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रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 18 जिराल्डा का रैवन // सुषमा गुप्ता

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एक बार की बात है कि स्पेन देश के सेविल शहर के कैथैड्रल की मूरिश के समय में बनी घंटे वाली मीनार जिराल्डा पर एक बहुत ही अक्लमन्द रैवन रहता था...

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एक बार की बात है कि स्पेन देश के सेविल शहर के कैथैड्रल की मूरिश के समय में बनी घंटे वाली मीनार जिराल्डा पर एक बहुत ही अक्लमन्द रैवन रहता था।

यह रैवन बहुत बूढ़ा था। इतना बूढ़ा कि उसका सिर भी पूरा काला नहीं था बल्कि कुछ भूरा सा था। और यह मीनार भी बहुत पुरानी थी। इसके ऊपर काँसे की "फ़ेथ" की एक शक्ल बनी हुई थी जो मौसम को बताने का काम करती थी।

400 साल तक वह मौसम बताने वाली फ़ेथ की शक्ल हवा से घूमती रही थी और इन 400 सालों से वह रैवन भी वहीं रह रहा था। सारा दिन वह अपने उस अक्लमन्द सिर को लिये हुए वहाँ अपनी जगह बैठा रहता और उसका सिर एक तरफ को झुका रहता।

उस समय में वह या तो जहाँ कैथैड्रल का घंटा लटका रहता है वहाँ के पत्थर के काम को सराहता रहता या फिर दूसरी चिड़ियों और हवा से कुछ मुख्य विषयों पर बात करता रहता।

रात को वह अपने खास दोस्त उल्लू से बात करता। जब उल्लू ताड़ के पेड़ों के ऊपर घूमते घूमते थक जाता तो वह अपनी यात्रा का हाल बताने के लिये रैवन के पास चला आता क्योंकि वह रात के समय में सेविल के पास में बहती नदी के ऊपर भी उड़ता था।

वह नदी अपने किनारे पर खड़ी "सोने की मीनार" की कहानियाँ फुसफुसाती रहती और वह उनको सुनता रहता। या फिर वह अलकाज़र के उन बागीचों में भी जाता जहाँ स्पेन के राजाओं के महल बने हुए थे। वहाँ से आ कर वह रैवन को उनकी ऐसी कहानियाँ सुनाता जिनको सुन कर उसके भी रोंगटे खड़े हो जाते।

रैवन को उल्लू से या किसी और से भी उस जिराल्डा के बारे में सुनने में सबसे ज़्यादा अच्छा लगता जो उस मीनार के नीचे था। क्योंकि रैवन दुनियाँ में किसी की इतनी परवाह नहीं करता था जितनी कि वह इस ऊॅची मीनार की करता था।

इस मीनार के 300 फीट ऊॅचे घूमते हुए रास्ते पर लोग अपने अपने घोड़ों पर चढ़ कर आते थे और वह यह सब अपनी आँखों से देखता रहता था।

इन घुड़सवारों के समय से पहले जब इस जिराल्डा के घंटे मूर लोगों को प्रार्थना की सूचना देते थे तब उसके नीचे उसके कोन वाले हिस्से पर चारों तरफ चार चमकती हुई ताँबे की गेंदें लगी हुई थीं जो सोने के सेब जैसी चमकती थीं।

एक बार एक भूचाल आया और उस भूचाल में वे चारों गेंदें नीचे गिर पड़ीं। बस उसके बाद ही यह अल जिरान्डैलो उसके गुम्बद के ऊपर रखा गया। तब से रैवन अपने आपको केवल इस जिराल्डा का ही नहीं बल्कि सारे जिराल्डा का मालिक समझता था।

उसके खुद के अलावा उसकी जुड़वाँ खिड़कियों के तंग छज्जों पर बैठ कर और कौन था जो सफेद छतों वाले सेविल को देख सकता था?

रैवन ने यह सब देख लिया था कि उसके खुद के अलावा और कौन था जो अल जिरान्डैलो के ऊपर बैठ सकता था? वह उल्लू भी नहीं और न ही उसकी कोई दूसरी जान पहचान की चिड़िया।

इसलिये वह अपने आपको दुनियाँ का सबसे पुराना और सबसे ज़्यादा अक्लमन्द रैवन समझता था और यकीनन वह सारा जिराल्डा उसी का तो था, वरना वह और किसका था?

