स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 7 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली

भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5   भाग 6

17. हार्वर्ड से बहुदिगंत आनुष्ठानिक भ्रमण (भाग-दो)

यूरोपीय समुदाय: स्ट्रासबर्ग और ब्रसेल्स

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के विभिन्न देशों में फेडरल संगठन के निर्माण का प्रयास तेजी से बढ़ा। पहले चरण में संपृक्त देशों के बीच केवल आर्थिक संयोग और सहयोग संभव था। बाद में, संयुक्त सरकार के रूप में उन्होंने अपनी संसद और फेडरल प्रशासन केंद्र की स्थापना की थी।

सम्पूर्ण यूरोप को एक राजनीतिक और आर्थिक इकाई में परिवर्तित करने के प्रयास अभी भी चल रहे हैं। पहले, राष्ट्रसमूह में सदस्यों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है। इस संगठन में शामिल करने के लिए तुर्की विचाराधीन देश है। नए देश को संगठन में जोड़ने से पहले कुछ निश्चित पदक्षेप लेने पड़ते है। अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करने पर हमें उन कदमों की जानकारी हुई। विशेषकर लोकतांत्रिक सरकार और मानवाधिकारों के प्रति सम्मान दो सबसे महत्वपूर्ण चीज है। केमाल अतातुर्क के समय से तुर्की में एक लोकतांत्रिक सरकार है। विविध सामाजिक सुधारों के द्वारा केमाल ने तुर्की को आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में रूपांतरित कर दिया था। तुर्की का मानवाधिकारों के बारे में भी काफी अच्छा रिकॉर्ड है। प्रसिद्ध तुर्की लेखक ओरहाम पानुक ने अपने टेलीविजन साक्षात्कार में तुर्की में बहुसंख्यक अर्मेनियाई नागरिकों की हत्या के बारे में बताया था,जिससे तुर्की सरकार नाराज हो गई थी। इस आरोप के कारण राष्ट्रसमूह का सदस्य होने में तुर्की के अनुरोध को कुछ हद तक बाधा पहुंची। तुर्की ने पानुक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी। हालांकि पनुक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई थी क्योंकि शायद ऐसा करना उनके लिए संघ की सदस्यता पाने में अड़चन पैदा कर सकता था। इस संबंध में वर्तमान में चल रही वार्ता के सफल होने की संभावना है।

नए सदस्य को लेने से पहले उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि एवं आय के बारे में जानकारी ली जाती है। इसका कारण है कि यूरोपीय समुदाय (ई.सी.) अब एक आर्थिक संगठन के रूप में माना जाता है। यह अब एक सामूहिक निकाय के रूप में विभिन्न देशों के साथ व्यापार करता है और किसी विशिष्ट राजनीतिक समस्या के समाधान के बारे में एकजुट होकर निर्णय लेता है।

हम 12 दिसंबर को बोस्टन से ब्रसेल्स की उड़ान पकड़ कर रात को 9.30 बजे वहाँ पहुंचे। दिसंबर के मध्य में घने कोहरे के कारण हवाई जहाज उतरते समय कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। हमारे कई दोस्त सपरिवार थे। हमारी औपचारिक यात्रा खत्म होने के बाद वे लोग यूरोप में कुछ दिन घूमने की योजना बना रहे थे। हवाई अड्डे से हमारी होटल मेट्रोपॉल आधे घंटे की दूरी पर था। हम वहां सवा दस बजे पहुंचे। लंबी उड़ान के बाद थकान लगने लगी थी। अपने कमरे में खाने को कुछ मंगाकर खा-पीकर मैं सो गया। अगले दिन हमारे लिए संघ के मुख्य कार्यालय का दौरा करना निर्धारित था। वाणिज्य और अंतरराष्ट्रीय संबंध के आयुक्त ने हमें संघ के संक्षिप्त इतिहास का ब्यौरा देते हुए वर्तमान के पारस्परिक व्यापार, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति की स्थिति पर चर्चा की। ई.सी. का कार्यालय बहुत बड़ा है। यूरोप के सभी प्रभावशाली देशों के बीच आर्थिक संबंधों पर नजर रखने वाला आयुक्त-विभाग ई.सी. का सबसे महत्वपूर्ण विभाग लगा। इसके अतिरिक्त, यह विभाग ई.सी. के साथ विश्व के अन्य सभी देशों के साथ विदेशी-संबंधों का परिचालन करता है। हमारे मित्र जेम्स ने ई.सी. के कार्यालय में पन्द्रह वर्षों तक काम किया था। इसलिए उन्होंने हमें ई॰सी॰ के कार्य करने के तौर-तरीकों और इसके विभिन्न विभागों के बारे में पहले से ही बता दिया था। वाणिज्य आयुक्त ने अपना संभाषण पूरा करने के बाद हमें होटल यूरोपा में दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया। लंच के बाद जेम्स ने हमें विभिन्न विभागों में ले जाकर वहाँ के अधिकारियों से हमारा परिचय कराया। दिन के साढ़े तीन बजते-बजते अत्यंत ठंड हो गई थी और बर्फबारी होने लगी। हम साढ़े चार बजे स्टेशन स्ट्रासबर्ग गए। रास्ते में नामूर बड़ा स्टेशन आया, बाद में लक्जमबर्ग। इन दो स्टेशनों के बाद हम स्ट्रॉसबर्ग पहुंचे। रिटर्न होटल में हमारे ठहरने के लिए व्यवस्था की गई थी। ई.सी. संसद के दो वरिष्ठ अधिकारी हमें रेलवे स्टेशन पर मिले, जो हमें होटल में ले गए। हिमपात धीरे-धीरे बढ़ने लगा, जल्दी से भोजन कर मैं सोने चला गया। जेम्स, आर्टुरो, जोहान और कुछ अन्य लोग बर्फ में घूमने के लिए बाहर निकल गए। उन्होंने मुझे आवाज दी, लेकिन इस दुस्साहसिक कार्य के लिए मेरी कतई इच्छा नहीं थी।इसलिए मैं उन्हें शुभ-रात्रि कहकर सो गया।

उसके परवर्ती दो दिन ई.सी.संसद के प्रमुख ने हमसे मुलाक़ात की। वे (डोलोरेस) विश्व के शक्तिशाली राजनेताओं में माने जाते हैं और उनके नेतृत्व में ई॰सी॰ का कार्य-परिसर कई गुना बढ़ गया था। सदस्यों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई थी। यूरोप के लगभग सभी देश इसमें शामिल हो गए थे। उन्होंने ई.सी. के लक्ष्य, कार्यप्रणाली तथा विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग के बारे में अच्छे से समझाया। इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यूरोप के विभिन्न देशों की स्व-सत्ता और उनकी आर्थिक विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए ई॰सी॰ अपना निर्णय लेती है।

उन्होंने ई.सी. के नीति-निर्धारण के विभिन्न पहलुओं की तरफ भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया था। हमने उस दिन फ्रांस और जर्मनी के पांच संसद सदस्यों से भी मुलाकात की थी। उन्होंने ई॰सी॰ से संबंधित कई मामलों पर प्रकाश डाला। उस समय संसद-सत्र चल रहा था, इसलिए दो दिन सत्र के कार्यक्रमों को वीआईपी गैलरी में बैठकर हमने देखा था।

स्ट्रासबर्ग यूरोप के सुंदर शहरों में से एक है। इस शहर के कैथेड्रल और विश्वविद्यालय का इतिहास और महत्व यूरोप में हर कोई जानता है। कैथेड्रल के निर्माण में चार शताब्दी लगी थी। फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम के प्रमुख वास्तुकारों के पारस्परिक सहयोग से इसे बनाया गया था। कैथेड्रल की खासियत है कि इसमें केवल एक टॉवर है, जिसका शिखर साढ़े चार सौ फुट ऊंचा है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक यह यूरोप और अमेरिका की सबसे ऊंची इमारत थी। कैथेड्रल में हमने लगभग एक घंटा बिताया। उसके बाद हम विश्वविद्यालय देखने गए। स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय की स्थापना सत्तरहवीं सदी में हुई थी। कभी प्रसिद्ध साहित्यिक गेटे, नेपोलियन बोनापार्ट और माटर्निच इस विश्वविद्यालय के छात्र हुआ करते थे। विश्वविद्यालय में 35,000 छात्र हैं, जिनमें से लगभग 3000 विदेशी विद्यार्थी हैं।

स्ट्रासबर्ग सदैव यूरोप का सांस्कृतिक केंद्र रहा है, रोमन सैनिकों ने ईसा मसीह के जन्म से पहले राइन नदी के तट पर एक सैन्य शिविर स्थापित किया था। बाद में उत्तरांचल के कई आक्रमणकारियों द्वारा विध्वंस्त होने के बाद इस जगह पर छोटा शहर उभरा, जिसका नाम था स्ट्रासबर्ग, जिसका अर्थ है कई रास्तों के मिलनस्थली वाला शहर।रोमन साम्राज्य के दौरान यह यूरोप का एक प्रमुख शहर था। मध्यकाल में विशेषकर यूरोप में पुनर्जागरण के समय स्ट्रॉसबर्ग की सांस्कृतिक उत्कृष्टता अपने चरम पर थी। फ्रांसीसी क्रांति के बाद इसे फ्रांस का हिस्सा माना गया। सन 1870 में फिर से जर्मनी ने इस पर कब्जा कर लिया था, प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1918 में इसे फ्रांस को वापस कर दिया। 1940 में जर्मनी ने इस पर फिर से कब्जा कर लिया, द्वितीय विश्व युद्ध के समापन पर 1944 में फिर से फ्रांस को हस्तांतरित कर दिया। स्ट्रासबर्ग की जनसंख्या ज्यादा नहीं है, केवल चार लाख। लेकिन यहाँ की परंपराएं महान है। रेटरडैम के बाद यह यूरोप के बड़े बंदरगाहों में से एक है और यूरोप के आयात-निर्यात का केंद्र है। शहर के पास से बहने वाली नदी की कई नहरें निकलती है।एक परिव्राजक ने स्ट्रॉसबर्ग के बारे में कहा है: "स्ट्रासबर्ग में हर जगह कविता है : उनकी कोठरियों के छोटे-छोटे पोस्टकार्डों की तरह फ्रेम जड़ित काँचलगे झरोखे और ऊपरी माले की छोटी बाल्कनियां संकीर्ण और सर्पिल छोटे-छोटे रास्तों की तरफ कुछ बढ़ी हुई हैं।" इन सब में मध्य-काल और पुनर्जागरण के समय का भास्कर्य और सौंदर्य-बोध परिलक्षित होता है। इस काव्यमयी शहर को अठारहवीं शताब्दी में यूरोप के अति-सुंदर क्लासिक शहर के रूप में जाना जाता था।तत्कालीन रोहन पैलेस उस शहर की सबसे बड़ी पहचान थी। कैथेड्रल के पाद-प्रदेश स्ट्रासबर्ग से प्रवाहित होने वाली नदी(जिसका नाम ‘इल्ल’ है, हालांकि वह बीमार नहीं है।)वास्तव में इसने शहर के लोगों को स्वस्थ बनाए रखा है। स्ट्रॉसबर्ग के पार्कों में, नदी तट और शहर के केंद्र में वाहन ले जाना निषिद्ध है। हमने दूसरे दिन प्राचीन निजी घरों की वास्तुकला को देखने में समय व्यतीत किया। एक ब्रिटिश पर्यटक ने लिखा है, "स्ट्रासबर्ग केवल अपनी संस्कृति से नहीं, बल्कि अपनी मदिरा-व्यंजन, स्वागतेय परिवेश और स्वादिष्ट भोजन जीवन-शैली को विशिष्ट बनाती है, जो यूरोप में नए सिरे से बनी हैं।"

