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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक 22 “धोबी-पाट” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक 22 “धोबी-पाट”

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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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“क्या कहा? मान्यता निरीक्षण के आदेश ज़ारी हो गए हैं..? है भगवान, यह क्या हो गया? मिस्टर के.के ऐसा हो नहीं सकता।” एलिमेंटरी दफ़्तर की सामान्य शाखा के वरिष्ठ उपज़िला शिक्षा अधिकारी जनाब सोहन लाल सोनी, आश्चर्य-चकित होकर कृष्ण कुमार शर्मा से बोले। एक तो घड़ी में साढ़े दस बज गए, देरी हो रही थी दफ़्तर जाने की..ऊपर से रास्ते में इनकी मुलाक़ात कृष्ण कुमार शर्मा से हो गयी, जो टेम्पो-स्टेंड के नुक्कड़ पर खड़े-खड़े पान की गिलोरी चबा रहे थे। ये आली जनाब, इसी कमला नेहरू नगर हाउसिंग बोर्ड कोलोनी में आयी ‘कमल बाल विद्या मंदिर’ विद्यालय के व्यवस्थापक ठहरे।

“क्यों नहीं निकलेंगे, हुज़ूर? ज़रूर निकलेंगे, इसमें आपका क्या गया? हमारा भला हुआ है, यह जानकर आपको ख़ुश होना चाहिए ना..?” कृष्ण कुमार शर्मा, तपाक से बोल उठे।

अब तो सोहन लालजी को चिंता होने लगी कि, “जब सम्बंधित प्रभारी लिपिक ललित दवे ने कार्यालय नोट पर मेरी टिप्पणी ली नहीं, फिर कैसे निकल गए....ये मान्यता के आदेश? क्या ख़ुदा ने अपने इन प्राइवेट स्कूल के बन्दों पर रहम खाकर, कहीं आसमान से न पटक दिए हो...ये मान्यता के आदेश? अब तो ज़िला शिक्षा अधिकारी के पास जाकर, मुझे शिकायत करनी ही होगी..” सोचते-सोचते उनके दिल में कार्यालय सहायक घीसू लाल के प्रति, जलन और तेज़ हो गयी। वे मन ही मन, गाली की पर्ची निकाल बैठे “कुतिया के ताऊ, आज़ भी तुमने मेरी टिप्पणी के बिना मान्यता की पत्रावली बड़े साहब के पास रख दी?”

सोहन लाल सोचा करते थे ‘जब ख़ुद ज़िला शिक्षा अधिकारी ने, उनको सामान्य शाखा के प्रकोष्ठ अधिकारी का काम सौंपा है...और यह प्राइवेट स्कूलों की मान्यता का काम भी, सामान्य शाखा का है। फिर मेरी टिप्पणी के बिना, यह मान्यता की पत्रावली आगे कैसे चली? अगर यह फ़ाइल चली है तो, फिर इसे मैं अपनी बदक़िस्मती कहूं या अपना दुर्भाग्य...? जो यह कमबख़्त पत्रावली, रेस-कोर्स के घोड़े की तरह दौड़ने लगी..व भी मेरी हरी झंडी देखे बिना?’

विचारों की आंधी ने ऐसा ज़ोर मारा कि, सोहन लाल क्रोधित होकर बेचारे कृष्ण कुमार पर फट पड़े..कड़कती बिजली की तरह बोल उठे जनाब “भलाई-भलाई मत बोल, के.के.। भलाई गयी, तेल लेने। तूझे क्या पत्ता, दफ़्तर के भी कुछ नियम होते हैं?” मायूस होकर सोहन लाल चल दिए, टेम्पो-स्टेंड की तरफ़। क्या करते बेचारे सोहन लाल, आज़ तो घड़ी ने उनका साथ छोड़ दिया? सुबह के साढ़े दस बज गए, और श्रीमान अभी दफ़्तर के स्थान पर कमला नेहरू नगर हाउसिंग बोर्ड कोलोनी में कैसे खड़े रह गए? मन ही मन, वे लगे बड़बड़ाने “हाय राम। रहम कर, इस बन्दे पर और रोक दे घड़ी के काँटों को। अभी दफ़्तर में उपनिदेशक महोदय आने वाले हैं, और मैं अभी यहाँ इस कोलोनी में ही खड़ा हूँ?” इस तरह बड़बड़ाते हुए, वे टेम्पो में चढ़ गए। टेम्पो खचा-खच भरा था, पैसेंजरों से। तभी सोहन लाल को, एक मोटी औरत सीट पर बैठी नज़र आयी। उस अकेली ने, क़रीब तीन आदमियों के बैठने की जगह रोक रखी थी। सामने उस क़ब्ज़ा की गयी सीट पर, अपनी नज़र गड़ाये हुए डेड पसली के बेचारे सोहन लाल...कब-तक खड़े-खड़े यात्रा करते?