रैवन अपनी मीनार और उसके घंटे से बहुत खुश था। उसकी आयताकार बैठने की जगह के चारों तरफ की चारों जगहों पर वहाँ चार शब्द खुदे हुए थे।

वहाँ लगे सब घंटों की पूजा ईसाई धर्म के अनुसार पवित्र तेल से हुई थी और उनके अपने अलग अलग नाम थे। वहाँ सैन्टा मारिया थे, सैन जुआन थे, ला गोर्डा थे, द फ़ैट थे और भी बहुत सारे थे।

कई बार तो शान्त हवा में वे घंटे बहुत ही धीमे बजते और कभी वे इतनी तेज़ बजते कि वहाँ से सबसे दूर वाला मकान भी उसकी आवाज से काँप उठता और जिराल्डा का रैवन अपने पत्थर से ऐसे चिपक जाता जैसे कोकोआ के पत्ते अपनी टहनी से चिपक जाते हैं।

रैवन को और दूसरे घंटों के मुकाबले में अल कैन्टर घंटा बहुत अच्छा लगता था। हालाँकि उसको खुद को तो गाना बिल्कुल नहीं आता था पर उसको वह गाता हुआ घंटा बहुत अच्छा लगता था क्योंकि उसकी आवाज बहुत साफ थी।

वसन्त के मौसम में जब सन्तरों के पेड़ों पर फूल खिलते और अकाकिया के पेड़ महकते तो अल कैन्टर इतना मीठा गाना गाता कि पास में आने जाने वाले कहते कि आज तो अल कैन्टर बहुत खुश लग रहा है।

और फिर रैवन भी उसके साथ ज़ोर से काँव काँव करने लगता। हालॅकि वह किसी और घंटे के साथ काँव काँव नहीं करता था।

हवा उल्लू से ज़्यादा रैवन की दोस्त थी। ऐसा इसलिये नहीं था कि हवा बहुत ही मन्द ढंग से बहती थी, या फिर नरम दिल की थी और प्यारी सी थी बल्कि ऐसा इसलिये भी था क्योंकि रैवन तो हमेशा ही मीनार में रहता था, चाहे दिन हो रात, जबकि उल्लू दिन में उसको दिखायी ही नहीं देता था।

जब भी कभी रैवन को बात करने की इच्छा होती तो हवा हमेशा ही उसके पास रहती। ऐसा ही कोई तो दोस्त बनने के काबिल होता है जिससे चाहे जब बातें की जा सकें। हवा भी अक्सर रैवन को राजधानी की कहानियाँ सुनाती।

एक शाम को हवा ने रैवन को एक बहुत ही आश्चर्यजनक कहानी सुनायी। हवा ने यह कहानी उल्लू से सुनी थी और उल्लू ने यह कहानी एक छोटी सी भूरे रंग की चिड़िया से सुनी थी जो एक देवदूत की तरह बहुत ही मीठा गाती थी।

इस चिड़िया ने इस कहानी को अपने किसी पुरखे से सुना था। उस पुरखे ने इस कहानी को अपने समय की हवा से कहा था। उस हवा ने राज ऋषि अल्फ़ोन्सो से कहा था।

बाद में वह कहानी घूमती हुई उल्लू से उस चिड़िया के पास, चिड़िया से हवा के पास और हवा से रैवन के पास पहुँची।

क्योंकि जो कहानी 13वीं सदी में राज ऋषि अल्फ़ोन्सो ने अपनी बड़ी सी किताब कैन्टीगास में लिखी थी उस चिड़िया की कहानी अब 300 साल बाद वैसी नहीं थी जैसी उस राज ऋषि ने लिखी थी।

क्या तुम वह कहानी सुनना चाहते हो? अरे उसको तो तुम ही क्या कोई भी सुनना चाहेगा क्योंकि वह तो कहानी ही ऐसी है।

इस कहानी पर वैसा विश्वास करने के लिये जैसा कि उस पर करना चाहिये पहले उसको ठीक से समझने के लिये संगीतमय आवाजों की ताकत को जानना जरूरी है जैसे सेविल के कैथैड्रल में एक अन्धा पियानो बजाने वाला उन ताकतों को जानता था।

अगर तुम पेड़ों के संगीत के बारे में या चिड़ियों के संगीत के बारे में या फिर हवा के संगीत के बारे में कुछ नहीं जानते तब यह कहानी तुम्हारे लिये नहीं है।

अच्छा हो कि तब तुम बजाय कहानी सुनने के जा कर गिरियाँ इकठ्ठी करो। पर फिर भी यह कहानी सुनो जैसी कि हवा ने रैवन को सुनायी थी।

हवा बोली - "सो जनाब, वह एक छोटी चिड़िया थी जिसने इसे उल्लू से कहा और फिर उस उल्लू ने इसे मुझसे कहा।

एक बार उल्लू उस छोटी चिड़िया की आवाज की बहुत तारीफ कर रहा था पर चिड़िया ने इस बात को नहीं माना और बोली - "मेरी पुरखा चिड़िया के मुकाबले में मेरी आवाज तो कुछ भी नहीं। उसकी आवाज ने तो एक साधु को भी मोह लिया था।"

उल्लू बोला - "क्या मतलब है तुम्हारे कहने का?"

