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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 377 व 378 // राहिला आसिफ़

प्रविष्टि क्रमांक - 377


राहिला आसिफ़

***भेड़ें***

"क्यों पांडेजी! कितनी मतगणना है इस गाँव की?

चुनाव से पहले उस गाँव में पहला फेरा डाल रहे नेताजी ने अपने निजी सहायक से गाँव के बारे में जानकारी चाही।

"सर! पांच हजार...!"

"बहुत है फिर तो!"

"कौन कास्ट ज्यादा है।"

"अपनी छोड़ के बाकी सब हैं। इसलिये हाथ में लेना जरूरी है।"

"पाँच हजार के लिये तो पक्की रणनीति तैयार करनी पड़ेगी...!"वह गंभीर हो गए।

" सर जी! लगभग पौने तीन को ही हाथ में ले लो... बाकी तो जनानियाँ हैं।"

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प्रविष्टि क्रमांक - 378

राहिला आसिफ़

***अहमियत***

"माँ ये लोग हम से इतनी नफरत क्यों करते हैं? क्या हमें इनकी तरह जीने का हक़ नहीं है? अगर हम इतने ही बुरे हैं; तो भगवान ने हमें पैदा ही क्यों किया?" ऐसे सैंकड़ों सवाल उसके मन में उथलपुथल मचाए हुए थे। उस भयानक हादसे ने उसके नन्हें मन- मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर डाला था। उसके कई दोस्त इस पुरानी दुश्मनी के चलते जहरीली गैस कांड की बलि चढ़ गए थे। भाग्य से वह बच गया था। अब उसकी माँ उसे उस हादसे से उभारने का भरसक प्रयास कर रही थी।

" नहीं बेटा...! इस पूरे ब्रह्मांड में बेमकसद कोई जीव पैदा ही नहीं हुआ। सब की अपनी अहमियत है। और पता है...,  हम तो बहुत महान काम के लिए पैदा हुए हैं। जिसे तू नफ़रत और दुश्मनी समझ रहा है दरअसल वह नफ़रत और दुश्मनी नहीं,बल्कि उनका डर है।"

"डर...!!! और हमसे?" माँ की बात सुनकर उसकी निस्तेज आँखें विस्मय से फैल गयीं।

"हाँ बेटा,यदि हम ना होते तो ये इंसान अपनी गंदी आदतों के चलते पूरी धरती को गटर माफ़िक बना देते। वह तो हमारे डर के मारे इन्हें साफ-सफ़ाई रखनी पड़ती है। हम हैं,तो इनका अस्तित्व बाक़ी है; वरना ये लोग कभी के खतरनाक बीमारियों से समाप्त हो चुके होते।"

"बीमार तो हम भी इनको देते हैं, उसका क्या...?"उसके अंदर एक और सवाल उपजा।

"तो इसके जिम्मेदार वे स्वयं है। हम तो इस धरती के सच्चे स्वच्छता प्रहरी हैं। जो हादसा तुझपर गुजरा वह सफाई अभियान के तहत ही तो था। तू बस इतना याद रख, कि हमारी जान हमारे काम की सफलता की कीमत है ।"

अब नन्हें मच्छर को अपनी अहमियत का आभास हो चला था। उसके चेहरे से रोष के बादलों को छटते देख माँ ने सुकून की सांस ली।

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राहिला आसिफ

पिछोर,जिला शिवपुरी(म.प्र.)473995

8 टिप्पणियाँ

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