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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 356 // जहर का बीज // संदीप यादव

प्रविष्टि क्रमांक - 356

संदीप यादव

जहर का बीज

                  दस वर्ष के सुरेश को पिता बाँके बहुत-सी  जरूरी बातें सिखाया करते। मलाई बेचने वाले से तीन मलाई का गेंहू देकर चार मलाई लेना तो महुआ बीन कर  उसपर पान के छींटे से उसका वजन बढ़ाना। घर में अनाज की बारी यदि कटी हुई मिलती तो वो किसी कमजोर चूहे की करतूत है इसका भान बाँके सुरेश को करते। सुरेश भी चूहे से शत्रुता कर बैठा।

            एक दिन चूल्हे पर जूठन खाते बैठा वह चूहा सुरेश को दिखा। उसने मौके का फायदा उठाया और पूरी ताकत से चूल्हे पर लाठी चला दी। चूहे की पीठ पर चोट तो लगी साथ ही चूल्हा भी टूट गया। चूल्हे के टूटने पर सुरेश की माँ सारदा को गुस्सा तो आया पर चूहे को लगी चोट उसके मन को ठंडक दे गई। चूहा बेचारा किसी तरह खुद को घसीट रहा था,उसका मुंह खुला हुआ और आंखें बार-बार झपक रही थी।सुरेश पर जाने कैसा जुनून सवार था। बाँके यह दृश्य देख कहने लगा,"अरे बेटा देखता क्या है,तुझे तेरे दुश्मनों को ऐसे ही पीटना है चला लाठी। " बाँके के शब्दों का कुछ ऐसा असर हुआ की चूहे की लीद, आँखें, दांत बाहर आने तक दस बरस का सुरेश उसे पीटता रहा और पिता की वाह भी मिलती रही।

                समय बीतता गया बाँके अपने सभी बच्चों की परवरिश इसी विचारधारा से करता रहा। चार बेटे और चार बेटियाँ इसी बीज से जन्मे फल खाकर बड़े हुए। सुरेश के बाद जब छोटे भाई राम की पत्नी ब्याह कर आयी तब छोटी बहू का मान-सम्मान अधिक होने लगा। क्योंकि सुरेश की शादी को ६ बरस बीत गए थे पर घर में किलकारी गूंजी न थी। वहीं राम को जब पहला लड़का हुआ तब "मेरे घर एक और लाठी बढ़ गयी है" ऐसा कहकर बाँके ने गाँव भर मिठाईयां बंटवाई थी।

              एक दिन बाँके खेत की उपज का बँटवारा कर रहा था। सुरेश को बाँके ने "तुम्हारा खर्च कम है" यह कहकर कम गेंहू दिया। सुरेश की पत्नी दिन-रात खेत में काम करती फिर भी सुरेश ने कोई विरोध नहीं किया।खेत के काम से निबटने के बाद गोशाला का सारा काम सुरेश की पत्नी ही करती। वहीं राम के परिवार को सुबह शाम खाने को दूध मिलता जिससे सुरेश की पत्नी वंचित रह जाती।

                      सुरेश को इस बात की तकलीफ होने लगी। जेठ होने के नाते वह रसोईघर में न जाता वरना तीन के बदले चार मलाई लेने का हुनर उसमें बचपन से ही था। उधर बाँके को सुबह दूधवाली चाय,दोपहर को दही व शाम को साढ़ी वाली कटोरी मिलती। सुरेश निश्चित समझ चुका था कि उसकी बोरी कुतरने वाला चूहा बाँके ही था ।एक शाम जब बाँके भोजन कर रहा था तब पास पड़ी लाठी लेकर सुरेश जिह्वा से खट-खट करने लगा। विरोध जताया अपने उचित हक़ की बात की लेकिन बाँके तो बाँके उसने एक न सुनी। इतने में छोटी बहू बाँके के लिए साढ़ी वाली कटोरी लेकर आयी। सुरेश ने बचपन के चूहे को याद कर लाठी चला दी। अब सुरेश २८ बरस का जवान था। उस वक्त जैसे चूल्हा टूटा था इस बार बाँके का हाथ। सारदा को चूल्हे के बदले चूहे के मरने की खुशी इस बार न हुई। वह चीखी सुरेश लाठी लेकर फिर खड़ा हो गया,राम भी अपनी पत्नी को लेकर कमरे में चला गया। बाँके असहाय था,पर क्या इस बार भी वह कहेगा, "बेटा देखता क्या है चला लाठी तुझे तेरे दुश्मनों को इसी तरह पीटना है,चला लाठी...."

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