादुरपुर कॉलोनी स्थित अपने बनाये घर में नहीं शिफ्ट कर गये। यह शिफ्टिंग उनके जीवन की नियति थी जैसे। मुंगेर से उजड़ने के बाद उनका परिवार बेगुसराय आ गया। यहाँ उनका बचपन बीता। हालात ने ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया कि बेगुसराय का घर भी बिक गया और फिर मुंगेर में शिफ्ट होना पड़ा। इस आशय का जिक्र रॉबिन शॉ पुष्प ने ‘सारिका’ में छपे ‘गर्दिश के दिन’ में विस्तार से किया है। सब्ज़ीबाग़ स्थित किराये का घर भले ही उनका आवास था, लेकिन नये-पुराने सभी लेखकों-कलाकारों की शरणगाह भी था। उनका घर सबके लिए खुला था। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने इसी घर के फर्श पर बैठकर अपनी कविताओं का पाठ किया था, तो फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने इस घर में उनसे अपने कई सुख-दुख बाँटे थे। रेणु ने एक लम्बी कविता लिखी थी- ‘मेरा मीत सनीचर’। सुबह-सुबह पहुँचे और बोले, ‘‘पहले मकईबाड़ी चाय पिलाइए, फिर मेरी कविता सुनिए। रात से परेशान था, कि कैसे सुबह हो।’’ पुष्प जी ने रेणु जी वह कविता रिकार्ड कर ली थी, जो उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘गवाह बेगमसराय’ में संकलित है। ‘गवाह बेगमसराय’ वह पिछले कई वर्षों से लिख रहे थे। यह छपकर आया 2013 में। दरअसल यह एक कथा-सूत्र में पिरोकर लिखी गयी आत्मकथा है, जिसमें घटनाएं, नाम, पात्र, ब्योरे सब वास्तविक हैं।

लेकिन इसका शिल्प कथारस में रसा-पगा है। ‘बेगमसराय’ बिहार के एक शहर ‘बेगुसराय’ का पुराना नाम है। इस शहर में पुष्प जी का बचपन बीता था। उसकी यादों से वह कभी उबर नहीं पाये और अपनी इस आख़िरी पुस्तक को नाम दिया ‘गवाह बेगमसराय’। संयोग ऐसा कि इस पुस्तक का लोकार्पण भी बेगुसराय में हुआ। बेगुसराय में उनके पाठकों-प्रशंसकों की कोई कमी नहीं। उन्हीं लोगों ने पिछले वर्ष 20 दिसंबर को उनके जन्मदिन पर बेगूसराय में एक कार्यक्रम आयोजित किया। उम्र के आधिक्य और हृदय रोग से पीड़ित पुष्प जी वहाँ जाना तो चाहते थे, लेकिन अकेले जाना संभव नहीं था। उन्होंने मुझसे साथ चलने को कहा। मैं साथ गया। 20 दिसंबर की वह शाम बेगुसराय के लिए किसी उत्सव की तरह था, तो मेरे लिए उनके पाठकों-प्रशंसकों की उमड़ी भीड़ को देखना कल्पनातीत अनुभव। पब्लिक स्कूल का हॉल खचाखच भरा था। उस शाम उन्होंने साहित्य, समाज और बेगूसराय के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हुए कहा था, ‘गवाह बेगमसराय’ के जरिये मैं इस शहर को अपना कर्ज़ चुकाने आया हूँ।’ अगली सुबह वह उस स्कूल में भी गये, जहाँ के शिक्षक त्रिशूलधारी बाबा के कहने पर उन्होंने स्कूल पत्रिका के लिए अपनी पहली कहानी ‘अख़बार’ लिखी थी। वही दो शिक्षिकाएँ मिलीं। छूटते ही प्रणाम किया और बोलीं, ‘‘आपकी कहानियाँ पढ़ते रहे हैं।’’ यह था एक लेखक का पाठक-समाज। किसी लेखक की कहानियाँ, उपन्यास दूर-दराज़ बैठे पाठकों की स्मृति में दर्ज़ हैं, यह किसी अवार्ड, पुरस्कार से कहीं बड़ा

होता है। रॉबिन शॉ पुष्प का कथा-संसार पाठकों की इसी मक़बूलियत से बड़ा बना है। वह कभी आलोचकों की पसंद के बायस नहीं बने। इसका उन्हें कभी मलाल भी नहीं रहा। उनके लेखन का सूत्र वाक्य थी एला बिलर बिलकॉक्स की ये पंक्तियाँ,‘ट्रू क्रिटिक्स में बो टु आर्ट, एण्ड आई एम इट्स ओन टू लवर। इट इज़ नॉट आर्ट, बट हार्ट, ह्विच विन्स द वाइड वर्ल्ड ओवर।’

