लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 270 // भगवान रूठकर चले गए // सुधा शर्मा

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प्रविष्टि क्रमांक - 270 सुधा शर्मा भगवान रूठकर चले गए अचानक ही मेरा पूणे जाने का प्रोग्राम बन गया। बेटे बहू की, और मुख्य रूप से पोते की याद...

प्रविष्टि क्रमांक - 270

सुधा शर्मा

भगवान रूठकर चले गए

अचानक ही मेरा पूणे जाने का प्रोग्राम बन गया। बेटे बहू की, और मुख्य रूप से पोते की याद लगातार दिल को चाट - चाटकर खोखला कर रही थी। तो अवश्य ही पूणे जाना मेरे लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। वैसे मुझे किसी आवश्यक कार्य से किसी से मिलना भी था।

उस समय पूणे गणेश चतुर्थी के पर्व के रंग में रंगा हुआ था। वहाँ जाकर ही पता चला कि घरों में डेढ दिन या पाँच दिन के लिए गणेश घर में मेहमान के रूप में लाए जाते हैं। पँडालों में और मंदिर में ग्यारह दिन के लिए गणेश विराजते है । तत्पश्चात उनका विसर्जन किसी भी नदी या दरिया के पवित्र जल में कर दिया जाता है। मुझे दो दिन के लिए अपने किसी जानने वाले के घर में ठहरना था।

उस घर में भी बडे जोर शोर से घर में गणपति को लाने की तैयारियाँ चल रही थी । आफिस से दो दिन की छुट्टी लेकर पति- पत्नी घर की साफ- सफाई में लगे थे। वैसे सफाई, बर्तन और खाना बनाने के लिए घर में मेड लगी हुई थी।

ट्रेन दो घंटे लेट थी। जैसे ही घर की ओर चले रास्ते में दुकानों पर गणेश ही गणेश नजर आ रहे थे। कहीं कहीं ट्रकों से सैंकडों मूर्तियां उतारी जा रही थी।

घर पहुँचते ही गृहस्वामी गणेश प्रतिमा लाने की तैयारी में थे अत: वो मेरे स्वागत की औपचारिकता भी ठीक से नहीं निभा पाए। हम उनकी मजबूरी ठीक से समझ रहे थे क्योंकि सुबह सात बजे पंडित जी से अपोइंटमेंट था ,जो केवल पन्द्रह मिनट के लिए गणेश प्रतिमा में प्राण- प्रतिष्ठा करने के लिए उपलब्ध है। मेरे मन में यहाँ भी शंका हो रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि भगवान को ज्यादा पावरफुल कहूँ या पंडितजी को ?एक प्राणी को पैदा करने में भगवान को नौ माह का समय लगता है। लेकिन पंडितजी तो मात्र पन्द्रह मिनट में मिट्टी या पत्थर की प्रतिमा में प्राण डाल देते हैं। साढे सात बजे उन्हें दूसरी सोसाइटी में जाना है। वैसे भी उनका गयारह दिन तक बहुत बिजि शेड्यूल है, और आज के दिन तो कुछ ज्यादा ही। क्योंकि आज के दिन लगभग सभी के घर भगवान आने वाले है। और पंडित जी को सभी में प्राण प्रतिष्ठा करनी है। खाना भी बाहर रेस्टोरेंट से मँगाया गया।

एक दिन के लिए एक कमरा भगवान के लिए समर्पित किया गया था। अत: उसमें जूते- चप्पल ले जाना सख्त मना था। डेढ वर्ष के शिशु के कमरे में प्रवेश को रोकने के लिए कमरे के दरवाजे पर बडी सी अटैची लगा दी गई थी। अगले दिन बडी सुबह घर की साफ- सफाई शुरू हो गई थी । पोंछा भी गृहस्वामिनी स्वयं लगा रही थी। दिल को थोडी सी खुशी हुई कि चलो भगवान ने घर में आने से पहले ही घर की अति मॅाडर्न बहु को सदबुद्धि का प्रसाद देना प्रारम्भ कर दिया। अन्यथा फ्लाइट छूटने का भय जिसे जल्दी उठने किए बाध्य नहीं कर सकता, पति के आफिस जाने का समय उसके उठने का कारण नहीं बन सकता। आज वह उठकर स्वयं पोंछा लगा रही है। देखकर दिल गदगद हो रहा था। ठीक सात बजे पंडित जी के चरण धूलि से घर पावन हो गया। जल्दी-जल्दी उच्चरित आधे- अधूरे श्लोको से प्राण प्रतिष्ठा की विधि सम्पन्न हो गई। अब उनके भोजन की व्यवस्था करनी थी। चावल की मेवाओ से युक्त खीर, पूडी पकवान यानी अनेक प्रकार के सुगंधित व्यंजन बनाए गए।

शाम को अनेक मिलने वाली स्त्रियाँ भगवान के दर्शन करने और उनसे मिलने आईं। भगवान को भोग लगाने के बाद सभी को वो खाना खिलाया गया। मेरे लिए यह कौतूहल का विषय था कि सास - ससुर को उस खाने का स्वाद भी नहीं चखाया गया। अगले दिन फिर भगवान के लिए भोजन बनना था। वैसे भी दोपहर का भोजन कराकर चार बजे तक उन्हें विदा करना आवश्यक था। मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछ भी लिया "केवल दो दिन के लिए भगवान को बुलाते हो, ग्यारह दिन के लिए क्यों नहीं?" बहू का बेबाक उत्तर था "आंटी ! इतने नियम धरम का पालन, इतनी साफ- सफाई एक या दो दिन निभ सकती है इससे ज्यादा नहीं। शाम के भोजन के रूप में बेसन के लड्डू बनने निर्धारित हुए। बस चार लड्डू बनाने का प्रयास रहा। लड्डुओं को काँच के एक पात्र में खुला रख दिया गया। न जाने कहाँ से चींटी मकोडे व चूहे बिन बुलाए मेहमान बनकर आतिथ्य स्वीकार करने आ गए थे। शायद इंसान व जानवर में यही फर्क होता है। सास-ससुर बहु द्वारा न कहे जाने के कारण घर में बने छप्पन भोगों के स्वाद से अनजान थे, स्वाभिमान के कारण केवल सुगंध से ही संतुष्ट हो रहे थे। और कीट-पतंगे जमकर दावत उडा रहे थे।

