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इटली की लोक कथाएँ–2 : 11 - तीन बुढ़ियाँ // सुषमा गुप्ता

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एक बार तीन बहिनें थीं और तीनों जवान थीं। उनमें से एक की उम्र 67 साल थी, दूसरी की 75 साल थी और तीसरी 95 साल की थी। इन लड़कियों के घर में एक स...

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एक बार तीन बहिनें थीं और तीनों जवान थीं। उनमें से एक की उम्र 67 साल थी, दूसरी की 75 साल थी और तीसरी 95 साल की थी।

इन लड़कियों के घर में एक सुन्दर सी छोटी सी बालकनी थी जिसके बिल्कुल बीचोबीच एक बड़ा सा छेद था जिसमें से वे सड़क पर आते जाते लोगों को देख सकती थीं।

एक बार उस 95 साल वाली लड़की ने एक बहुत ही सुन्दर नौजवान को सड़क पर आते हुए देखा तो जैसे ही वह उसकी बालकनी के नीचे से गुजरा तो उसने अपना खुशबूदार बढ़िया रूमाल उठाया और उसको नीचे फेंक दिया।

उस नौजवान ने उस रूमाल को उठा लिया, उसकी खुशबू महसूस की और सोचा कि यह रूमाल जरूर ही किसी बहुत सुन्दर लड़की का होगा।

पहले तो वह थोड़ी दूर आगे चला गया पर फिर वापस आया और उस घर का दरवाजा खटखटाया जिसकी बालकनी से वह रूमाल नीचे गिरा था।

उन तीनों बहिनों में से एक बहिन ने दरवाजा खोला तो उस नौजवान ने उससे पूछा — “क्या आप मुझे बतायेंगी कि यहाँ कोई जवान लड़की रहती है क्या?”

“हाँ हाँ, और एक ही नहीं है तीन तीन हैं।”

वह नौजवान वह रूमाल दिखाते हुए बोला — “क्या आप मुझे उस लड़की के पास ले चलेंगी जिसका यह रूमाल है?”

“नहीं, यह तो मुमकिन नहीं है। क्योंकि यह हमारे घर का नियम है कि शादी से पहले लड़की नहीं देखी जा सकती।”

वह नौजवान उस लड़की की सुन्दरता को सोच सोच कर पहले से ही बहुत उत्साहित था सो वह बोला — “यह कोई बड़ी बात नहीं है। मैं उससे उसको बिना देखे ही शादी कर लूँगा।

अभी तो मैं यह खबर अपनी माँ को बताने जा रहा हूँ कि मैंने एक सुन्दर सी लड़की ढूँढ ली है जिससे मैं शादी करने जा रहा हूँ।”

इतना कह कर वह तुरन्त ही वहाँ से चला गया। वह घर पहुँचा और जा कर सारा किस्सा अपनी माँ को बताया। तो माँ बोली — “बेटा, अपना ख्याल रखना। उनको तुम अपने आपको धोखा मत देने देना। कुछ करने से पहले सोच लेना।”

नौजवान बोला — “माँ, वे लोग कुछ ज़्यादा नहीं माँग रहे हैं। और अब तो मैंने उनको जबान भी दे दी है। और एक राजा को अपनी बात तो रखनी ही चाहिये।”

अब यह नौजवान इत्तफाक से एक राजा था। माँ से बात करके वह लौट कर फिर दुलहिन के घर आया और फिर से उसके घर का दरवाजा खटखटाया।

फिर से पहले वाली बुढ़िया ही बाहर निकल कर आयी तो राजा ने उससे पूछा — “क्या आप उसकी दादी हैं?”