चिड़िया खुश हो कर बोली - "तुम आराम से बैठ जाओ तब मैं तुमको सब बताती हूँ।"

दोनों अलकाज़र के बागीचे में कोकोआ के एक बहुत ही ऊॅचे पेड़ पर बैठे थे। यह सुन कर उल्लू एक चौड़ी सी पत्ती पर बैठ गया और चिड़िया उससे ऊपर वाली पत्ती पर बैठ गयी।

चिड़िया बोली - "मेरी पुरखा चिड़िया बहुत ही बढ़िया गाने वाली थी। उसका घर जिराल्डा के बराबर वाले सन्तरे के बागीचे में था।

जब वह गाती थी तो वह मीनार की तरफ देखती रहती थी। पर उसको सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था क्योंकि वह बागीचे के एक ऐसे हिस्से में रहती थी जहाँ ज़्यादा लोग नहीं आते जाते थे।

एक सुबह एक साधु बहुत धीरे धीरे उस रास्ते पर वहाँ आया जहाँ उस झाड़ी पर वह चिड़िया रहती थी। उस साधु को देखते ही मेरी पुरखा चिड़िया उस साधु के बारे में तीन बातें जान गयी।

पहली बात तो यह कि वह बहुत अच्छा था, दूसरी बात यह कि वह बूढ़ा था और तीसरी बात यह कि वह बहुत थका हुआ था।

वहाँ आ कर वह साधु फव्वारे के किनारे कुछ थका हुआ सा बैठ गया। वहाँ ठंडी ठंडी हवा चल रही थी और उस फव्वारे में से सन्तरे की सुगन्ध वाला पानी चारों तरफ से उछल उछल कर हवा में बिखर रहा था।

उस फव्वारे के किनारे पर झुक कर उसने उस पानी में अपने हाथ मुँह धोये। चिड़िया को लगा कि वह थका हुआ साधु उस साफ पानी में अपने हाथ मुँह धो कर काफी ताजा हो गया था।

उसको ऐसा इसलिये भी लगा कि उसका चेहरा पानी धोने के बाद ऐसा हो गया था जैसे किसी ने सूखे पेड़ पर पानी डाल दिया हो और वह फिर से ताजा हो गया हो।

उसके चेहरे की थकावट भी ऐसे चली गयी थी जैसे शाम के आसमान से बादल चले जाते हैं और वे उसे शान्त छोड़ जाते हैं।

वह मुस्कुराते हुए पेड़ों के ऊपर की तरफ और जिराल्डा की तरफ देखते हुए वहाँ थोड़ी देर बैठा रहा। फिर उसने अपने घुटनों के ऊपर बैठ कर ज़ोर से बोल बोल कर प्रार्थना की कि भगवान उसको यह बता दे कि स्वर्ग की खुशी कैसी होती है।

उसके घुटने अब उतने अकड़े हुए भी नहीं थे जितने कि जब वह बागीचे में आया ही आया था तब थे।"

चिड़िया आगे बोली - "मेरी पुरखा चिड़िया ने उसी समय अपना गाना शुरू किया। साधु अपनी प्रार्थना पर से उठा और एक घनी झाड़ी में जा कर बैठ गया। वहाँ से वह भी चिड़िया को देख सकता था और चिड़िया भी उसको देख सकती थी।

वह चिड़िया कभी धीरे गाती और कभी ज़ोर से गाती। उसके गाने में इतना खिंचाव था कि पत्तियों भी हिलना भूल गयीं। फव्वारे का पानी भी बहना रुक गया। हवा भी बहना रुक गयी। दिन की रोशनी धीमी पड़ गयी और रात सी लगने लगी। तारे उसका गाना सुनने के लिये धरती के पास आने लगे।

पर वह चिड़िया गाती रही और गाती रही और वह साधु भी उसका गाना बड़े ध्यान से सुनता रहा और सुनता रहा। उसको समय और दिनों का पता ही नहीं चला। चिड़िया गाती रही तो समय भी रुक गया। वह साधु भी उसको बड़ी खुशी से सुनता रहा।"

चिड़िया ने कुछ रुक कर फिर अपनी कहानी शुरू की - "एक दिन शाम को जिराल्डा के पास वाली मोनैस्टरी के दरवाजे पर एक बड़ा सा थका हुआ, लम्बी दाढ़ी वाला, साधु की तरह के मैले से कपड़े पहने हुए एक आदमी आया और उस मोनैस्टरी का दरवाजा खटखटाया।

प्रायर ने खुद मोनैस्टरी का दरवाजा खोला और उससे पूछा - "ओ अजनबी, तुम कौन हो और तुम्हें क्या चाहिये?"

