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विषादेश्वरी भाग 9 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली

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भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7   भाग 8 9. “हम आज कहां मिल सकते हैं अल्बर्टो ?" हर्षा ने डिपार्टमेन्ट से फोन प...



भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4 भाग 5 भाग 6 भाग 7 भाग 8
9.
“हम आज कहां मिल सकते हैं अल्बर्टो ?" हर्षा ने डिपार्टमेन्ट से फोन पर उससे पूछा।
" आज मैं बहुत व्यस्त हूँ, हाना!”
“ तुम मुझसे नाराज हो, अल्बर्टों?”
बदले में अल्बर्टो ने पूछा, "नाराज क्यों ?"
“ कल तुमने मुझे इतने मैसेज दिए , मगर मैं किसी का जवाब नहीं दे पाई। ”
" अल्बी, आज क्या बिलकुल फुर्सत नहीं है?
" नहीं, मैं आज बहुत व्यस्त हूँ। ओके, बाय, आई हेव टू गो नाऊ। "

ऐसा लग रहा था जैसे अल्बर्टो ने दरवाजे को धड़ाक से बंद कर दिया था। वह कुछ परेशान हुई। ऐसा क्रोध क्यों? उसने इससे पहले कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया था। अचानक उसे ऐसा क्या हुआ ? उसने अपने काम के बारे में भी नहीं बताया। वह हर्षा से क्यों बच रहा था? कल वह उसे पागल की तरह क्यों खोज रहा था ? हर्ष को बहुत बुरा लगा। वह अब अपनी कक्षा में पढ़ाई नहीं करके बस से अपने कमरे में सीधे वापस आ गई। उसने पहले से ही सोच लिया कि वह उसे समझा-बुझाकर मना लेगी, वह अपनी पूरी कोशिश करेगी उसका गुस्सा मिटाने का। लेकिन अल्बर्टो ने उसे मौका नहीं दिया।

अल्बर्टो क्या सच बोल रहा था वह बहुत पजेसिव हो गई है ? उसे पहले ऐसी कोई चिंता नहीं होती थी। वे दो दोस्तों की तरह रह रहे थे। वे पौराणिक कथाओं पर प्रश्नोत्तरी खेल खेल रहे थे। शारीरिक संबंध ने दोनों के बीच के अंतर को जैसे कम कर दिया था। बौद्ध अल्बर्टो भूल गया था अपने बचपन का यौन-उत्पीड़न, वह सब-कुछ भूलकर एक महान प्रेमी बन गया था। हर्षा अपने कटु वैवाहिक जीवन को भूल गई थी, उनके दिमाग से बेजान कठोर पत्थर बनने की भावना मिट गई थी। किसी ने मानो उस मूर्ति में प्राण डाल दिए हो। छेनी के आघात से घायल मूर्ति, अब अपने प्रेमी के स्पर्श से उल्लसित थी। दोनों भूल गए थे पूर्व-पश्चिम का भेद। एक बार हर्षा ने पूछा था, ”मैंने सुना है , गोरे लोग हमें हीन दृष्टि से देखते हैं। तुम्हारे मन में कभी ऐसी भावना नहीं आई। डोंट यू नो ब्रोंज इज फैशन नॉट व्हाइट ?"

हर्षा स्वयं को सांत्वना देने लगी कि अगर अल्बर्टो गुस्से में है, तो रहे। वह एक-दो दिन में शांत हो जाएगा? उसे कहीं भी नहीं जाना था, इसलिए वह अपने गंदे कपड़े धोने के लिए बाथरूम में चली गई। वह सर्फ डालकर गंदे कपड़ों को भिगो रही थी, कि मोबाइल पर घंटी बजी। कपड़े धोना छोड़कर वह दौड़ गई; क्या अल्बर्टो का फोन? मुझे पता था कि वह मुझे छोडकर कभी भी अकेले नहीं रह सकता है। उसने मोबाइल उठाया। मगर ये कौनसे नंबर है ? ये तो अल्बर्टो के नहीं है। सीने के भीतर उठ रहा आनंद एक क्षण में अचानक धूमिल हो गया था। उदास मन से उसने मोबाइल अपने कान पर लगाया। मानो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। वह धड़ाक से खाट पर गिर गई। इस तरह की अप्रत्याशितता उसकी कल्पना से परे थी।

उसका पूरा शरीर कांप रहा था। वह ऐसी दोपहर को कहाँ जाएगी ? उसका यहाँ कौन है, जो उसे तीन-चार दिन छुपाकर रखेगा? उसने बार-बार माँ से कहा था कि उसका मोबाइल नंबर किसी को न दें। वह आदमी अब यहां आएगा। वह भैरवी और नवीना को क्या जवाब देगी? हम एक ही छत के नीचे एक साथ रहे, लेकिन तुमने कभी हमें बताया नहीं कि तुम शादीशुदा हो। क्या वे और कभी उस पर भरोसा नहीं करेंगे? अगर उनमें से किसी ने अल्बर्टो के बारे में उस आदमी को बता दिया, तो वह आदमी झमेला पैदा नहीं कर देगा? वह अल्बर्टो को कैसे मुंह दिखा पाएगी, अपने विश्वविद्यालय के सहपाठियों को भी ?

वह आदमी अचानक क्यों आ रहा है? क्या उसे किसी से कोई जानकारी मिली? क्या वह जबरन उसे ले जाएगा? बेशक, उसने फोन पर कुछ भी नहीं बताया। आदमी एक आतंक की तरह लग रहा था। वह भूल गई थी कि वह कपड़े धो रही थी। दुर्भाग्य उसे छोड़ने का नाम नहीं ले रहा था। ओडिशा क्या नजदीक है, जो वह भागकर घर के किसी कोने में छुप जाए।

