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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 346 // स्त्री आज // कस्तूरीलाल तागरा

प्रविष्टि क्रमांक - 346


स्त्री आज
                               -- कस्तूरीलाल तागरा

                       उसके अंदर कुछ ऐसा था जिसे वह अभिव्यक्त करने को व्यग्र रहती । कभी कपडे पर बेल-बूटे रचती । कभी सहेलियों के हाथों पर मेहन्दी से अपनी सृजनशीलता का थोड़ा-सा संसार निर्मित कर लेती । लेकिन रहती फिर भी वह बुझी बुझी-सी ही ।
            अपनी कुलबुलाहट को रास्ता देने के लिए वह कभी लॉन की घास में घंटों पानी डालती । कभी खुरपी से गमलों में लगे पौधों की गुड़ाई में अपने को व्यस्त कर लेती ।
         एक दिन बेध्याने में उसकी खुरपी से एक पौधे की जड़ कट गई । उसके मुंह से कुछ वैसे ही 'ओह' निकला, जैसे क्रोंच पक्षी के जोड़े में से एक को शिकारी द्वारा तीर मारने पर महर्षि बाल्मीकि के मुंह से युगों पहले " मा निषाद ...." निकला होगा ।
             उसकी वह रात बहुत बेचैनी में कटी । भोर में उसके उसी आवेग ने उससे एक कविता क़ाग़ज़ पर उतरवा ली ।
          और उसके बाद तो साहित्य-नदी ऐसी बही कि सुदूर समुद्र तक पहुँची । उसकी लिखी कविता-कहानियां बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में छपने लगीं । संपादक साक्षात्कार लेने लगे । समीक्षकों का ध्यान उस पर केंद्रित हो गया ।
            अपने पंखों के इस फैलाव को जब वह देखती तो ख़ुशी से फूला न समाती ।
           लेकिन उसके जोड़ीदार को यह पसंद नहीं आया कि वह उड़े । उससे ऊँची डाल पर बैठी मिले ।
              अब उसके पास दो विकल्प थे । वह  ऊँची उड़ानें भर ले या अपनी टूटती गृहस्थी को बचा ले । उसने दूसरा विकल्प चुना और
अपने जोड़ीदार द्वारा बनाये गए पिंजरे के अंदर चुपचाप बैठ गई ।
           लेकिन उस पौधे की कटी हुई जड़ अब भी उसके सपने में आ कर उसे जगा देती है । वह जग कर भी सोये रहने का नाटक तो कर लेती है परंतु अपनी बेचैनी को संभाल नहीं पाती ।  दरअस्ल , वह स्वयं भी नहीं जानती कि कब उसके अंदर की खदबदाहट उसके हाथ में फिर से क़लम पकड़ा दे । 
              आखिर एक दिन बांध टूट ही गया । उसके पंखों ने फिर से परवाज़ भरनी शुरू कर दी ।
            उसके जोड़ीदार का पुरुष-अहम् तिलमिला उठा । उसे लगा , उसके वर्चस्व को चुनौती दी जा रही है । उसने सदियों पुराना अस्त्र अपनी पत्नी पर चला दिया --" निकल जाओ मेरे घर से ..."
               इस बार वह न तो घबराई , न ही कोई याचना की । सीधे चल दी अपनी राह । और जुट गई अपनी कलम की  धार को और तेज करने में ।
           अनन्तः प्रसिद्धि और समृद्धि ने उसके चरण चूमे । लेकिन आज भी वह आक्रोश से भरी हुई है । अक्सर सोचती है –" जिसको मैंने तन-मन सौंपा ,  दुःख में भी साथ निभाया , वह क्यों मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ ? ... मुझे घर से निकाल दिया ... क्या वह घर मेरा नहीं था ? "
          और फिर एक दिन वह हुआ जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी । जब वह लिखने में व्यस्त थी , उसके दरवाजे पर उसका जोड़ीदार आ खड़ा हुआ और पूछा  -- " क्या मैं अंदर आ सकता हूँ  ? "
                वह हतप्रभ रह गई ।
         उसने पल भर को कुछ सोचा और फिर उठ कर दरवाजा बंद कर दिया ।
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