आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ५ - संस्था, कारोबार व्यवस्थापन और नेतृत्व पर आध्यात्मिकता का प्रभाव - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

--

प्रस्तावना | अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 | अध्याय 4 |

अध्याय : ५

संस्था, कारोबार व्यवस्थापन और नेतृत्व पर आध्यात्मिकता का प्रभाव

अमरीका के शेअर बाजार के कुछ संस्थानों में लोभ और लालसा के कारण जो घपले हुए वे कुछ वर्षों के अंत में किए गए हैं (२००२, २००८), जिस से वहां की अर्थव्यवस्था पर मंदी हावी हो गई. इस समय, दुनिया के सारे देशों के अर्थतंत्र एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. इसलिए अमरीका की मंदी दावानल की तरह सर्वत्र फ़ैल गई है और विश्व के निर्दोष कामगार और गरीब लोग इसके बलि बन गए हैं. बहुत से लोग बेरोजगार, बेकाम हो जाते हैं. कई लोग बेघर हो जाते हैं और कुछ आत्महत्या करने के लिए प्रेरित होते हैं. जब इन के बारे में जानकारी पाते हैं तो ह्रदय पसीज जाता हैं.

अमरीका और योरप में अग्रिम पंक्ति के कई विवेचकों ने इस के बारे में लिखा है. संस्थानों में अग्रणी (नेता) लोगों के अनुचित व्यवहार के बारे में विश्व के प्रमुख वर्तमान पत्र जैसे कि बिजनेस विक, फोर्च्यून, यु.एस.न्यूज, वर्ल्ड रिपोर्ट, न्यूज विक, टाइम, दि इकोनोमिस्ट इत्यादि में इस विषय की करूण स्थिति के बारे में खेद प्रकट किया जाता है. ये सारे वर्तमानपत्र एक ही समस्या की बात करते हैं: ऐसे घपले आम जनता में ऐसी छवि बनाते हैं की कुछ कंपनियों के अधिकारी नैतिकता और अपने मूल्यों को भूल कर खुले आम भ्रष्ट आचरण करते हैं और वे अधिकारी के मूल्य और सामाजिक जिम्मेवारी की समझदारी का अभाव दर्शाते हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि गवर्नमेंट के कायदे-क़ानून से संबंधित व्यवसाय के निति-नियम ऐसे घपले रोक नहीं पाए हैं.

संस्थान के उच्च अधिकारी, संस्थान के उचित संचालन के द्वारा, अपने सारे कर्मचारिओं को अनुचित व्यवहार करने और लोभ लालसा के प्रलोभन से दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनका प्रमुख दायित्व यह है कि संस्थान को आकार देते समय ऐसा माहौल बनाएँ कि जिस में संस्थान से संबंधित प्रत्येक आदमी के हित का ध्यान रखा जाए, जहाँ उस के हक का आदर होता हो, संस्थान के मूलभूत मूल्यों में वृद्धि हों और उन्हें बनाए रखने में कहीं पर गलत समझौते न् हों, न ही किसी से गुप्त रूप से कुछ गलत किया जाए.

स्टीवन कवि अपनी पुस्तक 'दि एईटथ हेबिट' (The Eighth Habit) में संचालकों के साथ हुई अपनी बातों का सारांश उद्धृत करते हैं. आपने ५४००० से भी अधिक संचालकों से विचार विनिमय किया. उस दौरान आपने संचालक के आवश्यक गुण के बारे में पूछा. सभीने सर्वसम्मति ऐसा कहा कि संचालक में प्रामाणिकता का गुण होना सब से अधिक महत्वपूर्ण है. यदि किसी का आचरण अपने कहने के अनुसार नहीं है तो यह अप्रामाणिकता का स्पष्ट चिन्ह है. संस्थान के ऐसे संचालक या मालिक अपने कर्मचारिओं और संस्थान से जुड़े अन्य सारे लोगों की विश्वसनीयता गँवा देते हैं. उनके खंडित व्यक्तित्व के दो पहलू होते हैं. ऐसे लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ ओर है, वे अपनी जबान से मुकर भी सकते हैं. उसे दुरंगी चाल चलनेवाला कपटी संचालक कहते हैं. उनका जीवन डॉ. जेकिल और हाइड के साथी जैसा हो जाता है. ऐसे जीवन में आंतरिक संघर्ष अक्सर होते ही रहते हैं. जेकिल और हाइड की तरह जीता मनुष्य जीवन में कुछ खास हासिल नहीं कर सकता. ऐसे खंडित जीवन में हमेशा सदगुणों की बलि चढ जाती है. अच्छा जीवन जीने के लिए अथवा संस्था का अच्छी तरह से संचालन करने के लिए किसी भी मनुष्य का प्रामाणिक होना अत्यंत आवश्यक है. यही है प्रामाणिकता का अर्थ: जिन मूल्यों पर आप का विश्वास हो उनके प्रति संपूर्ण रूप से समर्पित हो जाना, यही एक मात्र उपाय है खंडित जीवन से बचने का. इस प्रकार का अखंडित जीवन मनुष्य में गहरा आत्म समर्पण और सच्ची इमानदारी लाता है. इसीलिए किसी भी संचालक में मूलभूत रूप से यह गुण होना अत्यंत आवश्यक है. यही संस्था के संचालन की नींव है.

जेम्स मेकग्रेगर बर्न्स (James Mac Gregor Burns) ने कायापलट कर देनेवाले संचालक कैसे होते हैं इस का विचार प्रस्तुत कर के संचालकों से संबंधित अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. रूपांतरकारी संचालक अपने कर्मचारियों को उच्च हेतु के लिए जाग्रत करते हैं तथा प्रगति करने के लिए प्रेरित करते हैं. संक्षेप में रूपांतरकारी संचालक अपने कर्मचारियों को उच्च प्रेरणा, हेतु और उमंग से भर देते हैं. ऐसे संचालकों को न्याय का मूल्य, विचारों की स्वतंत्रता और समानता की अधिक फिकर होती है. बर्न्स दृढ़ रूप से ऐसा मानते थे कि 'रूपांतरकारी संचालक परस्पर जागृति और एकदूसरे को उन्नत करे ऐसा संबंध स्थापित करने में सफल होते हैं. वे कर्मचारियों को अच्छे संचालक के रूप में बदलते हैं और उनको नैतिकता का अधिक प्रसार करने के लिए सक्रिय करते हैं.' इस विवेचन का प्रमुख सन्देश यह है कि रूपांतरकारी संचालक अपने साधारण कर्मचारियों का असाधारण संचालकों में रूपान्तर करने की क्षमता रखते हैं. ऐसा रूपांतरण लोगों के अंतरात्मा की आवाज से होता है.