उसने अल्बर्टो से संपर्क करने की कोशिश की। नहीं, अल्बर्टो ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था। उसने बार-बार कोशिश की, लेकिन विफल रही। इस समय वह कहाँ जा सकती है? अगर अल्बर्टो वहां होता तो वह उसके साथ पार्क चली जाती और वह आदमी उसे पाए बिना लौट जाता। सीमा गुप्ता है बसंतकुंज में। क्या पता सीमा गुप्ता अभी विभाग से लौटी होगी? वृंदावन मौसा जी ? नहीं, उनका घर सही नहीं है। वह उसके स्थानीय अभिभावक है, उसके पिताजी के दोस्त भी। शायद पिताजी ने उन्हें उस आदमी के आने के बारे में सूचित कर दिया हो। वह निश्चित रूप से कहेंगे, "तुम्हारा पति आया है, तो यह कैसे हो सकता है कि तुम यहाँ रहो ?"
हर्षा ने कभी पहले इतना असहाय महसूस नहीं किया था। यहाँ तक कि जब वह उस आदमी के साथ रहती थी तब भी। हर्षा ने पुरी फोन लगाया। दूसरी तरफ से अपनी मां की आवाज सुनकर वह रोने लगी। उसकी मां क्या जवाब देती ? सुनकर उसे घुन लग गया हो जैसे। ऐसे समय वह क्या सलाह देती? उसका पति उससे मिलने आया है। वह उसे नहीं मिलेगी।
"माँ, तुमने उसे मेरा मोबाइल नंबर क्यों दिया?"
“ भगवान की सौगंध मैंने उसे नहीं दिया। "

“ तो उसे कैसे मिला ?”
" मेरी प्यारी बच्ची, तुम परदेश में हो, ऐसा उलटा-पुलटा कोई काम नहीं करोगी। तुम्हें बचाने के लिए वहाँ कोई नहीं आएगा। "
यह कहते हुए माँ ने फोन रख दिया। शायद वह चाहती थी कि हर्षा और उस आदमी में सुलह हो जाए। कौनसी मां अपनी बेटी की ऐसी दुःखद स्थिति देखना चाहेगी ?
हर्षा कपड़े बिना धोए बाथरूम में चुपचाप बैठ गई। उसके दिल की धड़कन बढ़ गई थी। उसका शरीर कांप रहा था? वह बीमार अनुभव कर रही थी। वह नहीं समझ पा रही थी कि क्या करें या क्या न करें ?
इतने दिनों के बाद वह आदमी फिर से उसके जीवन में क्यों लौट आया? जैसे कि वह दुर्भाग्य के चंगुल से बच नहीं सकेगी। उसके जीवन में आशा की किरणें जगी थी। भले ही, उसका गंतव्य अनिश्चित था। मगर था तो सुखद। वह उस आदमी का सामना कैसे करेगी ? सोचते-सोचते एक घंटा बीत चुका था। वह मूर्तिवत बैठी हुई थी। वह जानती थी कि इंतजार के अलावा कुछ भी नहीं किया जा सकता है।

आखिरकार वह क्षण आया, जब कॉलिंग बेल ने उस आदमी के आगमन का संकेत दिया। बेशक, वह यंत्रवत् दरवाजे की ओर बढ़ गई। वह जानती थी कि यह आदमी उसके सजे-सँवारे जीवन को बर्बाद कर देगा। वह जानती थी कि वह आदमी उसके ऊपर अपना हक जताएगी। हर्षा ने दरवाजा खोलकर अपने सामने दुर्भाग्य को खड़े देखा। बिना कुछ कहे उसे घर में आने की अनुमति दी। वह वहां खड़ी रही, लेकिन उसका दुर्भाग्य खाट पर बैठा हुआ था।
" चलो चलें, " उस आदमी ने कहा।
हर्षा ने कुछ नहीं कहा। वह आदमी उसे कहाँ ले जाएगा? क्या होटल के कमरे में, सिनेमा देखने या टाटा या ओडिशा ले जाएगा? वह उसके साथ कहाँ जाएगी ? पहली बार उस आदमी ने कहा है ‘चलो’’। क्या उसने पहले कभी साथ जाने के लिए बुलाया था? नहीं, उसकी चाल-ढाल बिल्कुल नहीं बदली थी, अभी भी बातचीत में वहीं अहंकार। वह उस आदमी पर कैसे भरोसा कर सकती है, जिसे उसने दो साल पहले छोड़ दिया है ? एक दिन में बदल जाती है, इसका इतिहास बदल जाता है और उसका भूगोल भी। इन डेढ़-दो वर्षों में हर्षा की दुनिया बदल गई थी। उसने अपने आपको दिल्ली की जीवन-शैली के साथ ढाल दिया था। आज उसने अपनी पहचान बनाई थी। क्या वह उस जगह वापस जाएगी, जिसे उसने दो साल पहले छोड़ दिया था ?
वह आदमी कहने लगा, "मैंने तुम्हें कब से फोन किया कि कपड़े पहनकर तैयार रहो, लेकिन तुम अभी तक तैयार क्यों नहीं हुई हो ?" उसकी भाषा में कोई बदलाव नहीं था; वही अधिकार जताने वाली भाषा, क्या वह हर्षा में आकाश-पाताल का फर्क नहीं देख पा रहा था?

हर्षा चुपचाप खड़ी रही, सिर झुकाकर पहले की तरह। उसने आदमी की तरफ एक बार भी नहीं देखा। उसने न तो 'हां' कहा और न ही 'नहीं', उस आदमी के साथ जाने के लिए। वह आदमी किसी भी समय झमेला कर सकता है। भैरवी और नवीना के आने का समय हो गया था। वह नहीं चाहती थी कि उनके सामने कोई नाटक हो। बिना कुछ बोले वह अपने कपड़े लेकर बाथरूम में चली गई। गंदे कपड़े अभी भी बाल्टी में ऐसे ही पड़े थे। उस आदमी ने कहा, "क्या मेरे सामने कपड़े बदलने में तुम्हें शर्म आ रही हैं?" और उसके चेहरे पर व्यंग्य की हंसी दिखाई दे रही थी। जो उसके शरीर को भेदकर अपनी झुंझलाहट व्यक्त कर रही थी। वह आदमी उसके कटाक्ष से उत्साहित हो गया। वह उठकर उसके साथ अभद्र आचरण करने लगा। उस आदमी को एक तरफ धकेलकर उसने बाथरूम बंद कर दिया। वह बालों में कंघी किए बिना बाथरूम से बाहर आ गई, उसने चेहरे पर पाउडर भी नहीं लगाया। उसने केवल इतना ही कहा; "चलिए चलते हैं"।

