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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 349 व 350// सुनीता पवार

प्रविष्टि क्रमांक - 349

सुनीता पवार

सुरसरि

गंगा किनारे खड़ी सुरसरि आज बहुत हतोत्साहित है, ह्रदय में पीड़ा भरी है, जीवन के संघर्षों का सामना करने की हिम्मत नहीं बची है उसमें। घर के बड़े-बूढों, पति और बच्चों के प्रति अपना कर्तव्य बड़ी निष्ठा से निभाती है पर हर बार ही उसके मन को दुखा दिया जाता है।

मायके से संदेशा आया है, पिताजी का अस्थमा बहुत बढ़ गया है, मधुमेह भी नियंत्रण से बाहर है और जाने कौन घड़ी उनकी अंतिम घड़ी हो। सुरसरि पिताजी को देखना चाहती है उनकी आँखें बंद होने से पहले, उनके हाथों की गर्म उँगलियों को छूना चाहती है जिनको पकड़ उसने चलना सीखा, उनके हिलते होठों को पढ़ना चाहती है इससे पहले की वो सदा के लिये खामोश हो जायें। सुरसरि अपने पति के साथ दिल्ली जाना चाहती है परन्तु अत्यधिक व्यस्तता के चलते, सुरसरि को अकेले ही जाने को कह दिया। सास-ससुर ने बच्चों को सम्भालने से इंकार कर दिया है। सुरसरि आज तक अकेले केवल गंगा घाट तक ही गई है, ऋषिकेश से दिल्ली उसके बस के बात नहीं है।

ऐसी नाज़ुक घड़ी में भी कोई उसके साथ कोई नहीं है, मानसिक पीड़ा ने उसके सोचने-समझने की शक्ति को हर लिया है, आज वो गंगा में सदा के लिए समा जाना चाहती है।

बहती गंगा को एकटक देख रही है सुरसरि, बहते पानी में उसको फूल, पत्ते, लकड़ी, माटी के दीये दिखाई दे रहे हैं, लोग अपने प्रियजनों की अस्थियाँ बहा रहे हैं। उसको प्रतीत हो रहा है की अच्छा-बुरा सबको अपनी गोद में लिये, बिना विचलित हुये गंगा माँ कितनी सहजता से बह रही है। बरसात के मौसम में गंगा के पास कोई फटकता भी नहीं, उस समय माँ अपने उफान पर होती है, शायद माँ उन दिनों अपने तन और मन को शुद्ध करती हैं, सारी गंदगी को कहीं दूर उड़ेल देती हैं और शांत होकर फिर बहने लगती हैं। उसे लग रहा है की गंगा माँ कह रही है "मेरी गोद में आकर एक डुबकी तो लगा लेना परन्तु अपने अस्तित्व को नष्ट न करना, संघर्षों से न डर पुत्री, समय एक जैसा नहीं रहता"।

"ओ सुरसरि ! डुबकी लगा ली क्या?" पीछे से आई आवाज़ ने उसकी तन्द्रा भंग की। पति को सामने देख पहले तो डर गई मानो उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो, फिर हल्के से मुस्कुराते हुए बोली "जानते हो...गंगा को सुरसरि भी कहते हैं"।

"अच्छा..दो दिन की छुट्टी ली है, जल्दी से तैयार हो जाओ दिल्ली चलना है" पतिदेव के मुंह से ये सुनते ही वो गंगा की ओर तेज़ी से मुड़ी, एक डुबकी ली और चल पड़ी जिन्दगी के साथ, बहती गंगा की तरह।

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प्रविष्टि क्रमांक - 350

सुनीता पवार

मृत्यु का झपट्टा

सुबह सैर करते समय सुधा के साथ ऐसी घटना घटी जिसने उसकी नींदें उड़ा दी। सैर करती सुधा के सिर पर अचानक ही किसी ने जोरदार झपट्टा मारा, मुंह से चीख निकल गयी, वो घुटने टेक कर नीचे बैठ गई। वहां मौजूद लोगों ने सम्भाला, जैसे ही वो बेंच पर बैठी, दो अधेड़ उम्र महिलाएं पास आकर बोलीं "हे भगवान..कौये ने झपट्टा मारा है, जब किसी की मृत्यु निकट होती है तब कौआ ऐसा करता है"।

हालांकि उनकी बातों का सुधा पर कोई असर न हुआ परन्तु अचानक हुये इस हमले की पीड़ा वो अभी तक अपने सिर और बालों में महसूस कर रही थी। चाय का प्याला लिये वो रमन (उसके पति) के बगल में बैठ गई और सारी घटना कह सुनाई। "दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और ये लोग अभी भी ऐसे अन्धविश्वास में फंसे हैं" रमन जोर से हँस दिये।

पिछले दिन की घटना भुलाकर कर नियमानुसार सुधा आज भी सैर करने निकल पड़ी परन्तु जैसे ही वो पार्क पहुंची तो कौये ने फिर से झपट्टा मारा, बुरी तरह घबराई सुधा, तेज़ रफ्तार कदमों से घर आ पहुंची। "कहीं सच में ही मेरी मृत्यु निकट तो नहीं" जैसे ही सुधा ने कहा तो रमन ने पत्नी का मानसिक तनाव दूर करने के लिए कहा "ये सब अन्धविश्वास है, चलो नेटवर्क पर देखते हैं"। दोनों नेटवर्क पर कौये के झपट्टा मारने का कारण खोजने लगे, वहां अनेकों बातें पढने को मिलीं और साथ ही मृत्यु वाला कथन भी।

घर में एक अजीब सा मातम फ़ैल गया, रमन ने सुधा को घर से बाहर न जाने की सलाह दी, सुधा को तेज़ बुखार भी आ गया था, बेचैन रमन दफ्तर भी न जा पाया। धीरे-धीरे ये बात अन्य परिजनों तक भी पहुँच गई, सबने कई तरह के उपाय सुझाये, किसी ने कहा की कौआ अशुभ संदेशा लाया है इसलिए सुधा के घरवालों को उसकी मौत की झूठी खबर दो और जब वो सच मानकर दुखी हो जायें तो असली सच बता दो पर सुधा ऐसा करने के लिए राज़ी न हुई।

जब ये खबर घर की बूढी अम्मा के कानों तक पहुंची तो वो आगबबूला हो उठीं "पढ़े-लिखे गंवार हैं सब, वहाँ कौये का बच्चों भरा घोंसला होगा, उनकी रक्षा करने के लिये झपट्टा मारा क्यूंकि सुधा सैर करते समय उस पेड़ के नीचे से गुजरती है"। जब पेड़ का मुआयना किया गया तो अम्माजी की बात सच निकली।

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सुनीता पवार

नई दिल्ली

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