अब विसर्जन का समय आ गया था। अत: अन्तिम आरती होनी थी। सबका नहाना- धोना पुन: प्रारम्भ हुआ। व्यवहार स्पष्ट संकेत दे रहा था कि बहु के लिए सास का आरती में शामिल होना कोई महत्त्व नहीं रखता । वो तो पुत्र ही माँ के सम्मान की रक्षा स्वरूप उन्हें आरती में सम्मिलित करने को बाध्य कर रहा था।

सबके द्वारा आरती करने के पश्चात माँ के हाथों में थाली गई। न जाने क्या हुआ दीपक थाल से लुढ़क गया। घी चारों ओर बिखर गया और बाती भी बूझकर धराशाई हो गई। माँ तो भौचक्की रह गई ।उसका खून सूख गया,मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। हाँ बहु ने रो- रोकर घर सिर पर उठा दिया था। वह रो- रोकर बयान दे रही थी। बीच- बीच में सास- ससुर को भी कोस रही थी "सात साल से भगवान को घर बुलाने की कोशिश कर रही हूँ। बडी मुश्किल से भगवान आने को राजी हुए। अब की बार भी भगवान रूठकर जा रहें हैं । हमारे घर में पैसे की तंगी चल रही है, बीमारी में सारा पैसा जा रहा है,हमारे पास इतने पैसे नहीं कि हम बडा घर ले सके। टू बी एच के घर में काम चला रहे हैं। बेटे के दोस्त उसे रोज चिढाते हैं -"तू अपने पापा की पुरानी गाडी में स्कूल आता है। अपने पापा से कह मेरे पापा की तरह नई चमचमाती गाडी लें। इतनी श्रद्धा से मन्नत माँगी थी कि हम सबकी मनोकामना पूर्ण हो जाए। अब भी अपशकुन हो गया। मेरी तो किस्मत ही खराब है। पता नहीं अब भगवान सुनेंगे या नहीं। मेरे घर से गणपति रूठकर जा रहें हैं।"

इस प्रलाप से उसके सास- ससुर बुत बनकर बैठे थे । आखिर में सभी किंकर्तव्यविमूढ की स्थिति में थे। बहू को चुप कराने का रास्ता किसी को भी नहीं सूझ रहा था। बहुत सोच विचार के बाद निश्चित किया गया कि पंडितजी को वास्तविक स्थिति से अवगत कराकर उपाय पूछा जाए। पंडित जी ने जो उपाय बताया वह मेरी अति सूक्ष्म बुद्धि से परे था। उपाय था" शहर के गणपति के सबसे मंदिर में जाकर ग्यारह सौ या ग्यारह हजार रुपये चढा आओ। सब ठीक हो जाएगा। प्रायश्चित का केवल यही एक मार्ग है।"

मेरे मन की स्थिति बडी विचित्र थी। क्रोध था लोगों के आडम्बर और अँध विश्वास पर । भगवान के सही रूप को जानने की न चाह है न कोशिश। उसका नाम लालच से लेते है,श्रद्धा से नहीं। स्वयं रिश्वत लेते और देते हैं । भगवान से भी पैसे के बल पर काम कराना चाहते हैं। मेरा भगवान तो कण-कण में व्याप्त है शहर के किसी विशेष या बडे मन्दिर में नहीं। मेरा ईश्वर तो श्रद्धा का भूखा है पैसे से उसका लेना- देना ही नहीं। मेरा भगवान तो हर पल, हर क्षण मेरे पास है केवल एक या दो दिन के लिए मेरे पास नहीं आता। मेरा भगवान तो माता- पिता की सेवा से, दीन- दुखियों के प्रति करूणा दिखाने से, भूले- भटके को राह दिखाने से, ही खुश हो जाता है छप्पन प्रकार के भोजन की इच्छा नहीं रखता। पता नहीं कैसा है इनका भगवान जो माता- पिता को छप्पन भोग का स्वाद न चखाने वाले के भोजन को ग्रहण कर लेता है । पूरी दुनिया को सुख- सम्पदा देने वाला भक्तों के ग्यारह सौ रूपये के लिए भटकता रहता है। मुझे मेरा भगवान प्यारा है, नहीं चाहिए मुझे इनका भगवान, जिसे खुश करने के लिए मुझे येन केन प्रकारेण धन कमाना पडे। नहीं चाहिए मुझे ऐसा भगवान, जो मेरी जरा सी गलती पर मेरे से रूठकर मुझे छोड़कर चला जाए । मुझे तो मेरा वो ही भगवान चाहिए जो हमेशा मेरा पथ- प्रदर्शक बनकर मेरे साथ खडा रहे। पूरे वर्ष में केवल दो दिन भगवान के साथ से मैं संतुष्ट नहीं हो सकती।

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रचनाकार: लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 270 // भगवान रूठकर चले गए // सुधा शर्मा
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 270 // भगवान रूठकर चले गए // सुधा शर्मा
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रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/01/2019-270.html
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