स्ट्रॉसबर्ग का अपना फिलहार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा है। हर साल जून महीने में यहाँ अंतरराष्ट्रीय संगीत सम्मेलन आयोजित किया जाता है। इसके लिए सभागार में दो हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है। संगीत परिवेषण के लिए यह हॉल यूरोप के सबसे प्रसिद्ध हॉल में से एक है। संगीत के अलावा राइन ओपेरा, नेशनल थिएटर, अलसेसियन थियेटर और अनेक प्रसिद्ध संग्रहालय स्ट्रॉसबर्ग के सुंदर सांस्कृतिक जीवन का परिचय देते हैं। इन सभी संस्थानों खासकर ऑर्केस्ट्रा ऑडिटोरियम में चारों ओर घूमने में हमें बहुत समय लगा। स्ट्रासबर्ग का पुराना शहर अभी तक की अनेक शताब्दियों के स्मृति चिह्न अपने भीतर समेटे रखा है। रास्ते के किनारे बगीचों में स्थानीय पोशाक पहने ब्रासबैंड बजाते हुए युवकों को गाते हुए देखना आम दृश्य था। हमने एक शाम स्ट्रासबर्ग पर आधारित प्रकाश एवं ध्वनि शो देखा था। शायद इन्हीं सभी कारणों से यूरोप की संसद इस छोटे शहर में बसाई गई है। मैंने यूरोप के अनेक शहर देखे हैं, मगर स्ट्रासबर्ग छोटा शहर होने के बावजूद भी अपने प्राकृतिक सौंदर्य, सुदीर्घ परम्परा और शांत जनजीवन के कारण यूरोप का अन्यतम प्रसिद्ध शहर है। स्ट्रासबर्ग प्रवास के तीसरे दिन शाम को हम ब्रसेल्स लौट आए। अगले दिन ब्रसेल्स के विभिन्न अंचल देखने की व्यवस्था की गई थी।

ब्रसेल्स यूरोप का एक अनूठा शहर है। दूसरे यूरोपीय शहरों की तरह यह बेल्जियम का मुख्य व्यावसायिक केंद्र है। अर्थव्यवस्था,बैंक,वाणिज्य,शिल्प –बहुत मात्रा में यहाँ केंद्रीभूत है। प्राचीन ब्रसेल्स में कौलिक व्यवसायों को बहुत महत्व दिया जाता था।ब्रुसेल्स के मुख्य चौक या केंद्र में खड़े होकर सहजता से देखा जा सकता है कि विभिन्न व्यवसायी-समाज को किस तरह विशिष्ट स्थान और महत्व दिया गया था। सुनार, सुथार, बणिक, कारखाना श्रमिक, कृषक, राजमहल में विभिन्न काम करने वाले लोगों- इन सभी के नाम पर वृत्ताकार दिखने वाले अंचल का नाम रखा गया है।

बेल्जियम एक लोकतान्त्रिक देश है। ब्रिटेन की तरह यहां भी शाही परिवार है, जो शासन नहीं करता है, मगर देश का संस्थागत मुखिया माना जाता है। शाही परिवार और निर्वाचित सरकार के बीच कभी कोई टकराव नहीं हुआ है। दोनों एक दूसरे का सम्मान करते हैं और अपनी सीमाओं को नहीं लांघते हैं। बेल्जियम की अर्थव्यवस्था में खनिजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। कभी खनिज संसाधनों से भरे कई अंचलों में अधिकांश संसाधन या तो समाप्त हो गए हैं या होने वाले हैं। हमारे समय के प्रसिद्ध चित्रकार विन्सेन्ट वान गाग ने ऐसे खनन अंचल के कई चित्र बनाए थे।उनके चित्रों में खदान मजदूरों का चेहरा देखा जा सकता है। तेज धूप में दहकते दुखी खनिज क्षेत्रों के बहुत से अजीब दृश्य उनके चित्रों में देखे जा सकते है। 'डियर थियो' नामक आत्मकथात्मक पुस्तक में अपने छोटे भाई को लिखे अनेक पत्रों में उन्होंने बेल्जियम के इन क्षेत्रों का वर्णन किया है। जिस तरह इंग्लैंड का डोवर फ़्रांस के कार्लाइस से इंग्लिश चैनल से जुड़ा हुआ है,वैसे ही डोवर बेल्जियम के एक छोटे शहर ओस्टेंड से भी जुड़ा हुआ है। कैम्ब्रिज में अध्ययन करते समय सन 1968 में मैं डोवर से कार्लाइस समुद्री जहाज से गया था और वहाँ से ट्रेन से पेरिस गया था। इसके बाद मैंने जर्मनी और नीदरलैंड का दौरा किया और फिर बेल्जियम के ओस्टेंड से समुद्री जहाज द्वारा डॉवर लौटा। अवश्य अब डोवर और कार्लाइस के बीच इंग्लिश चैनल के नीचे ट्रेन और बसें चलने लगी है। मैं वर्ष 2003 में इसी भूमिगत मार्ग से इंग्लैंड से पेरिस गया था। बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग- तीन देशों की अर्थव्यवस्था और संस्कृति ऐतिहासिक काल से समृद्ध रही हैं।

तीनों को एक साथ में ‘बेनेलक्स’ नाम से जाना जाता है। बेल्जियम में कई राजभाषाएँ हैं। बेल्जियम में फ्रांसीसी, जर्मन, डच और बेल्गिक बोलने वाले लोग रहते है। राजधानी ब्रसेल्स यूरोप का अन्यतम महानगर है। मैं पहले भी ब्रसेल्स देख चुका था इसलिए इस बार मैंने प्रोफेसर विधुभूषण दास और श्रीमती प्रभातनलिनी दास की बेटी प्रज्ञा पारमिता (नानू) और उसके पति क्लोज आरमान मारवे के घर में शाम बिताई। उन्होंने कुछ स्थानीय लेखकों और टेलीविजन कलाकारों को रात्रि-भोज के लिए आमंत्रित किया था। क्लोज आरमान मारवे ब्रसेल्स फ्रांसीसी टेलीविजन का नियमित कलाकार था। प्रज्ञा और उनके पति के साथ मेरा बहुत पुराना परिचय था। प्रजा की पेरिस में जब एक विदेशी सेवा अधिकारी के रूप में नियुक्ति हुई थी तभी से उसने क्लोज आरमान मारवे से शादी करने का फैसला किया था। तत्कालीन विदेशी सेवा अधिनियम के अनुसार उन अधिकारियों को विदेशियों से शादी करने की मनाही थी। प्रज्ञा ने नौकरी से इस्तीफा दे कर क्लोज आरमान मारवे के साथ शादी की थी। उस समय से वे ब्रसेल्स में रह रहे हैं। तब मैं 1975-77 तक होमी भाभा फेलोशिप पाकर संथाली भाषा पर शोध कर रहा था। उस अवसर पर ब्रिटिश लाइब्रेरी में सन 1917 के संथाल-विद्रोह से संबंधित अनेक कागजात देखने के लिए मैं लंदन गया था। लौटते समय, प्रज्ञा के अनुरोध पर मैं उसके घर में दो दिन ठहरा था। मैंने उन दो दिनों में लगभग सारा ब्रसेल्स देख लिया था।

इस तरह यह मेरी बेल्जियम और उसकी राजधानी ब्रसेल्स की तीसरी यात्रा थी। मुझे अपनी पहली यात्रा में ब्रसेल्स के बाहरी इलाकों, शहर के खनन और औद्योगिक क्षेत्रों को देखने का अवसर मिला था। दूसरी यात्रा में प्रज्ञा और क्लोज आरमान के घर में रहते समय मुझे ब्रसेल्स के कई स्थानीय कवियों, कलाकारों और पत्रकारों से मिलने का मौका मिला। मुझे अपनी दूसरी यात्रा की एक अनुभूति अभी भी याद है, क्योंकि वह पूरी तरह से एक अलग अनुभव था। ब्रसेल्स के बाहरी इलाके में कुछ जंगल क्षेत्र हैं। जहां विभिन्न प्रकार के कुकरमुत्ता (मशरूम) अपने आप निर्दिष्ट ऋतु में उगते थे। ब्रसेल्स में मेरी दूसरी यात्रा के समय कुकरमुत्ता उगने का समय था। मुझे पता चला कि ऑर्मन को जंगल से मशरूम इकट्ठा करना बहुत अच्छा लगता था। मुझे लेकर वे दोनों मशरूम खोजकर इकट्ठे करने के लिए बाहर निकले। सड़क के किनारे कार खड़ी कर हम जंगल के भीतर सात-आठ सौ मीटर दूर गए। मुझे याद है कि आरमान की अभ्यस्त आंखें अधिक मशरूम खोजने में सक्षम थीं। घर लौटने के बाद आरमान मशरूम की सब्जी बनाने के लिए अंदर गया। मुझे मशरूम बहुत पसंद है, लेकिन मैंने सुना था कि जंगली मशरूम जहरीला और जानलेवा हो सकता है। मैंने उन्हें अपनी आशंका व्यक्त की। आरमान, प्रज्ञा और उनके छोटे भाई ने कहा कि उन्होंने जंगल से ऐसे मशरूम कई बार एकत्र कर खाया है। मगर फिर भी वे अभी तक जीवित है, यह उन मशरूमों के जहरीला नहीं होने का अकाट्य प्रमाण है। मेरे लिए अविश्वास करने का और कोई कारण नहीं था। मशरूम वास्तव में बहुत स्वादिष्ट थे, मृत्यु तो दूर की बात है, मेरा पेट तक खराब नहीं हुआ। आनुष्ठानिक यात्रा होने के कारण इस बार मेरे हाथ में ज्यादा समय नहीं था। प्रज्ञा और मैंने बेल्जियम में भारत के राजदूत श्री एन.पी. जैन से भेंट की। रात्रिभोज के बाद प्रज्ञा और उसके पति ने मुझे होटल में छोड़ दिया। अगले दिन बोस्टन हम लौट आए।

कनाड़ा यात्रा: अटलांटिक तट से प्रशांत महासागर तक

कनाड़ा सरकार हर साल सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स (सीएफआईए) के अधिकारियों को कनाड़ा-यात्रा के लिए आमंत्रित करती है। जब मैं हार्वर्ड में था, तब यह यात्रा 15 अक्टूबर 1987 को शुरू हुई थी और 26 अक्टूबर को समाप्त। हमारी यात्रा के लिए कनाड़ा के छह ह प्रमुख शहर मॉन्ट्रियल, क्यूबेक, ओटावा, टोरंटो, कैलगरी और वैंकूवर निर्धारित किए गए थे। उन क्षेत्रों के राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों के साथ कनाड़ा की समस्याओं पर हमारी चर्चा होनी थी। कनाड़ा एक विशाल देश है और यह ऑस्ट्रेलिया की तुलना में बड़ा है। कनाड़ा का उत्तरी भाग लगभग निर्जन है। यहाँ केवल इन्युटी (एस्किमोस) रहते हैं। समुद्र से सील,व्हेल और अन्य प्रकार की मछह लियों को पकड़कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। अब उन क्षेत्रों में छोटे-छोटे शहर भी बस गए हैं, जिनका परिवेश गांवों की तरह हैं। आगे और उत्तर की तरफ जाने से अर्थात् उत्तरी ध्रुव के निकट साल भर बर्फ गिरी रहती है। इस समय इन्युटी व्हेल मछलियों का संग्रह करते है और उनकी चर्बी से तेल निकालकर दिए जलाते हैं और सफ़ेद भालूओं को मारकर उनकी खाल का वे हड्डी कंपाने वाली सर्दियों में जैकेट बनाते हैं। स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में हमने स्लेज और इग्लू के बारे में पढ़ा है।

