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मंतव्य 2 - स्वप्निल श्रीवास्तव की कहानी - बड़े साहब का कुत्ता

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(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश...

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश अनंत का लघु उपन्यास लालटेन यहाँ पढ़ें)

 

 

जीवन की राहों में

बड़े साहब का कुत्ता

स्वप्निल श्रीवास्तव

बड़े साहब के आने के पहले उनके अफ़साने जिले में आ चुके थे। इन अफ़सानों में उनकी तस्वीर एक बदमिज़ाज आदमी की थी। वे अपने आगे किसी की नहीं सुनते थे। नेताओं से उन्हें चिढ़ थी। वे उन्हें बाल बराबर नहीं समझते थे। अमीरों के वे जानी दुश्मन थे, इस नाते जनता में उनकी छवि एक बगावती आफ़िसर की थी। वे निम्न मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे। मुश्किल से उनकी पढ़ाई हुई। वे अपने बल पर बड़े ओहदे पर पहुँचे थे। उन्हें नींद न आने की बीमारी थी, इसलिए वे रात भर बौड़ियाते रहते थे। चूँकि उन्हें नींद नहीं आती थी, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से बदमिज़ाज हो गये थे। वे अपने मातहतों को ज़लील करते रहते था। यह उनका शगल था। बात-बात में वे अपनी अफ़सरी झाड़ते रहते थे। उनके मातहत उनसे त्रस्त रहते थे। अपने बदतमीज़ स्वभाव के कारण वे किसी को कुछ भी कह सकते थे, कह देते थे। किसी में उनका विरोध करने का साहस नहीं था। सब लोग अपनी इज्ज़त बचाने के फिराक़ में रहते थे।

उनके आने से पहले उनके बंगले को सजाया जा रहा था। बंगले का रंग-रोगन हो रहा था। फ़र्नीचर दुरुस्त किये जा रहे थे। इस काम में कारिंदे जुटे हुए थे। विभागों की फ़ाइलें अपटूडेट की जा रही थीं। इसके बावजूद किसी न किसी पर गाज़ गिर जाती थी। उनके पी.ए. इस काम में मुस्तैदी से लगे हुए थे। उन्हें विभाग की पूरी जानकारी थी। छोटे-मोटे आफ़िसर पी. ए. के पीछे लगे हुए थे और उन्हें पटा रहे थे। पी. ए. का खूब जलवा था। वे बड़े साहब की नाक के बाल थे। कोई बड़ा साहब आता, तो उनसे ही विभाग की जानकारी लेता था।

बड़े साहब पास के जिले से आ रहे थे। सुना गया था कि उन्होंने किसी माफ़िया पर हाथ डाला था। वह दबंग आदमी था। उसकी मिनिस्ट्री में पहुँच थी। इसलिए भारी रकम देकर उनका तबादला करवा दिया था। बड़े साहब भी कम शातिर नहीं थे। उन्होंने उसको इतना नेस्तानबूत कर दिया था कि वह पनप नहीं सका। उनका आना ऐसे लग रहा था कि जैसे जिले में कोई भेड़िया आ रहा हो। लोग डरे हुए थे। बेईमान अधिकारियों की ख़ैर नहीं थी। मैं भी इस जिले में पदस्थापित था। अपना काम ढंग से करता था। किसी ने मुझ पर ऊंगली नहीं उठाई थी, लेकिन इस आदमी का क्या भरोसा, कब क्या कर बैठे। पुरानी कहावत है-गेहूँ के साथ घुन भी पीसे जाते हैं। अपना रोब जमाने के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। वे मूल रूप से बददिमाग थे। वे ठेठ देहाती की तरह रहते थे। उन्हें पहनने-ओढ़ने की कोई तमीज़ नहीं थी।

उलटे जो अच्छे कपड़े पहनता था, उस पर वे व्यंग्य करते थे। इसलिये लोग उनके सामने खराब कपड़े पहन कर आते थे।

वे अपने माल-असबाब के साथ जिले में धमक चुके थे। उनके बंगले में मिलने वालों की भीड़ जमा हो रही थी। मैंने सोचा, इस भीड़ में मिलना ठीक नहीं रहेगा। थोड़ी भीड़ छँट जाये, तो मिलना अच्छा रहेगा। जो उनसे मिल कर आ रहे थे, उनके पसीने छूट रहे थे। उनकी नानी याद आ रही थी। मैंने अपने काम की एक लिस्ट बनानी शुरू कर दी ताकि मैं तफ़सील से अपनी उपलब्धियों को बता सकूँ। हड़बड़ी में बने हुए काम बिगड़ जाते हैं। मुझे पिता का दिया हुआ यह पाठ याद था। लोगों पर उनका नज़ला गिर जाये, वे सामान्य हो जायें, तब मिलना उचित रहेगा।