" ऐसे कैसे कपड़े पहनी हो? साड़ी नहीं पहनी ?” आदमी ने शिकायत भरे लहजे में कहा।
“ नहीं, मैंने यहाँ साड़ी नहीं रखी है। ”
" पुरी की लड़की, साड़ी-सिंदूर क्यों रखेगी ?"
हर्षा को बहुत गुस्सा आया। देखो तो, यह आदमी डॉक्टर होने के बावजूद भी किस तरह एक देहाती महिला की तरह बात कर रहा है। क्या साड़ी पहनना और सिंदूर लगाना जरूरी है ? क्यों लगाएगी सिंदूर वह, जब उसे वह आदमी स्वीकार नहीं है ? कुछ घटना घटने से पहले हर्षा कमरे से बाहर आ गई। इस आदमी को उसका पता कैसे मिला? किसने उसे घर का स्थान बताया ? उस आदमी ने आगे जाकर गली के मुहाने पर टैक्सी को हाथ दिखाया। वह चारों तरफ देख रही थी कि क्या भैरवी और नवीना लौट तो नहीं रही है। क्योंकि वह इस आदमी के साथ अपने रिश्ते को बताना नहीं चाहती थी। इसके विपरीत वह उसे एक दुःस्वप्न मानकर भूलना चाहती थी। जबकि दुःस्वप्न की उसके जीवन में पुनरावृत्ति हो रही थी।

हर्षा जल्दी से टैक्सी में जाकर बैठ गई। भैरवी और नवीना के आने से पहले वह इस जगह को छोड़ना चाहती थी। रास्ते भर किसी ने कोई बात नहीं की। वह उस आदमी से डर रही थी, हो सकता है कि वह प्रतिशोध ले। नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा, उसने खुद को अगले पल अपने मन को समझाया। अगर अल्बर्टो का फोन उस वक्त आ गया तो ? या एसएमएस भेज दिया: "हाना, आई नीड़ यू। "
वह जानती थी कि वह कहीं जाने की स्थिति में नहीं है। जाना तो दूर की बात वह अपनी स्थिति के बारे में अल्बर्टों को फोन से भी नहीं बता सकती थी। बस स्टेशन से पहले ही उस आदमी ने टैक्सी ड्राइवर को दाएं मुड़ने के लिए कहा। टैक्सी त्रिवेणी अपार्टमेंट से थोड़ी दूरी पर रुक गई। उसने हर्षा से उसके साथ आने के लिए कहा। हर्षा उस आदमी के पीछे-पीछे गई। वह आदमी उसे कहाँ ले जा रहा था? क्या वह टाटा से दिल्ली आया हैं?

वह यहाँ आने का उद्देश्य पूछना चाहती थी, लेकिन हिम्मत नहीं हुई। लेकिन वह उस आदमी के साथ लिफ्ट में चली गई। लिफ्ट रुकी चौथी मंजिल पर और वह उसके पीछे फ्लैट नंबर 406 में चली गई। दरवाजे पर नाम-पट्टी पर डॉ॰पी॰ पुरी लिखा हुआ था और उसके नीचे डॉ॰एम॰आचार्य था। कॉलिंग बेल बजाते ही कुछ समय बाद दो लोगों ने एक साथ दरवाजा खोला और वे उन्हें ‘वेलकम, वेलकम’ कहते हुए भीतर ले गए।
क्या यहाँ आना पूर्व निर्धारित था ? तो फिर उस आदमी ने उसे बताया क्यों नहीं ?दोनों जाकर सोफे पर बैठ गए थे। डॉक्टर एम॰ आचार्य ने पूछा, "क्या यह आपकी बेटी है?" वह आदमी हंसते-हँसते लोट-पोट हो गया। डॉ॰ पुरी भी उनके साथ हँसने लगे, "नहीं, नहीं, यह उनकी पत्नी है। "

"सॉरी, सॉरी, दिखने में छोटी लड़की की तरह दिखती है, " एम॰ आचार्य ने कहा।
"इसमें सॉरी कहने की क्या बात है। श्रीमती महापात्र अभी भी जेएनयू में पढ़ रही हैं। "
धीरे-धीरे सभी तीनों अपनी प्रोफेशनल बातें करने लगे। हर्षा को बहुत खराब लग रहा था। इस बीच एक लड़की कुछ मिठाई और स्नैक्स देकर चली गई। डॉ॰ आचार्य ने अचानक देखा कि हर्षा चुपचाप उसे देख रही है। एक मधुर मुस्कान के साथ उन्होंने पूछा, "आपकी पढ़ाई कैसी चल रही है? आपके विषय क्या हैं?"
"जनर्लिज़्म, " उसने संक्षेप में उत्तर दिया।
" आप कहाँ रहती हो ? छात्रावास में? कभी-कभी यहाँ आ जाया करो। "
"नहीं, हम किराए के घर में तीन सहेलियाँ मिलकर रहती हैं। "

फिर वे तीनों अपनी मेडिकल स्ट्रीम की चर्चा करने लगे। वहाँ से लौटते समय शाम हो गई थी। वहाँ से विदा होते समय डॉ॰ पुरी ने उस आदमी की पीठ ठोककर फुसफुसाते हुए कहा, "तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम्हारी इतनी छोटी लड़की से शादी हुई है। "
नीचे उतर जाने के बाद उस आदमी ने एक टैक्सी बुलाई। हर्षा कहने लगी, "बहुत देर हो चुकी है, मैं जा रही हूँ। "
उस आदमी ने अचरज से उसकी तरफ देखा: "क्या दूसरे आदमी के साथ जा रही हो?"
जब हर्षा अल्बर्टो के साथ होती तो वह अपने कमरे में बहुत देर से लौटती। उसे कभी असहज नहीं लगता। उसको कभी अल्बर्टो के साथ समय का भान नहीं रहता था। वह टैक्सी में अनिच्छा से जाकर बैठ गई। अपनी मुट्ठी में उसका हाथ लेते हुए उस आदमी ने कहा, " मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। " उसने टैक्सी चालक को कनॉट प्लेस ले जाने का निर्देश दिया। वास्तव में वह समझ नहीं पाई कि अचानक उसे वह ‘तू’ से ‘तुम’ कहकर सम्मान से बुलाने के पीछे असली उद्देश्य क्या है? इसके अलावा, उसने अपनी मुट्ठी से उसकी हथेली को इतना ज़ोर से कसकर पकड़ा है, जैसे कहीं वह टैक्सी से बाहर कूदकर भाग न जाए। क्या वह आदमी तलाक चाहता है ? तब तो हर्षा सबसे ज्यादा खुश होगी। उसे उन्मुक्त जीवन मिलेगा।