कनाड़ा का दक्षिणी भाग अमेरिका के करीब है। यहाँ घनी आबादी है और यह क्षेत्र व्यापार और उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जो काफी हद तक कनाड़ा की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इस क्षेत्र ने कनाड़ा की संस्कृति और ऐतिह्य में मुख्य योगदान दिया है। हमने जिन छह ह शहरों का दौरा किया, वे सभी कनाड़ा के दक्षिणी भाग में स्थित थे। उनमें से दो मॉन्ट्रियल और क्यूबेक कनाड़ा की सबसे बड़ी नदी सेंट लॉरेंस के किनारे पर स्थित हैं। वैंकूवर प्रशांत महासागर के पास स्थित है। कैलगरी रॉकी पर्वतमाला के पूर्व में उच्च पहाड़ियों के बीच स्थित है। कनाड़ा का सबसे बड़ा शहर टोरंटो ओन्टरियो झील के तट पर स्थित है। यह नियाग्रा प्रपात से ज्यादा दूर नहीं है। संघीय राजधानी ओटावा प्रसिद्ध रेडो नहर के पास स्थित है।

क्यूबेक, मॉन्ट्रियल और ओटावा एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं हैं। हमने मॉन्ट्रियल से अपनी यात्रा शुरू की। हम वहां से क्यूबेक गए और फिर एक वातानुकूलित बस में ओटावा। हम ओटावा से टोरंटो विमान में गए। फिर विमान से हम टोरंटो से कैलगरी गए। ये दोनों शहर काफी दूर हैं। विमान में हमें चार घंटे लगे। मतलब विमान द्वारा भुवनेश्वर से नई दिल्ली तक की यात्रा करने में लगे समय का दोगुना। हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव था कैलगरी से वैंकूवर। इस यात्रा के लिए कनाड़ा सरकार ने ट्रेन की व्यवस्था की थी, ताकि हम रॉकी पर्वतमाला की छोटी-छोटी झीलों, लुभावनी पहाड़ियों और ग्लेशियरों से बहने वाली नदियों के दृश्यों का आनंद ले सकें। वास्तव में, यह हमारी कनाड़ा की पंद्रह दिवसीय यात्रा का सबसे अहम हिस्सा था,जो हमेशा अविस्मरणीय रहेगा।

क्यूबेक बहुत ही प्राचीन और खूबसूरत शहर है। जो सेंट लॉरेंस नदी के संकीर्ण अंचल पर स्थित है। इस शहर में लोग अंग्रेजी और फ्रेंच दोनों भाषा बोलते हैं। ओटावा संघीय राजधानी है। टोरंटो, मॉन्ट्रियल और वैंकूवर तीनों विशाल शहर हैं। कनाड़ा का सबसे बड़ा शहर टोरंटो देश के पांच झीलों में से एक के तट पर स्थित है। वैंकूवर शायद कनाड़ा के शहरों में सबसे सुंदर है।यह प्रशांत महासागर पर स्थित है। यह सैल्मन मछह ली और अमेरिकन इंडियन पर शोध हेतु पर्यटकों को आकर्षित करता है। मॉन्ट्रियल पूर्व ओलंपिक शहर है। यह सेंट लॉरेंस नदी के तट पर स्थित है, जहां एक द्वीप भी है। कैलगरी रॉकी पर्वतमाला की तलहटी में बसा एक छोटा मगर खूबसूरत शहर है। कैलगरी से रॉकी पर्वतमाला में प्रवेश करने पर दुनिया के सबसे खूबसूरत दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। हम बहुत खुश थे कि कनाड़ा-सरकार ने हमारे लिए ऐसा यात्रा कार्यक्रम तैयार किया था।

हमारा पहला गंतव्य स्थल था सेंट लॉरेंस की विशाल नदी के मुहाने पर स्थित क्यूबेक का प्राचीन शहर। हमारी यात्रा वहां से शुरू होकर प्रशांत महासागर के तट पर स्थित वैंकूवर में समाप्त हुई। बीच में हमने मॉन्ट्रियल, ओटावा, टोरंटो और कैलगरी का परिदर्शन किया। उस वर्ष कैलगरी में शीतकालीन ओलंपिक आयोजित किए जा रहे थे।

ग्यारह बजे की डेल्टा एयरलाइंस से हम बोस्टन से रवाना होकर बारह बजे डोरवाल हवाई अड्डे पर पहुंचे। क्यूबेक राज्य के अंतर्राष्ट्रीय संबंध मंत्रालय की ओर से कोन्फेडेरेशन रेस्तरां में हमारे लिए दोपहर के भोजन व्यवस्था की गई थी। एक अधिकारी ने हमें हवाई अड्डे से वहां पहुंचा दिया। लंच के बाद हम ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड एकोनोमिक्स’ गए। इस संस्थान के मुख्य अर्थशास्त्री जीन पियरे लेगॉफ ने हमें क्यूबेक की अर्थव्यवस्था के बारे में सचित्र लंबा व्याख्यान दिया। यहां यह कहना उचित होगा कि क्यूबेक कनाड़ा का सबसे अमीर राज्य है। यह अंचल कनाड़ा के कई क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति करता है। मॉन्ट्रियल इस राज्य का सबसे बड़ा शहर है, जो कनाड़ा का एक मुख्य शहर है।

लेगोफ ने हमें क्यूबेक के प्रधान शिल्प, सिंचाई सुविधाओं, बिजली उत्पादन और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बारे में बताया। क्यूबेक राज्य के लगभग आधे लोग फ्रेंच बोलते हैं। अंग्रेजी और फ्रेंच दोनों इस राज्य की राजभाषा हैं। लेगोफ़ ने हमें बताया कि यहाँ कभी-कभी शिक्षा-संस्कृति के क्षेत्र में मनोमालिन्य होता है। उसके बाद क्यूबेक के अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य विभाग के उपमंत्री ने इस तरह के संघर्षों का भी संकेत दिया था। हमें दोपहर के भोजन के बाद ‘हाइड्रो क्यूबेक’ ले जाया गया। यहाँ पर देश के सबसे बड़े सिंचाई और बिजली उत्पादन सुविधाओं का कार्यालय स्थित है। हमें वहाँ की गतिविधियों के बारे में संक्षेप में जानकारी दी गई, जिसकी विस्तृत चर्चा हुई थी। प्रत्येक साक्षात्कार और व्याख्यान के बाद हमेशा विचारों के आदान-प्रदान और प्रश्न-उत्तर के सत्र का आयोजन किया जाता था। हर कोई जानता था कि हमारे जैसे लोगों के लिए केवल व्याख्यान पर्याप्त नहीं होगा। बाद में हमें फोर सीज़न होटल में ले जाया गया। जहां पर क्यूबेक के विदेश व्यापार के उपमंत्री मार्सेल बर्ग्रोन ने हमारे लिए एक रिसेप्शन का आयोजन किया था। इस समय मेरी पत्नी, बेटा और आईबीएम में काम करने वाले दूर के रिश्तेदार श्री दिलीप हरिचंदन हमारे पास होटल में आए थे। मैं बहुत समय के बाद दिलीप से मिल रहा था। इसलिए कुछ समय के लिए मैंने अलग से उन लोगों से बातचीत की। हमारे लिए कॉकटेल और बुफ़े डिनर का आयोजन किया गया था। ऐसा लगा शायद कनाड़ाई बहुत औपचारिक होते हैं। उपमंत्री ने दिलीप, मेरी पत्नी और मेरे बेटे को रिसेप्शन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। कॉकटेल और बुफे डिनर के बाद हम सात बजे एक वातानुकूलित चार्टर्ड बस में क्यूबेक के लिए रवाना हो गए। कनाड़ा के विदेश मामलों के वरिष्ठ अधिकारी (येव बोपरे) कनाड़ा-यात्रा के दौरान हमारे साथ थे। वैलेरी रेमन नामक एक अन्य अधिकारी उनकी सहायता के लिए क्यूबेक और मॉन्ट्रियल में थे। मैरी एन डेलेर दूसरे चार शहरों के लिए बोपरे के साथ हमारे एस्कॉर्ट बने थे। उनके विदेश मंत्रालय ने क्यूबेक-यात्रा से पहले हमारे लिए बीस पृष्ठ का कार्यक्रम तैयार कर हमें पकड़ा दिया था, जिसमें प्रत्येक शहर में हमारे आगमन का समय, हमारे कार्यक्रम, मिलने और चर्चा करने वाले लोगों के नाम, यात्रा वाली जगहों के नाम आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन था।

‘फोर सीजन्स होटल’ में रिसेप्शन के बाद रात के साढ़े सात बजे क्यूबेक के लिए हमारी चार्टर्ड बस यात्रा शुरू हुई। सेंट लॉरेंस नदी के किनारे हम अंधेरे के बावजूद जहाजों और नौकाओं को देख पा रहे थे। सेंट लॉरेंस कनाड़ा की मुख्य बारहमासी नदी है क्योंकि यह पांच विशाल झीलों से बहती है। सेंट लॉरेंस का मुहाना काफी प्रशस्त और समुद्रगामी जहाज क्यूबेक नदी के इस रास्ते से आगे बढ़ते हैं। हम दस बजे क्यूबेक की उस होटल में पहुंचे, जहां हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी। वहाँ दो स्थानीय अधिकारी हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हमारे अगले दिन के कार्यक्रम की जानकारी देने के बाद हमसे विदा ली।

सुबह-सुबह मेरी नींद टूट गई। होटल के कमरे में चाय बनाने की व्यवस्था थी। मैंने खुद चाय बनाई और पी ली। फिर मैं सेंट लॉरेंस के तट पर घूमने के लिए बाहर गया। क्यूबेक शहर के पास यह विशाल चौड़ी नदी संकीर्ण हो जाती है। नदी के उस पार छोटी पर्वतमाला और उसकी तलहटी में बसे छोटे-छोटे गांव। वहाँ घूमते समय मुझे अपने गांव की चित्रोत्पला नदी, सुबह की ठंडी-ठंडी हवा सब याद आने लगी।अचानक मुझे लगा कि मैं अपने गांव की चित्रोत्पला नदी के तट पर बैठा हुआ हूँ । उस सुबह की अनुभूति हमेशा के लिए मेरी स्मृतियों में समा गई। सुबह साढ़े आठ बजे क्यूबेक में मेरा कार्यक्रम था, इसलिए मैं जल्दी से नदी के तट से होटल में लौट आया। हमें क्यूबेक के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और व्यापार के लिए निर्धारित सरकारी संस्थान में ले जाया गया। अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग के निदेशक और विदेश व्यापार विभाग के महानिदेशक ने हमें इन दो मामलों के बारे में बताया। क्यूबेक कनाड़ा का सबसे विकसित प्रदेश है। औद्योगिक समृद्धि के साथ-साथ शिक्षा-संस्कृति के क्षेत्र में यह अन्य राज्यों का नेतृत्व करता है। दोनों अंग्रेज़ और फ्रेंच ने इस प्रदेश के अटलांटिक तट पर अपनी कॉलोनियों की स्थापना की है। लोग अंग्रेजी और फ्रांसीसी दोनों भाषाएँ बोलते हैं। यहाँ पचास प्रतिशत लोग अंग्रेज हैं तो पचास प्रतिशत फ्रांसीसी। क्यूबेक प्रदेश कनाड़ा में उत्पादित कुल बिजली का तीन-चौथाई उत्पादन करता है। यह कनाड़ा के अन्य राज्यों और संयुक्त राज्य अमेरिका में बिजली आपूर्ति करता है।