बदनसीबी देखो सोहन लाल की, बेचारे पर किसी ने रहम खाकर उन्हें सीट नहीं दी। किसी सज्जन ने अपने पास अपने बच्चे को बैठाकर आधी सीट अलग से रोक डाली, तो कोई सज्जन पालथी लगाकर डेड सीट रोककर आराम से बैठा था। आख़िर भोले इंसान ठहरे हमारे सोहन लाल, कब-तक बेचारे करते ऊब-छठ..वह भी बिना सावन आये? बरबस अपने मुंह से उगल दिए, अंगार “ओ टुनटुन सेठानीजी, अब आप तीन जनों का किराया चुका दो..कंडक्टर साहब को। हाय राम, किस चक्की का आटा खाती हैं आप..?”

“मैं खाती हूँ आटा, मेरे घर का। मेरा पति खिलाता है, और मैं खाती हूँ। मुझे यह बता तू, क्यों मुझसे जलता है...बळोकड़े कहीं के?” आँखें तरेरती हुई, वह मोटी औरत बोली “तू क्या कंडक्टर है? टिकट पूछ रहा है मुझसे, कमबख़्त?”

उस रणचंडी की हूंकार क्या हुई, बेचारे सोहन लाल थर-थर कांपने लगे? बेचारे सोहन लाल सभ्य आदमी होने के कारण, वे औरतों के आगे गालियों का वाक-अस्त्र चला नहीं सकते थे। तब, बेचारे इतना ही बोल पाए “चुप हो जाओ, मेरी मां इंदिरा गांधी..!” उनका, बोलना क्या हुआ? बस, बादल फट पड़े..वह औरत चीख़ती हुई, बोल उठी “कमबख़्त। मुझे इंदिरा गांघी कहता है, भट्टी की बावड़ी के मुर्गे? क्या मैं तूझे, विधवा नज़र आ रही हूँ?”

बिना बरसात ओले क्या, कर्कश शब्दों के गोले बरस पड़े..बस, फिर क्या? बेचारे सोहन लाल ने लाचार होकर, चुप्पी साध ली। मगर उनके दिल में यह चुभन ज़रूर महसूस हुई कि, आज़ सुबह उठते ही उन्होंने किसका मुंह देखा? घर से रवाना होते वक़्त इस कृष्ण कुमार से भिडंत और अब इस मोटी भैंस से..? अब आगे दफ़्तर में, किस-किस महानुभव से भिडंत होगी..? इसकी कल्पना करते, दिल के रोगी जनाब सोहन लाल सहम गए।