वह साधु हकलाते हुए बोला - "ओ फादर, मैं इसी मोनैस्टरी का हूँ। मैं सुबह यहाँ से घूमने के लिये गया था। और अब मैं वापस आया हूँ पर मैं देख रहा हूँ कि यहाँ तो सब कुछ बदला हुआ है। मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है कि यहाँ यह सब क्या हो गया है।

यहाँ के पेड़ कुछ अलग से लग रहे हैं। यह मोनैस्टरी बड़ी हो गयी है। तुम भी मेरे प्रायर नहीं हो। कुछ भी तो वैसा ही नहीं है जैसा मैं सुबह छोड़ कर गया था।

मैं कहाँ हूँ। सुबह से अब तक में क्या हो गया है। मैंने एक चिड़िया को गाते हुए सुना तो मैं तो उसके गाने में ही खो गया। मुझे लगता है कि मैं उसे ही काफी देर तक सुनता रह गया।"

तब तक और बहुत सारे साधु भी वहाँ आ गये थे। वे सब उस साधु को आश्चर्य से देखने लगे और आपस में बोले - "लगता है कि यह आदमी अपने आपे में नहीं है। इसको पता ही नहीं कि यह क्या कह रहा है।"

प्रायर उससे बड़ी नम्रता से बोला - "अजनबी, तुम्हारा नाम क्या है?"

वह आदमी फिर हकला कर बोला - "मेरा नाम जुबीलो है। मेरा मतलब है कि इस मोनैस्टरी में मेरा नाम जुबीलो था। यानी जब मैं यहाँ से गया तब सब लोग मुझे जुबीलो कह कर बुलाते थे।"

यह सुन कर दरवाजे पर जो लोग खड़े थे उन सब लोगों में उम्र में जो सबसे बड़ा साधु खड़ा था वह कुछ सोचने लगा। जब किसी को पुराने समय की कोई बात मालूम करनी होती थी तो लोग उसी से पूछते थे।

वह प्रायर से बोला - "फादर, मेरी बात सुनो। 300 साल पहले एक ब्रदर जुबीलो यहाँ से चला गया था पर फिर उसका कुछ पता नहीं चला।

ओ मेरे फादर और मेरे ब्रदर्स, मेरा विचार यह है कि आज हमारे सामने एक जीता जागता आश्चर्य खड़ा है। मुझे लगता है कि वह जुबीलो जो 300 साल पहले यहाँ से चला गया था और यह साधु जो आज हमारे सामने खड़ा है दोनों एक ही हैं।"

प्रायर ने उस बूढ़े ब्रदर का विश्वास करते हुए जुबीलो का हाथ पकड़ा और उसको मोनैस्टरी के अन्दर ले गया। सब लोगों ने उसके लौटने की बहुत खुशियाँ मनायीं।"

उसके बाद वह चिड़िया उल्लू से बोली - "यही मेरी पुरखा चिड़िया की कहानी है। जिराल्डा गवाह है कि मैं सच बोल रही हूँ।"

जैसे ही उस चिड़िया ने अपनी कहानी खत्म की कि हवा बोली - "बस यही कहानी है जनाब, पर यह चिड़िया सच बोल रही है।"

रैवन बोला - "हाँ यह सच है और मैं इस कहानी को आगे भी सुनाता रहूँगा।"

तभी तेज़ हवा का एक झोंका आया और रैवन के पीछे वाले पंखों को उड़ा कर सेविल की सड़कों पर ले गया। पर रैवन वहीं अपने पत्ते पर बैठा रहा और शहर के चौरस छत वाले मकानों को देखता रहा जो जिराल्डा के नीचे अपने पीले गुलाबी रंग में फैले पड़े थे।

उसने देखा उन मकानों की छत पर स्त्रियाँ अपने कार्नेशन के फूलों के पौधों केा पानी दे रही थीं। गुआडलक्विविर नदी शाम को बड़ी शान्ति से बह रही थी। कुछ लड़के मोनेस्टरी की तरफ अपने नाच की रिहर्सल करने के लिये आ रहे थे।

उसने फिर अपना सिर अलकाज़ार के बागीचों की तरफ घुमाया, फिर सन्तरों के बागीचे की तरफ और फिर अपने नीचे फैले हुए बड़े कैथैड्रल की तरफ। फिर जब तक शाम ढली तब तक वह सारे शहर की तरफ ही देखता रहा।

फिर अल कैन्टर ने अपना गाना शुरू किया तो उसने भी बहुत ज़ोर से काँव काँव करनी शुरू कर दी और वह तब तक काँव काँव करता रहा जब तक अल कैन्टर का गाना खत्म नहीं हो गया।

इसके बाद वह एक गेंद में कूद गया और अपनी चोंच अपने पंखों में छिपा कर सो गया।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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रचनाकार: रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 18 जिराल्डा का रैवन // सुषमा गुप्ता
रैवन की लोककथाएँ - 2 - : 18 जिराल्डा का रैवन // सुषमा गुप्ता
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