क्यूबेक सरकार के व्यापार नीति विभाग के महानिदेशक और अंतर्राष्ट्रीय संगठन के निदेशक ने हमें क्यूबेक के विदेश व्यापार और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों के बारे में विस्तृत ब्यौरा प्रदान किया था। कनाड़ा भी भारत की तरह एक संघीय राष्ट्र है, लेकिन वहाँ का कोई भी प्रदेश दूसरे देश के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए स्वतंत्र है। यह संघीय सरकारों के मामले में एक महत्वपूर्ण व्यतिक्रम है, जिसे अभी तक अन्य किसी राष्ट्र द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है। इन चर्चाओं के समाप्त होने के बाद हमें करीब पंद्रह मिनट के लिए नदी के तट पर बसे क्यूबेक के पुराने शहर में घूमने के लिए ले जाया गया। इस क्षेत्र में क्यूबेक सिटी का सबसे पुराना ढांचा है।

ढांचे को राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में संरक्षित किया गया है। समग्र प्राचीन शहर सेंट लॉरेंस के किनारे पर स्थित है और यह नदी के स्तर से नीचे है। नदी के तट से पुराना शहर सुंदर लगता हैं। कनाड़ा में फ्रांस ने इस जगह पर पहली बार कॉलोनी की स्थापना की। प्रसिद्ध ऐतिहासिक किला फ्रेंटेनाक इस पुराने शहर में स्थित है। उस समय यह फ्रांसीसी मुख्यालय था। यह किले जैसा नहीं है, फिर भी इसे किला कहा जाता है। इसके चारों ओर कोई दीवार नहीं है। स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि इस अंचल को फ्रांसीसी शासन के प्रारंभिक चरण में खूबसूरती से सजाया गया था और सशस्त्र गार्ड हर समय वहाँ रहते थे। इस वजह से इसे साधारण भाषा में किला कहा जाता था। उस अधिकारी ने भारत का दौरा किया था और हमारे देश के किलों को देखा था। इसलिए शायद उन्होंने हँसते हुए कहा था, "हमारे किले देखकर आपको मन ही मन अचरज हो रहा होगा।" फ्रंटनेक एक अत्यंत सुंदर महल की तरह दिखता है। क्यूबेक सिटी में अधिकांश आवास पत्थर से बने है। खूबसूरत पत्थर शहर के आसपास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इसलिए वहाँ के लोग सदियों से इस प्राकृतिक संसाधन का उपयोग करते आ रहे हैं। मुझे पुराने शहर में घूमने और विभिन्न संरचनाओं की वास्तुकला को देखने में बहुत आनंद आया। लगभग सभी घर नदी के तट पर बने है। हर घर की छह त या खिड़कियों से नदी को देखा जा सकता है। फ्रंटनेक वर्तमान में एक उच्च कोटी की होटल है। क्यूबेक के अंतरराष्ट्रीय मामलों के मंत्री ने वहाँ हमारे लिए लंच की व्यवस्था की थी।

क्यूबेक के अंतरराष्ट्रीय मंत्री ने हमें मध्याह्न भोजन खिलाया था। अपराह्न को हमारी क्यूबेक के नेशनल असेंबली के सदस्यों से भेंटवार्ता थी। उनके साथ मुलाक़ात ‘पार्लियामेंट होटल’ में तय हुई थी। पहले-पहल होटल का नाम सुनकर मैं समझ नहीं पाया। बाद में मुझे पता चला कि संसद सदस्यों के रहने तथा संसद के अधिवेशन सत्र के समय उनके खाने-पीने की व्यवस्था के लिए उस होटल का निर्माण किया गया था। हमने नेशनल असेंबली के सदस्यों को कई प्रश्न पूछे। उन्होंने क्यूबेक के इतिहास, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संबंध, बाहरी व्यापार आदि के बारे में भी हमें जानकारी दी थी। उन्होंने इस विषय पर भी चर्चा की कि किस तरह क्यूबेक सरकार ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं की मांगों के बारे में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए समस्या के समाधान का प्रयास किया। उसके बाद हम क्यूबेक के पर्यावरण मंत्री क्विफ्फोर्ट लिंकन से उनके कार्यालय में मिले थे। तीव्र औद्योगिकीकरण, पनबिजली के लिए बांधों के निर्माण और इन सबके कारण कुछ गांवों के पानी में डूबने की बात का उन्होंने विशदभाव से चर्चा की। उन्होंने अपने मंत्रालय की कार्यावली और लक्ष्य के बारे में भी बताया, जिससे ज्यादा पर्यावरण प्रदूषित नहीं हो। उसके बाद हम एक गाइड के साथ छोटी बस में क्यूबेक सिटी देखने गए। शहर से कुछ दूरी पर सेंट लॉरेंस नदी पर एक पुल बनाया गया है, जिसका इतिहास काफी लंबा है। गहरी नदी, प्रखर स्रोत और दोनों तरफ ऊंची पहाड़ियों को ध्यान में रखकर पुल निर्माण की योजना बनाई गई थी। यह अनुमान लगाया गया था कि पुल डेढ़ साल में पूरा हो जाएगा, लेकिन इसे पूरा होने में तीन साल लगे। स्थानीय आदिवासियों ने पुल के निर्माण में मजदूर का काम किया था और जिनमें से कईयों की काम के दौरान मृत्यु हो गई। मैंने सेंटलॉरेंस के क्यूबेक पुल और आदिवासियों पर एक छोटी-सी किताब देखी थी। यह किताब हमारे रहने वाली होटल की छोटी लाइब्रेरी में थी। क्यूबेक सिटी बहुत बड़ा शहर नहीं है। बस में घूमने में हमें ज्यादा समय नहीं लगा। इसके बाद हम पश्चिम दिशा में गए। वहाँ सूर्योदय बहुत ही आकर्षक एवं सुंदर लग रहा था। क्यूबेक तक सेंटलारेंस नदी में बड़े-बड़े जहाज आते थे। रात में होटल की खिड़कियों से वे जहाज़ बहुत अच्छे लगते थे।

अगली सुबह गाइड के साथ हम सेंट ऐनी के बासीलिका का गिरजाघर देखने गए थे। यह क्यूबेक से कुछ दूर पर स्थित है। हमने होटल से चेक आउट कर लिया था, क्योंकि बासीलिका देखने के बाद हमें मॉन्ट्रियल जाना था। बासीलिका कुंआरी मैरी को समर्पित है। गाइड ने कहा, "बासीलिका देखने के लिए हर साल करीब दस लाख पर्यटक आते हैं। यहाँ कई जिज्ञासावश आते हैं तो कई आसाध्य रोगों या शारीरिक असक्षमता से ठीक होने की आशा लेकर आते हैं।" बासीलिका की ऊंचाई 300 फीट है। उसकी लंबाई और चौड़ाई क्रमशः 375 फीट और 200 फीट है। कई विकलांग लोग जो यहां बैसाखी के सहारे आते है, वे अपनी पुरानी बैसाखी यहाँ छोड़कर जाते हैं। बासीलिका के पीछे संग्रहित कई पुरानी बैसाखियों को देखकर मैं हैरान था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस देश के लोग हमारी तरह दैवी अनुकंपा में इतना ज्यादा विश्वास रखते हैं।

बासीलिका देखने के बाद हम केप टूर्नामेंट नामक स्थान पर गए। सर्दियों में कनाड़ा के उत्तर से हंस दक्षिण में अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों के लिए उड़ान भरते है। कुछ अज्ञात कारणों से पिछह ले पचास वर्षों से केप टूर्नामेंट उनकी दक्षिण यात्रा का संक्षिप्त विश्राम स्थल है। उन हंसों को ‘स्नो गीज़’ या ‘बर्फ हंस’ कहा जाता है। यह अंचल अल्प उच्च पहाड की तलहटी में फैला एक विस्तीर्ण समतल मैदान है। इसके एक तरफ सड़क थी। जब हमारी बस उस स्थान पर पहुंची और जो मैंने देखा, मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। पूरा समतल मैदान और पहाड़ी का कुछ ढालू हिस्सा चिड़ियों से भरा हुआ था। जहां वे अपने लंबे सफर से थककर अस्थायी रूप से आराम कर रहे थे। वह सड़क कारों और बसों से भर गई थी। आकाशमार्ग से वे झुंड में उस जगह पर उतर रहे थे। कुछ समय तक विश्राम करने के बाद वे पक्षी आकाश में उड़ते हुए दक्षिण दिशा में बढ़ने लगे। हर साल सर्दियों की शुरुआत में ‘बर्फ हंस’ इस दिशा से जाते हुए निर्दिष्ट स्थान पर उतरते हैं। कनाड़ा के पक्षी विज्ञानी और पर्यावरणविद इस अद्भूत घटना के रहस्य को सुलझाने के लिए शोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विषय पर एक छोटी-सी किताब भी प्रकाशित की है। जिसमें यह लिखा हुआ है कि सर्दियों की शुरुआत में कब किस जगह पर अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान लगभग डेढ़ लाख बर्फ हंस एवं हंसी आराम कर सकते हैं। जब वे दक्षिण-यात्रा पर जाते हैं तो इस जगह पर लंबे समय तक आराम करते हैं, मगर लौटते समय बहुत कम आराम लेते हैं। हमारे साथ आए अधिकारी से यह सुनने के बाद मैंने विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि शायद उत्तर में अपना घर छोड़कर दक्षिण की ओर उड़ना हंसों के लिए बहुत आनंददायक नहीं था। केवल वे ठंड से बचने हेतु ऐसा करने के लिए मजबूर हैं। उनकी वापसी यात्रा में उल्लास नजर आता है। इस वजह से वे वापसी यात्रा में कम अवधि के लिए रुकते हैं। कवि की भाषा में,“घरमुंहा बाट,मन उचाट”।

रास्ता केवल कारों से भर गया हो, ऐसा नहीं था, लगभग पांच-छह ह सौ लोग टीवी और साधरण कैमरों से तस्वीरें खींच रहे थे। पास में ही पहाड़ी से पतझड़ का आकर्षक दृश्य देखा जा सकता है, लाल, पीला और लाल-भूरा पत्तियों से भरा हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे उस पहाड़ी पर किसी ने रंगीन स्क्रीन रख दी हो। और उस तरह की पृष्ठभूमि से सफेद-भूरे रंग वाले असंख्य पक्षियों के कई झुंड उड़ते देखना वास्तव में एक स्वर्गिक अनुभव था। सच कहूँ, उस जगह पर मैं ज्यादा समय बिताना चाहता था, लेकिन हमारे पूर्व-नियोजित कार्यक्रम के कारण यह संभव नहीं था। हार्वर्ड लौटने के छह ह महीने बाद उन पर लिखी मेरी छोटी कविता का अंग्रेजी अनुवाद (स्नो गीज) कनाड़ा की साहित्यिक पत्रिका 'हैलिफ़ैक्स रिव्यू' में प्रकाशित हुआ था। कविता के पहले और अंतिम पद का हिन्दी अनुवाद निम्न प्रकार हैं :-

“ राह खोजने के लिए

न कम्पास और न ही कंप्यूटर की आवश्यकता है

बर्फाच्छादित उत्तर दिशा से

सुनसान वायु मार्ग पर तुम दीर्घपथ की उड़ान भरते हो

केवल थोड़े समय के लिए

दक्षिण-यात्रा पथ पर लाखों की तादाद में नीचे उतरते हो॥

XXXXX

यह चट्टान, यह नदी और तुम सभी

अक्टूबर की आसन्न गोधूलि में विलीन होकर

हम प्रार्थना करते हैं जानने के लिए

तुम्हारे यहाँ आगमन का अर्थ

और इस तरह एक खूबसूरत दिन की क्षणिकता का अर्थ!