वोरन बेनिस और बर्ट ननु (warren Bennis and Burt Nanun) ने बर्न्स की संचालकों की परिभाषा को ज्यादा विस्तृत की. आपने सूचित किया कि रूपांतरण करनेवाले संचालक संस्थान के कर्मचारियों में रही भावनाशील और आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग करते हैं. क्यों कि ऐसे संचालक के लिए संस्था के कर्मचारियों के मूल्य, उनका समर्पण भाव और उनके उमंग जैसी बातें अधिक महत्व रखती हैं. वोरन बेनिस अधिकारिओं के आध्यात्मिक पहलूओं के प्रति ज्यादा सजग हैं. अध्यात्म की रूपांतर करने की शक्ति के बारे में वे कहते हैं: 'ऐसे अधिकारी का सामर्थ्य ऐसा होता है कि जिस में मनुष्य की चेतना उन्नत बनती है, सार्थक बनती है और यह चेतना मनुष्य के जीवन को इस प्रकार से प्रेरित करती है कि जिससे वे दूसरों के लिए आदर्श बन सकें.'

अपनी पुस्तक 'लीडरशिप इज एन आर्ट' में मेक्स डीप्री (Max Depree) ऐसे तर्क प्रस्तुत करते हैं कि संचालन ऐसी बात है कि जिस का प्रमाण नहीं दिया जा सकता. 'शायद यह ऐसी कला है कि जिस की अनुभूति हो सकती है, उसका अनुभव किया जा सकता है, उसका सर्जन हो सकता है. संचालक का कार्य वैज्ञानिक से अधिक अनुभूतिजन्य है.' कलात्मक नेतृत्व के मूल में सेवा करने की भावना है. संस्थान के सदस्यों के साथ संस्थान के संबंध के बारे में बताते हुए डीप्री एकदूसरे के साथ कानूनी संबंधों के स्थान पर समझौते के अनुसार स्थापित संबंधों में अंतर स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इकरारनामे पर आधारित संबंध परस्पर कम से कम आवश्यकताओं पर निर्धारित होते हैं, जब कि आपसी समझौते से निर्धारित किए गए संबंध कई बातों पर खुले मन से विचार विमर्श करने के बाद अस्तित्व में आते हैं, तब यह समझौता कार्य को कुछ ऐसा अर्थ देता है जिसे पूर्ण करने के लिए सब एकजुट हो कर लग जाते हैं. आखिर में वे संबंधों की पवित्रता और गरिमा व्यक्त करते हैं. असल में परस्पर समझौता आत्मा की गहराई को छूती नेतृत्व की कलात्मक अभिव्यक्ति बन जाती है. पिटर वेइल (Peter Vaill) अपनी पुस्तक 'मेनेजिंग एज अ परफोर्मिंग आर्ट' में आध्यात्मिकता के प्रश्न को आदर्श नेतृत्व की आवश्यकता के रूप में देखते हैं. उन के अभिप्राय के अनुसार 'आध्यात्मिकता भीतर के मंथन के समय आत्मा द्वारा होती विविध प्रकार की नवीनतम और गहन अनुभूति की खोज है.' यह मंथन करने का मतलब ही मनुष्य होना है. पुस्तक में आप आगे दर्शाते हैं कि: 'समग्र रूप से सच्चा नेतृत्व आध्यात्मिक नेतृत्व है, भले ही यह कभी शब्दों में व्यक्त न हुआ हो. इस से आगे वेइल कहते हैं: 'संपूर्ण मनुष्य बनने की हमारी कोशिशों का पूर्ण सारांश आध्यात्मिकता है. जब यह हमारे भीतर व्याप्त होती है तब हमें प्रोत्साहित करती है, हमारे भीतर रचबस जाती है और हमारे मन में एक जगह कायम कर लेती है. इस प्रकार से वह हमारे अनुभवों को समृद्ध करती है.'

आध्यात्मिक नेता, कार्यकर्ताओं को दीर्घकालीन दृष्टि से तैयार करते हैं ऐसा अक्सर देखा गया है. ऐसा माहौल कार्यकर्ताओं को संस्थान के मूल्यों का पालन करना सिखाता है, हेतुपूर्वक समर्पित भावना से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है और उनकी उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है ऐसा प्रतीत होता है. जहाँ कर्मचारियों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है ऐसे संस्थानों में इस बात का सीधा प्रभाव संस्थान के विकास पर होता हुआ नजर आता है. कुछ सुप्रसिद्ध लेखकों व अन्वेषकों ने दर्शाया है कि आध्यात्मिकता नेताओं की सफलता के लिए महत्वपूर्ण पहलू बन सकता है.

पेट्रिशिया एबर्डीन (Patricia Aburdene) ने अपनी आखिरी पुस्तक 'मेगा ट्रेंड्ज' में कहा हैं कि कारोबार में आध्यात्मिकता पर ध्यान केंद्रित करने की बात इतनी तेजी से फ़ैल रही है कि यह अपनाने जैसा आज का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक झुकाव बन गया है. आप अपने कथन का समर्थन करते हुए कहते हैं कि आध्यात्मिकता की शक्ति का प्रभाव हमारे निजी जीवन पर भी होता है और यह संस्थानों को नैतिक रूपांतरण करने के लिए सजग करता है. वर्तमान में अधिक संस्थाएं उन कर्मचारियों को अधिक नियुक्त करना पसंद करते हैं जिनका आध्यात्मिक मूल्य अधिक हो.

न्यूज वीक, टाइम, फोर्च्यून और बिजनेस वीक के प्रमुख लेखों में अमरीका के कोर्पोरेट क्षेत्र में आध्यात्मिकता की मात्रा बढाती जा रही है यह बात उभर कर सामने आ रही है.

बहुत से व्यवस्थापन अधिकारी और नेता व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन में स्वेच्छा से अपने कार्य को आध्यात्मिकता के साथ जोड़ने लगे हैं. यह सब से बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है. कई किस्से में इस के कारण संस्थान के कर्मचारिओं के आपसी संबंधों में भी काफी सकारात्मक परिवर्तन हुआ है. इस से भी आगे, संस्थानों में आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करने से व्यक्तिगत रूप से लाभ हुआ हो ऐसे परिणाम भी पाए जाते हैं. जैसे कि, मनुष्य का स्वास्थ्य और मानसिक अवस्था में सकारात्मक सोच की वृद्धि. इस के सिवा वे अपनी कार्यक्षमता, उत्पादकता, अनुपस्थिति में कमी और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार दर्शाते हैं. यदि कंपनी अपनी संस्था में आध्यात्मिकता अपनाती है तो इससे कंपनिओं की कार्यप्रणाली में सुधार होता है इतना ही नहीं कर्मचारियों को केंद्र में रखते हुए अच्छे मूल्य और परस्पर भरोसे की भावना से कंपनी और उसके कर्मचारीओं के बीच आदर्श संबंध भी स्थापित होता है. और ऐसा भी सिद्ध हुआ है कि संस्थान में जितनी अधिक आध्यात्मिकता उतनी उत्पादन में वृद्धि होती है. इतना ही नहीं परंतु संस्थान के कार्यकर्ता और संचालकों के बीच और भी अच्छे व सृजनात्मक संबंध स्थापित होते हैं जो वर्तमान समय की तीव्र प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने के लिए अत्यंत उपयोगी हथियार सिद्ध हो सकता है.