“पोंsss.. पोंssss..” की आवाज़ निकालता, टेम्पो का होर्न बजा। और फिर अक्समात, टेम्पो रुक गया...कोयला फाटक के पास। उसके रुकते ही, एक मदारी बंदरिया को साथ लिए चढ़ गया टेम्पो में। गाड़ी में कभी औरतें, चुपचाप बैठ नहीं सकती, तब यह बंदरिया कैसे शांत बैठ पाती? बंदरिया सभी पैसेंजरों पर नज़र डालती हुई, अपनी आँखें मटकाने लगी। कभी उस बंदरिया को और कभी उस मोटी औरत को, देखते सोहन लाल दोनों के बीच समानता ढूंढने लगे। सोहन लाल ने जैसे ही उस बंदरिया पर अपनी निग़ाह डाली, निग़ाह गिरते ही वह बंदरिया अशांत हो गयी। अब उससे, चुपचाप बैठा नहीं गया। वह तो झट सोहन लाल को देखकर, अपने दांत किटकिटाने लगी..? उसकी हरक़त देखते ही, सोहन लाल की बुरी हालत हो गयी। कभी तो उनको उस मोटी औरत का डर लगता, तो कभी उस बंदरिया के काटने का डर..बेचारे डर के मारे थर-थर कांपने लगे। तभी टेम्पो के सामने एक गाय आ गयी, और ड्राइवर ने जमकर ब्रेक मारा....उसे डर था, कहीं उसके हाथ यह गाय शहीद न हो जाए? और गाड़ी को लगा, ज़ोर का धक्का। इस धक्के के कारण, सोहन लाल के हाथ में थामी रोड छूट गयी, और वे फटाक से गिर पड़े बंदरिया के ऊपर। फिर क्या? उस बंदरिया के ऊपर सोहन लाल के गिर जाने से, वह बंदरिया डर गयी और झट उसने लगाई ज़ोर से छलांग और आकर बैठ गयी उस मोटी औरत की गोद में। अपने बच्चे के स्थान उस बंदरिया को गोद में पाकर, वह मोटी औरत डर के मारे सीट से कूदकर सामने वाली सीट पर जा पहुँची। सामने की सीट पर, उसका पहुंचना क्या..? उस सीट पर बैठे डोकरे के जान पर बन आयी..उसके ऊपर बैठकर, उसने तो उसका कचमूर निकाल डाला। इस तरह, उस मोटी औरत की सीट ख़ाली हो गयी। बस, फिर क्या? मौक़े का फ़ायदा उठा लिया, सोहन लाल ने। इस तरह सोहन लाल ने, सीट पर क़ब्ज़ा जमा लिया। फिर वे अपनी आदत से मज़बूर होकर ‘आक थू..आक थू’ करते हुए उन्होंने गाली की पर्ची निकाल डाली, और उस मोटी औरत के पुरखों की शान में आलीशान कसीदे पढ़ डाले। और फिर, कंडक्टर से कहने लगे “कंडक्टर भाई, तू किसी मिनिस्टर से कम नहीं। मिनिस्टर सही वक़्त पर काम नहीं करता..अगर वह सही वक़्त पर काम करना शुरू कर दे तो जनता यही समझेगी कि उसके पास कोई काम नहीं है, इसी तरह अगर तू सही वक़्त पर टेम्पो स्टार्ट कर दे तो जनता यही समझेगी कि तेरे पास सवारियों की कोई कमी नहीं है। इस कारण तू तो भाई, लेट ही स्टार्ट करेगा टेम्पो को। अब समझा, मेरी बात?”

कुछ देर बाद, टेम्पो बांगड़ अस्पताल के सामने रुका। फिर क्या? ड्राइवर ने गाड़ी का इंजन बंद करके, वहां सामने ढाबे पर चाय पीने चला गया। आदर्श नगर और अस्पताल की तरफ़ जाने वाली सवारियां कंडक्टर को किराया चुकाकर चली गयी, इस तरह टेम्पो की कई सीटें ख़ाली हो गयी। इन सीटों को भरने के लिए कंडक्टर बाहर खड़ा हो गया, फिर सवारियों को बुलाने के लिए आवाजें लगाने लगा। अब यह स्टॉप हमेशा वाला स्टॉप तो था नहीं, दस मिनट बीतेंगे तब कहीं जाकर सवारियों से गाड़ी खचाखच भर जायेगी...और तब ड्राइवर ढाबे से आकर, इस गाड़ी को स्टार्ट करेगा। इस स्थान पर इतनी देर रुके रहने के अंदेशे से, सोहन लाल घबराये। और, कह बैठे “यह तो रोज़ वाला स्टेंड नहीं, अब तो शामत आयी इन पांवों की..अब पैदल चलना होगा।” तभी, कंडक्टर बोल उठा “साहब हम तो मिनिस्टर हैं, मिनिस्टर की गाड़ी भीड़-भड़क्कों से दूर रहती है। अब श्रीमानजी आप अपने चरण-दास को संभालें, और फटा-फट गाड़ी से उतरकर शुरू कीजिये रोड-मास्टरी।”

फिर क्या? बेचारे सोहन लाल टेम्पो से नीचे उतरे, उनको नीचे उतरते देखकर उस कंडक्टर ने वाक-तरकश से व्यंग-बाण छोड़ दिया “वाह। क्या मारा, धोबी-पाट हमने भी..”

