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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 102 // आजकल की हवा // चेतना भाटी

प्रविष्टि क्रमांक - 102


चेतना भाटी

आजकल की हवा

      बेटे ने नया घर बनवाया था । गाँव से माता -पिता पहुंचे , गृह प्रवेश के शुभ अवसर पर । सब कार्यक्रम शानदार - भव्य तरीके से पूर्ण हुआ । मेहमान विदा हुए । और परिवार मिल बैठा ।

       " बेटा घर तो अच्छा बनवाया है तुमने । मगर रोशनदान तो है ही नहीं घर में । " --- पिता बोले ।

         " ए सी लगा है ना पापा । तो घर पूरा पैक रखना पड़ता है , एयर टाइट । " --- बेटा बोला ।

         " अरे लेकिन घर में ताजी हवा भी तो आनी चाहिए न । वह कहा गया है ना कि अपने घर -  दिमाग के रोशनदान खुले रखो । ताकी ताजी हवा अंदर प्रवेश कर सके । "

          " हवा भी आजकल ताजी कहाँ रही ? जो है वह तो घर में प्रवेश न ही करें तो अच्छा । "

           " लेकिन बेटा घर में दरवाजा भी सिर्फ एक ही है । सब उसी से आओ -  जाओ ! कम से कम दो  दरवाजे तो होने ही चाहिए वक्त  - जरूरत के हिसाब से । जैसे कि अचानक मेहमान आ जाएं तो पीछे के दरवाजे से दौड़ा दो बच्चों को । चाय - नाश्ते के इंतजाम के लिए । इज्जत रह जाती है घर की । अब उनके सामने से तो जाने से रहे । " -- माँ बोली ।

       " अरे माँ , आप भी किस जमाने की बात कर रही है ? वह जमाना और था जब अतिथि देव हुआ करते थे । और मेजबान की कमियों को - कमजोरियों को देख कर भी अनदेखा करते थे बल्कि बातों - बातों में "  रफू " भी कर दिया करते थे  कुछ  " उधड़न ।" व्यवहार भी तो दोनों तरफ से होता है ना । ताली दो हाथों से ही बजती है ।  आजकल तो कोई नहीं पड़ता इन सब चक्करों में । जो है सो है वरना वह भी नहीं है । अब तो मेहमानों के सामने ही बच्चों को भेज देते हैं नाश्ता लाने बाजार हिदायतें देते हुए कि - " देखना ठीक से मोल - भाव करना । पिछली बार ज्यादा पैसे दे आए थे तुम । "

        फिर महंगाई का रोना अतिथि के सामने ही कि इतनी मंगाई है और आने - जाने वाले भी कम नहीं है । रोज ही कोई न कोई आन टपकता है । " ---  बेटे ने स्पष्टीकरण दिया ।

          भौंचक माँ यूँ ही देखती रही उसे पहले तो  फिर उनका ध्यान चलते टी वी पर गया । जहाँ एक अभिनेत्री मंच पर आ रही थी । उनका अत्यंत लंबा गाउन  फर्श पर घिसट रहा था पीछे । इतना कपड़ा लगा था उसमें की मानों पूरा का पूरा एक थान ही ले लिया गया हो । मगर फिर भी उनकी पूरी टाँगें - बाँहें -  कंधे - गला सब खुले थे ।

           " सचमुच हवा बड़ी खराब है आजकल । " ---उन्होंने सिर हिलाया स्वीकृति में ।

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संक्षिप्त परिचय-

दो दशकों से अधिक समय से सतत साहित्य साधनारत चेतना भाटी की साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे - व्यंग्य , लघुकथा , कहानी , उपन्यास , में अब तक आठ कृतियाँ प्रकाशित । तीन प्रकाशकाधीन । बी . एस - सी . एम . ए. एल - एल . बी . तक शिक्षित , म . प्र . लेखक संघ भोपाल द्वारा काशी बाई मेहता सम्मान प्राप्त ।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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