वे कनॉट प्लेस में उतर गए। शाम के समय उस जगह थोड़ी भीड़भाड़ थी। वह एक रेस्तरां में उसके पीछे-पीछे चली गई। अगर अब उसने शराब पीना शुरू कर दिया तो? वह सोचने लगी, वह उसे छोड़कर चली जाएगी, उस होटल के कमरे में वह आदमी बेहोश पड़ा रहे। एक टेबल पर खुद बैठने के बाद उसने पूछा क्या खाओगी, कहो।
"मुझे भूख नहीं है, " हर्षा ने कहा।
"लेकिन मुझे भूख लग रही है। " उसने हँसते हुए कहा। जैसे कि उसने हर्षा को तंग नहीं करने की शपथ खाई हो। उसने कई किश्तों में खाने के आदेश दिए। दोनों बैठे हुए थे, बीच में उसके मोबाइल की रिंग बजने लगी। क्या अल्बर्टो का फोन था? हे भगवान! इस समय वह क्या उत्तर देगी ? उसने अपने पर्स में से मोबाइल बाहर निकाला। उधर से अपने पिताजी की आवाज़ सुनकर वह चकित रह गई थी। पिताजी पूछ रहे थे - क्या डॉक्टर बाबू से मुलाक़ात हो गई ?

"हाँ, " उसने गंभीरता से उत्तर दिया।
"मेरी प्यारी बेटी, तुझे अब और क्या समझाऊँगा, तुम बड़ी हो गई हो। सोच समझकर निर्णय लेना। इस दुनिया में खोना सहज है, मगर इसे पाना बहुत कष्टकर है। मेरे आखिरी दिन करीब आ रहे हैं। मैं बूढ़ा हो गया हूं। तुम्हारा भाई विदेश में बस गया हैं। तुम्हारी सहायता करने के लिए कौन है? तुम तो जानती हो, तुम्हारी बड़ी बुआ का क्या हाल था ? उसका जीवन कैसे गुजरा। अपने हाथ से अपने भविष्य की कब्र मत खोदो। तुम्हारी माँ बहुत चिंतित थी, इसलिए मैंने फोन किया। भगवान जगन्नाथ, तुम्हारा मंगल करें! ठीक है रख रहा हूँ!"

उसे अपने पिता का फोन आने से बड़ा असहाय लग रहा था। वे उसे राजी भी कर रहे थे ? उसका रोने का मन हो रहा था। उसे लगा, उसके पीछे भयानक साजिश चल रही थी। उस आदमी ने दिल्ली आने से पहले हर्षा के माता-पिता को बता दिया था ? लगता है उनका मौन समर्थन था। पर क्यों? क्या वह वास्तव में उसके माता-पिता पर बोझ बन गई थी? भाई तो उसकी पढ़ाई के लिए पैसे भेज रहा है, इसके अलावा, पिता ने खुद कहा था कि अगर वह आगे पढ़ना चाहती है, तो पढे। वे अचानक कैसे बदल गए ? फिर, इस आदमी को देखो, वह कैसे उसका पीछा कर रहा है, जैसे उसे लड़कियां नहीं मिल रही हो।
हर्षा ने पूछा, "आप कुछ कहना चाहते थे, है ना?"

"यहाँ ?" उस आदमी ने अचरज से उसकी तरफ देखा। "नहीं, यहाँ नहीं। "
रात के खाने के बाद वह आदमी उसे कपड़ों की दुकान में ले गया और कहने लगा, “ अपने लिए ड्रेस देख लो। ”
"ड्रेस ?"
" तुम तो ड्रेस पहनती हो, साड़ी क्यों लोगी?" उस आदमी ने कहा।
"नहीं, मुझे इन चीजों की ज़रूरत नहीं है। न तो साड़ी और न ही ड्रेस। " अचानक वह आदमी इतना कैसे बदल गया ? इतना प्यार उछल रहा है ? वह सोचने लगी कि वह आदमी क्या कहना चाहता है, जिसके लिए वह तब से नाटक कर रहा है। नहीं, उसे उस समय कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। न उसके दोस्त के घर में, न तो रेस्तरां के डिनर में, न ही एक नए ड्रेस खरीदने के प्रस्ताव में। वह केवल मुक्ति चाहती थी। उस आदमी ने अपनी पसंद से उसके लिए एक पोशाक खरीदी। तब दोनों टैक्सी में बैठकर बाहर चले गए।

हर्षा सोच रही थी कि वह उसे अपने कमरे में छोड़ देगा। लेकिन वह उसे किसी होटल के कमरे में ले गया। उसने सोचा कि वह उससे जरूर पूछेगा: "तुम्हारी परेशानी क्या है? तुम वापस क्यों नहीं आना चाहती हो? तुम ऐसे कब तक अलग रहोगी? तुम्हारी मेरे प्रति क्या शिकायतें हैं, कहो? मेरे धैर्य की परीक्षा लेने की कोशिश मत करो।
जो भी हो, आज फैसला हो जाएगा। इतने लंबे समय से इंतजार कर रहे बम को आज फूटने का मौका मिल जाएगा। उसने मन-ही-मन आज संकल्प लिया कि मुंह से कोई ग़लत शब्द न निकले।