यह धोबी-पाट शब्द सोहन लाल ने कभी सुना नहीं, और न उन्होंने इस शब्द को देखा किसी अघातन कोष में। बार-बार उनका मानस इस शब्द का अर्थ जानने के लिए, उन्हें बाध्य करने लगा..आख़िर, इस शब्द का अर्थ क्या है? इस बारे में सोचते हुए, वे दफ़्तर की बिल्डिंग के पास जा पहुंचे। हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़कर, वे आ गए एलिमेंटरी के होल में। हवाई-बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ना, एक दिल के मरीज़ के लिए आसान नहीं। बेचारे सोहन लाल हांप गए, और उनका बदन पसीने से लथपथ हो गया। दरवाज़े में दाख़िल होने के बाद उनमें खड़े रहने की ताकत रही नहीं, फिर क्या? झट, अपनी सीट पर लुढ़क गए।

अभी-तक यह ‘धोबी-पाट’ शब्द उनके दिमाग़ पर छाया रहा, जिसे वे अपने दिमाग़ से बाहर निकाल नहीं पा रहे थे कि, इस शब्द का अर्थ क्या है? यह सोचते-सोचते, वे अपना सर ख़ुजाने लगे। उनको सर ख़ुजाते देखकर घीसू लाल को हंसी आने लगी, उन्होंने किसी तरह इस हंसी पर क़ाबू पाया और फिर ललित को आवाज़ लगाई “अरे ललित, तू काहे कुर्सी तोड़ता है बैठा-बैठा...तेरे पास न कोई है काम है, और न कोई काज..? ख़ाली बैठा-बैठा करता जा रहा है, मटरगश्ती..इसके सिवाय, तूझे कोई काम नज़र आता है?”

घीसू लाल के लबों पर व्यंग भरी मुस्कान देखकर, ललित उस मुस्कान का अर्थ इशारे-इशारे में समझ गया। फिर क्या? वह लगा, चहकने। बस, वह तपाक से बोल उठा “हेड साहब, आपको तो पत्ता ही है..मटरगश्ती करने का काम आज़कल अफ़सरों का माना जाता है। हमारे ऊपर तो हुज़ूर, इस मटरगश्ती की छायाँ भी पड़ती...नज़र नहीं आयी। देखिये हुज़ूर, यहाँ तो फाइलों के ढेर लग गए हैं..मगर, इन्हें हरी झंडी दिखलाने वाला कोई नहीं। बस साहब, हम तो धोबी-पाट मारते हैं..आगे, वे जाने।” इतना कहकर, ललित भी मुस्कराने लगा। इस तरह ललित के लबों पर छाई व्यंग भरी मुस्कान ने चला दी तलवार, सोहन लाल के दिल पर। एक बारगी उनके मन में आया कि, अब अफ़सरी छोड़कर चल दें कमठे की ठेकेदारी करने। और करें, क्या? किसी स्कूल में तबादला करवाने से रहे....क्योंकि, इच्छा-माफ़िक स्थान हाथ आने से रहा। सच्च पूछो तो राजनीति टाट के उस फटे पर्दे की तरह है, जिन पर इंसानियत के खून के धब्बे हो और उसके ऊपर महात्मा गांधी, महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी के चित्र टंगे हो।

सोहन लाल को विचारमग्न पाकर, ललित उठा...अलमारी खोली और चक्रांकित किये गए आदेश की प्रतियां बाहर निकाली। दफ़्तर के हर अवर उप ज़िलाशिक्षा अधिकारी को एक-एक प्रति देकर, वह सोहन लाल की तरफ़ मुड़ा।

“लीजिये...साहब।” मुस्कराकर ललित बोला “अब चालू हो जाइए, धोबी-पछाट के लिए।”