संस्थान में आध्यात्मिकता के समर्थक ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं कि आध्यात्मिकता से लोगों को संस्था के लिए अदभुत आदर का उदभव होता है. उससे कर्मचारिओं में अपनेपन की भावना और सहअस्तित्व की अच्छी सी प्रेरणा मिलती हैं. व्यू कास्ट कोर्पोरेशन (Viewcast Corporation) के कार्यकारी अधिकारी ज्योर्ज प्लेट (George Platt) के अभिप्राय के अनुसार 'लोग प्रथम या द्वितीय स्थान पाने के लिए संस्था में कार्य करने नहीं आते या कुल मुनाफे से २५% का मुआवजा मिले इसलिए भी वे यहां नहीं आते. उन के कार्य करने के पीछे कोई हेतु है. और वे चाहते हैं कि अपने जीवन को सार्थकता मिले इसलिए वे आते हैं.' जिन कर्मचारिओं का कार्य करने का आशय केवल अपनी आर्थिक आवश्यकताएँ पूरा करने का ही होता है उनसे विल्कुल भिन्न आशय ऐसे कर्मचारिओं का कार्य करने का होता है. वे अपने कार्य को कृतसंकल्प हो कर व्यावसायिक स्तर का मानते हैं. कुछ ऐसे प्रमाण भी मिलते रहते हैं कि आध्यात्मिकता से संस्था के उत्पादन में स्पर्द्धात्मक लाभ भी होते हैं. व्यावसायिक आध्यात्मिकता ऐसे मूल्यों को भी समाविष्ट करती है जो समर्पित होने की भावना भी जागृत करती है और सहअस्तित्व स्थापित करने के संपर्क भी उम्दा होते हैं, जिस से कर्मचारिओं को कार्य में निजी संतोष प्राप्त होता है. संस्थान के सदस्य दृढता से कार्य करते हुए समर्पित होने की भावना और अच्छे सदस्य बनाने की उत्कंठा, संस्थान में आध्यात्मिकता के सिद्धांत की नींव बनती है.

v संस्थान में आध्यात्मिकता और धर्म :

संस्थान में आध्यात्मिकता का अभ्यास तुलनात्मक दृष्टि से धार्मिक जटिलता से मुक्त होता है. असल में संस्थानों में धार्मिक विचारधारा पर ध्यान नहीं दिया जाता. आध्यात्मिकता से संबंधित जब भी कोई प्रश्न संस्थान के सामने आता है, तब संस्थान ने हमेशा उन के संबंध में सही या गलत धार्मिक विचारधारा का उल्लेख करने से बचना चाहा है. संस्थान में आध्यात्मिकता को धार्मिक परम्परा और विधि के सन्दर्भ में देखने से हमारे विचार विभाजक बन जाते हैं. सही कहें तो धर्म मनुष्य को कईबार संकीर्णता की ओर ले जाता है. धर्म की ऐसी प्रकृति शायद संस्थाकीय उद्देशों की कीमत पर धर्मान्धता के प्रति मोड दे ऐसा हो सकता है. ऐसा वर्तन संस्थान के सदस्यों को और ग्राहकों को नाराज कर सकता है और उनके आंतरिक मूल्यों में और कर्मचारी के कल्याण के सन्दर्भ में विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर सकता है.

हम अगले अध्यायों में देख चुके हैं कि इस का उलेख करना आवश्यक है कि आध्यात्मिकता और धर्म के बीच अंतर है. धर्म को कोई विश्वास, मान्यता, परंपरा, प्रार्थना, कर्मकांड और विधि के साथ संबंध है और उस में नियत स्वरूप की क्रिया और निश्चित विचार होते हैं. उस के बदले आध्यात्मिकता मनुष्य की भावना और उसकी आत्मा के साथ संबंधित है. उस में सकारात्मक मानसिक ख़याल, जैसे कि प्रेम, करूणा, धैर्य, सहनशीलता, क्षमा, संतोष, निजी उत्तरदायित्व और अपने माहौल के साथ सुमेल का समावेश होता है. आध्यात्मिकता ऐसे दर्शन की खोज है कि जिस में नम्रता, परोपकार, निस्वार्थ प्रेम, सच्चाई, दूसरों की सेवा भावना के साथ सब को एकसमान समझने की और प्रत्येक को आदर सम्मान देने की तत्परता है. यह केवल सच बोलने की प्राथमिक आवश्यकता से भी जो वस्तु जैसी है वैसी ही देखने की, विषयवस्तु को विकृत किए बगैर यथार्थ दृष्टि से देखने की बात है. इस दृष्टिकोण से, आध्यात्मिकता धर्म का अंश बन सकती है. परंतु धार्मिक विधि आध्यात्मिक व्यवहार का अंश होना ही चाहिए यह आवश्यक नहीं.

v अंतरराष्ट्रीय विश्व और नेतृत्व :

स्टीवन कवि अपनी पुस्तक 'दि एईटथ हेबिट' (The Eighth Habit) में वे 'दुनिया के महा रूपांतरकारी परिवर्तन' पर विचार करते हैं. वे २१ वीं शताब्दी के नेताओं से कहते हैं कि: 'अब हम जब संस्थाकीय चुनौतियों को अधिक गहराई से समझने के लिए आगे बढ़ रहे हैं तब मैं आप को इस महा रूपांतरकरी परिवर्तनों के सात मुद्दों पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता हूँ, जो प्रवर्तमान नव शिक्षित एवं बहुश्रुत कर्मचारी युग के लक्षण दर्शाते हैं. उस में आपको वर्तमान सन्दर्भ में संस्थान के और आप के निजी संबंध के बारे में चुनौतीपूर्ण बातें नजर आएंगी:

· अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं टेक्नोलोजी:

नई टेक्नोलोजी ने देश-विदेश जैसी दूरियां या अंतर को ध्यान में नहीं रखते हुए अधिकतर स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रिय बाजारों की कायापलट करने की शुरुआत कर दी है.

· अंतरराष्ट्रीय संपर्क की सरलता:

'ब्लोंन टू बिट्स' (Blown to Bits) पुस्तक में इवान और वुर्स्टर (Evan & Wurster) कहते हैं: 'संदेशों का आदान-प्रदान करती हुई, निजी (मलिकी की) बिजली के तार से जुडी हुई और कुछ क्षमता रखनेवाली पद्धतियाँ जो कि लोगों को और कंपनियों को मर्यादित रखतीं थीं वे सारी अब जैसे एक ही रात में पुरानी हो गई हैं. और उनके व्यावसायिक ढांचे रातभर में अर्थहीन बन गए हैं. संक्षेप में जो वस्तु तमाम आर्थिक प्रवृत्तियों को जोड़े रखतीं थीं वे सारी सार्वत्रिक संपर्क हो पाने के कारण तेजी से पिघल रहीं हैं. अतः इतिहास में पहली ही बार जानकारी एवं ज्ञान के प्रसार से वस्तुओं का प्रसार अलग होता हुए नजर आता हैं.

· जानकारी एवं संभावनाएं अब नियंत्रित नहीं रहीं :

इंटरनेट इस विश्व की परिवर्तनकारी जबरदस्त खोज है. इतिहास में पहली ही बार मनुष्य की आत्मा की आवाज सरहदों के पार किसी भी नियंत्रण के बगैर लाखों लोगों के बीच बातचीत के रूप में गूंजने लगी. इसी क्षण की तरोताजा जानकारी लोगों की अपेक्षा और समाज के निर्णयों को तय कर सकती है, जो कि राजनीती और प्रत्येक मनुष्य को प्रभावित करती है.

