नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 357 व 358 // दीपक गिरकर

प्रविष्टि क्रमांक - 357


दीपक गिरकर

पापा कब आओगे?

हरियाणा में एक गाँव के शासकीय विद्यालय की कक्षा तीन के बच्चों को कक्षा अध्यापिका जो अन्य विषयों के अलावा हिन्दी भी पढ़ाती थी, कक्षा के बच्चों से कहा “सभी बच्चे अपनी-अपनी रफ़ कॉपी में 40 मिनट के अंदर अपने-अपने पिताजी को एक पत्र लिखो जिसमें उन्हें अपनी पढ़ाई की प्रगति से अवगत करो ।”

लांस नायक दीपसिंह, जिसकी ड्यूटी उत्तरी कश्मीर के उरी सेक्टर में थी, उसकी बेटी प्रिया ने पत्र लिखा-

आदरणीय पापा,

चरणस्पर्श.

मैं जब छोटी थी और आपसे फ़ोन पर बात होती थी तो आपको हमेशा एक ही बात बोलती थी "पापा आप कब आ रहे हो… आपकी बहुत याद आ रही है। मैं अब आपको कभी नहीं कहूँगी कि पापा आप कब आ रहे हो। मुझे मालूम हो गया है कि देश सेवा से बढ़कर कोई बड़ी सेवा नहीं होती। मुझे आपकी बेटी होने पर गर्व है. मुझे क्या, आप पर तो पूरे देश को नाज़ है। पापा, मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है। मैं खूब पढ़ाई कर रही हूँ। मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूँगी और आपके समान ही देश सेवा करूँगी। पापा, आप छुट्टी लेकर तब ही आना जब हमारा पूरा कश्मीर आंतकियों से मुक्त हो जाएँ। पापा, आप जब कभी भी छुट्टी लेकर घर आओ तो मेरे लिए खिलौने मत लाना। यहाँ दादाजी, मम्मी, चाची, रिंकू भैया, संदीप भैया सभी लोग ठीक है। आप यहाँ की चिंता मत करना। अब मैं बड़ी हो गई हूँ।

आपकी लाड़ली बिटिया,

प्रिया

प्रिया ने पत्र लिखकर मुस्कराते हुए अपनी कॉपी अध्यापिका को दी। अध्यापिका ने प्रिया द्वारा लिखे गये पत्र को पढ़ा और अध्यापिका की आँखों से झर-झर आंसू गिरने लगे। अध्यापिका ने प्रिया की ओर देखा प्रिया अभी भी मुस्करा रही थी।

---

प्रविष्टि क्रमांक - 358


दीपक गिरकर

हरिया

आज के समाचार पत्र में हरिया द्वारा की गई आत्महत्या की खबर पढ़कर मन विचलित हो गया। हरिया और मैं गाँव में आठवीं कक्षा तक साथ ही पढ़े थे। गाँव में आठवीं तक ही स्कूल था। हरिया पढ़ने में अच्छा था। वह आठवीं में प्रथम श्रेणी में पास हुआ था उसके बाद उसने आगे की पढ़ाई छोड़ दी थी और अपने पिताजी के साथ खेतों में हाथ बंटाने लगा था और साथ में बड़े किसानों के यहां मजदूरी भी करने लगा था। आज से 15 साल पूर्व हरिया से मुलाक़ात हुई थी। 45 साल की उम्र में ही वह मुझे बहुत बूढ़ा लगा था।

जब से हरिया की आत्महत्या की खबर पढ़ी है तब से मेरी आँखों के सामने उसके साथ बिताए बचपन के दिन चलचित्र के समान चलने लग गए। आठवीं कक्षा तक आते हरिया काफी समझदार हो गया था। वह अक्सर कहता था "मैं तो मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का होरी हूँ। शायद मैं पिछले जन्म में होरी ही था। इसलिए तो इस जन्म में मेरा नाम हरिया है।“ उस समय मैं उसकी बातें मजाक में उड़ा देता था। आज मुझे समझ में आया है क़ि मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं, उनकी कहानियां, उपन्यास की तरह उनकी रचनाओं, कहानियों, उपन्यासों के पात्र, नायक भी कालजयी हैं और साथ ही उनकी आर्थिक दशा, उनकी समस्याएं भी कालजयी हैं।

मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसके बड़े बेटे मोहन से फोन पर बात की तो मालूम हुआ कि हरिया साहूकार के कर्ज से मानसिक रूप से परेशान था। साहूकार से कर्ज न हरिया ने लिया था, न ही हरिया के पिताजी ने और न ही हरिया के दादाजी ने। कर्ज लिया था हरिया के परदादा ने। हरिया ब्याज भी बड़ी मुश्किल से चुका पाता था मूलराशि तो दूर की बात है। हरिया को तो यह मालूम था कि मृत्यु के पश्चात भी साहूकार से लिया हुआ कर्ज माफ़ नहीं होता है। बाप का कर्ज बेटे को चुकाना ही पड़ता है फिर भी उसने आत्महत्या की! मुझे हरिया के बारे में मालूम था। वह गणित विषय में बहुत प्रवीण था। हिसाब-किताब में माहिर था। मुझे लगता है कि वह स्वयं को अपने परिवार के लिए बोझ समझने लगा होगा। उसने हिसाब लगाया होगा कि उसके नहीं रहने से उसके परिवार के खर्चे में कमी आ जायेगी। वह अपने आप को बूढ़े बैल के समान समझने लग गया होगा जो सिर्फ खाता ही है, दिन भर जुगाली करता है और किसी काम का नहीं होता है।

मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूँ कि हरिया की मृत्यु आत्महत्या है या किसी के द्वारा उसकी ह्त्या की गई है और यदि ह्त्या की गई है तो किसके द्वारा…

---


दीपक गिरकर

लघु कथाकार

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016


मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.