“काग़ज़ थमाना नहीं आता, जाओ रजिस्टर में चढ़ाकर लाओ।” सोहन लाल तमतमाते हुए बोले। उनका तमतमाने का कारण, ललित के लबों पर फ़ैली हुई मुस्कान थी...जिसने उनके दिल में खीज़ पैदा कर डाली। क्या करता, बेचारा ललित..उसको आती नहीं थी किसी को मक्खन के पहाड़ पर चढ़ाना? बस उनको खिन्न पाकर, वह तो वहां से चल पड़ा।

“आओ, आओ..घसीटा रामजी। आज़कल काहे आप, ईद का चाँद बनते जा रहे हैं? जनाब, तशरीफ़ रखिये।” अपने पास रखी कुर्सी को आगे खिसकाकर, सोहन लाल ने घसीटा राम से कहा..जो उनके पास से, गुज़र रहे थे।

सोहन लाल की एक बुरी आदत, जब कोई कार्यालय का कार्मिक उनसे मुलाक़ात करता तब जनाब को अपने सारे पेंडिंग काम याद आ जाते कि आगंतुक से कौनसा पेंडिंग काम करवाना बाकी है? उनकी इस आदत के वाकिफ़ थे, घसीटा राम..बस, बरबस उनके मुख से यह जुमला निकल पड़ा “माफ़ करना, हुज़ूर। अफ़सरों से दूरी भली..उस्ताद ने फ़रमाया है ‘अफ़सर मिट्टी का भूंडा’..अफसर के अगाडी और गधे के पीछे पिछाड़ी, नहीं रहना ही अक्लमंदी है हुज़ूर।” इतना कहकर उन्होंने सोहन लाल के पीछे जाकर खड़े होने का प्रयास कर डाला, तभी इससे अनजान सोहन लाल ने अपनी कुर्सी पीछे ले ली...बस, फिर क्या? उसके हत्थे से घसीटा राम टकरा गए, और जा गिरे बेचारे नारायण सिंह के ऊपर। जो सोहन लाल के बिल्कुल, पीछे ही बैठे थे। अब तो यह मुच्छड़ सींकिया पहलवान, दर्द के मारे चीख़ उठा “मार दिया, मेरी मां। इस प्रहार से तो, गधे की लात ही अच्छी। जो एक बार ही, खानी पड़ती है।” मुच्छड़ नारायण सिंह की चीत्कार सुनकर, होल में बैठे सभी लोग ज़ोर से हंसने लगे। और इधर हर शाखा में तांक-झाँक करने वाले रमेश को इतनी ज़ोर से हंसी आई, वह बेचारा पेट पकड़-पकड़कर हंसने लगा। हंसते-हंसते वह अपने-आपको संभाल नहीं पाया, उसके हाथ में थामा हुआ पानी से भरा ग्लास नीचे गिर पड़ा..जो ज़मीन पर लेटे मोहम्मद सफ़ी के ऊपर गिरकर उसे नहला दिया। कहाँ तो वह मोहम्मद शफ़ी जुम्मे-जुम्मे नहाने वाला, बेचारे को बिना जुम्मा आये ही उसे ज़बरदस्ती नहला दिया इस कमबख़्त रमेश ने..?

पानी गिरते ही वह कुम्भकरणी निंद्रा से जग गया, बेचारे को मालुम न रहा उसका पायजामा पानी गिरने से गीला हो गया। मगर जैसे ही गीले पायजामें पर उसकी निग़ाह गिरी, और वह समझ न पाया उसका पायजामा गीला कैसे हो गया? उसको ग़लत ख़्याल आया, कहीं उसे नींद में पेशाब आने की बीमारी तो न लग गयी? कारण एक यह भी रहा, वह बड़ा सेक्सी मिज़ाज़ का ठहरा..नाईट-फोल होने की उसे आम बीमारी थी। बस अब अपनी इज़्ज़त को सलामत रखने के लिए, वह दिल से ख़ुदा को याद करने लगा..बरबस उसके मुख से ये अल्फ़ाज़ निकल गए “या ख़ुदा। रहम कर इस तेरे बन्दे पर..मेरी इज़्ज़त को सलामत रहने दे, मेरे मौला।” अब बेचारा मोहम्मद शफ़ी, करता क्या? एक हाथ से गीले पायजामें का नाड़ा थामे जैसे ही बेचारा चार क़दम चला होगा, और उसके दुर्भाग्य से उसे सामने दीदार हो गए बाबू गरज़न सिंह के।