· अपूर्व तेजी से बढती हुई प्रतिस्पर्द्धा:

इंटरनेट और सेटेलाईट टेक्नोलोजी के साथ जुडे हुए किसी भी मनुष्य या संस्थान को भविष्य में अन्य लोगों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए सतर्क करती है. अब संस्थानों को किसी नए अविष्कार की दिशा में जाने के लिए और अधिक कार्यक्षम बनाने के लिए तथा बेहतरीन योग्यता की, ऊंचे दर्जे की वस्तुएँ और सेवा देने के लिए निरंतर रूप से प्रयत्नशील रहना पडता है. नए व्यापारिक औद्योगिक संस्थान और प्रतिस्पर्द्धा से श्रेष्ठता में सुधार हो रहा है, संचालन खर्च कम होता जा रहा है और संस्थान ग्राहकों की मांग तुरंत और यथेष्ट रूप से पूर्ण करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. किसी को भी अब अन्य संस्थानों से कम श्रेष्ठतावाली वस्तुएँ या सेवाएँ देना स्वीकार्य नहीं ऐसी स्थिति का सृजन हो चुका है. प्रत्येक संस्थान को अब वैश्विक स्तर की स्पर्द्धात्मक वस्तुएँ प्रस्तुत करनी पड़ती हैं.

· केवल आर्थिक पूँजी बढ़ाने के बदले बौद्धिक और सामाजिक पूँजी का सर्जन करने की ओर झुकाव:

संपत्ति सर्जन करने का झुकाव अब धन से मनुष्य की ओर हुआ है. आर्थिक पूँजी के स्थान पर बौद्धिक और सामाजिक मूल्य रखनेवाली मानव-पूँजी की ओर झुकाव बढता जा रहा है. इस में इस प्रकार के मूल्यों के सारे पहलूओं का समावेश हो जाता है. इस समय के उत्पादनों में से दो-तिहाई से अधिक उत्पादन मूल्य शिक्षित एवं जानकारी प्राप्त कर्मचारियों पर आधारित कार्यों से होता है; बीस साल पहले यह प्रमाण एक-तिहाई से कम था.

· कर्मचारिओं के विकल्प :

लोगों को अब अधिकाधिक जानकारी मिलने लगी है, उन्हें पहले कभी नहीं मिलते थे इतने विकल्प प्राप्त होने लगे हैं. इस से उनमें जागृति आ गई है और वे अधिक सतर्क हो गए हैं. नौकरी-पेशे का बाजार अब मुक्त कर्मचारियों की ओर तबदील होता जा रहा है. और लोग अब रोजगार की पसंदगी करने में अधिक सावधानी बरतने लगे हैं. शिक्षित कार्यकर्ता अपने को किसी भी वर्ग या ढांचे के साथ जोड़ते संचालकों के प्रयत्नों का विरोध करने लगे हैं और वे खुद अपने आप को किस रूप में पहचाने जाएँ यह निर्णय करने की निति अपनाने लगे हैं.

· पल पल हो रहा परिवर्तन :

हम निरंतर भीषण रूप से उलटते पलटते वातावरण में सांस ले रहे हैं. प्रतिक्षण बदलती परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कुछ तो ऐसा होता ही है जो उसे अपने बारे में निर्णय लेने के लिए मार्गदर्शन देता है. उसे स्वयं संस्थान के हेतु और मार्गदर्शक सिद्धांत समझने ही चाहिए. इस समय हम ऐसी स्थिति में हैं जहाँ हमें नदी की अनियंत्रित बाढ़ में, उठती-घूमती लहरों के भंवरजाल में नैया खेनी है. ऐसे में सब को नेतृत्व करना होता है, सब को व्यवस्था संभालनी पड़ती है. कोई नेता नाविकों को आदेश दे पाए यह भी संभव नहीं होता, क्यों कि ऐसे हो हल्ले में और उफनती हुई बाढ़ में स्थिति के अनुसार ही नैया पार लगानी होती है. संस्थान के मार्गदर्शक सिद्धांतों को आत्मसात किये हो तो ही ऐसी स्थिति में नैया को सफलतापूर्वक पार लगाया जा सकता है.

कुछ लेखकों ने विद्यमान और पहले के महान धर्म तथा राजकीय और आध्यात्मिक नेताओं के बारे में कुछ साहित्य प्रकाशित किया है, जिस में महात्मा गाँधी, मार्टिन ल्यूथर किंग जूनियर, २३ वें पोप ज्होन, मदर टेरेसा और नेल्सन मंडेला इत्यादि का समावेश होता है. कुछ लेखकों ने नेतृत्व के आत्मीय एवं प्रेमपूर्ण संबंधों के बारे में अच्छीखासी जांच की है. यह प्रकाशन नेतृत्व और आध्यात्मिकता के बीच के संबंधों का महत्व अत्यंत स्पष्ट रूप से दर्शाता है.

रॉबर्ट ग्रीनलीफ (Robert Green Leaf) ने धार्मिक संबंधों के बारे में बहुत कुछ लिखा है. धार्मिक नेतृत्व का महत्व समझाने के अलावा, ग्रिनलीफ ने उन सिद्धांतों का धर्म के सिवा अन्य कार्यक्षेत्रों में भी कैसे उपयोग किया जा सकता है उस के बारे में भी जानकारी दी है. और उस के अनुसार नेतृत्व का नया रूप प्रत्येक चरण पर और समाज की प्रत्येक शाखा में उपयोगी बन सकता है. नेतृत्व के महत्व की प्रमाणित बातों को अत्यंत संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए आप कहते हैं: 'धार्मिक नेतृत्व से हम अध्यात्म द्वारा नेतृत्व और अन्य कई बातें जान सकते हैं, सिख सकते हैं.' इस विषय पर आपकी पुस्तक 'सरवंट लीडरशिप' (Servant Leadership) बहुत प्रसिद्ध हैं.

सेवक-नेता (सरवंट-लीडर) खास तौर से कर्मचारी, ग्राहक और समाज का अपनी सेवा द्वारा उचित मार्गदर्शन करता है. सेवक-नेतृत्व की विशिष्टताओं में एकदूसरे को ध्यान से सुनना, दूसरों की स्थिति को समझना, दूसरों का दुःख दूर करना, लोगों को जागृत करना, उनको समझाना (मनाना), आसानी से समस्याओं का समाधान करना, दीर्घदृष्टि, समर्पित भाव से सेवा करना, कार्यनिष्ठ, विकास और समाज का निर्माण इत्यादि का समावेश होता है.

