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लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड छः

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भूली बिसरी लोक कथाएँ सीरीज़–24


किस्सये चार दरवेश

अमीर खुसरो – 1300–1325


अंग्रेजी अनुवाद -

डन्कन फोर्ब्ज़ – 1857


हिन्दी अनुवाद -

सुषमा गुप्ता

अक्टूबर 2019

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खंड 6


1 पहले दरवेश के कारनामे[1]

सो पहला दरवेश आराम से बैठ गया[2] और अपनी यात्रा का किस्सा सुनाने लगा —

ओ अल्लाह की प्यारी ज़रा हमारी तरफ भी तो देखो

और इस बेचारे की कहानी सुनो

ध्यान से सुनो कि हमारे ऊपर क्या गुजरी

अल्लाह ने हमें कैसे उठाया और फिर कैसे गिराया

मैं अपनी वे सब बदकिस्मतियाँ बताने जा रहा हूँ जो मैंने सही हैं

सब सुनो

ओ मेरे दोस्तों। मेरे जन्म की जगह और मेरे पुरखों का देश यमन[3] है। इस अभागे का पिता एक मलीकूत तुज्जर[4] था। उसका नाम ख्वाजा अहमद[5] था। उस समय उनके मुकाबले का कोई और सौदागर और बैंकर नहीं था।

उन्होंने अपनी फैक्टरियाँ कई शहरों में लगा रखी थीं और उनका सामान खरीदने बेचने के लिये उनके एजेन्ट्स भी चारों तरफ फैले पड़े थे। उनके खजाने में लाखों रुपये नकद थे और कई देशों का सामान था।

उनके दो बच्चे थे – एक तो मैं जो काफ़नी और सैली[6] पहनता था और जो आज आपके सामने बैठा है और आपसे यानी पवित्र गुरूओं से बात कर रहा है। और दूसरा बच्चा था एक बेटी। यानी मेरी बहिन।

मेरे पिता ने उसकी शादी अपने जीते जी दूसरे शहर के एक सौदागर से कर दी थी। वह अपने पति के साथ परिवार में ही रहती थी। एक पिता के लिये इससे ज़्यादा खुशी की बात क्या हो सकती थी कि वह अपने पिता का अकेला बेटा था और इतना अमीर था।

मेरी शिक्षा दीक्षा मेरे माता पिता दोनों की छाया में बड़े प्यार से हुई। मैं लिखना पढ़ना सीखने लगा। विज्ञान और सैनिक शिक्षा भी लेने लगा। इसके अलावा हिसाब किताब रखना और सौदागरी का काम भी सीखने लगा।

चौदह साल की उम्र तक मेरी ज़िन्दगी बड़े आराम और खुशी से निकली। मेरे दिल को किसी की चिन्ता ही नहीं थी। पर एक बार ऐसा हुआ कि एक साल के अन्दर अन्दर मेरे माता पिता दोनों अल्लाह को प्यारे हो गये।

इस दुख से मैं इतना दुखी हो गया कि मैं कुछ भी न कह सका। मैं तो एकदम से लावारिस हो गया था। मेरे परिवार में मेरी देखभाल करने वाला मेरा कोई बड़ा नहीं था।

इस अचानक धक्के को मैं सँभाल नहीं सका और दिन रात रोता रहता। मेरे माता पिता के मरने के 40वें[7] दिन उनके मरने के संस्कार करने के लिये मेरे रिश्तेदार और अजनबी सब इकठ्ठा हुए।

जब मरे हुए के लिये फातिहा[8] खत्म हो गया तो उन्होंने इस तीर्थयात्री के सिर पर उसके पिता की पगड़ी बाँध दी[9]

उन्होंने मुझे यह अच्छी तरह समझा दिया कि “इस दुनिया में सबके माता पिता मरते हैं और एक दिन तुम भी उनका रास्ता अपनाओगे। इसलिये दुखी मत हो बेटा धीरज रखो और अपनी घर गृहस्थी देखो भालो। अब तुम्हीं इस घर के मालिक हो। अपने सारे मामलों को ध्यान से देखो भालो – अपना नकद अपना सामान आदि। ”