“साला इश्कबाज। आख़िर, पायजामा गीला कर दिया तूने..? साले, इस दफ़्तर को दिशा-मैदान समझ रखा है तूने?” बाबू गरज़न सिंह गरज़ते सिंह की तरह दहाड़ते हुए बोल उठे, और जमा दिया धोल उस बेचारे के कंधे पर। तभी पीछे से रमेश की आवाज़ उन्हें सुनायी दी, वह कह रहा था “अरे बाबू साहब, यह क्या कर डाला आपने हुज़ूर? अभी तो इसने अपना पायजामा गीला किया है, कहीं आपके धोल मारने से इसके पीछे की दुकान न खुल जाए?” हंसता हुआ, रमेश बोल उठा।

फिर वह अपनी हथेली पर मिराज़ ज़र्दा फैलाकर, उसे ले आया बाबू गरज़न सिंह के सामने..! आख़िर उसे, बाबू साहब को मक्खन के पहाड़ पर चढ़ाना जो था। फिर मुंह से थूक के फव्वारे छोड़ता हुआ, उनसे कहने लगा “हुज़ूर, अरोगिये और शान्ति से...”

“दूर...दूर। दूर हट, कब्रिस्तान के मुर्दे। पहले मुंह का नल बंद कर, बावली पूछ।” बाबू गरज़न सिंह ऐसे गरज़े कि, उसके बोले जा रहे शब्द मुंह से बाहर न निकल पाए। फिर क्या? जनाबे आली गरज़न सिंह ने झट मुर्गे की गरदनिया पकड़ने की स्टाइल से, उसकी गर्दन पकड़कर उसका मुंह दूसरी तरफ़ घुमा दिया। जैसे नेताजी भाषण देते-देते माइक का मुंह, घुमा दिया करते हैं।

चार दिन बीत गए, फिर कहीं जाकर दफ़्तर के कार्मिकों को वरिष्ठ उपजिला शिक्षा अधिकारी सोहन लाल सोनी के दीदार हुए। दफ़्तर में आये, सोहन लाल थके-मांदे नज़र आ रहे थे। चढ़ी हुई सांस की गति सामान्य होने के बाद, उन्होंने रमेश से पानी मंगवाया। फिर पानी से भरे ग्लास से अपने गले को तर किया, फिर ख़ाली ग्लास रमेश को थमाकर बगल में बैठे पुष्कर नारायण से बोले “भाई पुष्कर नारायणजी गुस्सा आता है मुझे, इस मुफ़तिये ललित पर। इस नालायक के कहने पर, उसकी बतायी प्राइवेट स्कूल में निरीक्षण करने का चला तो गया...मगर..”

घबराकर, पुष्कर नारायण बोले “मगर क्या..? सोहनजी कहीं..”

“हाँ गया था, अपनी टांगे तुड़वाने। कहता था नालायक, उस स्कूल में आपकी ख़ूब ख़ातिर होगी..मगर, नकटों ने पानी का भी नहीं पूछा मुझे। और...और...” हाम्पते-हाम्पते सोहन लाल बोले।

“आराम से, सोहनजी। पहले सांस ले लीजिये, फिर बताना आगे क्या हुआ?” पुष्कर नारायण बोले।

गहरी सांस लेकर, सोहन लाल आगे बोले “अरे क्या बताऊँ, पुष्कर नारायणजी आपको? ऊपर से इन उल्लू के पट्ठों ने, मुझे कहा ‘किसने बुलाया, आपको? हमारे पास कोई पत्र अया नहीं दफ़्तर से, और न हमने बुलाने के पीले चावल आपको भिजवाये?’ अच्छा हुआ, आप साथ नहीं चले जनाब..न तो आपकी भी इज़्ज़त...” हाम्पते हुए, सोहन लाल बोले।

“क्या बचकानी हरक़त करते हो, सोहनजी? जब बेचारा ललित आपको आदेश की प्रति दे रहा था, तब तो आपने ली नहीं। यह भी आप जानते नहीं, उस स्कूल में डाक पहुँचने में थोड़ा तो वक़्त लगेगा ही..यह भी हो सकता है, डाक देरी से रवाना हुई हो..?” इतना कहकर, पुष्कर नरायण टेबल पर रखे विपत्रों पर हस्ताक्षर करने में व्यस्त हो गए।

