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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 253 // मामेरा // विजय सिंह चौहान

प्रविष्टि क्रमांक - 253

विजय सिंह चौहान

// मामेरा //

बड़ी बहन के घर बिटिया के विवाह का समाचार सुनते ही ननिहाल तक खुशियां फूले नहीं समा रही थी । वही मदन मामा जी के माथे पर सिलवटों की संख्या बढ़ने लगी।

मामा जी,  मामेरे के खर्च का आकलन कर चिंतित थे। बड़ी बहन का बड़ा कुटुंब है, बड़े लोग, ब्रांडेड कपड़े पहनते है, एक-आधा जेवर भी देना होगा, नहीं तो पूरे समाज के सामने नाक कट जाएगी।

प्राइवेट नौकरी में होने से तथा परिवार की जिम्मेदारी निभाते निभाते मामा जी ने चप्पल कब बदली थी, उन्हें यह भी याद नहीं । ऐसे में असमय, अवांछित खर्च ...बाप रे...बाप , तभी बड़ी बहन का फोन खनखनाता है ...मदन भैया के दिल की धड़कन , राजधानी एक्सप्रेस की तरह से धड़कने लगी । सांसें अभी थमी भी नहीं थी, की बड़ी बहन ने कहा भैया कल, मैं आपके यहां पीले चावल रखने आ रही हूं । शादी में आपको सब देखना है । बातों ही बातों में,  बहन ने राहत की बूंदे बिखेरते हुए कहा,.... भैया आप चिंता मत करना मैं मामेरा प्रथा/ परंपरा में विश्वास नहीं रखती इसलिए मैंने पत्रिका में जाहिर किया कि मामेरा प्रथा बंद है । कृपा कर, आप लोक दिखावे के लिए भी ना तो कुटुंब पैरावनी और ना गहने लाना .....हां भैया, आना जरूर ,आप की लाडली के लिए लेकर ढेर सारा आशीर्वाद लेकर।

मदन भैया देखते ही देखते कर्ज की चिंता से मुक्त होने लगे और लौट आई खुशियां विवाह की •••••।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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