मैंने उनसे मिलने के लिए छुट्टी का दिन चुना था। मैं सुबह के दस बजे उनके बंगले पर पहुँच गया था। पी. ए. बाबू से पहले से ही पहचान थी। दरअसल उन्होंने कहा था कि मैं बड़े साहब से किसी छुट्टी के दिन मिलूँ। छुट्टी के दिन भीड़ कम होती थी। मैंने देखा, एक कुत्ता अपनी टांग उठाकर एक फ़ाइल पर मूत रहा था। कुत्ता देशी बिलायती का पंचमेल था। थोड़ा देशी कुत्तों से बड़ा था, लेकिन उसे बिलायती नहीं कहा जा सकता था। देखने में वह खूंखार लग रहा था। आँखें बहुत चमकीली थीं। उसमें हिंसक ललाई थी। मैंने पी. ए. से पूछा, ‘‘यह किसका कुत्ता है?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘इसे कुत्ता न कहें।’’

‘‘कुत्ते को कुत्ता न कहें तो क्या कहें?’’मैंने प्रतिवाद किया।

‘‘यह कुत्ता नहीं है, इसका नाम चर्चिल है।’’ पी. ए. ने किंचित हास्य से यह बात कही। मैं समझ गया, इस कुत्ते की हैसियत कम नहीं है। ‘‘आप मना तो करिये। यह तो फ़ाइल पर पेशाब कर रहा है।’’ मैंने उन्हें सुझाव दिया।

‘‘चर्चिल अपने साहब के स्वभाव पर गया है। उन्हीं की तरह बेअदब है।’’ यह बात उन्होंने मुझसे कही। वे सार्वजनिक रूप से इस बात को कहने की हैसियत नहीं रखते थे। मुझसे दोस्ती के नाते उनकी यह बेबाक राय थी।

मैं उसे घूर रहा था और वह मुझे। मुझे लगा, वह बहुत ढीठ किस्म का जानवर है जो एक बिगड़ैल अधिकारी के साथ रहते हुए मनबढ़ू हो गया है। वह अपने मूल स्वभाव को भूल चुका था।

दफ़्तर में कई लोग बैठे हुए थे। वह सबको बारी-बारी सूंघ रहा था। लोग डरे हुए थे, कहीं वह काट न ले। पेट में बीस सूई लगवाने की नौबत न आन पड़े। ‘‘आप लोगों को इसे बाँधकर रखना चाहिए।’’ मैंने पी. ए. बाबू को बिना माँगे राय दे डाली। ‘‘किसकी हिम्मत है जो इसको बाँधे। यह बड़े साहब का कुत्ता है।’’ थोड़ी देर में वह सबको सूँघ कर चला गया। लोगों की जान में जान आयी।

मैंने उनसे पूछा, ‘‘बड़े साहब कहाँ गये हैं?’’ ‘‘दौरे पर गये हैं।’’ पी. ए. ने जवाब दिया। ‘‘क्या छुट्टी में आराम नहीं करते हैं?’’

‘‘न आराम करते हैं, न आराम करने देते हैं। इनके बाल-बच्चे गाँव पर हैं। वक़्त काटने के लिए हम सब लोगों को नाधे रहते हैं। हम लोग 12 बजे के पहले घर नहीं पहुँचते। घरवाले अलग गाली देते हैं। हम लोगों की जान अजब सांसत में है।’’

दो-तीन दिन के बाद उनसे मिलना हुआ। उन्होंने विभाग से सम्बंधित कई सवाल पूछे और मैंने उन्हें ठीक से जवाब दिया। मेरा टार्गेट सौ प्रतिशत था। फिर उन्होंने कहा, ‘‘ठीक से काम करो नहीं तो सस्पेंड कर दूँगा।’’

उनकी इस बेतुकी बात पर देह जल गयी, लेकिन मैं चुप रहा। मुझे बर्नाड शा की बात याद आयी। उन्होंने कहा था-‘इट इज बेटर टू कम्प्रोमाइज विथ फूल्स।’

कुछ देर बाद उन्होंने चर्चिल को आवाज दी। वह उछलता-कूदता हुआ आया। उन्होंने कहा,‘‘देखो कौन आया है?’’