“तुमने ठीक जाना। मैं उसकी दादी ही हूँ।”

“अगर आप उसकी दादी हैं तो मेरे ऊपर एक मेहरबानी कीजिये। मुझे उस लड़की की कम से कम एक उँगली ही दिखा दीजिये।”

“नहीं, अभी नहीं। इसके लिये तुमको कल आना पड़ेगा।”

नौजवान राजा ने उसको गुड बाई कहा और वहाँ से चला आया। जैसे ही वह नौजवान चला गया उन बुढ़ियों ने एक दस्ताने की उँगली की नकली उँगली बनायी और उस पर एक नकली नाखून लगा दिया।

नौजवान राजा भी घर चला तो गया पर उस उँगली को देखने की उत्सुकता में वह रात भर सोया नहीं। अगले दिन आखिर सूरज निकला तो वह जल्दी से तैयार हो कर दुलहिन के घर की तरफ दौड़ा।

दरवाजा खटखटाने पर फिर उसी बुढ़िया ने दरवाजा खोला तो नौजवान बोला — “दादी माँ, मैं अपनी दुलहिन की उँगली देखने आया हूँ।”

“हाँ हाँ, अभी लो। तुम इस चाभी वाले छेद में से उसे देख सकते हो।”

दुलहिन ने वह नकली उँगली उस छेद में से बाहर कर दी। नौजवान ने उस उँगली को चूमा और हीरे की एक अँगूठी उसको पहना दी।

प्यार में पागल उसने उस बुढ़िया से कहा — “मुझे उससे अभी शादी करनी है दादी माँ। मैं अब और इन्तजार नहीं कर सकता।”

“अगर तुम चाहो तो तुम उससे कल ही शादी कर सकते हो।”

“बहुत बढ़िया। मैं उससे कल ही शादी कर लूँगा। यह एक राजा का वायदा है।”

वे तीनों बुढ़ियें खुद भी बहुत अमीर थीं सो रात भर में ही उन्होंने शादी का छोटे से छोटा सब सामान इकठ्ठा कर लिया। अगले दिन दुलहिन की दोनों बहिनों ने दुलहिन को सजा दिया।

राजा भी अगले दिन आ गया और बोला — “दादी माँ मैं आ गया।”

“ज़रा ठहरो, हम उसको तुम्हारे पास अभी लाते हैं।”

उसके बाद दुलहिन अपनी दोनों बहिनों की बाँहों में बाँहें डाल कर सात परदों से ढकी वहाँ आ गयी।

उसकी बहिनों ने राजा से कहा — “याद रखना, तुम उसके चेहरे को तब तक मत देखना जब तक तुम अपने कमरे में न पहुँच जाओ।”

फिर वे सब चर्च चले गये और वहाँ उनकी शादी हो गयी। उसके बाद राजा दुलहिन को शाम के खाने के लिये ले जाना चाहता था पर उन बुढ़ियों ने मना कर दिया।

उन्होंने कहा — “दुलहिन को ऐसी बेवकूफियाँ अच्छी नहीं लगतीं। वह वहाँ नहीं जायेगी।”

सुन कर राजा बेचारा चुप रह गया।

तो अब तो वह बस रात का इन्तजार कर रहा था जब वह अपनी दुलहिन के साथ अपने कमरे में अकेला होगा और उसका सुन्दर चेहरा देखेगा।

आखिर वह समय भी आया जब वे बुढ़ियें उसकी दुलहिन को उसके कमरे में ले गयीं पर उन्होंने राजा को अन्दर नहीं घुसने दिया। उसको कमरे के बाहर ही खड़े रखा।

कुछ देर बाद ही उन्होंने उसको अन्दर जाने दिया। अन्दर जा कर उसने देखा कि दुलहिन तो चादर से ढकी लेटी हुई थी और उसकी दोनों बुढ़िया बहिनें कमरे में कुछ कुछ करती इधर उधर घूम रही थीं।

राजा ने अपने कपड़े बदले और वे बुढ़ियें लैम्प ले कर कमरे से बाहर चली गयीं। पर राजा अपनी जेब में एक मोमबत्ती ले कर आया था सो उसने वह मोमबत्ती निकाली और जला ली।