वाकई वह पाठकों के दिल को जीतने वाले लेखक इसीलिए थे कि ‘लेखन उनके लिए एक क़िस्म की दुआ थी, जो दिमाग से नहीं हमेशा दिल से की जाती है।’ (आत्मकथ्य) उनकी कहानियाँ, उपन्यास पाठकों में किस क़दर लोकप्रिय हुए, इसका अंदाज़ा लगाना आज मुश्किल है। लेकिन ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ‘सारिका’ में छपी कहानियों पर उन दिनों देशभर से सैकड़ों की संख्या में आने वाली चिट्ठियों और लेखकों-संपादकों के प्रशंसा पत्र गवाह हैं कि वे प्रसिद्धि की किस ऊँचाई पर थे। यह प्रसिद्धि ही थी कि ‘एक चादर मैली-सी’ से प्रसिद्ध हो चुके राजिन्दर सिंह बेदी को जब पता चला कि रॉबिन शॉ पुष्प बंबई आये हुए हैं, तो वह भागे-भागे उनसे मिलने रेस्टहाउस पहुँच गये, ‘‘पुष्प जी रेस्ट हाउस में आराम कर रहे हैं। इतना सुनते ही, मैं अपने आपको रोक नहीं सका। आर्ट डायरेक्टर के साथ रेस्ट हाउस पहुँच गया। वजह बस यही रही कि रॉबिन शॉ पुष्प की कहानियों और नॉवल्स के साथ मेरा गहरा रिश्ता रहा है। उनसे मिलकर मैंने महसूस किया कि ऐसे लोग कम ही मिलते हैं, जिनकी जबान में जो सादगी रहती है, वही ज़िन्दगी में भी।’’ बेदी ने सही कहा था। रॉबिन शॉ पुष्प की ज़िन्दगी और ज़बान दोनों में ग़ज़ब की सादगी थी। उनकी कहानियों के कथ्य, भाषा, शिल्प में जैसे ज़िन्दगी साँस लेती है। कोई बनावट नहीं। कोई चकाचौंध नहीं। मितव्ययी इतने कि एक शब्द फालतू नहीं। इसीलिए उनकी कहानियों, उपन्यासों का आकार नपा-तुला है। ‘थोड़ा-सा आकाश, थोड़ा-सा समुद्र’ हो या ‘अन्याय को क्षमा’ कई पीढ़ियों की कथा होते हुए भी ये उपन्यास वृहदकाय नहीं हुए। उनकी कहानियों के पात्र हमारे आस-पास मिलते हैं। वे हम ही होते हैं। डॉक्टर श्री निवास बिहार के जाने-माने कॉडियोलॉजिस्ट थे। साहित्यिक अभिरुचि थी उनकी। उन्हीं की प्रेरणा से पटना में ‘इंदिरा गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी’ की स्थापना हुई। वह मरीज को देखकर उसके सम्मान में खड़े हो जाते थे। रॉबिन शॉ पुष्प के इनसे अंतरंग

