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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 269 // भोर // अनघा जोगलेकर

प्रविष्टि क्रमांक - 269


अनघा जोगलेकर

.....भोर.....

मैं दिशाहीन-सा चलता जा रहा था जैसे कुछ दिख ही न रहा हो। तभी मेरा सर किसी ऊँचे पत्थर से टकराया। मैं उसी पत्थर को पकड़ते हुए आगे बढ़ने लगा। वह कोई सुरंग थी। अंदर थोड़ा धुंआ-सा था। पास में लकडियाँ जल रही थीं।

मैं आगे बढ़ा ही था कि उस धुँए में से एक 'आकृति' उभरी। उसके चेहरे पर नकाब था और दोनों हाथों में हथियार! वह मेरी ओर बढ़ी तो मैं पीछे हटने लगा। यकायक मेरी पीठ किसी सख्त चीज से टकराई। मेरे लिए अब और पीछे हटना नामुमकिन था।

वह आकृति ठहाका मारकर हँस पड़ी। हथियार मेरे हाथ में थमाते हुए बोली, "ले, पकड़ इसे। और हाँ... पैसे तेरे खाते में जमा हो जाएँगे।"

"ल...लेकिन तुमने तो कहा था कि म...मुझे सरहद पार जाकर सिर्फ अफवाहें फैलानी...फिर ये हथियार किस...लिए?"

ये सुनते ही उसने मुझे जोर का तमाचा जड़ते हुए कहा, "भूल गया! तेरा ईमान अब मेरे कब्ज़े में है। जैसा मैं कहूँ तुझे वैसा ही करना होगा।"

यकायक पीछे की सख्त दीवार पर हजारों कीलें उग आई। मेरी पीठ छलनी होने लगी। उससे बहता गर्म लहू अन्य जगहों से आते खून में मिलने लगा। तभी बहुत करीब से किसी के रोने की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा तो मेरा बेटा मेरी ही रक्त सनी लाश पर सर पटककर रो रहा था।

         "अरे! यह तो...!" मैं हैरान रह गया। मैंने घबराहट में वहाँ से भागने की कोशिश की लेकिन नीचे पड़े खून में फिसलकर गिर पड़ा। मुझे 'गिरा हुआ' देखकर मेरा बेटा, मेरे पास आकर खड़ा हो गया। अचानक उसकी आँखें और आवाज़ मुझे अम्मी-सी लगने लगीं जैसे कह रही हों, "बेटा, अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। लौट आ।"        

मैं नींद से हड़बड़ाकर उठ बैठा। पसीने से तरबतर हो इधर-उधर देखा। बेटा पास ही सो रहा था। गुसलखाने से अम्मी के गुनगुनाने की आवाज़ आ रही थी। दूर से आती 'अज़ान' हवाओं में गूँज रही थी। मेरी नज़र कैलेंडर पर पड़ी। आज का ही दिन तो मुकर्रर हुआ था 'उस ओर' जाने के लिए।

      "इतनी देर हो गई! किसी ने मुझे जगाया क्यों नहीं?" मैंने चीखते हुए पूछा।

"नहीं बेटा, अभी ज्यादा देर नहीं हुई है।" गुसलखाने से आती अम्मी की आवाज़ 'अज़ान' में घुल गई। मैं चौंक पड़ा।

      "ओह! ख्वाब में भी तो अम्मी ने यही कहा था! तो इसका मतलब वह हथियार, वह लाश...सब सच हो सकता है !"

अब डर मेरी नस-नस में समाने लगा। ज़ुबान साथ छोड़ने लगी। मैं बस इतना ही कह पाया, "अ... अम्मी... आज हो सके तो... बैंक में मैनेजर साहब से मिलकर म...मेरा खाता कुछ दिनों के लिए ब...बन्द करवा देना।"

       अब चौंकने की बारी अम्मी की थी, "अरे! लेकिन क्यों? और ये तू हकला क्यों रहा है?" अम्मी अपनी कुर्ती से हाथ पोंछती हुईं गुसलखाने से बाहर आईं। मुझे चप्पल पहनते देख बोलीं, "अरे सुन! रुक तो। यूँ उठते ही...?"

अम्मी कुछ और पूछती उसके पहले ही मेरे पैर पुलिस थाने की ओर मुड़ चुके थे।

©अनघा जोगलेकर

2 टिप्पणियाँ

  1. आंतकवाद की ओर बढ़ते कदम और उसके अंजाम को सहज ही रचना एक स्वप्न के जरिये प्रभावी तरीके से दिखाने का प्रयास करती है। रचना में माँ का पात्र भी बहुत ही बढ़िया ढंग से रचा गया है और दो वाक्यों के इस अंश में बहुत सुंदर प्रभाव पैदा हुआ है। हार्दिक बधाई अनघा जी को इस बढ़िया प्रस्तुति के लिये। 💐

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  2. शानदार सृजन। भटकते कदम को रास्ते पर लाने का प्रयास।

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