इस तरह से आये हुए लोग प्यार से समझा कर चले गये। मेरे पिता की फैक्टरियों के सारे मजदूर एजैन्ट्स और दूसरे लोग मेरे इन्तजार में खड़े थे। उन सबने मुझे नजराना भेंट किया और कहा — “आप अपनी आँखों से इस सब सम्पत्ति को देख कर खुश हों।

जब मैंने अपनी इस अथाह सम्पत्ति को देखा तो मेरी आँखें फैल गयीं। मैं तो देखता का देखता रह गया।

तुरन्त ही मैंने एक दीवानखाना[10] बनाने का हुकुम दिया। उसके फर्शाें पर कालीन बिछवाये। दीवारों पर परदे लगवाये। दरवाजों पर चिकें[11] लगवायी गयीं। मैंने सुन्दर सुन्दर नौकर अपनी सेवा में रखे और उनको अपने खजाने से अच्छे मँहगे कपड़े पहनने को दिये।

जल्दी ही यह साधु अपने मरे हुए पिता की सीट पर बैठने की जगह मुफ्त के खाने वालों से झूठे लोगों से और झूठी प्रशंसा करने वालों से घिर गया। अब वे ही सब उसके दोस्त बन गये और वह हमेशा ही उनके साथ रहता।

वे मुझे बहुत सारी जगहों के बारे में नयी नयी बातें बता कर मेरा मन बहलाते। धीरे धीरे करके वे मेरे दिमाग में यह डालते रहते — “जवानी के इस समय में तुमको तो बहुत बढ़िया बढ़िया शराब पीनी चाहिये और सुन्दर सुन्दर लड़कियों के साथ आनन्द करना चाहिये। ”

थोड़े में कहो तो बुरा विद्वान आदमी भी तो आदमी ही होता है न। उनकी ये सब बातें लगतार सुनने से मेरे विचार बदल गये।

शराब पीना नाच देखना और खेल खेलना ही मेरे जीवन का उद्देश्य हो गया। आखिर यह मामला इतना बढ़ गया कि मैं अपनी सौदागर वाली जिम्मेदारियाँ भूल गया और इस जुआ खेलने की आदत में पड़ गया।

मेरे नौकरों और मेरे साथियों ने जब मेरी इस लापरवाही की आदत को देखा तो उन्होंने मुझसे बहुत सारी बातें छिपा लीं और फिर मेरा बहुत सारा पैसा इधर उधर कर दिया। मुझे यही नहीं पता चला कि मेरा पैसा कब कहाँ से आया और कब कहाँ गया।

जब पैसा आता था तो उसे बहुत ही लापरवाही से खर्च किया जाता था। उस समय अगर मेरे पास कारूँ[12] का खजाना भी होता तो वह भी इस खर्चे के लिये काफी नहीं होता।

इस रास्ते पर चलते हुए कुछ ही सालों में मेरी ऐसी हालत हो गयी कि मेरे सिर पर केवल एक टोपी रह गयी और एक फटा कपड़ा मेरी कमर और टाँगें ढकने के लिये रह गया। मेरे वे दोस्त जो मेरे साथ खाना खाते थे आनन्द करते थे मेरे एक चम्मच खून के लिये अपना खून देने के तैयार रहते थे सब गायब हो गये थे।

हालाँकि अगर मैं इत्तफाक से उनको सड़क पर भी मिल जाता तो भी वे शायद मुझसे आँखें चुरा लेते और अपना चेहरा मेरी तरफ से घुमा लेते।

इसके अलावा मेरे हर तरह के छोटे बड़े ऊँचे नीचे नौकर भी मुझको छोड़ कर चले गये। कोई भी मेरे साथ मेरी देखभाल के लिये नहीं रहा। यहाँ तक कि कोई यह कहने वाला भी नहीं रहा कि “अफसोस तुम आज किस हालत में पहुँच गये हो। ”

मेरे पास कोई साथी ऐसा नहीं रह गया था जिसके साथ में अपना दुख बाँट सकता या उससे अपना पछतावा कह सकता।

मेरे पास अब आधे फारदिंग[13] की कीमत के बराबर भी किसी अन्न का दाना नहीं रह गया था जिसको खा कर मैं पानी पी कर सन्तुष्ट हो जाता।