हंसों को अनिच्छा से अलविदा करते हुए हम ‘सेंट ऐनी’ नामक स्की केंद्र में गए। यह बहुत ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। तलहटी से केबल-कार द्वारा हम पहाड़ी की चोटी पर गए। सर्दियों में यह पहाड़ पूरी तरह से बर्फ से ढक जाता है। इसलिए यह बर्फ पर स्की खेल के लिए कनाड़ा में प्रसिद्ध है। यह पहाड़ी ज्यादा ऊबड़-खाबड़ नहीं है। इसलिए खिलाड़ियों को नीचे खिसकने में सुविधा होती है। इस सेंट ऐनी पहाड़ पर हम दोपहर का भोजन लेकर मॉन्ट्रियल के लिए रवाना हो गए। मोंटेमोरेंसी प्रपात के निकट हम बस कुछ समय के लिए रुके। इस प्रपात की ऊंचाई 274 फीट है, जो नियाग्रा से लगभग 100 फीट अधिक है। प्रपात अपेक्षाकृत संकीर्ण है,इसलिए नीचे अपेक्षाकृत कम पानी गिरता है। जलप्रपात के निकट छोटे से रेस्तरां में बैठकर उसके सौंदर्य का आनंद उठाते हुए कॉफी पीकर हमने मॉन्ट्रियल की यात्रा शुरू की। हम रास्ते में और कहीं नहीं रुके। इसलिए हम शाम को 5.30 बजे मॉन्ट्रियल पहुंच गए।

बस से क्यूबेक जाने से पूर्व हम मॉन्ट्रियल में रुके थे। मगर हम वहाँ सब-कुछ नहीं देख पाए थे। इस बार मॉन्ट्रियल पहुंचने के बाद हमने पुराने ओलंपिक पार्क, प्रसिद्ध कैथेड्रल, मैकगिल विश्वविद्यालय और शहर के केन्द्रांचल में घूमे। हमने दस बजे से पहले डिनर समाप्त कर सीधे होटल सिटाल में वापस आ गए। यहाँ हमारे ठहरने के लिए व्यवस्था की गई थी। मॉन्ट्रियल के आस-पास के अन्य स्थानों को दिखाने के लिए सुबह-सुबह दो गाइड उपस्थित हो गए थे। इस बार हम पुराने मॉन्ट्रियल और सेंट लॉरेंस नदी के किनारे पर घूमने गए। पुराने मॉन्ट्रियल के डेढ़ सौ पुराने रेस्तरां ‘प्रीपेन’ में लंच कर हम ओटावा के लिए रवाना हो गए। यह मॉन्ट्रियल से केवल दो घंटे की दूरी पर था। वहाँ होटल प्लाजा डे ला सोथियर में अपना सामान रखकर शाम को ओटावा के आस-पास कुछ समय के घूमने चले गए। ओटावा और हॉल दो छोटे शहर हैं, जो एक दूसरे के निकट हैं। ओटावा कनाड़ा की राजधानी है। संसद, मंत्रि-परिषद, सुप्रीम कोर्ट, आदि यहां स्थित हैं। छोटा होने के बावजूद भी यह एक सुंदर शहर है। इस शहर की आलोक-सज्जा मंत्र-मुग्ध करती है। यहाँ की सड़कें बहुत विस्तृत हैं। स्थानीय अधिकारी चार्ल्स नाडो ने हमें दोनों शहरों के केंद्रीय क्षेत्रों का जायजा कराया। अगली सुबह हमारी तीन मंत्रालयों के अधिकारियों के साथ चर्चा रखी गई थी। हमारी पहली बैठक संचार विभाग में रखी गई थी, जहां अंतर्राष्ट्रीय विकास के निदेशक ल्यूसियन ने कनाड़ा जैसे विशाल देश में दूरसंचार क्षेत्र में आने वाली विभिन्न समस्याओं से हमें अवगत करवाया। कनाड़ा के बर्फाच्छादित उत्तर में दूरसंचार सेवाएँ बनाए रखने के लिए सर्दियों में उन्हें किस तरह परेशानी का सामना करना पड़ता है, उन्होंने उसके बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। मेरा यहां यह कहना उचित होगा कि दूरसंचार में अपनी प्रगति के लिए कनाड़ा दुनिया में प्रसिद्ध है। कनाड़ा के दूरसंचार और उपग्रह लिंक केवल अपने भीतर ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों के साथ भी संतोषजनक हैं।

इसके बाद हम राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय में गए। मंत्रालय के महानिदेशक के काल्डर ने कनाड़ा की रक्षा-नीति, रक्षा समस्याओं, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और अन्य राष्ट्रों के साथ कनाड़ा के रक्षा संबंधों से संबंधित मामलों पर चर्चा की। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी पियरे डु ब्रुले हार्वर्ड में हमारे एक साथी थे। कहने की जरूरत नहीं है, उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर इन मुद्दों पर कई सवाल पूछे। दिन में 12 बजे और 1.45 बजे के बीच मैकडॉनल्ड्स क्लब में हमारे लिए दोपहर के खाने की व्यवस्था की गई थी। कनाड़ाई भोजन प्राय: अमेरिकी भोजन के समान होता है, लेकिन मैंने देखा कि क्यूबेक और मॉन्ट्रियल की तरह ठीक वहाँ भी कुछ मात्रा में फ्रांसीसी भोजन भी परोसा जा रहा था और कुछ हद तक फ्रांसीसी पाक-शैली भी प्रचलित थी। यहीं पर उपलब्ध भोजन के मामले में भी था। मित्र पियरे ने मुझे बताया कि क्यूबेक सिटी, मॉन्ट्रियल और ओटावा में फ्रेंच इतिहास और संस्कृति का ज्यादा प्रभाव है, इसलिए भोजन में फ्रेंच स्वाद स्वाभाविक है। मुझे वह समय याद आया, जब पिएरे ने हमें अपने घर में रात के खाने के लिए आमंत्रित किया था। वहाँ ज्यादातर फ्रांसीसी खाद्य था।

मध्याह्न भोजन के बाद हम कनाड़ा की संसद में गए और वहाँ हमने लगभग तीन घंटे बिताए। श्रीमती सिल्वी हमें संसद में ले गई। उस समय संसद सत्र चल रहा था। हाउस ऑफ़ कॉमन्स में प्रश्नकाल चल रहा था। वी.आई.पी. गैलरी में बैठकर हमने कार्यवाही सुनी। उसके बाद पेश किए जा रहे बिल पर विचार-विमर्श होने लगा। यह बिल कनाड़ा के विस्तीर्ण उत्तरी क्षेत्रों में प्रशासन की प्रक्रिया से संबन्धित था। जिसमें इस क्षेत्र को अधिक स्वायत्तता देने के साथ-साथ इन्युटी (एस्किमो) और पर्यटन नीति के संबंध में विवेचना थी। श्रीमती सिल्वी ने हमें संसद के विभिन्न विभागों में घुमाया और दो मंत्रियों और तीन राजनयिकों से भी भेंट करवाई।

कनाड़ा की संसद समतल भूमि से कुछ ऊंचाई पर है, जिसका नाम है पार्लियामेंट हिल। सन 1916 में भयानक आग के कारण संसद भवन पूरी तरह से नष्ट हो गया था। वर्तमान भवन लगभग पूरी तरह से नया है। मध्य में सेंट्रल ब्लॉक सीनेट, हाउस ऑफ कॉमन्स, कमेटी रूम और ऑफिस बने हुए हैं। दोनों तरफ पूर्व और पश्चिम ब्लॉकों मंत्रियों के कक्ष और अन्य कार्यालय अवस्थित हैं। संसद का खूबसूरत गोलाकार पुस्तकालय 1916 की अग्नि-विभीषिका से बच गया था। इंटीरियर में लकड़ी के पैनल और छत के कुछ हिस्से में सोने की परत चढ़ी हुई थी। यह मुझे सुंदर लग रहा था। लाइब्रेरी काफी बड़ी है। बाहर के स्कॉलर भी यहाँ पढ़ सकते हैं। संसद के केंद्रीय ब्लॉक में 291 फीट ऊंचा पिस्ट टॉवर बना हुआ है। श्रीमती सिल्वी हमें लिफ्ट से शीर्ष पर ले गई। टॉवर के ऊपर से ओटावा और हॉल का दृश्य लुभावना लग रहा था। जुलाई और अगस्त महीनों में दस बजे यहाँ ‘चेंजिंग ऑफ गॉड’ गवर्नर-जनरल के फूट-गार्ड बदले जाते हैं। जुलाई-अगस्त महीनों में कनाड़ा के सशस्त्र बलों की बैंड-पार्टी का भी आयोजन होता है। इसी महीने सन इट ल्यूमिरे शो में कनाड़ा का इतिहास दिखाया जाता है। अक्टूबर महीने में कनाड़ा परिभ्रमण करने के कारण हम ये सब नहीं देख पाए।

ओटावा कनाड़ा की राजधानी है। यह ओटावा नदी के दक्षिण में स्थित है और नदी के दूसरी तरफ हॉल शहर स्थित है। दोनों शहरों की आबादी आठ लाख है। यह नदी ओंटारियो और क्यूबेक की सीमारेखा है। हॉल में लगभग 70 प्रतिशत लोग फ्रांसीसी मूल के हैं। रानी विक्टोरिया ने ओटावा को 1857 में कनाड़ा की राजधानी के रूप में चुना था। टोरंटो, मॉन्ट्रियल और वैंकूवर जैसे बड़े शहरों को नजरअंदाज कर इसे राजधानी के रूप में चयन करना आम लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। शायद इस शहर के सामग्रिक सौंदर्य, फ्रेंच भाषा- संस्कृति पूर्वांचल और अंग्रेजी भाषा-संस्कृति के पश्चिमांचल के मिलन-बिंदु के कारण उन्होंने यह निर्णय लिया था। संसद भवन देखने के बाद हम प्रसिद्ध रेडो नहर और ओटावा नदी पर गए। यह नहर छह ह मील से अधिक लंबी है। यह काफी चौड़ी भी है। सर्दियों में बर्फ से ढक जाती है, तब इसे स्केटिंग के लिए काम में लिया जाता है। यह सबसे लंबी मानव निर्मित स्केटिंग रिंक है।शीत-उत्सव (वाइन्ड रल्यूड) यहां हर साल आयोजित किया जाता है। यह राजधानी का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। लोग साइकिल पर लगभग 65 मील की दूरी तय करते हुए रेडो कैनाल से आगे जाते हैं। हमने रेडो कैनाल और ओटावा नदी के किनारे से घूमते-घूमते एक पार्क में गए। फिर हमने ओटावा नदी में नाव भी चलाई। इस नदी के किनारे ‘कोंफ़िडरेशन स्क्वायर’ भी बना हुआ है।यह शहर का केंद्रीय स्थल है और सबसे अधिक आबादी वाला क्षेत्र भी। यहाँ से थोड़ी-सी दूरी पर संसद भवन है, बड़े-बड़े होटल हैं। रेडो नहर यहाँ ओटावा नदी में मिलती है।

अगले दिन हम ओंटोरियो सरकार के वरिष्ठ सलाहकार श्री जिम हर्ली से उनके कार्यालय (प्रिवी काउंसिल ऑफिस) में मिले। उन्होंने संघ-राज्य के संबंधों, कनाड़ा की संसदीय प्रक्रिया और संविधान पर शानदार आधा घंटा भाषण दिया। मैं मन ही मन भारत से तुलना कर रहा था। इस बैठक के बाद ओंटोरियो सरकार के अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य विभाग ने हमारे लिए मध्याह्न भोजन का बंदोबस्त किया। दो बजे विदेश मंत्रालय के कार्यालय में रंगभेद नीति और कनाड़ा के इस विषय पर दृष्टिकोण के बारे में एक वरिष्ठ निदेशक के साथ संक्षिप्त चर्चा हुई। इसके बाद हम हवाई अड्डे से एयर कनाड़ा की उड़ान पकड़कर टोरंटो के लिए रवाना हो गए। इस यात्रा में सिर्फ एक घंटा लगा। हम वहां रॉयल यॉर्क होटल में रुके, रात के भोजन की व्यवस्था भी वहीं थी। ओन्टेरियो झील के तट पर टोरंटो स्थित है। यह 35 लाख की आबादी वाला कनाड़ा का सबसे बड़ा शहर है। मैं पहले भी टोरंटो गया था और कई दर्शनीय स्थानों को देखा था। मैंने कनाड़ा की तरफ से नियाग्रा प्रपात को भी देखा था। इस प्रकार मेरे लिए टोरंटो सुपरिचित स्थान था।