कमरे में पहुंचने के बाद उस आदमी ने दरवाजा बंद कर दिया। उसने अपनी शर्ट खोलकर हेंगर पर टांग दी। बिस्तर पर बैठकर वह कहने लगा, "तुम ऐसा क्यों कर रही हो जैसे किसी अजनबी के साथ आई हो? बैठो। "
हर्षा कुर्सी पर बैठकर पूछने लगी: "आप क्या कहना चाहते थे, कहो?"
"तुम्हें इतनी जल्दी क्यों है? थोड़ा इंतज़ार करो। "
अलमारी से बोतल निकालकर वह बिस्तर पर बैठ गया। ढक्कन खोलकर दो-तीन घूंट पीकर उसने पूछा: "तुम्हारी समस्या क्या है?"
हर्षा ने गुस्से में पूछा: " किस संबंध में ?"
वह आदमी बिल्कुल नहीं बदला था।
"टाटा जाने में। "
"मैं वापस नहीं जाऊँगी, " हर्षा ने दृढ़ता से जवाब दिया।

"क्या यहाँ तुम्हारा कोई प्रेमी है?" उसने फिर से दो घूंट शराब पी। हर्षा क्रोधित होने की बजाय शांत रही। जैसे कि किसी ने आग पर पानी डाल दिया हो। क्या इस आदमी के कान में भनक लग गई ? जिस आदमी ने दिल्ली में उसके रहने के स्थान के बारे में बताया होगा, उसने शायद अल्बर्टों के बारे में भी बताया होगा।
नशे की हालत में वह आदमी कहने लगा, "ठीक है, क्या कारण है?, "
हर्षा ने उत्तर नहीं दिया। उसके नथुने क्रोध से फड़फड़ा रहे थे। उस आदमी में बिलकुल भी बदलाव नहीं हुआ था। उसने उस पर भरोसा कर बहुत बड़ी गलती की थी। वह उठकर खड़ी हो गई और कहने लगी:"मुझे देर हो रही है, मैं जाऊँगी। "

बिस्तर से उठकर उस आदमी ने उसे अपने पेट के ऊपर खींच लिया। "हाँ, जाओगी, लेकिन इतनी जल्दबाजी क्यों हैं?" हर्षा के ऊपर पहाड़ की तरह बैठकर वह कहने लगा, "तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मुझे अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। "
उसकी जकड़ से खुद को मुक्त करते हुए वह कहने लगी, "हमारे लिए एक साथ रहना संभव नहीं है। "
उसकी छाती को अमानवीय और असभ्य तरीके से दबाते हुए उसने पूछा: " संभव क्यों नहीं है?"

यह कहते हुए वह उसके चेहरे पर अपने दांत गड़ाने लगा। उसने अपने होंठ उसके चेहरे पर इतने हिंस्र तरीके से दबाए कि उसके फेफड़े शराब की गंध से भर गए। उस आदमी ने उसे नंगा किया। लेकिन वह चिल्ला नहीं पाई। वह कोमल पत्ती की तरह नीचे गिर गई। आदमी उसे बेरहम तरीके से कुचलने लगा। उसके निचले अंग सुन्न होते जा रहे थे। उसकी शिरा-प्रशिरा अलग होती जा रही थी। ध्यान दिए बगैर वह आदमी उसे प्रत्येक आघात में खत्म करता जा रहा था। हर्षा बिस्तर पर बेजान पड़ी हुई थी। उस आदमी ने बची हुई व्हिस्की गटक ली। उसके नुकीले दांतों से हर्षा के होंठ दो भाग में कट गए। मानो मांसपेशियां बाहर निकल गई हो। हर्षा दर्द से कांप रही थी। वह उसकी बाहों को भूखे भेड़िए की तरह काट रहा था, जिसे लंबे समय से भोजन नहीं मिला हो। वह दर्द से कराह उठी, "हे माँ!"। इस आवाज से वह आदमी और अधिक उत्तेजित हो गया। वह उसकी जांघों पर चोट के ऊपर चोट लगाते जा रहा था। जैसे वह अपने भोजन की परख कर रहा हो।

हर्षा का दर्द उसके पास नहीं पहुँच रहा था। वह अपने जंगली जुनून के साथ उसके शरीर से खेलता रहा, जब तक वह पसीने से तर-बतर नहीं हो गया। आखिरकार वह बिस्तर पर केले के तने की तरह गिर गया। इधर चक्रवात से तबाह बगीचे की तरह हर्षा दिखाई दे रही थी। उसके बाल बिखरे हुए थे। उसके चेहरे पर रोने के भाव थे। तेज धूप में रेतीले समुद्र तट पर उन्मुक्त भाव से पड़ी हुई थी वह। कोई भी उसके शरीर को ढकने के लिए आगे नहीं आया। उसके हाथों पर सारी जगह दांतों की दो पंक्तियों के काटने के निशान बन गए थे। उसकी गर्दन पर जबरदस्त दर्द हो रहा था। उसका शरीर मिट्टी की अवांछित गीली गांठ बन गया था। घृणा से धिक्कारने लगे उसके प्राण।

वह धीरे-धीरे उठकर बाथरूम में गई। नल के पानी से उसने अपने पूरे शरीर को धोया। लेकिन शरीर पर बने निशान मिटाए नहीं जा सके थे और न ही वह रौनक लौट आई हर्षा के चेहरे पर। उसने अपनी आँखें धोई, आँसू और पानी एक-दूसरे में मिल गया। उसकी जांघों की धमनियों में खिंचाव हो रहा था। चलते समय जांघे दर्द कर रही थी। कमरे में आकर जमीन पर तकिये के पास से एक-एक कर अपने कपड़े इकट्ठे कर शरीर को ढक लिया। बिस्तर पर पड़ा हुआ था वह आदमी, पूरी तरह से अचेतन। कपड़े पहनकर दरवाजे की चिटकनी खोलकर वह कमरे से बाहर निकल गई। जैसे कोई कॉल गर्ल अपना काम पूरा कर लौट रही हो।
उसने जानबूझकर वह पोशाक वही रहने दी, जो उस आदमी ने उसके लिए खरीदी थी। भैरवी और नवीना को लौटे हुए काफी समय हो गया होगा। वे उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह किस तरह अपने चेहरे पर पूर्व प्रसन्नता ला सकती थी?