दो तीन बार मुझको सारा दिन बिना कुछ खाये भी रह जाना पड़ा पर इसके बाद मैं भूख नहीं सह सका। एक जरूरतमन्द की तरह से बेशरमी का परदा पहन कर मैंने अपनी बहिन के घर जाने का विचार किया।

पर यह शरम मेरे दिमाग पर छायी रही कि अपने पिता के मरने के बाद से मैंने उससे कोई रिश्ता नहीं रखा था। यहाँ तक कि कभी उसको एक लाइन भी नहीं लिखी थी। जबकि उसने मुझे अफसोस जाहिर करने के लिये 2–3 चिठ्ठियाँ भी लिखी थीं पर मैंने अपनी अमीरी के नशे में उनका उसे कोई जवाब नहीं दिया था। सो अब मैं उसके पास किस मुँह से जाऊँ।

इस शरम की वजह से मेरी उसके पास जाने की कोई हिम्मत नहीं पड़ रही थी पर उसके घर जाने के अलावा मेरे पास और कोई चारा भी नहीं था।

सबसे अच्छे तरीके से बस मैं यही कर सकता था कि मैं खाली हाथ पैदल हजारों मुसीबतें झेल कर बीच बीच में रुकते हुए उसके घर जाता। सो मैंने यही किया और एक दिन मैं उस शहर पहुँच गया जिस शहर में वह रहती थी।

मैं उसके घर पहुँच गया। मेरी बहिन ने मेरी उस बुरी हालत को देख कर बहुत ज़ोर ज़ोर से रो पड़ी और मेरे लिये अल्लाह से मेरे खुश रहने की दुआ माँगी। उसने मेरे सुरक्षित वहाँ पहुँचने की खुशी में गरीबों को खैरात[14] बाँटी – जैसे तेल सब्जियाँ और छोटे छोटे सिक्के।

फिर उसने मुझसे कहा — “भैया। हालाँकि मेरा दिल तुमसे मिल कर और तुमको देख कर बहुत खुश है पर मैं तुम्हें किस हालत में देख रही हूँ। ” इस बात का मैं उसको कोई जवाब नहीं दे पाया।

उसने मुझे तुरन्त ही नहाने के लिये भेजा। मेरे लिये एक शानदार पोशाक सिलवायी। उसने मेरे रहने के लिये अपने घर के बराबर में ही एक घर ठीक कर लिया था।

नहाने के बाद मैंने वह पोशाक पहनी नाश्ता किया। मेरे नाश्ते में शरबत और कई तरह की मिठाइयाँ थीं। तीसरे प्रहर के समय कई तरह के ताजे फल और मेवा थी।

दोपहर और शाम के खाने के लिये पुलाव कबाब और रोटी थी जो सब बहुत अच्छा बना था और बहुत अच्छा महक भी रहा था। उसने मुझे अपने सामने बैठ कर खाना खिलाया और हर तरह से देखभाल की।

इतने दुख झेलने के बाद अपने इस आराम के लिये मैंने अल्लाह का लाख लाख धन्यवाद किया। इस आराम में कई महीने रहा। इस बीच मैंने अपने घर से एक बार भी कदम बाहर नहीं रखा।

एक दिन मेरी बहिन जो मेरी माँ के समान देखभाल कर रही थी मुझसे बोली — “भैया तुम मेरी आँख के तारे हो और हमारे माता पिता की निशानी हो। तुमको यहाँ देख कर मेरा दिल बहुत खुश हुआ। जब जब मैं तुम्हें देखती हूँ तो मेरा दिल खुशी से झूम उठता है। तुमने यहाँ आ कर मुझे बहुत खुश कर दिया।

पर अल्लाह ने आदमी को अपने रहने सहने के लिये काम करने के लिये पैदा किया है। उनको आलसी हो कर नहीं बैठना चाहिये। अगर कोई आदमी आलसी हो कर घर में बैठ जाता है तो लोग उसके बारे में बुरा सोचने लगते है और खास करके इस शहर में। चाहे वे बड़े हों या छोटे।

