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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 273 // आज भी ईमान ज़िंदा है ! // आनंद कौर पुरोहित

प्रविष्टि क्रमांक - 273


“आज भी ईमान ज़िंदा है !” [सत्य लघु-कथा]

लेखिका श्रीमती आनंद कौर पुरोहित [सेवानिवृत वरिष्ठ अध्यापिका]

पांच रोज़ पहले की बात है, दोपहर के वक़्त मैं जूनी मंडी पोस्ट-ऑफिस पास-बुक में रुपये जमा कराने गयी..तब लंच होने वाला था ! वहां कार्य कर रहे लिपिक की टेबल पर, ढेरों पास-बुकें रखी थी ! उस लिपिक को पास-बुक देकर, मैंने कहा “देख बेटा, पास-बुक में रुपये २०००=०० रखे हैं ! जांच कर ले, जब भी तुझे वक़्त मिले तब जमा कर देना..मगर याद रखना, आज़ रुपये जमा करने की अंतिम तिथि है !” फिर क्या ? उसने झट रुपये देखकर उसे गिने और फिर वापस उन रुपयों को डायरी में रखकर मुझे सौ रुपये लौटा दिए ! फिर बोला “माताजी, आप शाम को आते वक़्त डायरी ले जाना !”

मैंने सोचा, शाम को दूध लाने रोज़ जूनी मंडी जाती हूँ...तब यह डायरी भी, लेती आऊँगी ! मगर मैं शाम को वहां जा न सकी, कारण यह था..मेरा बड़ा पुत्र राजकमल दूध ले आया...और मैं इस डायरी की बात, बिल्कुल ही भूल गयी ! रात को राजकमल ने डायरी के बारे में याद दिलाते हुए, मुझसे पूछ ही लिया “अम्माजी, रुपये जमा करवा दिए होंगे, आपने ? लाइए डायरी, उसे यथा-स्थान रख देता हूँ ! ताकि, उसे ढूँढने में परेशानी न आये !” अब मुझे याद आया कि, ‘पास-बुक तो, अभी-तक लाई नहीं..डाकखाने से लानी है..!’ तब, मैंने उसे कह डाला “बेटा, रुपये तो जमा करवा दिए, मगर पोस्ट-ऑफिस से डायरी वापस लाना भूल गयी ! कल सुबह, लेती आऊंगी ! तू, फ़िक्र मत कर !” फिर क्या दूसरे दिन सुबह दस बजते ही मैं पोस्ट-ऑफिस पहुँची, वहां वही लिपिक बैठा था ! मैंने उसका चेहरा देखा, उसके ज़ब्हा [ललाट] पर फ़िक्र की रेखाएं साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी ! मुझे देखते ही उसने पूछ लिया, “माताजी, आपने कितने रुपये जमा करवाए, और कितने रुपये मैंने आपको वापस लौटाए ?” मैं मुस्कराकर बोली “बेटा, इतना जल्दी भूल जाते हो ? कल तो तुम, मेरी बहू को भी भूल जाओगे ! ले सुन, तूझे २००० हज़ार रुपये के नोट दिये, और तूने मुझे वापस सौ रुपये लौटाए..कुछ याद आया ?”

उसके चेहरे पर फ़िक्र की रेखाएं बनी रही, वह बेमन से पास-बुक लौटाता हुआ कह बैठा “मेरी तो क़िस्मत ही ख़राब है !” पास-बुक लेकर मैंने जमा के इन्द्राज देखे, और डायरी में रखे रुपयों को देखकर मुझे अचरज हुआ कि ‘यह बेवकूफ़, पास-बुक से रुपये निकालना ही भूल गया ?’ झट उसे २००० हज़ार रुपये के नोट देकर, कह दिया मैंने “अरे उल्लू के पट्ठे, तू डायरी से रुपये निकालना कैसे भूल गया ? अब मुझे भरोसा हो गया बेटा, तू तो भुल्लकड़ निकला..ज़रूर तू मेरी बहू को भूल जाएगा..अब कल ही तेरे ससुर को कह दूंगी....!”

रुपये लेकर उसका चेहरा कमल की भांति खिल उठा, वह गद-गद होकर बोला “माताजी, क्या कहूं आपको ? आप जैसी ईमानदार महिला के दीदार पाकर, मैं गद-गद हो गया ! कल शाम को रोकड़-पुस्तिका लिखने बैठा था तब १९०० रुपये कम पड़ रहे थे...अगर आप मुझे ये रुपये नहीं लौटाती तो, मुझे यह राशि भुगतनी पड़ती !”

इतना कहकर, वह मेरे चरण स्पर्श कर बैठा ! और अवरुद्ध गले से, रुन्धती आवाज़ में बोल उठा आज़ भी ईमान ज़िंदा है !

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2 टिप्पणियाँ

  1. "आज़ भी इमां जिन्दा है" नमक लघु कथा सत्य घटना पर आधारित है । इस कहानी को पढ़कर पाठक गण "ईमानदारी"के महत्व को समझेंगे और यह सीख भी लेंगे कि मेहनत की कमाई की ही बरक़त होती है ।

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  2. अति सुंदर और यह एक अर्थपूर्ण और प्रेरणादायक कहानी है साधुवाद

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