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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 243 // दर्शना बांठिया

प्रविष्टि क्रमांक - 243


दर्शना बांठिया

सूरज....

"काका,आप भी फालतू में गांव से ये दालें,सब्जी ले आते हो , यहां शहर में मॉल है , वहां सब आर्गेनिक सामान मिलता है" रिमी ने चॉकलेट का छिलका सोफे के पीछे फेंकते हुए कहा।

"अरी,गुड़िया अ..अग..अगनेक में वो स्वाद कहा होगा जो मेरे खेत की देसी सब्जियों में है" सूरज ने फेंका हुआ चॉकलेट का छिलका कचरें के ढ़ेर में उठाते हुए कहा।

"काका, आप अंग्रेजी बोलना सीख लो थोड़ा, घर में सब पढ़े लिखे है, मेरे पापा अफसर,और छोटे चाचा इंजीनियर है, बस आप ही अनपढ़ रह गए, न पढ़-लिखकर अपना भविष्य अंधकारमय कर

लिया "रिमी ने चिढ़ते हुए कहा।

"खबरदार ,रिमी जो मेरे सूरज को कुछ कहा तो ये तो वो सूरज  है ,जिसकी रोशनी से  हमारे घर का अंधकार दूर हो गया"रिमी की दादी ने कहा।

"मां..छोड़ो..ना..ये बच्ची है इसको नहीं पता" सूरज ने टोकते हुए कहा।

"बच्ची नहीं है ये...18 साल की  है,इसे पता नहीं की किससे क्या बोलना है,और ये तेरे पापा और छोटे चाचा अफसर बने है ना ,वो सूरज काका की वजह से बने है । तेरे दादाजी का व्यापार ठप हो गया था ,तेरी पिता को पढ़ाई छोड़नी पड़े ऐसे हालात हो गए,ये तेरे सूरज काका ने दिन- रात मेहनत कर ,खेतों में कामकाज कर ,अपनी पढ़ाई छोड़ कर सबको पढ़ाया है,जिस तरह सूरज  नि:स्वार्थ भाव से रोशनी सारे संसार में फैलाता है, मेरे सूरज ने भी अपनी मेहनत के तेज से घर को रोशन कर दिया"मां ने भरे गले से कहा।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आदरणीय महोदय, आप हमारे मार्गदर्शक हैं, अनुभवी हैं, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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