· सेवक-नेतृत्व अभियान :

नेता बनकर नेतृत्व के द्वारा सेवा करवाने का विचार बहुत पुराना है, परन्तु आधुनिक सेवक-नेतृत्व के विचार का प्रारंभ रॉबर्ट के. ग्रीनलीफ ने अपने निबंध 'द सरवंट एज लीडर' (The Servant as Leader) से किया, जिस का प्रकाशन १९७० में हुआ था. ग्रीनलीफ एक व्यावसायिक मनुष्य थे. आपने ए.टी.एंड टी. (A.T.& T.) नामक कंपनी में लगातार ३८ वर्ष तक काम किया था और उस समय यह विश्व का सब से बड़ा कोर्पोरेशन था. वे जब उस में काम करते थे तब व्यवसाय एवं नेतृत्व के बारे में जानकारी प्राप्त की. असल में वे ए. टी. एंड टी. में मैनेजमेंट रिसर्च के डिरेक्टर थे. इस का अर्थ यह हुआ कि उनका कार्य संस्थान में नेता बन सके ऐसे संचालकों को तैयार करने का था. और उनका लक्ष्य संभवतः हो सके उतने अधिक प्रभावशाली ऐसे संचालक बनाने का था.

ग्रीनलीफ ने इस बात को नोट किया कि कुछ कर्मचारी केवल अपने निजी फायदे के लिए ही काम करते हैं. कुछ लोग खुद को सत्ता, संपत्ति एवं यश मिले इस के लिए तरसते रहते हैं. परंतु उनमें से कुछ कर्मचारी ऐसे भी थे कि जो अपने बंधु-बांधवों को मदद करने की चाह रखते थे और अपने ग्राहकों को सेवा प्रदान करना चाहते थे. इस से ग्रीनलीफ ने देखा कि जो लोग संस्थान में अन्य लोगों की सेवा करने के लिए आते थे वे ही सबसे अधिक प्रभावशाली नेता बनते थे. ग्रीनलीफ ने इनको सेवक-नेता के नाम से जाना. ये ऐसे नेता हैं जो असल में जनता की सेवा करते हैं.

सेवक-नेता इसीलिए प्रभावशाली होते हैं कि वे दूसरों के लिए ही काम कर रहे होते हैं. वे अपने सह्कर्मिओं के प्रति भी पूरा ध्यान देते हैं. इसलिए वे उनको आगे बढ़ने में मदद करते हैं तथा वे अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य कर सकें इस में सहायक बनते हैं. वे संस्था के ग्राहकों का भी इतना ही ध्यान रखते हैं. इसलिए वे ग्राहकों की आवश्यकताओं को समझ सकते हैं और उनकी सारी आवश्यकताओं को पूरा भी कर सकते हैं.

सेवक-नेताओं की कई विशिष्टताएं हैं, परंतु उनका सबसे बड़ा लक्षण है उनकी दूसरे लोगों की सेवा करने की निष्ठा. सेवक-नेता यह जानते हैं कि यहां बात अपनी नहीं है, दूसरे लोगों की है और इन लोगों की सेवा करने की है. दूसरे लोग से मतलब है परिवार के सभ्य, मित्र, साथी एवं ग्राहकवर्ग जिन की सेवा करने की बात हो रही है. यह कभी-सभी करने का काम नहीं है, यह कार्य जीवनपर्यंत करने के लिए है. वे मानते हैं कि उनका जन्म इसीलिए ही हुआ है. यह कार्य ऐसा कार्य है जो जीवन को सार्थक बनाता है और इसलिए वे इस कार्य को सब से अधिक महत्व देते हैं.

सेवक-नेता जी हुजूरिये या कमजोर नहीं होते. वे भी कठिन निर्णय कर सकते हैं. वे केवल दूसरे लोगों का ध्यान रखते हैं और उनके विकास में और उनकी सफलता में ही आनंदित होते हैं. ग्रीनलीफ कहते हैं कि यही बात सेवक-नेता की सबसे उत्तम कसौटी है जिस से उनकी परख होती है. वे निरंतर निम्नानुसार प्रश्न पूछते रहते हैं, यही उनकी परख है:

क्या जिन की सेवा की जा रही है वे एक मनुष्य के रूप में विकसते हैं? क्या जिनकी सेवा हो रही हैं वे अधिक सशक्त, अधिक समझदार, अधिक स्वतन्त्र एवं स्वावलंबी बनते हैं? और उन में सेवा करने की भावना का विकास होता है?

इस प्रकार लोगों के विकास पर ध्यान देना दीर्घकाल के लिए सफलता का मार्ग है. जब आप आपके साथी का विकास हो इस लिए उसे सहाय करते हो तब तीन प्रकार से सफलता मिलती है. आप के साथी को पूरा साथ मिलता है, उसकी इच्छा संतुष्ट व परिपूर्ण होती है, आप के संस्थान की क्षमता में वृद्धि होती है और संस्थान के द्वारा उस के ग्राहकों की जो सेवा होती है उस से ग्राहक संतुष्ट होते हैं. आपकी संस्था अधिक अच्छी तरह से कार्य कर सकती है या फिर जो पहले नहीं कर पाती थी ऐसे नए कार्य अब कर सकती है. यदि आप चाहते हैं कि शिक्षा एवं जानकारी पर आधारित और तेज रफ़्तार से बदलते जाते अर्थतंत्र में आपकी संस्था प्रतिस्पर्द्धा में अपना स्थान बनाएँ रखें तो फिर आप के साथिओं को चाहिए कि वे नया सिखने के लिए और विकास करने के लिए तत्पर रहें.

v अपने संस्थानों में परिवर्तन कर के विश्व में परिवर्तन का प्रसार करना:

सेवक-नेतृत्व अंततः दुनिया को बदलने की बात है. ग्रीनलीफ ने सोचा कि ऐसा करने का श्रेष्ठ उपाय अपने संस्थानों को बदलने का है, उस में आंतरिक परिवर्तन करने का है. रॉबर्ट के. ग्रीनलीफ 'अ लाइफ ऑफ सरवंट-लीडरशिप' (A Life of Servant-Leadership) में डोन फ्रिक (Don Frick) अपने साथी ग्रीनलीफ एक विशाल संसथान की कार्यपद्धति में कैसे दिलचस्पी लेने लगे इस बात को याद करते हैं: १९२० के दशक में कार्लटन कोलेज के विद्यार्थी की हैसियत से ग्रीनलीफ ने इकोनोमिक्स डिपार्टमेंट के चेअरमेन डॉ. ओस्कर हेल्मिंग (Oscar Helming) के पास विशेष रूप से अध्ययन किया था. एक दिन उनके भाषण के दौरान हेल्मिंग ने ऐसा कुछ कहा: "हम विशाल संस्थानोंवाला राष्ट्र बनने जा रहे हैं...सब कुछ विराट होता जा रहा है - सरकार, गिरजाघर, व्यवसाय, मजदूर संघ, युनिवर्सिटी; परंतु इनमें से किसी भी बड़ी संस्था के संचालक या उस के कर्मचारी... ये सब अच्छी तरह से कार्य नहीं कर रहे. इन संस्थानों को अच्छा काम करने पर विवश करने के लिए बाहर से दबाव डालकर स्थिति में सुधार लाने की कोशिश की जा सकती है. परंतु ऐसे प्रयत्नों में सफलता मिलने की संभावना कम रहती है, किंतु ऐसे सभी संस्थानों में आंतरिक परिवर्तन तभी संभव हो सकता है जब उनकी अपनी परिवर्तित होने की इच्छा प्रबल हो और जब ऐसे कार्य कैसे किया जाए इस के बारे में जानकारी रखनेवाले कर्मचारिओं के द्वारा यह कार्य होता हो. उनको संस्थान में रहकर ऐसा कार्य करना चाहिए कि जिस से वे बहुत कुछ अधिक अच्छा कर पाएँगे ऐसी समुचित भावना को दृढ़ करते हुए संस्थान को आगे विकसित कर पाएं इतने समर्थ बनें."

