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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 252 // रिटायर्ड दंपति की मीठी नोक झोंक // चन्द्रिका व्यास

प्रविष्टि क्रमांक -


चन्द्रिका व्यास

रिटायर्ड दंपति की मीठी नोक झोंक
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ज्योति के पैर में काफी दर्द हो रहा था! किंतु, फिर भी इतनी गर्मी में उसे बैंक जाना पडा! जल्दी में थी अत: छाछ का टोपिया पति को फ्रिज में रखने को कह गई थी  !

पति दीप भी पछत्तर पार कर चुके हैं! बुढ़ापे में आने वाली तमाम तकलीफों से ग्रस्त! छाछ का टोपिया फ्रिज में रखना भूल गये ! इस बात को लेकर दोनों ने आपसी नाराजगी दिखाई!

बैंक जाने से पहले दोनों ने नाश्ता किया था!आते ही दोपहर के खाने में उसी छाछ की कढ़ी बनाई !

दीप चटकारे ले लेकर कढ़ी खा रहे थे! कढ़ी अच्छी बनी है! उनका वह निर्मल और निर्दोष मन देखकर ज्योति सब भूल गई!

ज्योति के पैर में दर्द से दीप को असहनीय पीडा हो रही थी! "आखिर जीवन संगिनी जो है "! गरम पानी की थैली से पैर सेंकते हुए कहते हैं बाम लगा दूं?

ज्योति यह सब देख सोचती है की मैंने दीप के पसंद की कढ़ी बनाई वह भी कैसे! वह हंसने लगी ! ज्योति को हंसता देख दीप भी हंस पडे!

नि:स्वार्थ भाव के साथ दोनों सारी गल्तियों को गले लगाते हुए हंसते हैं और कहते हैं यह हमारा कसूर नहीं है! हमारे बुढ़ापे का है जो हमें निकम्मा बनाने पर तुला है ! दिन पर दिन हम पर हावी होता जा रहा है! बुढ़ापे को हमने बहुत ही प्रेम से अपनाया किंतु यह बुढ़ापा अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आता! आये दिन कोई ना कोई फसाने खड़ा कर देता है! गर हम अपनी जवानी को बाल काले कर याद करने की चेष्टा करते हैं तो वह कुछ ही दिनों में मुंह उठाये वापस आ जाता है!

हमने उसे अपनाया किंतु वह हमारी जवानी को अपना न सका!
बुढ़ापा हमसे सब छीन रहा है! हमारा शरीर निष्क्रिय हो रहा है! हमारी सभी इच्छायें भावनायें संवेदनायें धूमिल कर रहा है किंतु फिर भी उसे मान सम्मान और इज्जत सब चाहिये!

दीप ज्योति से कहते हैं देखो यह बुढ़ापा अपना ताज हमारे सिर पर रख कैसा इतरा रहा है! मेरा बस चले तो इस बुढ़ापे की तो............

ज्योति ने दीप से कहा! अब तो यह बुढ़ापा जोंक बनकर हमारे शरीर से लिपट गया है! जब तक शरीर रुपी चक्की में टांके हैं हमारी छाती में मूंग दलते रहेगा!

यह सुन दीप खिलखिलाकर हंसने लगे! ज्योति भी हंस पडी!

आखिर उन्होंने बुढ़ापे को हावी जो होने न दिया वर्ना यह "बुढ़ापा तो द्वन्द ही करा देता"

चन्द्रिका व्यास
खारघर नवीमुंबई

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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