उस मोमबत्ती की रोशनी में उसने देखा कि वहाँ तो झुर्रियों से भरे हुए चेहरे वाली एक बुढ़िया थी।

उस बुढ़िया को देख कर एक पल के लिये तो वह सन्न रह गया और डर के मारे हिल भी नहीं सका। फिर गुस्से में आ कर उसने अपनी पत्नी को पकड़ा और हवा में घुमा कर खिड़की से बाहर फेंक दिया।

इत्तफाक से खिड़की के नीचे बेलों से ढकी हुई कुछ डंडियाँ खड़ी थीं। गिरते समय उस बुढ़िया की स्कर्ट उनकी एक डंडी में अटक गयी और वह नीचे गिरने की बजाय हवा में ही लटकी रह गयी।

इत्तफाक से उस रात तीन परियाँ बागीचे में घूम रही थीं कि वे उस डंडी के नीचे से गुजरीं तो उनको वह झूलती हुई बुढ़िया दिखायी दे गयी।

यह नजारा देख कर तो उन तीनों परियों की हँसी छूट गयी। और वे तब तक हँसती रही जब तक उनके पेट में हँसते हँसते बल नहीं पड़ गये।

जब उनकी हँसी कुछ रुकी तो एक परी बोली — “अब जब कि हम उसकी इस हालत पर इतना हँस चुके हैं तो अब हमें इसकी कुछ सहायता भी करनी चाहिये।”

दूसरी परी बोली — “हाँ यह तो ठीक है। हमको इसकी कुछ सहायता तो जरूर ही करनी चाहिये।”

पहली परी बोली — “मैं इसको दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की बना दूँगी।”

दूसरी परी बोली — “मैं भी। कि इसको दुनिया में सबसे सुन्दर पति मिले और वह इसको ज़िन्दगी भर दिल से प्यार करे।”

तीसरी परी बोली — “मैं भी। कि यह ज़िन्दगी भर बहुत ही भली औरत बन कर रहे।”

और उसके बाद वे परियाँ वहाँ से चली गयीं।

अगले दिन जब राजा सो कर उठा तो वह पिछली बातों को याद करने लगा। यह यकीन करने के लिये कि कल वाली बातें सब सच थीं सपना नहीं थीं उसने अपनी खिड़की खोली और देखा कि जिस बुढ़िया को उसने कल रात खिड़की से बाहर फेंका था वह वहाँ है कि नहीं।

पर उसको तो यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उस डंडी पर तो दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की बैठी हुई थी। उसने अपना सिर पीट लिया — “ओह, यह मैंने क्या किया?”

उसको तो यह समझ ही नहीं आ रहा था कि वह उसको उस डंडी से ऊपर कैसे खींचे। लेकिन फिर उसने बिस्तर की एक चादर ली और उसका एक सिरा उस लड़की की तरफ फेंक दिया।

उस लड़की ने वह सिरा पकड़ लिया और राजा ने उस चादर का दूसरा सिरा पकड़ कर उसे अपने कमरे में खींच लिया।

एक बार उसको फिर अपने पास देख कर राजा बहुत खुश हुआ और उसने उससे माफी माँगी। उस लड़की ने तुरन्त ही उसको माफ कर दिया और फिर वे आपस में बहुत अच्छे दोस्त बन गये।

कुछ देर बाद किसी ने दरवाजा खटखटाया तो राजा बोला — “शायद दादी माँ होगी। अन्दर आ जाओ, अन्दर आ जाओ दादी माँ।”

बुढ़िया अन्दर घुसी और उसने बिस्तर की तरफ देखा तो देखा कि वहाँ तो उसकी 95 साल की बुढ़िया बहिन की बजाय एक बहुत ही सुन्दर लड़की बैठी हुई है।

वह लड़की उससे ऐसे बोली जैसे कुछ हुआ ही न हो — “क्लैमेन्टाइन , ज़रा मेरी कौफ़ी तो बना लाना।”

लड़की की बुढ़िया बहिन ने अपने मुँह से निकलने वाली आश्चर्य भरी चीख को रोकने के लिये अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। फिर यह दिखाते हुए कि सब कुछ साधारण था वह वहाँ से चली गयी और अपनी बड़ी बहिन के लिये कौफ़ी ले आयी।

पर जैसे ही राजा ने अपने काम के लिये घर छोड़ा वह उसकी पत्नी के पास दौड़ी गयी और उससे पूछा — “यह कैसे हुआ? तुम इतनी सुन्दर जवान लड़की कैसे बन गयी?”

