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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 351 व 352 // मृणाल आशुतोष

प्रविष्टि क्रमांक - 351

मृणाल आशुतोष

पोंगा-पण्डित

घण्टी बजी। मोहन ने दरवाजा खोला तो सामने लंगोटिया यार सुभाष था। इससे पहले कि उसे बैठने को कहता, उसने आरोप जड़ दिया,"कल तुम्हें कई बार फोन किया पर तुमने उठाया ही नहीं!"

"अरे भाई! कल मूड ऑफ हो गया था!"

"पर हुआ क्या?"

"कुछ नहीं। कल गांधी जयंती थी। फेसबुक पर कुछ नीच लोग उनको गाली दे रहे थे।"

"तो?"

"तो! तो क्या! मैंने भी जमकर गरियाया साले को। बोला, 'एक बाप की औलाद है तो आकर मिल'। अपना पता भी दिया उन हरामखोरों को!"

"यार! यह तो तुमने ठीक नहीं किया। उनको नज़रअंदाज़ करना चाहिए था न!"

"अरे यार! जब से मैंने गांधी-दर्शन पर पीएचडी करनी शुरू की है! कोई गांधीजी के बारे में बोलता है तो मेरा खून खौल उठता है।"

कमरे में अब गांधीजी के तीनों बंदर के सिसकने की आवाज़ आ रही थी।

***

प्रविष्टि क्रमांक - 352

मृणाल आशुतोष

संवेदना

आज मंथली मीटिंग थी। विक्रांत ने ऑफिस पहुँचकर अभी सिस्टम लॉग इन किया ही था कि ऑफिस मेसेंजर पर बॉस का मैसेज चमका, "मीट मी बिफोर मीटिंग।" लॉग ऑफ कर वह बॉस के केबिन की ओर भागा।

"मे आई कम इन मैडम?"

"कम इन। सिट। तुम्हारे टीम में राजेश नाम का एक लड़का है न?"

"यस मैडम!"

"वह पाँच महीने से परफॉर्म नहीं कर रहा है और तुम उसको कॉन्टीन्यू कर रहे हो। जबकि हम अंडर परफ़ॉर्मर को तीन महीने में निकाल देते हैं न!"

"वो दरअसल..."

"क्या वो..."

"वह हार्ड वर्क कर रहा है। बस लीड कन्वर्ट नहीं हो रही। और उसकी मिसेज हाउसवाइफ है...और साथ ही प्रेग्नेंट भी !"

"ओह्ह!...ओके। तुम जाओ।"

विक्रांत के जाते ही उसकी आँखों से बहते आँसू बुदबुदा उठे, "विक्रांत, काश मेरी पुरानी कम्पनी का बॉस भी तुम्हारी तरह सोच पाता और प्रेगनेंसी पीरियड में मुझसे रिजाइन न लेता तो..... तो डिप्रेसन से मैं अपना बच्चा न खोती!"

इतना कहते हुए उसने राजेश की फाइल बन्द कर दी।

***

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