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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 279 // तुम ज़िन्दगी हो // विजय कुमार नामदेव (विजय बेशर्म)

प्रविष्टि क्रमांक - 279

विजय कुमार नामदेव (विजय बेशर्म)

तुम ज़िन्दगी हो

मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर सिर कंधे पर रखकर "अब हमें एक दूसरे को भूल जाना चाहिए।" उसने कितने सहज भाव से कह दिया।

मैं एकटक उसे देखता रहा। क्या यह वही अभिलाषा है जो दुनिया से बेखबर सिर्फ मेरे बारे में सोचती थी।

"क्या सोच रहे हो सच कह रहे हो, बेटी बड़ी हो रही है। हम खुद को कब तक इसकी नज़रों से बचाए रखेंगे और इस पर भी बुरा असर.........."

मैं अभी भी एकटक देखता रहा। "देखो तुम्हारा क्या तुम पुरुष हो, मुझे तो सब कुछ सहना पड़ता है और फिर प्रेम तो अनंत है, इसे प्रदर्शित किया जाना जरूरी नहीं। मैं नहीं चाहती कि हमारी बेटी को हमारे रिश्ते की भनक लगे और वो मुझे......"

एक पल में सबकुछ छिनता सा प्रतीत हुआ। "और फिर लोग भी तो तुम्हारा नाम लेकर मुझे......."

मैं कुछ कह पाता इससे पहले प्रिया बेटी मम्मी को पुकारती हुई कमरे में आई तो अभिलाषा हाथ छोड़ कर दूर हुई।

'अरे अंकल आप कब आए...?' प्रिया के शब्द जैसे मैंने सुने भी नहीं।

"अब मुझे चलना चाहिए" अभिलाषा- "चाय नहीं पियोगे बेटी के हाथ की"

प्रिया चाय बनाने लगी तो अभिलाषा फिर से बोली 'प्लीज बुरा मत मानना तुम मेरी जिंदगी हो........."

मैं अतीत में खोता-सा चला गया......

आज अचानक अपने घर पर मुझे देखकर अभिलाषा अचंभित-सी रह गई "अरे आप"

जैसे अपनी आंखों पर विश्वास ना हो। फोन पर बातें करते हुए उसने कई बार मुझे घर आने का न्योता दे डाला पर हर बार समयाभाव का बहाना रहा।

अभिलाषा से मेरी मुलाकात किसी प्रशिक्षण के दौरान हुई उन दिनों अपने मित्रों की भीड़ मेरे आस-पास सहज-स्वाभाविक थी।

मैं उसका नाम ही जान पाया इस से ज्यादा कुछ नहीं।

एक दिन अचानक ट्रेन में मुलाकात हुई तो औपचारिकतावश अभिलाषा ने कहा "आप समय निकालकर घर आएं"

मैंने शिकायत करते हुए कहा "मोबाइल नंबर के सिर्फ दिखाने के लिए लिया था"

"अरे माफ करना ठीक है शाम को लगाती हूं" उसने एक बात में शिकायत दूर की।

विदा हुए तो सच में शाम को ही उसका फोन आ गया

कहां हो?

मंदिर

मंदिर.....?

हां शाम को मैं इतने समय मंदिर आता हूं प्रतिदिन।

मुझे इंप्रेस करने के लिए तो नहीं कह रहे हो

नहीं सच में जब घर पर होता हूं तो यही मेरी दिनचर्या में शामिल है

"बुरा लगा हो तो माफ करना लड़के अक्सर लड़कियों को इंप्रेस करने के लिए ऐसे ही झूठ बोलते हैं"

"बोलते होंगे"

"क्यों आप अलग हो सबसे"

"मुझे क्या पता"

"और क्या चल रहा है"

"कुछ नहीं"

यूं ही फिर कुछ देर बात करके उसने खाना बनाने और कल बात करने का कह कर फोन रखा।

कुछ देर को सोचता रहा घर आया खाना खाकर सो गया। अगले दिन मैंने दोपहर में फोन किया।

फिर तो बातें करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया और शायद आदत भी मैसेज, और ढेर सारी बातें।

फिर एक दिन "आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया...."

मैंने तो आपसे अपने मन की बात कही है यह थोड़ी कह रहा हूं कि आप भी मुझसे...."

मैंने सफाई दी।

मैं कुछ और कहता इससे पहले अभिलाषा ने मोबाइल बंद कर लिया दिन गुजर गया रात 10:00 बजे के आसपास मैसेज मिला-"ठीक है"

जैसे दुनिया बदल गई फिर ढेर सारी बातें, वायदे, समझौते फिर तो जैसे पर ही लग गए हमें।

"याद रखना धोखा मत देना सुना है लोग विश्वास में दगा करते हैं" कुछ बातें और दावों के साथ मैंने कहा "जिस दिन तुम्हें ऐसा लगे मेरी वजह से तुम्हारा जीवन असहज हो गया है बता देना मैं खुद को तुमसे दूर कर लूंगा प्रेम का दूसरा नाम ही समर्पण है"

तीन वर्ष कैसे बीत गए तब से पता ही नहीं और आज ही पल में सब कुछ छिनता-सा प्रतीत हो रहा था।

"चाय" प्रिया ने जैसे मुझे अतीत से बाहर निकाला है। चाय पीते हुए अभिलाषा की ओर देखने लगा "तुम मेरी जिंदगी हो"

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विजय कुमार नामदेव (विजय बेशर्म)

प्रतिभा कॉलोनी आज़ाद वार्ड

गाडरवारा जिला नरसिंहपुर मप्र

पिन कोड 487551

7 टिप्पणियाँ

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