टोरंटो की स्थापना 1793 में हुई थी। तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इसका नाम ‘यॉर्क’ दिया था। शायद संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के शहरों के नामों की तरह ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इसका यह नाम रखा था। यॉर्क इंग्लैंड का एक सुंदर शहर है। यह नाम 1835 तक प्रचलित था, बाद में इसे टोरंटो में बदल दिया गया था। टोरंटो एक अमेरिकी-इंडियन शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'मिलन स्थल'।

इस यात्रा में हम सबसे पहले सी.एन. टॉवर में गए, जो विश्व का सबसे ऊंचा फ्री स्टैंडिंग टॉवर है। इसकी ऊंचाई 1815 फीट है।काँच की लिफ्ट से हम शीर्ष पर गए, जहां से टोरंटो का सामग्रिक दृश्य शानदार दिखाई दे रहा था। जहां तक आँखें जा रही थीं, टोरंटो ही टोरंटो नजर आ रहा था। मैंने सुना था, वहाँ से चारों तरफ 120 किलोमीटर की दूरी तक कोई व्यक्ति दृश्य देख सकता है। टॉप ऑफ टोरंटो अर्थात् सबसे ऊपर टोरंटो के रेस्तरां में हमारे लिए चाय पार्टी का आयोजन किया गया था। यह घूमने वाला रेस्तरां है। इसके डाइनिंग रूम से सटे नाइट क्लब को विश्व का सर्वोच्च रेस्तरां और नाइट क्लब के रूप में जाना जाता है। इसके बाद हम टोरंटो में चार अन्य स्थानों पर गए। इनमें से एक ओन्टारियो आर्ट गैलरी थी। हमने उसमें मैकमिलन संग्रहालय भी देखा। संग्रहालय में प्रदर्शित इन्युटी (एस्किमो) कलाकारों द्वारा बनाई गई कई पेंसिल स्केच अत्यंत सुंदर थी। सी॰पेर्न उन कलाकारों में से एक थे। 68 वर्ष की उम्र में उनके पैरों में भयानक दर्द हुआ, बर्फ पर लगातार चलने के कारण। अगले साल उन्होंने कुछ ऐसे स्केच बनाए थे, जिसमें यंत्रणा के सूक्ष्म संकेत थे। इसके अलावा, कस्तूरी बैल, व्हेल्स और कार्बीस (उत्तरी अमेरिकी हिरन) की हड्डियों से बनाई गई भास्कर्य मूर्तियाँ सुंदर लग रही थी। ब्रिटिश कोलंबिया के आठ उप-जातियों द्वारा बनाई गई कला संग्रहालय में प्रदर्शित की गई थी।

इसके बाद हम टोरंटो के प्रसिद्ध आइसलैंड पार्क देखने गए। इस विशाल पार्क में छोटी-छोटी झीलें, विभिन्न प्रकार की जल-मुर्गियाँ, कई झूलें, छायाच्छादित रास्ते, प्रवाहित होते झरने, रॉक गार्डन, फूलों की प्रदर्शनी आदि देखी जा सकती हैं। पार्क में सभी जगह लिखा हुआ है-‘घास पर नहीं चले’। मगर आइसलैंड पार्क में ठीक इसका उलटा लिखा हुआ था- ‘कृपया घास पर चलें’। एक गार्ड ने हमें बताया, "घास पर चलना हमारे देश में एक रमणीय अनुभव माना जाता है। इसलिए पार्क के भीतर घास का इतना बड़ा मैदान होने पर हम अपने पर्यटकों को असुंदर रास्ते पर चलने के लिए कैसे कह सकते हैं ?”

हम उसके बाद झील के तट पर स्थित ओन्टारियो प्लेस में गए। यहाँ छियानवें एकड़ जगह में पांच द्वीप हैं। लोग विभिन्न प्रकार की नौकाओं से झील में एक से दूसरे द्वीप की ओर जा रहे थे। संकीर्ण नहर एक-दूसरे द्वीप को जोड़ रही थी। सबसे बडे द्वीप में 800 सीटों वाला थिएटर और खुले स्थान में 8000 लोगों के बैठने लिए एक एम्फी-थियेटर बना हुआ देखकर बहुत अच्छा लगा। अंत में हम बंदरगाह पर गए। जहां पर जल-क्रीडा, थिएटर, नृत्य, सिनेमा हॉल, आदि की अच्छी-ख़ासी सुविधाएं थीं। विदेशी सैलानियों के लिए यह अति प्रिय स्थान था। ये सारी जगहें घूमने के बाद 6.45 बजे हम हवाई अड्डे पर गए, एयर कनाड़ा से कैलगरी जाने के लिए। चार घंटे का सफर था। एयर कनाड़ा की यात्रा हमेशा सुखद रही थी। इस बार रात्रि भोजन भी फ्लाइट में दिया था। कैलगरी का स्थानीय समय टोरंटो के समय से दो घंटे पीछे होता है। चार घंटे की उड़ान के बाद हम कैलगरी में 8.45 बजे पहुंच गए। स्टीव हमारी प्रतीक्षा कर रहा था, वातानुकूलित बस से होटल पलिसर ले जाने के लिए।कैलगरी के लिए केवल एक दिन (22 अक्टूबर) निर्धारित किया गया था। शहर बहुत सुंदर था। रॉकी माउंटेन रेंज पश्चिम में बहुत दूर तक दिखाई दे रही थी। शहर में बहने वाली खूबसूरत नदी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। कनाड़ा-यात्रा के दौरान कनाड़ा-सरकार ने हमारे लिए जिन पाँच-छह ह पांच सितारा होटलों की व्यवस्था की थी, उनमें होटल पलिसर सबसे ज्यादा सुंदर थी। मुझे इस होटल के कमरें, लॉबी और खाना बहुत अच्छा लगा।

कैलगरी में बहुत ठंडा था। सुबह बाहर का तापमान शून्य से 2 डिग्री सेल्सियस नीचे था। सड़कों पर बर्फ पड़ी हुई थी। मुझे पता चला कि रात में न्यूनतम तापमान शून्य से 6 डिग्री सेल्सियस कम था। यह अक्टूबर महीने की बात थी। क्रिसमस और नए साल के समय तापमान शून्य से 20 डिग्री कम रहता है। सुबह नाश्ते के बाद हमें कैलगरी के प्रमुख दर्शनीय स्थान पहाड़ पर शीतकालीन ओलंपिक पर ले जाया गया। श्रीमती शीला और श्रीमती डायना हमारी मार्गदर्शक थीं। शीतकालीन ओलंपिक की तैयारी चल रही थी। मुझे नहीं पता था कि शीतकालीन ओलंपिक में इतने सारे खेलों का आयोजन होता है। मैंने केवल टेलीविजन पर पहाड़ियों की ढलानों से नीचे फिसलने वाली प्रतियोगिताएँ देखी थीं, मगर यहाँ लगभग आधा दर्जन खेलों के बारे में हमें समझाया गया। मुझे एक खेल बेहद आकर्षक लग रहा था।

प्रतिभागी अपने पैरों पर बड़ी स्लेटों को बांधकर पहाड़ की ढलान से तेज गति से नीचे की तरफ खिसकते थे, जिसके अंतिम चरण में कूदकर अपना भार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते थे। उच्चतम बिंदु से कूदकर अपना संतुलन बनाए रखने में कामयाब होने वाला प्रतिभागी विजेता घोषित किया जाता था। इसे स्काइडाइविंग कहते हैं। कूदने के लिए चार अलग-अलग ऊंचाइयों को निर्दिष्ट किया जाता है, अर्थात् 30 मीटर, 50 मीटर, 70 मीटर और 90 मीटर। कैलगरी के मेयर राल्फ क्लिन ने हमारे लिए विशाल साडेल डोम में स्वादिष्ट लंच का आयोजन किया था। लंच के बाद हमने शहर के मुख्य स्टेडियम और विश्वविद्यालय के अंदर एक अपेक्षाकृत छोटे स्टेडियम (जिसमें स्पीड स्केटिंग की व्यवस्था थी) देखा। इन तीन स्थानों पर शीतकालीन ओलंपिक आयोजित होने का प्रस्ताव था। शहर के अंदर ओलंपिक ग्राम बनाया जा रहा था।

मेयर के साथ हमने कैलगरी शहर के भविष्य और शीतकालीन ओलंपिक की तैयारियों की चर्चा की। शहर के भीतर बहने वाली दो नदियों के नाम बो और एल्बो था। कुछ दूर आगे जाकर वे मिल जाती हैं। यह शहर दोनों नदियों के किनारे फैला हुआ है। पहाड़ से ओलंपिक की तैयारी देखते समय शहर एक खूबसूरत पोस्टकार्ड की तरह लग रहा था। छोटे-छोटे पहाड़, घाटियां, बहने वाली दोनों नदियां, नदियों के तट पर साइकिल चला रहे अनेक लोग, ठंड और बर्फ होने के बावजूद भी सुंदर लग रहे थे।

स्थानीय समय के अनुसार 2.35 बजे हमने कैलगरी छोड़ दिया, ट्रेन से वैंकूवर जाने के लिए। इस ट्रेन का नाम था कनाडियन पेसेफिक। जो कोच हमारे लिए आरक्षित किया गया था, इसमें तीन अलग-अलग वर्ग थे। रात में सोने के लिए बर्थ, बर्थ के सामने अलग से भोजन करने का स्थान और सबसे सुंदर काँच के गुंबद का सुंदर लाउंज था। हार्वर्ड में मेरे एक वर्ष के प्रवास में इस ट्रेन की यात्रा सबसे सुखद रही।

कैलगरी के रास्ते में कई घाटियां पड़ रही थीं और उनके भीतर से बहने वाली नदी रेलवे पटरियों के बगल से पार हो रही थी। बाद में मुझे पता चला कि वह नदी कैलगरी शहर से भी होकर गुजरती है। पहाड़ के ढलानों पर बड़ी संख्या में गाय-गोरु, घोड़ों की आवाजाही और उनके चरने के लिए विशाल राँच बने हुए थे। बीच-बीच में चाय, कॉफी, स्नैक्स लेते, एक-दूसरे से बातचीत करते और कांच के गुंबद के बाहर के दृश्यों को देखते हुए समय तेजी से पार हो रहा था। रेलवे अधिकारियों द्वारा गाए जा रहे कनाड़ा के लोकगीत (दोनों यंत्रसंगीत और कंठ संगीत) बहुत आनंददायक लग रहे थे। धीरे-धीरे हमारी ट्रेन रॉकी पर्वतमाला में प्रवेश करने लगी। तलहटी के कई गाँव पार होने के बाद ट्रेन में उत्कृष्ट खाना परोसा गया। उसके कुछ समय बाद पृथ्वी का वास्तविक स्वर्ग प्रारम्भ हो गया। दृश्य लगभग कश्मीर घाटी जैसा ही था। उससे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं था। रात्रिभोज से पहले पर्वत-शिखरों पर सूर्यास्त की सुनहरी आभा कुलू से मनाली की यात्रा की तरह दिख रहा था, दूर से यह दृश्य बर्फाच्छादित स्वर्ग की तरह दिख रहा था। धीरे-धीरे वे शिखर हमारे करीब आ रहे थे, मानो हमसे मिलने के लिए आतुर हो। धीरे-धीरे संध्या की छाया उन पहाड़ की चोटियां को निराकार बना रही थी। बाद में धीरे-धीरे वे दृश्य अंधेरे में खो गए।