ग्रीनलीफ ने डॉ.हेल्मिंग की सलाह मान ली और उन्होंने अपना जीवन ए.टी.एंड टी. (A.T.& T.) को अधिक अच्छा कार्य करनेवाली संस्था बनाने के लिए बिताई.

उसके बाद के वर्षों में उनके जीवन में विशाल संस्थानों का प्रभुत्व उस से भी बढ़ गया है. अमरीका भी उसकी तुलना में छोटा व्यवसायवाला राष्ट्र हो ऐसा प्रतीत होने लगा है! विराट विश्व-व्यवसाय का प्रभाव इस समय स्वाभाविक रूप से नजर आने लगा है. उदाहरण के तौर पर ऐसा अनुमान किया जाता है कि मैग्जीन फोर्च्यून (Fortune) पत्रिका की सूची के अनुसार विश्व की सबसे बड़ी १००० कम्पनियाँ अमरीका के ७०% अर्थतंत्र पर नियंत्रण रखती है.

ग्रीनलीफ जानते थे कि यदि हमारी सारी संस्थाएं सेवक-संस्थाएं बन जाएँ तो हमारी दुनिया जीने के लिए अधिक सुन्दर स्थान बन सकती है. उन्होंने कहा कि, "ध्यान रखने की बात अभी तक अधिकतर निजी रूप में ही है ऐसा ही समझा जाता था. अब उसके संस्थाकीय माध्यम का विचार अधिक व्यापक बना है. विशेषतः हाल में संस्थानों का विशाल, जटिल, सबल व बिनव्यक्तिगत ख्याल फैलता जा रहा है. ऐसे संस्थानों का हमेशा स्पर्द्धात्मक होना आवश्यक नहीं है; कभी उनमें भ्रष्टाचार भी नजर आता है. यदि अधिक अच्छे समाज का निर्माण करना है, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक प्रेमपूर्ण समाज का निर्माण करना है जिस में लोगों को अधिक सर्जनात्मक अवसर मिले तो इस के लिए सब से उचित उपाय यह है कि विद्यमान संस्थानों में से ही सेवक-नेता के विचार के अनुरूप संस्थानों का सुन्दर संचालन कर रही ऐसी नई पीढ़ी तैयार होनी चाहिए जिस की सेवा करने की क्षमता और सेवक के रूप में कार्य करने की भावना का उत्तरोत्तर विकास होता रहे."

v सेवापरायण संस्थानों के लक्षण:

सेवा परायण संस्थान जिस किसी को स्पर्श करता है, प्रत्येक बातों का ध्यान रखता है: कर्मचारी, ग्राहक, व्यावसायिक साझेदार, शेअरहोल्डर्स और लोक समुदाय. ऐसी संस्थाएं प्रत्येक मनुष्य के हित का ध्यान रखती है. कोई विषय जब कर्मचारी से संबंधित होता है तब सेवापरायण संस्थान निम्नानुसार बातों पर विशेष रूप से ध्यान देते हैं:

· प्रशिक्षण देना, संस्थान के कार्य से संबंधित निरंतर शैक्षणिक कार्यक्रम, व्यक्तिगत विकास पर और प्रगतिशील कार्यक्रम तथा प्रमोशन के द्वारा प्रगति करने के अवसर पर जोर देते हैं.

· विश्वास और भरोसे का वातावरण बने इसलिए प्रयत्नशील रहते हैं और पहले ही दिन से सकारात्मक झुकाव रखते हैं. (उदाहरण के लिए कर्मचारियों को प्रोबेशन पर नहीं रखे जाते, उन्हें तुरंत ही सारे लाभ दिए जाते हैं.)

· मनुष्य को पूर्ण रूप से समझने में दिलचस्पी लेते हैं, उसे केवल एक कामगार के रूप में नहीं देखा जाता, सामूहिक भावना को प्रेरित करने पर जोर देते हैं; कर्मचारियों के रोजमर्रा के कार्य में उन्हें अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं जिस से ग्राहकों के साथ उनके संबंध अधिक घनिष्ठ रूप से विकसित होते हैं.

· कर्मचारी के प्रशिक्षण को मात्र वर्तमान कार्य तक सीमित नहीं रखा जाता, परंतु कर्मचारियों को कार्य के अगले चरण के प्रशिक्षण के लिए सुसज्ज किए जाते हैं. क्यों कि ऐसे सेवापरायण संस्थान अपने कर्मचारिओं को संस्थान में उन्नति के अवसर देने के लिए तत्पर होते है.

इस का एक परिणाम यह है कि सेवा परायण संस्थान अपने ग्राहकों को बड़े गौर से सुनते हैं ता कि वे अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से समझ सकें और उन्हें पूरा करने के कार्यक्रम बना सकें और सेवाएँ प्रदान सकें. इस से ग्राहक उन संस्थानों के वफादार आदमी बन जाते हैं और वे संस्थान के द्वारा प्रस्तुत किये जाते कार्यक्रम, उत्पादन और सेवाओं का ही उपयोग करते रहते हैं. इस से सेवा परायण संस्थाओं को अपने चालू ग्राहकों के साथ अधिक काम करने में तथा व्यवसाय में अपनी बिक्री में वृद्धि करने के अवसर भी मिलते हैं.

सेवा परायण संस्थान यह बात जानते हैं कि व्यावसायिक साझेदार महत्वपूर्ण होते हैं. इसलिए वे अपने विक्रेताओं की या आपूर्ति करनेवाले प्रदायकों की बातों को ध्यान से और कुशलता से सुनते हैं. वे ऐसे संस्थानों के साथ के दीर्घकालीन संबंधों के फायदे अच्छी तरह से समझते हैं. वे एकदूसरे के कारोबार के बारे में ज्ञान व जानकारी हांसिल करते हैं जिस से वे साथ मिलकर प्रभावक ढंग से काम कर सकें. परस्पर विश्वास व समझौते से संस्थान और उनके व्यावसायिक साझेदार साथ मिलकर ग्राहकों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. ऐसी सेवा परायण संस्थाएं जो सार्वजनिक क्षेत्र से संबंधित है, वे अपने शेअरहोल्डरों की बात पर भी अच्छी तरह से ध्यान दे पातीं हैं. उन्हें और आम जनता को भी निश्चित रूप से और सही समय पर जानकारी देने के लिए ये तत्पर रहतीं हैं.

