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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 347 // बोझ उतर गया // परिमल प्रज्ञा

प्रविष्टि क्रमांक - 347


परिमल प्रज्ञा

बोझ उतर गया

वह कई दिनों से सोच रही थी कि ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाती काँच की अलमारी में सजी मूल्यवान क्रोकरी पर जमी धूल की सतह वह पुन:साफ करे। वह इस विषय में सोचती, फिर इस काम को टाल देती।

कौन देखता है इन सब को? कभी कभार आने वाले दोस्त भी अब दर्शन नहीं देते। सालों बीत गये हैं इन्हें प्रयोग में लाये। प्रति माह इन्हें निकाल कर साफ करना और वापिस अलमारी में सजा देना मात्र ही इनकी उपादेयता रह गई है। इस जीवन का क्या भरोसा? न जाने अमरीष की तरह, मुझे भी ईश्वर बिना किसी अग्रिम चेतावनी के कब अपने पास बुला ले। दोनों वयस्क बच्चे अपनी अपनी फैमिली के साथ इतने सुदूर शहरों में बस गये हैं कि पोते पोतियों को देखने को भी मन तरस जाता है। भगवान सदा सुखी रखे उन्हें। जुग जुग जिये मेरे लाल।

इस तरह अंबिका वह डूब जाती मधुर यादों के समुद्र में। अपने जीवन साथी के साथ व्यतीत किये उन दिनों की रौनकी शामों में, जब कभी विषेश अवसर पर शैम्पेन,शरबती वाइन अथवा अन्य कोई पेय के निमित्त इन गिलासों को अलमारी से बाहर निकाला जाता और बड़े गर्व से प्रयोग में लाया जाता। एक मधुर विडियो मन को विभोर कर देता। सुनहरी यादों से सजे सपने आँखों के सन्मुख पैंगे भरने लगते। समय तिरोहित हो जाता, न जाने कहाँ।

मीठी यादों में अंबिका का मन डूब गया। घंटों के लिये। पर सहसा वह मधुर सपना टूट गया। स्वर्गीय पति की स्मृति से नयन गीले हो गये। अश्रु आँखों समा नहीं पा रहे थे। सूनी, सहमी, उदास शाम, एकांत के सन्नाटे को असहनीय बना रही थी। डबडबाये नेत्रों व शिथिल शरीर को समेटे, पग, अंबिका को शयन कक्ष में घसीट लाये। बिना खाये पिये वह आँख मूँद कर लेट गई। नींद की गोद में राहत पाने को।

यकायक आधी रात अंबिका की नींद टूट गई। शाम की याद ह्रदय में कौंध गई। जैसे भगवान सहायक बन सुझाव भेज रहा हो। मन ने फरमाया, क्यों न तुम घर की उन सब वस्तुओं को अपने जीते जी बाँट दो, जिन्हें तुम यदाकदा भी प्रयोग में नहीं लाती।

मैंने सोचा, गराज सेल? सब ही तो करते हैं, यहाँ कैनाडा में। पर मैं? ३५ साल हो गये यहाँ रहते, अभी तक तो कभी की नहीं, अब इस बुढ़ापे में, और वह भी अकेले। न बाबा ना। यह मेरे बूते का कतई नहीं। और आज के ज़माने में यह सेफ भी नहीं। क्यों न चुपचाप अपने ड्राइवे के किनारे,जहाँ गारबेज पिक- अप के लिये सामान रखती हूँ, हर रोज़ दस बारह क्रिस्टल रख कर देखूँ। कोई न कोई तो अवश्य ले जायेगा इन्हें। इतने मँहगे व सुन्दर हैं यह। कोई तो होगा पारखी और ज़रूरत मंद। शनै: शनै: यह विचार अंबिका-मन को रचबच गया। और उसने कुछ ही घंटों में इसे कार्यान्वित करने की ठान ली।

सुबह सबेरे जल्दी उठ कर अंबिका ने एक दर्ज़न गिलासों का चयन किया, और शाम ढलते ही अपने ड्राइवे के दाहिने किनारे पर उन्हें सलीके से सजा दिया, इस नोटिस के साथ “फील फ्री टु टेक”।

दूसरे दिन सुबह घर के दूसरी मंजिल की खिड़की से, ऊषा की पहली किरन के साथ, जब अंबिका ने बाहर झाँक कर देखा तो वहाँ कुछ भी शेष न था।

यह सोच, न जाने कितने लोग दिवंगत अंबरीष की आत्मा को दुआ दे रहे होंगे, अंबिका का मन हलका हो गया,

जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।

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परिमल प्रज्ञा,

ब्रैम्टन औन्टारिओ,

कैनडा

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