शाम को सात बजे खाने के समय तक पूर्व में चंद्रोदय हो गया था। इस काँच गुंबद का अंचल दु-मंजिला था। नीचे से कुछ ज्यादा नहीं दिखता था। इसलिए हम सभी ऊपर माले के लाउंज में बैठ गए थे। उस समय ट्रेन ऊंचे पहाड़ पर चल रही थी। बीच-बीच में ट्रेन बर्फ से ढकी दो पहाड़ियों के मध्य से गुजर रही थी। कई बार हमने महसूस किया कि वे बर्फीली पहाड़ियां काँच के गुंबद से रगड़ तो नहीं खा जाएगी ! साथ ही साथ, यह भी महसूस हुआ कि हाथ बढ़ाने से हम बर्फ की उन दीवारों को छू सकते थे। ऊपर आकाश में चमकते सितारें सुंदर दिख रहे थे।

रेलगाड़ी की हेडलाइट आगे रास्ते पर प्रकाश डाल रही थी। चन्द्रमा की किरणें उस समग्र दृश्य को अनिर्वचनीय बना रही थी। वास्तव में यह अनुभव करने की चीज है, शब्दों में अभिव्यक्त करना नामुमकिन है। हमारे कई दोस्त जिनके पास उन्नत कैमरे थे, जो कैमरों का इस्तेमाल करना जानते थे, वे इन अपरूप दृश्यों का फोटो खींचते जा रहे थे। कई लोग अपने हैंडीकैम से रिकॉर्डिंग कर रहे थे। ट्रेन अक्सर अंधेरी सुरंगों में प्रवेश करती थी। यह मुझे पसंद नहीं आता था। उसके बाद सूर्यकिरणों से उद्भासित बर्फ के वे ही चित्र आँखों के सामने नजर आने लगे।रास्ते में छोटी-छोटी झीलें दिखने को मिल रही थीं। कुछ दूर नजर आ रही थी कनाड़ा की सबसे खूबसूरत और मशहूर झील बेंफ़। चारों तरफ बर्फ़ाच्छादित पहाड़ों की खोल और झीलों के तट पर कई पर्यटक कॉटेज थे,बेंफ गाँव था, मुझे विश्वास नहीं हो रहा था मानो मैं कोई सपना देख रहा था। इच्छा हो रही थी राधानाथ की कविता की पंक्तियों को थोड़ा बदलकर गाने की:

"रुको,रुको एक पल यांत्रिक शकट,

देखूंगा रॉकी का चारु-चित्रपट।"

सोने का समय सो गया। आधी रात बीत चुकी थी। हमारे अधिकांश बंधु इस लुभावने दृश्य का अब तक आनंद ले रहे थे। कुछ दोस्त आनंद-उल्लास से गीत भी गाने लगे थे। नींद आने का समय होने के कारण अनेक बंधु सोने चले गए। केवल मुझे नींद नहीं आ रही थी। मुझे याद है कि उस रात मैं बहुत देर से सोया था।

नींद खुलने के समय हमारी ट्रेन रॉकी पर्वतमाला के पाद-प्रदेश की घाटियों में दौड़ रही थी। दृश्यपट अब भी बहुत सुंदर थे, लेकिन रात के जादू जैसा नहीं, सपने की तरह वह कहीं खो गया हो। यद्यपि मैंने कोई फोटो नहीं खींचा था, लेकिन मेरे मन के अंदर वे दृश्य दीर्घकाल तक बचे रहेंगे। एक कविता का जन्म हो चुका था, हार्वर्ड लौटने के कई दिनों बाद मैंने 'रॉकी पर्वतमाला की यात्रा’ कविता लिखी। मूल कविता ओड़िया में लिखी गई थी। यह कविता और इसका अंग्रेजी अनुवाद मेरे ओड़िया और अंग्रेजी कविता-संकलनों में संग्रहित है। कविता के कुछ अंश निम्न है :-

जल्द ही हम कैलगरी के

मुट्ठी से बाहर निकले

विलंबित अपराह्न की संगीत-यात्रा में

छोटी नदी के कल-कल स्वन

हमारे साथ चल रहे थे।

****

रात के विलंबित प्रहर तक

हम गपते गए

हमारी आशा,हमारा भय,

इधर-उधर की सारी बातें

अंततः हमारे भाग्य के निर्णय

******

सुबह की प्रशस्त नदी

जिसके वक्ष पर दिखाई देते रात के जंगल

अनेक पेड़ों के शव

किसी अज्ञात देश की तरफ तैरते हुए

हमारे ज्ञान-अज्ञान

में वृद्धि करते हुए।

******

हम दोपहर के 12 बजे वैंकूवर पहुंच गए। वैंकूवर का स्थानीय समय कैलगरी के समय से एक घंटे पीछे था। अमेरिका की तरह कनाड़ा में भिन्न-भिन्न समय क्षेत्र हैं। पेजब्रुक होटल में हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी। श्रीमती केली हमें होटल में ले गई। शहर की यह सुंदर होटल प्रशांत महासागर से ज्यादा दूर नहीं थी। हमारे कई दोस्त लंबी ट्रेन यात्रा से थककर होटल में आराम कर रहे थे। मैं नौवें मंजिल के अपने कमरे की खिड़की से प्रशांत महासागर देख रहा था। बाहर घूमने की इच्छा हो रही थी। यूरोपीय संघ के चीफ एक्सक्यूटिव जेम्स स्पैन ने मेरा साथ दिया। हम दोनों पैदल-पैदल प्रशांत महासागर के तट पर स्थित प्रशांत मॉल में घूमने चले गए। छोटी-छोटी आयताकार क्यारियों में अनेक फूलों के पौधे लगे हुए थे। बीच-बीच में अनेक रेस्तरां और अन्य दुकानें थीं। दुकानों के सामने विस्तृत सीमेंट फर्श पर हरी पत्तियों वाले बहुत लंबे पेड़ लगे हुए थे और प्रत्येक पेड़ के नीचे वृत्ताकार घेरे में सर्दी ऋतु के फूल खिले हुए थे।ऐसा मिश्रित परिवेश हमें बहुत अच्छा लग रहा था। समुद्रोन्मुखी एक छोटे रेस्तरां में बैठकर हम दोनों ने कॉफी पी। समुद्र तट पर भ्रमण करने और कॉफ़ी पीने से हमारी रेलयात्रा की थकान उतर गई। पास वैंकूवर आर्ट गैलरी में घूमकर हम होटल में लौट आए। रूम में खाना मंगवाकर मैंने मध्याह्न भोजन किया।

थोड़ी देर आराम करने के बाद उसी होटल में ब्रिटिश कोलंबिया सरकार के आर्थिक विकास मंत्रालय के सचिव जॉर्ज लेनको ने हमें ब्रिटिश कोलंबिया की अर्थव्यवस्था के बारे में बताया। वैंकूवर स्थित भारतीय काउंसिल जनरल श्री जगदीश शर्मा उनके साथ में थे। क्यूबेक और ओन्टेरियो प्रदेशों की तरह ब्रिटिश-कोलंबिया प्रदेश की शिक्षा, व्यापार, वाणिज्य, प्रति व्यक्ति आय आदि सभी अत्यधिक उन्नत हैं। प्रशांत महासागर के किनारे पर स्थित इस प्रदेश का चीन और जापान के साथ निरंतर व्यापार संबंध बना रहता है। वैंकूवर में चीनी और जापानी लोगों की बड़ी आबादी है। लेनको के व्याख्यान के बाद गाइड हमें शहर के दौरे पर ले गया। पहले दिन हमारे लिए स्टेनली पार्क, क्वीन एलिजाबेथ पार्क, चीनाटाऊन, ग्रीनविल्ले आइलैंड, गैस टाऊन, डॉ॰ सूर्य यॉत सेन के क्लासिक चीनी उद्यान और मछलीघर देखना निर्धारित हुआ था। अगले दिन हमें और दो स्थानों पर जाना था। पहला ब्रिटिश-कोलंबिया विश्वविद्यालय और निगम द्वारा प्रबंधित एवं विश्वविद्यालय की तकनीकी सलाह के अनुसार बनाया गया खुला भूवैज्ञानिक संग्रहालय था। दूसरा दो झरने, छोटी नदी और उसके तट पर स्थित तालाब में नियोजित तरीके से रखी गई सैल्मन मछली को देखना था। स्टेनली पार्क और क्वीन एलिजाबेथ पार्क बहुत खूबसूरत हैं। स्टेनली पार्क के अंदर रखे गए विविध अमेरिकी-इंडियन के विभिन्न प्रकार, अलग-अलग ऊंचाइयों और क्षेत्रफलों के रंगीन कुलदेवता की पताकाएँ और भी सुंदर लग रही थीं। प्रत्येक जनजातीय समुदाय में नृतत्व में कुलदेवता का विशिष्ट पताका होती है। यह उस जनजाति की सबसे अच्छी पहचान मानी जाती है। लगभग सभी अमेरिकी भारतीय जनजातियों की पताकाएँ पार्क में प्रदर्शित की गई थीं। नृतत्व की कुछ जानकारी होने के कारण मैंने इन्हें देखने में ज्यादा समय बिताया था, इसलिए मैं अन्य दोस्तों के साथ पार्क की दूसरी जगहों में नहीं जा पाया। यह अनुभव मेरे लिए शिक्षाप्रद था। कुछ समय बाद हम क्वीन एलिझाबेथ पार्क में गए। हमारे कोलकाता में जिस तरह विक्टोरिया मेमोरियल रानी विक्टोरिया के यादगार में बनाया गया है, ठीक उसी तरह यह पार्क महारानी एलिजाबेथ की याद में। यह सर्वसाधारण लोगों के लिए एक सुंदर पार्क है,अवश्य इस पार्क में देखने के लिए काफी कुछ नहीं था। मगर मुझे सन यात सेन का शास्त्रीय चीनी उद्यान बहुत अच्छा पसंद आया। जापान के देखे गए बगीचों की तरह इस बगीचे में बहते झरने में रंगीन मछलियाँ, अलग-अलग ऊंचाई से उतरने वाले रास्ते, छोटे-छोटे तालाब और तरह-तरह के सुंदर पेड़- सभी मनमोहक लग रहे थे। इसलिए यह बगीचा मुझे बहुत अच्छा लगा। इसके बाद हमने चाइना टाउन में कुछ समय बिताया था। बीच-बीच में चाइनीज सूप का भी स्वाद लिया था। चाइना टाउन बहुत बड़ा है, क्योंकि प्रशांत महासागर के तट पर शहर होने के कारण कैलिफोर्निया के ऑरेंज काउंटी की तरह कई चीनी लोग चीन से इस जगह पर बस गए हैं।

गैस टाउन का नाम मुझे पहले समझ में नहीं आया। गाइड ने हमें बताया कि बहुत समय पहले इस जगह पर प्राकृतिक गैस एकत्रित की जा रही थी। हालांकि अब ऐसा नहीं है। केवल 'गैस' शब्द इस जगह के नाम से जुड़ गया है। इसके बाद हम डाउनटाउन वैंकूवर के बंदरगाह को देखने गए। पाश्चात्य देशों के सभी शहरों में बड़ी-बड़ी दुकानें, बाज़ारों और भीड़वाले इलाके को आमतौर पर 'डाउनटाउन' कहा जाता है। मुझे इस जगह में ऐसी कोई खासियत नजर नहीं आई, जिससे इसकी टोक्यो के गीजा, न्यूयॉर्क के टाइम स्क्वायर या लंदन के पिकाडिली सर्कस या ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट से तुलना की जाए। शाम होने लगी थी। हम समुद्र के नजदीक ग्रीन वैली द्वीप गए।वहाँ सूर्यास्त बहुत सुंदर दिख रहा था। संध्या उतरते-उतरते वैंकूवर शहर उज्ज्वल आलोकमाला से विभूषित होते-होते हम होटल लौट आए।