सेवा परायण संस्थान समाज में जो भी व्यवसाय करते हैं उस के प्रति सावधान रहते हैं. वे वहां के स्थानिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों के प्रति संपूर्ण रूप से जागरूक रहते हैं और आसपास की स्थिति के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते रहते हैं. वे अन्य संस्थान या आम जनता की समस्याओं को ध्यान से सुनते हैं और उनको सहयोग भी देते हैं. वे अपने कर्मचारिओं एवं ग्राहकों को ऐसे समुदायों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

v स्वप्न साकार करना:

दुनिया को अधिक अच्छी बनाने के लिए उसे बदलने का कार्य कभी आसान नहीं होता, इस के लिए कड़ी मेहनत के अलावा उसे सिद्ध करने के लिए एक स्वप्न भी देखना चाहिए. ग्रीनलीफ कहते हैं: "कुछ भी संभव होने के लिए स्वप्न देखना आवश्यक है. कोई महान कार्य करने के लिए महान स्वप्न होना चाहिए... ऐसे स्वप्नों में से एक स्वप्न ऐसे अच्छे समाज का है कि जिस में सेवा परायण संस्थानों की मात्रा अधिक हो. ये संस्थाएं सच्चे सेवा परायण मनुष्यों के द्वारा अपने आदर्शो को समाज में स्थापित करतीं हो और उन में मनुष्य और समाज को बड़े सर्जनात्मक कार्य करने के और सेवा करने के अवसर मिलते हो ऐसी होती हैं."

सभी सपने साकार नहीं होते; और यदि हमारे सपने बहुत बड़े हो तो शायद वे हमारे जीवनकाल के दौरान साकार नहीं हो सकते. फिर भी ऐसे स्वप्न साकार करने की कोशिश करते रहने से हमें जीवन की सार्थकता का, संतोष और परम आनंद मिलता है यह कम नहीं. अपनी संस्थाओं का उपयोग समाज के कल्याण के लिए कर के हम लोगों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं, उन्हें बचा सकते हैं. हम अपनी संस्थाओं को सेवा परायण संस्था बनाकर उन की कार्यक्षमता में सुधार ला सकते हैं, उन्हें विकसित कर सकते हैं और हम सब के कल्याण के लिए विश्व को अधिक सुन्दर बनाने के लिए उसे बदल भी सकते हैं.

हम में से प्रत्येक मनुष्य प्रसन्नता के साथ रह सकता है और उसे प्रसन्न रहना ही चाहिए. भीतर से प्रसन्न रहने के लिए हमें अपने जीवन का हेतु खोजना चाहिए और उस हेतु को सार्थक करने के लिए हमें इमानदारी से पूरी कोशिश करनी चाहिए. ऐसा अचूक (अमोघ) हेतु दुनिया को जीने के लिए अधिक सुन्दर स्थान बनाना है.

परंतु यह कैसे बनाएँ? ऐसा करने का एक अच्छा उपाय सेवक-नेता बनाने का है और आपकी संस्था को सेवा परायण संस्था में रूपांतरित करने का है. इस से आप आपके जीवन को सार्थक बनाकर कुछ अनोखा और असाधारण कार्य कर सकते हैं. यह ऐसा अद्वितीय एवं अर्थपूर्ण कार्य है कि जब आप अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आप के विगत जीवन पर दृष्टिपात करेंगे तो आप को जीवन जीने का परम संतोष प्राप्त होगा. आप को यह पता चलेगा कि आप क्यों जिएं? आप एक ऐसी विरासत सौंप कर जा सकते हैं जिस का लाभ दूसरों को हमेशा मिलता रहेगा.

ली बोलमेन और टेरेन्स डील (Lee Bolman and Terrence Deal) ने एक बहुत ही अच्छी पुस्तक प्रकाशित की है: 'लीडिंग विद सोल' (Leading with Soul). इस पुस्तक में दोनों ने संस्थाओं से जुड़े कुछ ऐसे नेताओं के ब्यौरे दिए हैं कि जिन्होंने आध्यात्मिक नेतृत्व के सिद्धांतों का सफलतापूर्वक पालन किया है. इस में ऐसे नेताओं का वर्णन सुन्दर शब्दों में दर्शाया है:

'किसी का नेतृत्व करना, किसी का मार्गदर्शन करना इस का मतलब है देना. नेतृत्व नीतिशास्त्र है, यह समान हेतु के लिए स्वयं को ही प्राप्त एक उपहार है और यह उच्च कोटि का कार्य है. इस सन्देश की गहराई और उसकी शक्ति परखने में आसानी से चूक हो सकती है.

नेतृत्व का सार भाग वस्तुएँ देना या केवल नई दृष्टि देना ही नहीं है. यह अपने आप को समर्पित करने की खुद की भावना है. निस्संदेह, भौतिक बक्षिस का कोई महत्व नहीं है ऐसा नहीं. हमें दोनों की आवश्यकता है. वस्तुएँ उपहार के रूप में देने के साथ साथ सेवा भावना की नई दृष्टि प्रदान करने की भी आवश्यकता है! हृदयपूर्वक या निस्वार्थ भाव से होते हुए कार्य केवल वेतन या अच्छा ऑफिस पाने के लिए नहीं किये जाते. हम जानते हैं कि बक्षिस देने के पीछे यदि सब से महत्वपूर्ण कोई बात है तो यह बक्षिस देनेवाले की हृदयस्पर्शी भावना है.

काम करने की स्वतंत्रता, प्रेम, सत्ता और उस का हेतु तभी सार्थक बनता है कि जब यह निष्कपट भाव से दिया और स्वीकार जाए. नेता के पास जो नहीं है ऐसा कुछ वह किसी और को कैसे दे सकता है? जहाँ वह खुद कभी गया ही नहीं वहां वह अन्य किसी को कैसे ले जा सकता है? नेता की ऐसी कोशिश से ही निराशा उत्पन्न होती है और अश्रद्धा का उदभव होता है. जब सही माने में सेवा करने की और कुछ निछावर करने की भावना होती है तब संस्थान केवल कार्य करने के स्थान के बजाय जीवन का अविभाजित आनंद मनाने का सुन्दर स्थान बन जाता है.

ऐसी यात्रा किस प्रकार से की जाए और कैसे आपके अस्तित्व के सही खजाने को ढूंढा जाए ये संचालकों के लिए एक चुनौती है. इस चुनौती का स्वीकार कर के अपनी क्षमता से समाज में सहायक बनना और ऐसा कर के लोगों के जीवन में परिवर्तन लाना भी किसी चुनौती से कम नहीं. यह खोज अपने आप में खतरनाक है और उस में हर जगह खतरा रहता ही है, किंतु उस के बदले में जो प्राप्त होता है वह भी कुछ कम नहीं है. उस के बदले में विश्व में सफल होने की संभावना, मनुष्य की आत्मा के रहस्य के बारे में ज्ञान प्राप्त होना, स्वाभाविक रूप से प्राप्त क्षमता की अदभुत बक्षिस का पता लगा लेने का अवसर और प्रेमपूर्ण समुदाय व अन्य लोगों के साथ बांटा जा सके ऐसा सुन्दर जीवन सही माने में जबरदस्त उपलब्धि समझी जाती है.

