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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 355 // पापा जेब में पैसा क्यूं नहीं रखते? // मोती प्रसाद साहू

प्रविष्टि क्रमांक - 355

मोती प्रसाद साहू

पापा जेब में पैसा क्यूं नहीं रखते?

बीच चौराहे पर कुछ नवांकुर आइसक्रीम चाट रहे थे। कभी आपस में मुड़ मुड़ कर बतियाते और बीच -बीच में चिड़ियों की तरह चहकते। आइसक्रीम वाला रह रह कर साईकिल में बॅधा अपना भोंपू बजाता रहता ताकि अधिक से अधिक बच्चे घर से पैसे लेकर निकलें और आइसक्रीम की विक्री बढ़ जाय।

उसी बीच रामू नहर के किनारे रेहरी का सामान पीठ पर लाद कर बेचने जा रहा था। आज उसके साथ उसका छोटा लड़का भी अॅगुली पकड़कर चल रहा था। कभी कभार बाप के साथ जिद वश वह जाया करता ।

आइसक्रीम चाट रहे बच्चों को देखकर उसने भी पापा से आइसक्रीम के लिए जिद की। रामू भी क्या करता दो तीन दिन से उसकी दुकान पर बोहनी तक नहीं हुई थी। उसने धीरे से कहा अभी पैसे नहीं हैं , चुपकर!

बच्चे की उमर अभी इतनी नहीं थी की वह पिता की मजबूरी समझ पाता। पिता का उत्तर सुनकर लड़का तड़ाक् से बोल बैठा-

“पापा जेब में पैसा क्यों नहीं रखते?“

रामू भला दुबारा क्या उत्तर देता सबके सामने। वह चुपचाप किनारे से नजरें झुकाता हुआ निकलता रहा ।

किंतु उस नवांकुर के प्रश्न से हवाएं ठिठक -सी गयीं । बहुत देर तक वहॉ सन्नाटा -सा छाया रहा। चहकने वाले बच्चों की आइसक्रीमें उनके हाथ में ही गलने लग गयी थीं। आइसक्रीम वाले ने भी वहॉ भोंपू बजाना उचित नहीं समझा और चुपचाप साइकिल दूसरी गली में मोड़ दी।

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मोती प्रसाद साहू

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

एक कविता संग्रह 2013 में प्रकाशित

’हस्तक्षेप 2011 ’ का सह सम्पादक

दैनिक पत्रों में कहानियॉ प्रकाशित

सम्प्रति संस्कृत प्रवक्ता उत्तराखंड

ई0 मेल- motiprasadsahu@gmail.com

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