“ग़लती यहाँ ही हो गयी, हमसे। ना तो हम कर देते, उनकी छुट्टी।” सोहन लाल बोले “न तो सालों में कहाँ इतनी हिम्मत, जो हमें निरीक्षण करने का मना करे? आख़िर, हम भी तो शिक्षा विभाग के अधिकारी हैं।” इतना कहकर सोहन लाल ने अपने दोनों हाथ ऊपर ले जाकर, अंगड़ाई ली।

“क्यों दुखी होते हो, सोहनजी? एक बार और चले जाना टूर पर, और क्या? दो दफ़े टी.ए. बिल बना देना, बस बात तो इतनी सी है। आपको तो फ़ायदा ही हुआ है, जनाब।” इतना कहकर, पुष्कर नारायण ने घंटी बजायी।

नेमा राम आया, उसके साथ सारे विपत्र महेश के पास भेज दिए..जिन पर वे अपने हस्ताक्षर कर चुके थे। कुछ देर बाद, महेश उनके पास आया और कहने लगा “साहब, मुझे बाहर जाना है।”

“महेश, थोड़ी देर बाद आराम से चले जाना। मगर, पहले मेरी बात सुन ले..वक़्त पर भुगतान उठा लेना पारित विपत्रों का। कोई शिकायत मेरे पास आनी नहीं चाहिए, समझा या नहीं? अब सुन आगे, घर पर काम है..जा रहा हूँ मैं..पीछे से तू ध्यान रखना।” पुष्कर नारायण ने नाक भौं की कमानी को, नाक के ऊपर चढ़ाते हुए कहा।

“साहब पधारिये। मैं सब संभाल लूंगा, आप फ़िक्र न करें।” महेश बोला।

फिर क्या? पुष्कर नारायण शर्मा ने झट बैग उठाया, और दफ़्तर से रुख़्सत होने के लिए झट कुर्सी से उठ गए। उनको जाते देखकर, सोहन लाल बोले “क्या संभालेगा, महेश? नालायक पिछले पे-डे की तरह, रोकेगा सबको।”

जाते-जाते पुष्कर नारायण ने सुन लिया, वे तपाक से बोले “अरे यार सोहनजी, क्या बार-बार बच्चों से नाराज़ हो जाते हो? बस, आप तो इन बच्चों को हुक्म दीजिये..तपाक से आपके हुक्म की तामिल करेंगे..ये बच्चे लोग। फिर क्या? लगा देंगे, नोटों का धोबी-पाट।” इतना कहकर, पुष्कर नारायण मुस्करा उठे....फिर, सीढ़ियां उतरकर चले गए।

इस तरह बार-बार धोबी-पाट शब्द सुनकर, सोहन लाल उसका अर्थ ढूंढ न सके। आख़िर, सर थामकर बैठ गए..फिर ललित से कहने लगे “भाई हार गया, ललित। अब तू ही बता दे, धोबी-पाट का क्या बला है? क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा..?” सोहन लाल धारा-प्रवाह बोलते गए, मगर उन्हें क्या पत्ता..कि, ललित वहां है नहीं..? वह कमबख़्त तो उनकी आँखों के सामने ही, वहां से नौ दो ग्यारह हो चुका था..? तभी उन्हें सीढ़ियां उतरते, उसकी आवाज़ सुनायी दी, वह चहकता हुआ कह रहा था “इसी को धोबी-पाट कहते हैं।”

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पाठकों।

इस अंक को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि, आख़िर धोबी-पाट किसे कहते हैं। आप अपनी प्रतिक्रया से मुझे अवगत करें, मेरे ई मेल है dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com हैं। जिन पर आप अपने विचार भेज सकते हैं, मुझे आपके ख़त का इन्तिज़ार रहेगा।

अब आप पढेंगे, अंक २३ “अच्छा नागरिक”। यह अंक, आपको ज़रूर पसंद आएगा।

शुक्रिया।

दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक – पुस्तक “डोलर-हिंडा”]

निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].

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