नेता केवल स्वमान की, प्रेम की, सत्ता की और सार्थकता की प्रेरणा और क्षमता ही देते हैं ऐसा नहीं, वे स्वयं भी यह सीखते हैं कि इस विषय में उन्हें कितना योगदान देना है. ऐसा योगदान तब तक ही हेतुपूर्ण रहता है जबतक वह करुणा और न्याय के मूलभूत नीतिशास्त्र का अनुसरण करता हो. आत्मा की आवाज से प्रेरित मार्गदर्शन हेतुयुक्त एवं करुणायुक्त बनता है तब यह पूरे समुदाय के लिए नींव का पत्थर बनता है.

------------------------------------------------------------------------------------------------

इस अध्याय से संबंधित सुविचार

मैं यह नहीं जानता कि आपकी अंतिम नियति कैसी होगी, परंतु एक बात मैं अवश्य जानता हूँ कि जिसने दूसरों की सेवा कैसे करें यह सही रूप में जान लिया है उसने जीवन की सच्ची खुशी पा ली है. -अल्बर्ट स्वाईटजर (Albert Schweitzer)

भौतिक वस्तुओं की मालिकी और उनसे प्राप्त सुविधाओं से सुख मिलेगा ही, इस का कोई भरोसा नहीं है. आध्यात्मिकता ही जीवन की सही धन-संपत्ति है, जो सच्चा सुख दे सकती है. यदि यह सही में सत्य है, वास्तविकता है तो व्यावसायिक संस्थानों का अपने कर्मचारियों के प्रति जो दायित्व बनता है वह भौतिक जीवन तक ही कैसे सीमित रह सकता है? और कर्मचारिओं की आध्यात्मिक जिम्मेवारी धर्म पर ही कैसे छोड़ी जा सकती है? क्या यह मुनासिब है? - -कोनोसुके मात्सु शीटा -(Konosuke Matsushita)

अच्छे संचालक या नेता वह है जिस के लोग यह जानते हैं कि वह सब के बीच में उपस्थित है. इस से निम्न दरजे का नेता वह है जिस के लोग उस की आज्ञा के अनुसार कार्य करते हैं और निम्नतम दरजे के नेता ऐसा होता है कि जिसे उनके लोग तिरस्कृत दृष्टि से देखते हैं. किंतु उत्तम संचालक वह नेता है जो कम बोलता है और संस्था का कार्य पूर्ण और हेतु सिद्ध होने पर उन के लोग ऐसा कहते हैं कि 'हमने यह कार्य पूर्ण किया'. -लाओ त्से (Lau-Tzu)

जीवन का हेतु समझने का सब से अच्छा उपाय यह है कि हम पूरे विश्व को एक रमणीय स्थान में बदल दें. इस के लिए हमारे नेता व संचालकों को एक सेवक के रूप में अपने कर्तव्य निभाने चाहिए. -रोबर्ट ग्रीनलीफ(Robert Greenleaf)

जब मैं सात महिने की भारत की यात्रा करने के बाद अमरीका वापस आया तब मुझे पश्चिम की दुनिया की सनक और उनकी तर्कबुद्धि से सोचने की आदत का स्पष्ट परिचय मिला. यदि आप शांति से बैठकर निरिक्षण करेंगे तो पता चलेगा कि हमारा मन कितना अस्वस्थ और अशांत है. यदि आप मन को शांत करने की कोशिश करेंगे तो वह उलटे अधिक अस्वस्थता का और बेचैनी का अनुभव करेगा. परंतु समय बीतने के साथ और निरंतर कोशिश करते रहने से उसे अवश्य शांत कर पाएंगे. जब मन शांत होता है तब वह सूक्ष्म और जटिल बातें समझ पाने की क्षमता प्राप्त करता है. उसी पल आपका मन अपने आप सहज बुद्धि से अत्यंत सक्रिय हो जाता है, तब आप वस्तुस्थिति को अधिक स्पष्ट रूप से देख पाते हैं और कैसी भी स्थिति में स्वस्थ रह सकते हैं. मन का इधर उधर भटकना कम हो जाता है. और यह क्षण असाधारण रूप से फैलती हुई सी लगती है. तब आप पहले से काफी अधिक देख पाते हैं. यह एक ऐसी साधना है जिसे हम आचरण एवं अभ्यास से सीख सकते हैं.

अमरीका लौटने के बाद मुझे जो सांस्कृतिक झटका लगा वह मैंने जो भारत पहुँचते वक्त अनुभव किया था उस से काफी बड़ा था! हम जिस प्रकार से सोचते हैं उस प्रकार से भारत के देहाती लोग नहीं सोचते. वे लोग अपनी सहजबुद्धि का अधिक उपयोग करते हैं. उनकी यह सहजबुद्धि विश्व में अन्य सब लोगों से अधिक विकसित है. मेरे कार्य और आविष्कारों पर इस का गहरा प्रभाव है.

पश्चिम की तार्किक विचारशैली मनुष्य की कुदरती खासियत नहीं. यह अभ्यास से प्राप्त की जा सकती है जो पश्चिम की संस्कृति की सब से बड़ी उपलब्धि है. भारत के ग्रामवासी लोग उस का अभ्यास नहीं करते, इसलिए वे हमेशा सहज बुद्धि का प्रयोग करते हैं. यह अच्छी बात है और नहीं भी. परंतु सहजबुद्धि में बहुत शक्ति है और उसमें अनुभव की समझदारी भी देखी जा सकती है. -स्टीव जोब्स (Steve Jobs)

(एपल कम्प्यूटर कंपनी के स्थापक)

आध्यात्मिकता के प्रति संस्थाओं के झुकाव के बारे में पश्चिम के दो चिन्तक मिट्रोफ और डेन्टोन (Mitroff and Denton) ने महत्वपूर्ण अध्ययन किया है. इस में ऐसा तथ्य उजागर हुआ है कि कर्मचारी हमेशा जीवन के सन्दर्भ में मूलभूत प्रश्न पूछते ही रहते हैं. जीवन का हेतु क्या है? अर्थ क्या है? परिपूर्णता कहाँ है? एकता कहाँ है? इत्यादि...ऐसे प्रश्नों के उत्तर की खोज करने के लिए वे सप्ताह में एकाधबार देवस्थान जाते हैं तब या संस्था का काम निपटा के घर जाकर फुर्सत मिलती है तब करते हैं, किंतु यह इस प्रकार से मर्यादित नहीं होनी चाहिए. ऐसा अभिगम मनुष्य की सम्पूर्णता और नीतिमत्ता को विभाजित करता है. आध्यात्मिकता के बारे में विचार-विमर्श करने की बात को संस्था के कार्य - कारोबार में उपेक्षा की जाती है और यह सिर्फ निजी विषय है ऐसी आम धारणा प्रत्येक संस्थाओं की होती है. इसका अर्थ यह हुआ कि कर्मचारी अपनी आध्यात्मिकता घर पर छोड़कर काम करने के लिए आते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है. इस में तत्काल परिवर्तन करने की आवश्यकता है. -(L.G.Bolman & T. E. Deal)

=======================================================

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ५ - संस्था, कारोबार व्यवस्थापन और नेतृत्व पर आध्यात्मिकता का प्रभाव - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.