होटल में आने के बाद मैंने ओहियो के कैंटन में रहने वाले रिश्तेदार डॉ॰ वीरेश्वर पटनायक को फोन लगाया। मेरी पत्नी और बेटा हार्वर्ड से मोंट्रियल जाते समय कुछ दिन वहाँ ठहरने वाले थे। लेकिन हमारे एक अन्य संबंधी श्री सुजीत मोहंती (बफेलो विश्वविद्यालय में अंग्रेजी प्रोफेसर, प्रसिद्ध गायक अक्षय मोहंती के अत्यंत अंतरंग थे) ने उन्हें कैंटन से अपनी गाड़ी में ले गए। दो दिन तक वहां रहकर उन्होंने नियाग्रा प्रपात देखा और बाद में फ्लाइट पकड़कर सैन फ्रांसिस्को चले गए। अंजी और सूर्या (गोपी बाबू की बेटी और दामाद) उन्हें सैन फ्रांसिस्को से अपने घर सैन होज ले गए। कनाड़ा-यात्रा के शेष में मैं सैन होज गया था। वहां के विश्वविद्यालय के नृतत्व विभाग के प्रमुख डॉ॰ जेम्स फ्रीमैन और मेरे मानवविज्ञानी मित्र सुसान सीमौर ने मुझे फाइजर ग्रुप ऑफ कालेज में काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया था। उस समय सैन होज में अंजी और सूर्य के साथ गोपीमामू और मामी थीं। सैन होज में आठ दिवसीय प्रवास में मैंने विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने के साथ-साथ दोस्तों के साथ विभिन्न स्थानों पर घूमने और क्लेरमॉन्ट में सुजान के अनुष्ठान में काव्य-पाठ किया था।

हम अगली सुबह पहली बार वैंकूवर में साल्मन मछह ली के बारे में जानने के लिए गए। वैंकूवर के मत्स्य-पालन और महासागर विभाग ने साल्मन मछह ली के बारे में एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जिसका नाम था 'सलोमोनाइड एन्हांसमेंट प्रोग्राम'। यह किताब हमें पहले दिन दे दी गई थी। इसमें मैंने पढ़ा था कि इस कार्यक्रम के अनुसार वैंकूवर में इकतालीस जगहों पर काम चल रहा था । इन सभी को पुस्तिका में ब्रिटिश कोलंबिया के नक्शे पर भी दिखाया गया था, जिसमें एक तिहाई जगह वैंकूवर और समुद्री द्वीप के नजदीक थी। पढ़ने पर मुझे पता चला कि ब्रिटिश-कोलंबिया के विभिन्न क्षेत्रों में पांच प्रकार की साल्मन मछली पाई जाती थी, मगर कोहो और चिनूक किस्म ज्यादा मात्रा में पाई जाती थी। परियोजना की अन्य तीन किस्म इन साल्मन हैचरियों में नहीं थी। जिनके तीन क़िस्मों के नाम थे स्टीलहेड, सोकी और पिंक । हमें छोटी-सी नदी कैपिलानो के तट पर स्थित हैचरी के पास ले जाया गया। कैपिलानो नदी पर एक हैंगिंग ब्रिज बना हुआ था, लक्ष्मण झूला से बहुत छोटा। इस हेचरी में केवल कोहो और चिनूक की किस्में रखी गई थीं।

साल्मन एक विचित्र मछली है। मीठे पानी में अपने अंडे देने के लिए वे समुद्र से नदी में आती हैं। इससे पहले सात वर्ष तक समुद्र में घूमकर वे आकार में काफी विशालकाय हो जाती हैं, फिर अपनी दूसरी संक्षिप्त यात्रा शुरू करती हैं नदी के लिए। उनमें से बहुत सी पकड़ी जाती हैं, नदी के स्रोत के विपरीत तैरते समय। जो बच जाती हैं,वे मधुर जल में अंडे दे पाती हैं। उनके बारे में एक तथ्य और उल्लेखनीय है कि मधुर जल में सहवास के लिए आने वाली साल्मन मछली सहवास के तुरंत बाद मर जाती है। इस प्रकार उनका नया सृजन और मृत्यु लगभग एक ही समय में होती है। अत्यंत ही अद्भूत सृष्टि-तत्व है यह !

कैपिलानो नदी तट पर स्थित हैचरी में उन मछलियों को लाया जाता है और उनका अंडे देने से लेकर बढ़ते-बढ़ते पूरी तरह से वयस्क होने तक उनकी ज़िंदगी का अध्ययन करते हैं। उन्हें क्या खाना पसंद है और वे कितनी गहराई में अपने अंडे देती हैं- आदि उनकी गवेषणा के विषय होते हैं। इकतालीस परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य यह है कि किस तरह मधुर जल में अधिक से अधिक साल्मन मछली के बच्चे पैदा हों और निरापद तरीके से समुद्र में चली जाए- इन विषयों पर अनुसंधान करना। कैपिलानो हेचरी देखने के बाद हम पास का अंगूर बगीचा देखने गए। ब्रिटिश-कोलंबिया और वैंकूवर अंचल में इन अंगूरों से अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया की तरह अच्छी गुणवत्ता वाली लाल और सफेद शराब का पर्याप्त उत्पादन किया जाता है। उस अंगूर बगीचे में हमने वाइन परीक्षण प्रक्रिया और प्रणाली देखी। उसके हैचरी के नजदीक प्रोस्पेक्ट प्वाइंट में हमने लंच किया और कल नहीं देख पाए एक्वैरियम को आज देखने गए। यह बहुत बड़ा एक्वैरियम था। छोटी-बड़ी अनेक सफेद रंग की बलुगा व्हेल और दो मानव भक्षी किलर व्हेल देखी। मानव भक्षी के होने के बावजूद भी वे नृत्य करने में कुशल थीं और बच्चों की तरह चीं, चीं की कर्कश आवाज निकाल रही थीं। उनका पूरा शरीर काला, नाक के पास थोड़ा सफेद निशान था। हमने और कई छोटे-छोटे तालाबों में अन्य समुद्री मछलियाँ देखीं। उसके बाद हम ब्रिटिश-कोलंबिया के संग्रहालय और विश्वविद्यालय को देखने के लिए रवाना हुए।

ब्रिटिश-कोलंबिया विश्वविद्यालय न केवल अपने प्रदेश या कनाड़ा में प्रसिद्ध है,बल्कि सारी दुनिया में उसकी ख्याति है। इस विश्वविद्यालय के नृतत्व और समाजशास्त्र के विभाग बहुत ही सम्मानित है। मेरी नृतत्व में विशेष दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने उस विभाग के प्रोफेसरों के साथ चर्चा के लिए अलग से कुछ समय निकाला। उन्होंने मुझे पहले दिन देखे हुए स्टैन्ली पार्क में लगे कुलदेवताओं की पताकाओं के बारे में कुछ और जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि पार्क में उनके सज्जीकरण की व्यवस्था उनके विभाग द्वारा की गई थी।

संग्रहालय वैंकूवर नगरपालिका के नियंत्रण में था, लेकिन विश्वविद्यालय के नृतत्व विभाग ने इसे बनाया था। विश्वविद्यालय में भारत के बारे में बहुत कुछ अध्ययन-शोध किया गया है और यह अब भी जारी है। उदाहरण के लिए, संग्रहालय में भारत पर आधारित एक प्रदर्शनी नृतत्व विभाग द्वारा लगाई गई थी। यह प्रदर्शनी छह ह विषयों पर आधारित थी अर्थात् राम-सीता, विष्णु, शिव- पार्वती, घर-मंदिर, हिंदू परंपराएं और हिंदू, मुस्लिम और सिखों की परंपराओं में पारस्परिकता- प्रत्येक विषय पर बनी अनेक परंपरागत पेंटिंग, रेखाचित्र, भास्कर्य वस्तुएं एवं लिखित पोस्टर दर्शकों को समझाने में मदद कर रही थी। खूब सुंदर पृष्ठभूमि में सितारवादन इस प्रदर्शनी का अन्यतम आकर्षण था। हमारे उपनिषद (मुख्यतः छान्दोग्य उपनिषद) से कुछ चुने गए अंशों को उनके अँग्रेजी अनुवाद के पोस्टर के साथ भी प्रदर्शित किए गए थे। इसके अतिरिक्त, कॉमनवेल्थ से संबंधित कुछ बेहतरीन तस्वीरें भी इस प्रदर्शनी में आयोजित की गई थीं।

ब्रिटिश-कोलंबिया विश्वविद्यालय प्रशांत महासागर के घाट पर स्थित है। विश्वविद्यालय के लॉन, उद्यान और उनसे जुड़े रास्ते प्रशांत महासागर से बहुत दूर नहीं हैं। लहरों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी।सामने समुद्र दिखाई दे रहा था। हमारे गाइड ने कहा कि कनाड़ाई तीन चीजों को ज्यादा पसंद करते हैं।

पहली- फिल्म एवं संगीत,

दूसरी- पर्यावरण,खासकर जंगल, बर्फ हंसों की वार्षिक दक्षिण यात्रा एवं मूस और कैरिबौ (दोनों उत्तरी अक्षांश के जानवर )।

तीसरी- साहित्य और लोक साहित्य

गाइड ने बताया कि एक बार टोरंटो का प्रसिद्ध सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा उत्तर के इनुविक शहर में आया था। सिम्फनी के निदेशक आंद्रे डेवी की प्रेक्षागृह में उम्मीद से कम लोगों को देखकर कुछ हद तक आश्चर्यचकित हुए और उतनी कम उपस्थिति के कारण खोजने लगे। उन्हें बताया गया कि उस दिन उस वर्ष पहली बार मूस के दर्शन हुए थे। बाद में गाइड ने कहा कि मूस के दर्शन करना हंसों की दक्षिण-यात्रा जैसा अवसर होता है।

वैंकूवर को अलविदा करने का समय आ गया था। होटल लौटकर कुछ नाश्ता पानी करने के बाद हमने एयर कनाड़ा से ओटावा के रास्ते बोस्टन की उड़ान भरी। हमें कहा गया, बोस्टन का अंतरराष्ट्रीय समय वैंकूवर के स्थानीय समय से तीन घंटे आगे है। एयरलाइन ने हमें उड़ान में डिनर दिया। बोस्टन पहुंचते –पहुँचते मुझे भारी नींद आने लगी थी। टैक्सी से कॉनकॉर्ड एवेन्यू के मेरे अपार्टमेंट में पहुँचकर तुरंत सो गया। एक सपने की तरह दो सप्ताह का दौरा पूरा हो गया था। जिन आठ नौ शहरों में पांच सितारा होटल में रहने और वहाँ के अनेक दर्शनीय स्थल देखने को मिले,इतना ही नहीं, वरन् प्रवास के दौरान विशिष्ट अतिथियों के उद्बोधन और उनसे चर्चा के माध्यम से कनाड़ा के इतिहास, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, जीवन शैली, अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषाओं के बीच आपसी संबंध एवं प्रतिस्पर्धा के बारे में सम्यक जानकारी प्राप्त हुई। कैलगरी से वैंकूवर का ट्रेन सफर सबसे ज्यादा यादगार हिस्सा बना। कैफे टूर्नामेंट में लाखों बर्फहंसों का समावेश, मॉन्ट्रियल और क्यूबेक में सेंट लॉरेंस नदी के किनारे भ्रमण और सामग्रिक भाव से वैंकूवर शहर, उसकी साल्मन मछह ली और प्रशांत महासागर भी हमें बहुत अच्छा लगा।

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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