जैसे ही वह अपने घर पहुंची, तो नवीना ने पूछा: "क्या जीजू ने आपको बहुत घुमाया न ? हमें कल ट्रीट चाहिए, हम कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं है। वैसे, हम कब से एक साथ रह रहे हैं, मगर तुमने हमें जीजू के बारे में कभी बताया नहीं ? अगर वह तुम्हें खोजने विभाग में नहीं आते, तो हमें उनके बारे में बिल्कुल पता नहीं चलता। "
" सब चलता है। " भैरवी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई "जीजू बहुत अच्छे आदमी है। "
हर्षा खाट पर बैठ गई। उसे रोने की भारी इच्छा हो रही थी। लेकिन उसे निरोला जगह कहाँ मिलेगी, जहां वह दिल खोलकर रोएगी ?

10.
तुम कहां हो, अल्बर्टों? तुम मेरी पहुंच से बाहर क्यों हो ? देखो, तुम्हारी हाना किस तरह छिन्न-भिन्न असहाय होकर पड़ी हुई है। देखो, किस तरह दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है। तुम मेरे इस दुर्दिनों में कहाँ गायब हो गए? क्या तुम अचानक मेरा देश छोड़कर चले गए? देश छोड़ने से पहले कम से कम मुझे कहकर तो जाते ?
हर्षा को रात में बहुत समय तक नींद नहीं आई। क्या अल्बर्टों को उस आदमी के आने के बारे में पता चल गया है? क्या उसकी घर में अनुपस्थिति के समय अल्बर्टों ने इस आदमी के बारे में जानकारी प्राप्त कर ली थी? या क्या वह अभी भी नाराज है ?

निवृत्ति और प्रवृति के बीच लटक रहे विदेशी बौद्ध ने पश्चाताप की आग में जलकर क्या उसने खुद को हर्षा से दूर तो नहीं कर दिया ? नहीं, नहीं ... यह नहीं हो सकता। कम से कम वह खुद को चोर की तरह छुपा तो नहीं सकता। उस पर हर्षा का क्या अधिकार है, जिससे उसे अपने को छुपाना पड़े ? वह बहुत अच्छी तरह से जानती थी कि वह एक गंभीर पढ़ाकू आदमी है। उसे भारत में आए हुए अभी तक एक वर्ष भी पूरा नहीं हो पाया था। मगर उसने पूर्व और पश्चिम के दर्शनशास्त्रों के तुलनात्मक अध्ययन पर पहले से ही एक पुस्तक तैयार कर ली थी। हर्षा ने देखा कि वह हमेशा शुरु-शुरू में शिक्षार्थी की तरह ध्यान लगाकर प्रत्येक शब्द को सुनता था। हर्षा द्वारा सुनाई गई कहानियों की सच्चाई को संदर्भ पुस्तकों में परखता था। अगर कुछ समझ में नहीं आता तो वह अगले दिन आकर पूछ लेता था। कभी-कभी उन दोनों के बीच तर्क-वितर्क भी होता था। इसलिए वह बिना किसी कारण के इस तरह छुप कर नहीं रह सकता।

वह आदमी फिर से कहीं बीमार तो नहीं हो गया या किसी अस्पताल या नर्सिंग होम में भर्ती तो नहीं हो गया? वह डायरिया से पीड़ित तो नहीं है, जैसे कि पिछली बार हुआ था।
हर्षा को नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर पहले ही भैरवी और नवीना लाइट बंद कर सोने चली गई थी। वे अपना प्रोजेक्ट पेपर तैयार करने में लगी हुई थीं। उन्होंने उसे खाने के समय भी नहीं बुलाया था , हालांकि वह बिस्तर पर करवट बदलकर सो रही थी। क्या वे उसके बारे में बहुत कुछ बोल रही होगी ?, उस आदमी और अल्बर्टो को लेकर उनकी चर्चा बहुत ही रोचक बनी होगी ?उसके प्रति गंदी-गंदी टिप्पणी कर रही होगी? उसे खाने पर उन्होंने क्यों नहीं बुलाया ?

उस आदमी ने अचानक आकर जैसे तूफान की तरह सब-कुछ तबाह कर दिया। उसकी इच्छा हो रही थी कि वह कहीं भाग जाए। लेकिन उसे लग रहा था कि वह जहां भी जाएगी, वह आदमी उसका पीछा करेगा। अल्बर्टो ऐसे खराब समय में उसकी सहायता करने के लिए वहां नहीं था। कौन जानता है कि कल सुबह वह आदमी यहाँ आकर झमेला न कर दे? हो सकता है, वह उसे टाटा जबरन खींच कर ले जाए ? किसको पता, कल क्या होगा ? ऐसा भी हो सकता है कि हर्षा चलती ट्रेन से बाहर कूद जाए। कौन जानता है, क्या होगा ?
हर्षा ने अपने पूरे शरीर पर दांतों की दो पंक्तियों के काटने के निशान देखें। वह भैरवी और नवीना से कल दिन के उजाले में उन्हें कैसे छिपाकर रखेगी ? वह क्या जवाब देगी, उनकी मजाकिया टिप्पणियों का ? क्या उस आदमी का नशा उतर गया होगा ? क्या वह उसे खोज रहा होगा ? हर्षा को पास में न देखकर क्या वह चिंतित हो उठेगा ? नहीं, चिंतित कभी नहीं, लेकिन वह क्रोध से पागल तो नहीं हो जाएगा ?

नहीं, उसका नशा उतरा नहीं होगा, अन्यथा अभी तक उसने फोन पर उसे धमकी दे दी होती: "तुम बहुत स्मार्ट हो गई हो? बिना कुछ पूछेअकेली चली आई ? तुम्हारा सतीत्व नष्ट हो जाता, मेरे साथ रात गुजारने से?” नहीं, तो वह आदमी यहां पहुंचकर सब-कुछ उगल देगा?उसके अतीत जीवन, उसके पति को छोड़कर आने की कहानी। क्या उसे भैरवी और नवीना के सामने और छोटा होना पड़ेगा? उन्हें कल रात की यंत्रणा कैसे समझ में आएगी ? वह उसके विरोधाभासी अनुभवों को कैसे समझ पाएगी ? कभी-कभी इस शरीर पर कविता की सुंदर पंक्तियाँ लिखी जा सकती है, तो कभी-कभी इस शरीर पर तेज चाकू से रेखाएँ खींची जाती है।