पत्नी ने अपने मुँह पर उँगली रख कर उसको चुप करते हुए कहा — “श श श श। ज़रा धीरे बोल। मैंने क्या किया यह मैं तुझे अभी बताती हूँ। यह सब मैंने अपने आपको एकसार करवाया ।”

“एकसार करवाया? एकसार करवाया? किसने तुमको एकसार किया? और तुमने किससे अपने आपको एकसार करवाया? मैं भी अपने आपको ऐसे ही एकसार करवाना चाहती हूँ।”

“बढ़ई से। मैंने बढ़ई से एकसार करवाया।”

वह बुढ़िया बढ़ई की दूकान पर भागी गयी और बोली — “ओ बढ़ई, ओ बढ़़ई, क्या तुम मुझे भी अच्छी तरह से एकसार कर दोगे जैसे तुमने मेरी बड़ी बहिन को किया?”

बढ़ई चिल्लाया — “ओह मेरे भगवान। तुम तो पहले से ही मरी हुई लकड़ी हो। अगर मैने तुमको एकसार किया तो तुम तो स्वर्ग पहुँच जाओगी।”

“तुम इस बात को ज़रा भी न सोचो कि मैं कहाँ पहुँचूँगी बस तुम मुझे एकसार कर दो।”

“क्या कहा तुमने? क्या मैं यह ज़रा भी न सोचूँ कि तुम कहाँ पहुँचोगी? अरे अगर मैंने तुमको मार दिया तो फिर मेरा क्या होगा? मैं तो मर ही जाऊँगा न।”

“तुम चिन्ता न करो। मैं तुमको बताती हूँ कि तुम क्या करो। यह तुम एक थेलर लो और जैसा मैं कहती हूँ तुम वैसा ही करो।” जब बढ़ई ने थेलर का नाम सुना तो उसने अपना विचार बदल दिया।

उसने उससे थेलर लिया और उससे कहा — “तुम यहाँ मेरी काम करने वाली मेज पर लेट जाओ और मैं तुम्हें उसी तरह से एकसार कर दूँगा जैसे तुम चाहोगी।”

यह कह कर वह उसका जबड़ा एकसार करने के लिये बढा़ तो बुढ़िया की तो चीख ही निकल गयी। तो बढ़ई बोला — “अगर तुम इस तरह चीखोगी तो मैं कोई काम नहीं कर पाऊँगा।”

वह पलट गयी तो बढ़ई ने उसका दूसरा जबड़ा एकसार करना शुरू किया। पर अब की बार वह बुढ़िया चिल्लायी नहीं। क्योंकि वह मर चुकी थी।

उस तीसरी बुढ़िया के बारे में फिर कुछ और नहीं सुना गया कि वह डूब गयी, या फिर उसका गला चीरा गया, या फिर वह बिस्तर में ही मर गयी – कोई नहीं जानता।

केवल दुलहिन ही अपने जवान राजा के साथ घर भर में बच गयी थी और फिर वे दोनों हमेशा के लिये खुश खुश रहे।  

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया इटली की बहुत सी अन्य लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3788,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: इटली की लोक कथाएँ–2 : 11 - तीन बुढ़ियाँ // सुषमा गुप्ता
इटली की लोक कथाएँ–2 : 11 - तीन बुढ़ियाँ // सुषमा गुप्ता
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/10/2-11.html
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