चर्चिल मेरे ऊपर चढ़ने लगा, जैसे मैं कोई पेड़ हूँ। मैं इस आकस्मिक स्थिति से परेशान हो गया था। बड़े साहब ने कहा, ‘‘डरो नहीं, यह काटता नहीं है।’’ उन्होंने मुझे परेशान देखकर मज़ा आ रहा था। दरअसल यह सब उनके खेल हिस्सा था। मुझे लगा यह आदमी एबनार्मल है। इसका मानसिक विकास बहुत गलत हुआ है, अन्यथा यह इस तरह का व्यवहार नहीं करता। इसके अंदर पशुता मौजूद है। यह जिस वर्ग से आया हुआ है, उसके अवशेष खत्म नहीं हुए हैं। सुना है, बचपन में इसकी शादी हो गयी थी। बीवी से पटी नहीं इसकी। इसलिए यह पत्नी को साथ नहीं रखता। बच्चों के साथ इसका व्यवहार तानाशाहों जैसा है। इसके पास इस तरह की तमाम कुंठाएं थीं, जो आये दिन प्रकट होतीं। इसे मानसिक चिकित्सा की ज़रूरत है वरना यह पागल हो जाएगा। लोगों को बेवजह काटता रहेगा।

मैंने गलत या सही सुना था कि अंग्रेजों के ज़माने में बड़े अधिकारियों का हर साल मेंटल चेक-अप होता था। इस परंपरा को बंद नहीं करना चाहिए था। अच्छे-ख़ासे लोग बड़े पदों पर पहुँच कर अबनार्मल हो जाते हैं। बड़े साहब के चैंबर से निकला तो मन बहुत भन्नाया हुआ था। जब तक यह रहेगा, जीना हराम कर देगा। इसी मनःस्थिति में मैं पी.ए. बाबू के कमरे में पहुँच गया। उन्होंने पूछा, ‘‘कैसी रही मुलाकात?’’

मैंने उन्हें तफ़सील से पूरी बात बतायी, लेकिन वे हैरान नहीं थे। जो अफसर उनसे मिलने जाता था, उसके अनुभव मेरे अनुभव से भिन्न नहीं थे। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा, ‘‘अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। हौसला रखिये, सब ठीक हो जाएगा।’’

बड़े साहब हर हफ़्ते अधिकारियों की मीटिंग बुलाते थे। उन्हें ज़लील करते थे। बात-बात में जवाबतलब करते थे। कई अधिकारियों को बेवज़ह मुअत्तल कर चुके थे। जनपद में हाहाकार मचा हुआ था। किसी को ज़रूरी से ज़रूरी काम के लिए छुट्टी नहीं देते थे। वे किसी अधिकारी को रात-बिरात बुला लेते थे। न मिलने पर जवाब-तलब करते थे।

एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, ‘‘जाओ टीवी और वीसीआर लेकर आओ, मुझे फिल्म देखनी है।’’ रात के दस बजे थे। दुकाने बंद हो चुकी थीं। मैंने लाख कहा, ‘‘सर कल ले आऊँगा, लेकिन उन्होंने कहा, मुझे अभी और इसी वक़्त फिल्म देखनी है।’’ मैंने एक दोस्त की मदद ली। सारा साज़ोसामान पहुँचा, तो वे कहीं शहर में निकल चुके थे। पी. ए. बाबू के पास पहुँचा। उन्हें मेरी हालत पर दया आयी। रात हो चुकी थी। मैं तेज़ी से स्कूटर चला रहा था। तब तक देखा, चर्चिल मेरे पीछे दौड़ रहा है। मैं उसे देखकर सनक गया। मैंने सुना था, जब कुत्ते पीछे दौड़ रहे हों तो रूक जाना चाहिए। वे भाग जाएंगे। मैंने ऐसा ही किया, लेकिन मेरा यह अनुभव काम नहीं आया। मैं रूका, लेकिन वह भागा नहीं। उसने मुझे हबक कर काट लिया। मेरी पिंडलियों में उसके चार दाँत गड़े हुए थे। खून अलग से बह रहा था। मैं बड़े साहब के आवास से थोड़ी दूर ही गया था। मैं दर्द से बिलबिला रहा था।

