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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 133 व 134 // रतन लाल जाट

प्रविष्टि क्रमांक - 133


रतन लाल जाट

सच्ची खुशी

शाम को उसने देर घंटे भर किसी लड़की से बातें की। खूब डींगें मारी और प्रशंसा की। फिर जल्दी-जल्दी खाना खाया और कमरे में दरवाजा बंद कर लेपटॉप ऑन करके अश्लील गाने, वीडियो और फोटोज देखे। तब वह बहुत ही गंभीर दिखायी दे रहा था। देर रात होने को आ गयी थी। तब जाकर वह सोया। सोते वक्त भी उसके मन को कोई चैन नहीं था और आँखों में भरी हुई खुमारी जलन के कारण आँसू बनकर छलक रही थी। इन सबके लिए उसके होंठों से एक शब्द भी नहीं निकला था।
जब नींद के आगोश ने उसे घेर लिया और सपने आने लगे। वह देखता है कि उसका मित्र बहन के साथ जबरन बलात्कार की कोशिश कर रहा है और वह खुद इस से बेखबर होकर किन्हीं अजनबी महिलाओं के साथ पार्टी में रंगरेलियाँ मना रहा है और उसे बड़ा मजा आ रहा है।
दूसरे दिन वह बाजार गया था। संयोग से उसे अपने साथ ही पढ़ा-लिखा रमन मिला। कई सालों बाद मिलने पर बहुत खुशी हुई दोनों को। दूर से देखते ही मुस्कुराये और फिर पास आकर गले लग गये। फिर खूब हँसी-ख़ुशी की बातें हुई और कहने लगे, "ऐसा लगा जैसे वे बरसों दूर होकर भी साथ ही थे।" जब चाय पीकर बिछुड़े। तो भीतर की खुशी बाहर आँसू के रूप में झलक रही थी।
वह शाम होते-होते घर आ गया और देखा कि घर में बुआ आयी हुई थी। तो परिवार में उत्सव- पर्व की तरह माहौल था। फिर बुआ ने उसे कहा, "मैं तेरी बहन के विवाह की कैसेट भी लायी हूँ। तेरे पास इसे देखने का कम्प्यूटर है ना।"
जब उसने लेपटॉप में सी. डी. ऑन की। तो धीरे-धीरे परिवार के सभी छोटे-बड़े लोग कमरे में आकर एक साथ बैठकर देखने लगे। जब अन्त में विदाई का दृश्य आया। तब सबकी आँखों में आँसू छलक आये थे। लेकिन इन चेहरों पर सच्ची खुशी और लबों पर प्यारी मुस्कुराहट थी।

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प्रविष्टि क्रमांक - 134


रतन लाल जाट


फैसला

रमेश का कब से एक सपना था कि वह किसी शहर में कोई भूखंड खरीदे और वहाँ एक आलीशान बंगला बनाकर रहे। लेकिन सबसे बड़ी उलझन यह थी कि माता-पिता गाँव छोड़ने को तैयार नहीं थे। फिर भी एक दिन वह अपनी जिद्द पूरी करने में सफल हो गया। इधर बूढ़े माँ-बाप टूटे-पुराने घर में और उधर वह आधुनिक सुख-सुविधा सम्पन्न घर में पत्नी और बच्चों के साथ रहने लगा। जैसे-तैसे करके पाँच-सात महीने बीते। तब तक केवल पत्नी ही शिकायत करती थी, "मैं पूरे दिन घर में बन्द रहती हूँ। बाहर निकलने पर हर कोई भूखी नजरों से घूरता है। पता नहीं, सुबह और शाम कैसे हो जाती है? न खेत, न खलिहान और न नदी, न तालाब कुछ भी नहीं देखा है मैंने कभी। बस भीड़, शोर-शराबा और लड़ाई-झगड़े के अलावा।"
तभी अचानक कुछ दिनों से शहर में चारों ओर धुआँ ही धुआँ रहने लगा और लोग श्वास-त्वचा आदि रोगों से सम्बन्धित बीमारियों से जुझने लगे।
इसी बीच एक दिन रमेश ने अखबार में पढ़ा था। इसी शहर के नामचीन वर्मा जी ने पाँच मंजिला मकान और कारखाना सब ठेके पर देकर उसी के गाँव में शहर से दस गुना कीमत पर सुनसान जंगल के पास जमीन खरीदकर छोटा-सा घर बना लिया और रहने भी लग गये थे। हर कोई दाँतों तले उंगली दबाये था कि कौड़ी की जमीन लाखों में क्यों ली?
तभी रमेश के बेटे ने पास आकर कहा, "पापा, गाड़ी में पेट्रोल, मोबाइल में बैलेंस और ए.सी. भी चेंज करवाना है। सो जल्दी रूपये दीजिए।"
रमेश का मुँह खुला का खुला रह गया था। पता नहीं क्यों? वर्मा जी के फैसले से या बेटे के सवालों से।
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परिचय 
रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट
जन्म दिनांक- 10-07-1989
गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया
तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)
पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)
कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली
प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में
शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)

ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.in

3 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय,
    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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