संबंध थे। उन्होंने एक कहानी लिखी ‘हरी बत्तियों का दरख़्त’। यह ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में छपी और खूब चर्चित हुई। इस कहानी का पात्र डॉक्टर कहता है, ‘जब कोई हार्ट पेशेंट मेरे सामने आता है, तब मुझे लगता है, कोई टूटकर गिरने वाला मंदिर मेरे सामने आ गया है।...उस वक़्त मैं किसी आदमी के सामने नहीं खड़ा होता, मंदिर के समक्ष खड़ा होता हूँ। फिर मैं किसी डॉक्टर की तरह नहीं, बल्कि एक मामूली राजमिस्त्री की तरह मंदिर की मरम्मत में जुट जाता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ, अगर मंदिर गिर गया, तो वहाँ भगवान भी नहीं रहेंगे...।’ उनकी कहानियों, उपन्यासों का फलक बहुत विस्तृत था, लेकिन उनमें दो बातें ग़ौर करने वाली हैं। एक ‘सेल्फ आइडेंटिटी’ की तलाश और दूसरी स्त्री पात्रों की केंद्रीयता। आज जब स्त्री विमर्श पर वाद-विवाद-संवाद साहित्य के केंद्र में है, आश्चर्य कि इसके प्रस्थान-बिन्दु पुष्प जी की तमाम कहानियों में बहुत पहले ही से मिलते हैं। उनकी बेशुमार कहानियों में स्त्रियाँ हैं। इन स्त्रियों का संघर्ष बाहरी और भीतरी दोनों स्तरों पर है। वे हर स्तर पर लड़ती हैं और जीतती हैं। वे लादी गयी अवांछित परंपराओं और रूढ़ियों का विरोध करती हैं। विद्रोह करती हैं। उनके कहानी संग्रहों ‘हरी बत्तियों के दरख़्त’ से लेकर ‘अग्निकुंड’ तक में ये स्त्रियाँ उपस्थित हैं। ‘अग्निकुंड’ तो उनकी बेहद चर्चित कहानी रही। राजनीति से लोहा लेती इवलिन डेविस हो या ज़िन्दगी की जंग में अपनी अस्मिता के लिए जूझती ‘कौर’ की सुरजीत कौर...। ये उस वक़्त लिखी गयी अपने वक्त से आगे की कहानियाँ थीं। ये कहानियाँ जिस वक़्त लिखी गयीं, ऐसी कल्पना हिन्दी कहानी में लगभग अनुपस्थित थी। रॉबिन शॉ पुष्प अनुपस्थित को उपस्थित करने के लेखक थे, तो इसलिए कि वह किसी ‘वाद’ के झंडाबरदार नहीं रहे और ताज़्ज़ुब नहीं कि यह एक बड़ी वजह थी, उन पर जायज चर्चा से बचकर निकल जाने की। राजेन्द्र यादव ने एक बार कहा था, ‘‘हिन्दी कथा लेखन रॉबिन शॉ पुष्प की चर्चा के बग़ैर अधूरा होगा।’ रॉबिन शॉ पुष्प नये से नये लेखकों को पढ़ते थे। अनामिका से लेकर हृषीकेश सुलभ तक, संतोष दीक्षित से लेकर मनोज पांडेय तक के लिखे को सराहते थे। व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखकर या विभिन्न अवसरों पर चर्चा कर उनकी कहानियों पर अपनी राय व्यक्त करते थे। उन्हें प्रतिभाओं की पहचान थी और उसे बढ़ाने में परोक्ष-प्रत्यक्ष मददगार भी होते थे। उन्होंने जब बिहार की पहली लघु फिल्म ‘डाक बाबू’ बनायी, तो उसमें कुणाल और रीता भादुड़ी को ब्रेक दिया। बाद में कुणाल भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार बने, तो रीता भादुड़ी हिन्दी फिल्मों की समर्थ अभिनेत्री के रूप में पहचानी गयीं। सुबोध गुप्ता को शुरुआती दिनों में पुष्प जी ने खूब प्रोत्साहित किया, आज सुबोध गुप्ता अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पेंटर है। पत्रकार-लेखक विकास कुमार झा और मुझ पर भी उनका विशेष स्नेह रहा। उन्होंने संघर्ष के दिनों में मुझे आत्मीयता तो दी ही, ‘पाटलिपुत्र टाइम्स’ अख़बार शुरूहोते ही मुझे नौकरी दिलाने में भी मददगार रहे। इस अख़बार में इंटरव्यू देने के लिए मुझे बुलाने ट्रेन से वह खगौल गये। आशय यह कि वह एक लेखक के तौर पर ही नहीं, इन्सान के तौर पर भी बड़े थे। उनका बड़प्पन, प्यार और स्नेह से पगा था। यही वजह है कि वह जिससे जुड़े, वह उनके परिवार का सदस्य हो गया। उनका यह परिवार बहुत बड़ा था। पटना, मुंगेर, बेगुसराय तो जैसे उनके परिजनों का ही परिक्षेत्र था। पुष्प जी जब अपना घर बनाकर पटना के ‘बहादुरपुर कॉलोनी’ में शिफ्ट हो गये, तो परिवार-परिजनों का यह दायरा सिमटने लगा। धीरे-धीरे जमघटें घटने लगीं। दो बेटे संजय और सुमित अपनी नौकरी और कार्यव्यस्तता में बाहर रहने लगे। घर में उनकी पत्नी डॉ. गीता पुष्प शॉ और भतीजी डॉ. शीला जॉयस शॉ रह गये। गीता जी आजीवन उनकी जीवन संगिनी ही नहीं, शक्ति-सामर्थ्य भी बनी रहीं। गीता जी और शीला जी अपने-अपने कॉलेज चली जातीं, तो उनका अकेलापन और बढ़ जाता। ऐसे में वह लिखते-पढ़ते या पुरानी बिखरी रचनाओं को समेटते-सहेजते। यह सहेजना-समेटना व्यस्त रखने का बहाना था। लेकिन सच तो यह है कि साहित्य समाज इतना व्यस्त हो गया था कि इस दौरान उन्हें सहेजने-समेटने की किसी को सुध नहीं रह गयी थी। इसी बीच उन्होंने ‘गवाह बेगमसराय’ पूरा किया। इसमें पटना और बिहार का एक पूरा युग बोलता है। साहित्य-संस्कृति और तमाम सामाजिक राजनीतिक हलचलें बोलती हैं। इस बोलने में रॉबिन शॉ पुष्प का शालीन व्यक्तित्व शामिल है, जो किसी के प्रति कटुता नहीं पालता। संभव है, उनकी पीढ़ी का यह संस्कार रहा हो, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर वह गहरे तक मानवीय करुणा से ओत-प्रोत थे।