पी. ए. बाबू से सारी बात बतायी। वे बहुत दुःखी हुये। उन्होंने गाड़ी के साथ मुझे डॉक्टर के पास भिजवाया। डॉक्टर ने मलहम-पट्टी की। इंजेक्शन लगा कर खाने के लिए दवा दी। मेरी हालत देखकर पत्नी रोने लगी।

मैं आराम कर रहा था कि पी. ए. बाबू का फोन आया। उन्होंने कहा, ‘‘साहब आप से बात करना चाहते हैं।’’

फोन पर बड़े साहब ने कहा, ‘‘सुना है तुम्हें चर्चिल ने काट लिया है, लेकिन तुम्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है। वह विषैला नहीं है, उसे हर हफ़्ते सूई लगती है। तुम दवा-दुआ के चक्कर में मत पड़ो। सब ठीक हो जाएगा।’’ उनकी आवाज़ में कोई सहानुभूति नहीं थी।

मैं उनकी बात के जवाब में हाँ, हूँ करता रहा। उनकी सलाह मानने के काबिल नहीं थी।

मुझे ठीक होने में दो हफ़्ते लगे, लेकिन एक हफ़्ते और घर पर था। इसी बहाने मैं आराम कर रहा था। ज़रूरी फ़ाइलें निपटाने के लिए स्टाफ़ को घर बुला लेता था। मीटिंग से छुट्टी मिल गयी थी, लेकिन मुझे बड़े साहब से वितृष्णा हो रही थी। यह आदमी है या पैज़ामा? यह आदमी सारी दुनिया से खफ़ा रहता है और अपने आप को सबसे क़ाबिल समझता है। वह अपने टूटपूँजियेपन को अपने अहंकार से छिपा रहा था।

धीरे-धीरे मैं चले लायक हो गया था। कुत्ते काटे का दंश ठीक हो रहा था, लेकिन मेरे भीतर ज़ख़्म हरे थे। कई दिन बीत गये थे। मैंने सोचा, मुझे साहब से मिलना चाहिए, अन्यथा वे बुरा मान जाएंगे। कोई न कोई मुसीबत खड़ी कर देंगे। नंगों से तो परमेश्वर डरता है।

रविवार का दिन था। आगंतुक कक्ष डॉक्टरों से भरा हुआ था। मुझे लगा, शायद कोई मीटिंग होने वाली है। ऐसा क्या आन पड़ा कि छुट्टी के दिन मीटिंग बुलानी पड़ी। मेरे दिमाग में बहुत से ख्याल उमड़ रहे थे। मेरी जिज्ञासा का उत्तर पी.ए. साहब के पास था। मैंने उनके चेहरे पर बेचैनी देखी। माहौल में थोड़ा-बहुत तनाव दिखाई दे रहा था। बड़े साहब ने माहौल ही ऐसा बना रखा था। वहाँ पहुँचकर आदमी खामखां असहज हो जाता था।

मैंने पी. ए. के कान के पास पहुँचकर पूछा, ‘‘क्या बात है भाई जान, डॉक्टरों की इतनी बड़ा फ़ौज यहाँ क्या कर रही है? कोई शासन से मीटिंग के लिए आदेश तो नहीं आया है या कोई इमरजेंसी है?’’ उन्होंने मेरे कान में जो बात कही, उसे सुन कर मैं उछल गया।

दरअसल चर्चिल ने उन्हें काट लिया था। उनके इलाज के लिए डॉक्टरों की फ़ौज को बुलाया गया था। जब मुझे चर्चिल ने काटा था, तो उन्होंने कहा था, तुम्हें किसी इलाज की ज़रूरत नहीं है, चर्चिल को हफ़्तावार इंजेक्शन लगता है। इसलिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। जब इस कमबख़्त को चर्चिल ने काटा, तो इन्होंने डॉक्टरों की फ़ौज बुला ली। कहावत है- पर उपदेश कुशल बहुतेरे। इस बात से इस आदमी का दोगलपन जाहिर होता है। बहुत कम अफ़सर होते हैं, जो बड़े ओहदे पर पहुँचकर मानवीय रह पाते हैं। मैंने अपने करियर में कम ही लोग देखे हैं जिनके पास अच्छे व्यवहार की पूँजी थी। नकचढ़े अफ़सरों के साथ काम करते हुए मेरी संवेदना भोथर हो चली थी। किसी तरह मैं उसे बचाये हुए था। किस्सा-कोताह यह कि किसी आदमी ने बताया कि आप कुत्ते की पूँछ काट कर दरवाज़े पर गाड़ दीजिये, इससे कुत्ता आपके काबू में रहेगा। यह बात साहब की अक्ल में आ गयी। एक दिन उन्होंने कुत्ते की पूँछ हलाल कर उसे दरवाज़े पर गाड़ दिया। चर्चिल लहूलुहान होकर कई दिनों तक भोंकरता रहा। हालांकि कुत्ते में जो बदतमीज़ी आयी थी, उसका बढ़ावा साहेब ने दिया था। कुत्ता दिन ब दिन आक्रामक होता जा रहा था। बड़े साहब की नहीं सुनता था। इस बात से बड़े साहब बहुत चिंतित थे। उन्होंने कई लोगों से राय ली। उसे एक सिरफिरे की राय पसंद आयी।