हर्षा चुपचाप उठकर बाथरूम में चली गई। अल्बर्टो से संपर्क करने की आशा के साथ आधी रात को मोबाइल ऑन कर दिया। उधर फोन में रिंग बजने लगी। “मोबाइल उठाओ, अल्बर्टो। मेरे दुर्दिन में चुप मत रहो। हम दोनों ने एक नया जीवन गढ़ा है। अगर हम एक-दूसरे से नहीं मिलेहोते तो हम स्वर्गिक सुख से वंचित हो जाते। पांच साल की उम्र में पैदा हुए उस दर्दनाक अनुभूति से तुम्हारा सारा जीवन उबर नहीं पाता, अगर तुम इस सुख से वंचित हो जाते तो, शायद तुम पलायनवादी होते और औरतों को निवृति मार्ग की कहानी सुनाते। तुम्हारा यह जीवन व्यर्थ चला जाता। अल्बर्टों, मैंने तुम्हारे अधरों पर मुस्कुराहट लाई। तुम्हारी वह मधुर मुस्कान मैं कभी नहीं भूल सकती। तुमने मुझे पत्थर से इंसान बनाया है। देख, कल रात किस तरह मेरे शरीर की हरी पत्तियों, फूलों और फलों का सुंदर उद्यान पूरी तरह से नष्ट हो गया। अल्बर्टो, फोन उठाओ, क्या तुम इतनी गहरी नींद में हो?”
वह सो नहीं सकी ; रात भर दर्द होता रहा। दरवाजे की ओट से भोर का प्रकाश दिखाई देने लगा था। धीरे से दरवाजा खोलकर वह बालकनी में खड़ी हो गई। आसमान अभी तक गोबर पुते हुए आँगन की तरह दिख रहा था। सुबह-सुबह घूमने वाले कुछ लोग दिखाई दे रहे थे। फिर वाहनों ने सड़कों पर चलना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे आसमान साफ हो रहा था। दिन के उजाले से वह और डरने लगी थी। यदि वह आदमी सुबह-सुबह यहाँ पहुंच गया, तो वह कहाँ जाएगी, कहाँ छुपेगी ?

हर्षा बाहों और गर्दन पर बने निशान बहुत ही अश्लील लग रहे थे। उसे रोने का मन हो रहा था। वह अपने कमरे में लौट आई और अलमारी से लंबी पोशाक बाहर निकाली। कड़ाके की सर्दी की सुबह में भी वह बाथरूम में चली गई, नहाने के लिए। भैरवी नल से पानी गिरने की आवाज़सुनकर जाग गई। खाट के नीचे से तानपुरा बाहर निकाल कर वह रियाज़ करने बैठ गई। नवीना के खांसने और चिड्चिड़ाने की आवाज सुनाई दे रही थी। नींद में व्याघात होने से वह शायद नाराज़ हो गई थी। दिल्ली में दुर्गा पूजा के बाद थोड़ी-थोड़ी ठंड पड़ने लगती है। इसलिए सुबह उठना कष्टप्रद होता है। नवीना के झुंझलाहट की परवाह किए बगैर भैरवी तानपुरा पर स्वर निकालने शुरू किए। इधर साबुन और तेल लगाकर हर्षा दाग मिटाने की कोशिश कर रही थी। नहीं, ये दाग नहीं मिटेंगे। हर्षा ने शरीर पोंछते हुए लंबे बाजू वाली पोशाक पहन ली।

हर्षा देवताओं के सामने धूप-अगरबत्ती जलाकर सभी के लिए चाय तैयार करने लगी। आँखें मलते हुए नवीना ने पूछा, “ सुबह-सुबह जीजू के पास जा रही हो? तुम रात को वहां रुक जाती। "
"नहीं, मैं सुबह जल्दी उठ गई, इसलिए नहाने चली गई। "
हर्षा ने अपने गीले बाल पोंछे। तानपुरा को एक तरफ रखकर भैरवी चाय का कप उठाकर बिस्तर पर बैठ गई:"आज जीजू को यहां लेकर आना, " उसने कहा।
"नहीं, यह संभव नहीं है। वह कह रहे थे आज वापस जाने के लिए। इसके अलावा, मुझे अपना प्रोजेक्ट पूरा करना है। शायद पूरा दिन लग जाए। "
"तुमने तो अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताया नहीं ? वह तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता है। बेचारे को क्या पता, तुम किसी और की संपत्ति हो। ”
“हे भगवान! घूम-फिरकर बात वहीं आ जाती है?” हर्षा ने कहा: "आज मैं कुछ नहीं खाऊंगी, मैं तुम्हारे लिए खाना बना देती हूँ। "

"नहीं, तुम जाओ, इसके बारे में चिंता मत करो, हम देखेंगे। "
उस समय आठ बजने जा रहे थे, हर्षा को आशंका थी कि वह आदमी किसी भी वक्त वहाँ पहुंच सकता है। उससे पहले उसे घर छोड़ना पड़ेगा। लेकिन सुबह-सुबह वह कहाँ जाएगी ? उसने पहले से कुछ भी योजना तैयार नहीं की थी। उसे बचने के लिए एक अज्ञात जगह की जरूरत थी। वह वृंदावन मौसा के घर जाने के बारे में सोच रही थी। वह आदमी उस जगह को कभी खोज नहीं पाएगा। अगर अल्बर्टो होता तो कितना अच्छा होता! वह उसके साथ कुछ दिनों के लिए दिल्ली से बाहर चली जाती। मगर अल्बर्टो इतना नाराज है ? तीन-तीन एसएमएस का जवाब तक नहीं दिया, उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। मिलने पर उससे पूछेगी हर्षा:" तुम युधिष्ठिर हो? क्या युधिष्ठिर को कभी इतना गुस्सा आता है? इसके अलावा, तुम्हारे वायदे का क्या हुआ ? छोटी-सी बात पर अपना वायदा तोड़कर तुम चुपचाप बैठे हो? मैं बहुत बुरे समय से गुजर रही हूं। दुर्दिन में काम आने वाला ही सच्चा दोस्त है। तुम्हारा पसंदीदा खेल गोल्फ है और मेरे शरीर पर देख ये सब गोल्फ के हरे भरे मैदान? इतना जल्दी खत्म हो गया तुम्हारा गोल्फ का आकर्षण?”

