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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 11 // कलुषित मन // प्रदीप उपाध्याय


प्रविष्टि क्रमांक - 11
कलुषित मन
प्रदीप उपाध्याय

“वह कुलटा नारी सम्पूर्ण ग्राम का माहौल खराब कर रही थी। ग्राम का कोई भी परिवार उस कुलटा नारी को पसन्द नहीं करता था। ग्राम की बड़ी-बूढ़ी औरतें उसे कुलच्छनी कहती थीं। उस कुलटा नारी का एक ही पुत्र था लेकिन उसका विवाह भी उस कुलटा नारी के लक्षणों के कारण नहीं हो पा रहा था,”प्रवचनकार भागवत कथा में किसी प्रसंग में रस घोलने के लिए अपनी लय में बहे चले जा रहे थे और  कुलटा स्त्री शब्द का बार-बार जिक्र कर रहे थे।
उधर पाण्डाल में बैठा पुरूष वर्ग प्रसंग सुनकर आनन्दित हो रहा था तो दूसरी ओर नारी वर्ग में कुछ खुसर-पुसर शुरू हो गई थी। इसी बीच पीठ पर विराजित प्रवचनकार के पास आकर उनके अनुसरणकर्ता ने कुछ कहा और उसकी बात सुनकर वे आगबबूला हो गए। उन्होंने अपना प्रवचन बन्द कर दिया और आयोजकों को बुलाकर कुछ बातें करने लगे। उनकी चिन्ता कल ही कथा के समापन को लेकर थी।
कुछ देर बाद प्रवचन पुनः प्रारम्भ हो गया। शर्माजी अग्रिम पंक्ति में ही बैठे थे। शर्माजी ने अपने पास बैठे मित्र के कान में फुसफुसाकर कहा- “देखो सतीश बाबू, प्रवचन की फीस को लेकर विवाद था। आयोजकों के पास कलेक्शन पूरा नहीं हो सका था फिर भी उन्होंने हाथ-पैर जोड़कर किसी तरह मामले को निपटा लिया। लगता है कि सन्तश्री के मन में जो कलुष आ गया था ,वह मिट गया है। अब वे कुलटा का चरित्र चित्रण बखूबी कर सकेंगे!

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.






1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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