यह करुणा उन्हें ईसा मसीह से मिली थी। वह ईसाई थे, लेकिन उन्हें कभी चर्च जाते नहीं देखा था। क्रॉस बनाते नहीं देखा था। लेकिन करुणा उनके व्यक्तित्व में जन्मजात थी। वह माँ, मुंगेर और मानवीय करुणा से इस हद तक गहरे जुड़े थे कि उनकी रचनाओं में ये विविध रूपों में आते रहे। वह माँ की तस्वीर के आगे अगरबत्ती जलाकर लिखना शुरूकरते थे। ईसाई तस्वीर पर अगरबत्ती नहीं जलाते। वह एक तरह से परंपरा भंजक थे। वह अपनी माँ के प्रति अपनी श्रद्धा आजीवन ऐसे ही व्यक्त करते रहे। ‘मसीही आवाज़’ का जब संपादन किया, तो ईसाई समाज में व्याप्त रूढ़ियों पर करारा प्रहार करते कई लेख छापे। मुंगेर उनकी कहानियों का घटनास्थल ही नहीं रहा, उनकी रगों में दौड़ता एक ऐसा आख्यान था, जो कभी ख़त्म नहीं हुआ। ‘यात्रा एक वेश्यानगर की’ इसी शहर पर लिखा गया था और ‘सारिका’ मे छपने के बाद चर्चा और विवाद के केंद्र में रहा। ‘काँपती आँखें ढहती दीवारें’ उपन्यास मुंगेर की वेश्याओं के जीवन, सम्मान और संघर्ष की कथा है। मानवीय करुणा तो उनकी हर रचना की अंतर्धारा है। आशय यह कि पुष्प जी के लेखक को देखने के लिए गहरी अंतरंगता और मानवीय करुणा वाली दृष्टि की दरकार होगी, जो कालांतर में दिखती नहीं नज़र आती।

तीन-तीन ‘हार्ट अटैक’ के बावजूद पुष्प जी मौत को मात दे चुके जीवट के इन्सान थे। दवाओं और परहेजों के सहारे जीवन व्यवस्थित चल रहा था, लेकिन जैसे उन्हें साज़ो-समान समेट लेने का पूर्वाभास हो चला था। पिछले एक साल से वह अपनी रचनावली की प्रतीक्षा कर रहे थे। इस वर्ष वह छह खंडों में छपकर आ गयी। उसका एक सेट उन्होंने 10 जून को मुझे दिया। अपनी खूबसूरत राइटिंग मे मेरी पत्नी, बेटियों और मेरे नाम के आगे लिखा-आशीर्वाद के साथ। उनका आशीर्वाद लेने मैं बीच-बीच में उनके पास जाता रहा। इधर उन्हें यूरिन की समस्या हो गयी थी। उपाय ऑपरेशन। लेकिन उम्र और हृदयरोग से

यह संभव नहीं लग रहा था। पुष्प जी स्वयं ऑपरेशन के नाम से घबरा रहे थे। उस दिन वह ‘यूरिन पास’ न होने से बेहद पीड़ा में थे। मेरा हाथ पकड़कर बार-बार यही कहते रहे,‘अवधेश, मुझे बचा लो।’ यह बेहद मार्मिक क्षण था। मैं जानता था वह मृत्यु से नहीं, अपनी पीड़ा से उबारने की गुहार लगा रहे हैं। उस दिन मुझे लगा, सारी उम्र करुणा जीता रहा एक इन्सान, आज स्वयं एक कारुणिक पुकार बन गया है। इसी दौरान वह विस्मृति के शिकार हुए। मनोचिकित्सक व लेखक मित्र डॉ. विनय कुमार को लेकर पुष्प जी के घर गया। डॉ. विनय ने उनसे बात की। पुष्प जी ने अस्पष्ट-अस्फुट जवाब दिया। डॉ. विनय ने कुछ टेस्ट बताये, दवा लिखी। दवा असर करने लगी थी। पुष्प जी स्मृतियों को पकड़ने लगे थे। उनके छोटे पुत्र सुमित दिल्ली से आये। बेहतर इलाज और स्थान परिवर्तन के लिए उन्हें और गीता जी को साथ लेकर दिल्ली चले गये। लेकिन दस दिन में ही उन्होंने घर वापस जाने की ज़िद शुरूकर दी। 30 अक्टूबर को सुमित पुष्प जी और गीता जी को लेकर पटना पहुँचे। बहादुरपुर स्थित घर ‘रवीन्द्रांगन’ में वह अपने बिस्तर पर लेटे और फिर लेटे ही रह गये। वह घर जिसे उन्होंने बेहद प्यार और श्रम से बनवाया था, सदा के लिए छूट गया।

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