हर्षा ने पर्स में पैसे रखे, कैमरा रखा और कहा, “मैं जा रही हूँ। ”
भैरवी को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, " सुबह इतनी जल्दी?"
"मुझे जाना होगा। " कहकर हर्षा बाहर निकल गई। गली के मोड से वह ऑटो रिक्शा में अल्बर्टो के घर की तरफ गई। उसका घर ज्यादा दूर नहीं था। अल्बर्टो के घर पर ताला लगा हुआ था। कहाँ अन्तर्धान हो गया वह ? क्या किसी जरूरी काम से अपने देश चला गया ? हर्षा को उसका अंतिम एसएमएस याद आया:"मैं इंतजार नहीं कर सकता, मुझे आज तुम्हारी ज़रूरत है। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। "

वह क्यों इंतज़ार कर रहा था? क्या वह कुछ कहना चाहता था? कहना होता तो परसो जब हर्षा ने फोन किया था, वह उसे निश्चित रूप से बता सकता था ? नहीं, वह जानबूझकर चुप है। नहीं तो वह चाहे कभी भी हो, बता सकता था ? अल्बर्टो के पड़ोसी नाइजीरियन स्कॉलर को क्या उसके बारे में कुछ जानकारी होगी ? हर्षा को उससे अल्बर्टो के बारे में पूछने के लिए थोड़ा संकोच हो रहा था। उसने संक्षिप्त पत्र लिखकर अल्बर्टो के लेटर-बॉक्स में डालकर चली गई।

अब वह कहाँ जाएगी ? पूरे दिन कहाँ घूमेगी ? उसने वृंदावन मौसा के घर की तरफ रिक्शा मोड़ा। वे नार्थ में रहते थे। वह जगह बहुत दूर थी। ऑटो रिक्शा निश्चित तौर पर अधिक किराया लेगा, मगर उसे जाना पड़ेगा। उसके पास और कोई रास्ता नहीं था। उसके ठाट-बाट देखकर भैरवी और नवीना कहेगी "तुम्हारे पास क्या कमी है, तुम्हें तो डॉलर मिलते हैं। अगर हमें मिलते तो हम स्टार होटल में खाना खाते;नहीं तो आधा पैसा जाता डिस्कोथेक्स में और आधा बुटीक में। "
हर्षा ने अपना मोबाइल बंद कर दिया, उस आदमी के खातिर। वह जानती थी कि अल्बर्टो भी उसे खोज सकता है, लेकिन उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। वह जानती थी कि वह जो भी कर रही है, ठीक नहीं है। उस आदमी से कितने दिन छिपती फिरेगी ? अगर वह एक दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक इधर-उधर भटकती रहेगी तो क्या वह दया करके उसे मुक्त कर देगा ? दूसरी तरफ, क्या वह ज्यादा क्रोधित तो नहीं हो जाएगा?
वह आदमी उसे छोड़ क्यों नहीं रहा है? क्या उसके लिए लड़कियों की कमी है? उसके छूते ही रोगी ठीक हो जाते है। यदि वह चाहेगा तो कल ही उसे बहुत सारी लड़कियां मिल जाएगी। एक बार केवल वह कह देता:"हर्षा, जाओ, तुम्हें मैं मुक्त करता हूं। "

हर्षा बहुत अच्छी तरह जानती थी कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा। उस आदमी ने अपनी मर्दानगी का प्रचंड आघात किया, उसे अपने जीवन से भगाने के लिए। मगर वह अभी भी उसका कारण समझ नहीं पाई। कभी-कभी हर्षा को लगता है : जो कोई भी सुनेगा, वह कहेगा कि पति ऐसे ही होते हैं। दे आर मास्टर, दे फील लाइक सो। उनमें अधिकार भाव होना एकदम स्वाभाविक है। इसके बिना क्या पति, पति जैसा लगेगा ? आजकल कौन नहीं पीता है? कलाकार तक ? किसी को छोड़ने का यह कोई कारण है? क्या इस कारण से कोई लड़की अपने पति के साथ नहीं रहेगी ? सिर्फ इसलिए कि वह पीते हैं? हर्षा कभी भी किसी को मुख्य कारण नहीं समझा पाएगी।

दुनिया में बहुत सारी खूबसूरत चीजें हैं, जिसका किसी को उपहार दिया जा सकता है। दे सकते है नरम हाथों का स्पर्श, एक मुट्ठी भर चांदनी रात। सुना सकते है झरने के कल-कल नाद की तरह प्रेम कविता। दे सकते है आकाश जैसा आश्रय, बाहों का सुरक्षा कवच, लिख सकते है बांवरे कवि की तरह अधरों पर कविता।
तुम उस आदमी को तलाक क्यों नहीं दे देती? अल्बर्टो ने कई बार पूछा था "मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम क्यों इस बात के लिए मानसिक पीड़ा भोग रही हो। जब रिश्ता मर गया है, तो तुम इसे क्यों खींच रही हो? तुम न्याय के लिए अदालत में क्यों नहीं जाती हो, तुम अपनी जिंदगी क्यों खराब कर रही हो ? "

"यदि यह संभव हो गया होता, तो क्या मैं सारा जीवन 'सिसफस' पत्थर ढोती रहती ? हमारी भारतीय जीवन-शैली तुम्हारे देश की तरह नहीं है, अल्बर्टों। जब मेरी शादी दादाजी की इच्छा से हुई, उस समय मेरी उम्र बीस साल भी नहीं हुई थी। क्योंकि वह अपनी मृत्यु से पहले अपनी नातिन की शादी देखना चाहते थे। अब मेरे पिताजी चाहते है कि मैं उस आदमी से अलग न होऊँ। क्योंकि वे बूढ़े हो गए है। उन्हें उम्मीद है कि एक-न-एक दिन मैं मैच्योर हो जाऊंगी। जीवन जीने के गणितीय सूत्र समझ पाऊँगी और फिर उस दिन निश्चित रूप से उस आदमी के पास लौट जाऊँगी। मेरे कारण उन्हें और अपमान सहना नहीं पड़ेगा। "

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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रचनाकार: विषादेश्वरी भाग 9 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
विषादेश्वरी भाग 9 // उड़िया उपन्यास // सरोजिनी साहू // अनुवादक - दिनेश कुमार माली
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