चर्चिल अब कैम्पस में कम दिखाई देता था। यह लोगों के लिए राहत की ख़बर थी। किसी को क्या पता था कि बड़ा साहब संकट में पड़ने वाला है। मुसीबत का यह रास्ता उसका ही बनाया हुआ था। जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद गड्ढे में गिरता है। लोग इस बात से अक्सर अनजान रहते हैं।

बड़े-बड़े सूरमाओं की यही गत होती है।

जब चर्चिल की तबीयत ठीक हुई, वह पागल सा हो गया था। वह बेतरह भूँकता था और काटने के लिए दौड़ता था। वह बड़े साहब को देखकर गुर्राता था। उसके इस व्यवहार से साहब परेशान थे। जिस कुत्ते को पाल-पोसकर बड़ा किया। उसके तेवर बदले हुए थे।

एक दिन बड़े साहब अपने चैंबर में बैठे हुए थे। चर्चिल गुर्राते हुए आया और उनके हाथ को बुरी तरह चबा गया। साहब लहूलुहान हो गये। साहब ने लाठी उठायी और वह चर्चिल को बुरी तरह पीटने लगे। उसे पीटते समय वे हाँफ रहे थे। स्टाफ़ के लोग दौड़ते हुए आये। डॉक्टर को बुलाकर मरहम-पट्टी की गयी। स्टाफ के लोग मन ही मन खुश थे। इस ख़बर से मैं भी कम प्रसन्न नहीं था। मेरा बदला उनके कुत्ते ने ले लिया।

बड़े साहब ने डॉक्टरों को बुलाया। सभी ने मिलकर उसे दवाइयाँ लिखी। इंजेक्शन लगाये। बड़े साहब अपने बेड रूम में लेटे रहे। रोज़ डॉक्टर आते, उसे दवाइयाँ देते। स्टाफ़ के लोग उसकी सेवा में लगे रहे। बड़े साहब का पारा जो सातवें आसमान पर था, वह धीरे-धीरे उतर रहा था। चर्चिल को एक मजबूत जंजीर से बाँध दिया गया था।

उसे देखने वालों का तांता लगा हुआ था। जिले के लोग उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। यह ख़बर शहर के चप्पे-चप्पे में फैल चुकी थी। कुछ लोग भयवश उसे देखने आ रहे थे। कुछ लोग सौजन्यता बस मिल रहे थे। इतना तय था, किसी की उसके प्रति सहानुभूति नहीं थी। लोग यही कह रहे थे- बहुत अच्छा हुआ। मैं भी उनसे मिलने गया। वह सामान्य था, मन हुआ, उनसे पूछूँ- अब आपको कैसा लग रहा है?

लेकिन यह पूछना, मुझे उचित नहीं लगा। उनके चेहरे को देखकर लगा, वह ज़रूर मेरे बारे में सोच रहे होंगे। चर्चिल के काटने के बाद जो राय उन्होंने मुझे दी थी, मैंने उसे वह अपनाया नहीं था।

बड़े साहब और चर्चिल दोनों का पतन हो चुका था। मुझे चर्चिल का डर नहीं था। मैं अब आराम से बड़े साहब से मिलने जाता था। बड़े साहब को कदाचित अपनी भूल का एहसास हो चुका था।

510, अवधपुरी कॉलोनी, अमानीगंज, फैजाबाद-224001

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रचनाकार: मंतव्य 2 - स्वप्निल श्रीवास्तव की कहानी - बड़े साहब का कुत्ता
मंतव्य 2 - स्वप्निल श्रीवास्तव की कहानी - बड़े साहब का कुत्ता
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