हालाँकि उनका इस बात का कोई मतलब नहीं है फिर भी वे इस बारे में बात जरूर करेंगे कि तुम मेरे पास रह रहे हो और कुछ कर नहीं रहे हो। वे यह भी कहेंगे कि इसने अपने पिता का पैसा तो ऐयाशी में उड़ा दिया और अब बहिन के टुकड़ों पर पल रहा है।

इससे हमारे गर्व को ठेस लगती है। इससे हमारी हँसी उड़ती है। इससे हमारे माता पिता को शरमिन्दा होना पड़ता है। नहीं तो मैं तो तुम्हें अपने दिल के पास ही रखती। तुम्हारे लिये अपनी खाल के जूते भी बनवा देती और तुम्हें पहना देती।

अब मेरी सलाह यह है कि तुम यात्रा की तैयारी करो। अल्लाह की मरजी हुई तो तुम्हारा समय बदलेगा और अभी जैसे तुम परेशान हो शरमिन्दा हो फिर खुशी और खुशहाली तुम्हारे कदम चूमेगी। ”

बहिन का यह कहना सुन कर मेरे अन्दर का अहंकार जाग उठा। मैंने उसकी सलाह मानी और बोला — “बहिन। अब तुम मेरी माँ की जगह हो। अब मैं वही करूँगा जो तुम कहोगी। ”

मेरी इच्छा देख कर मेरी बहिन घर के अन्दर गयी अपनी दासियों की सहायता से 50 टोरा[15] यानी थैले बाहर ले कर आयी और मेरे सामने रख दिये।

तभी एक कारवाँ दमिश्क[16] जाने के लिये तैयार था। उसने मुझे वे पैसे देते हुए कहा कि “ये पैसे लो और इससे कुछ सामान लो और उसे किसी भरोसे वाले सौदागर के पास रखवा दो। उससे इस सामान की रसीद लेना न भूलना। तुम खुद भी दमिश्क चले जाओ।

जब तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओ तो उस सौदागर से अपने सामान को बेच कर आये हुए पैसे ले लेना। या फिर तुम उनको अपने आप ही बेच लेना। जैसी सुविधा हो और जैसे फायदेमन्द हो वैसा ही करना। ”

मैंने बहिन से पैसे लिये बाजार गया और बेचने के लिये बहुत सारा सामान खरीदा और उस सब सामान को एक मुख्य सौदागर को सौंप दिया। उससे उस सामान की रसीद ले कर मैं सामान की तरफ से लापरवाह और सन्तुष्ट हो गया।

वह सौदागर एक जहाज़ पर चढ़ा और समुद्र के रास्ते वहाँ से चल दिया। मैंने जमीन के रास्ते से जाना ज़्यादा ठीक समझा। जब मैंने अपनी बहिन से विदा ले तो मेरी बहिन ने मुझे एक बहुत शानदार जोड़ा दिया एक बहुत बढ़िया घोड़ा दिया जिसकी जीन कीमती पत्थरों से जड़ी हुई थी।

उसने मुझे चमड़े के थैले में बहुत सारी मिठाई दी जिसको उसने मेरे घोड़े की जीन से बाँध कर लटका दिया और एक डिब्बा भर कर पानी भी घोड़े से लटका दिया। उसने मेरी बाँह पर एक पवित्र रुपया बाँधा मेरे टीका लगाया और मुझे विदा किया।

उसने मुझे अपने आँसू रोक कर कहा — “जाओ भैया। मैं तुम्हें अल्लाह की हिफाजत में रख कर भेज रही हूँ। जिस खुशी से तुम मुझे अपनी पीठ दिखा कर जा रहे हो मैं उसी खुशी से कुछ दिनों बाद तुम्हारा चेहरा देखूँ। ”

मैंने भी अल्लाह की प्रार्थना कह कर उससे कहा — “अल्लाह तुम्हारी भी रक्षा करे बहिन। मैं तुम्हारा कहा जरूर मानूँगा। ”

यह कह कर मैं घर से बाहर निकल आया अपने घोड़े पर सवार हुआ और अल्लाह की सुरक्षा पर भरोसा करके वहाँ से चल पड़ा। जल्दी ही मैं दमिश्क के पास आ गया।

थोड़े में कहो तो जब मैं शहर के फाटक पर आया तब रात काफी ढल चुकी थी। फाटक के चौकीदारों ने शहर का फाटक बन्द कर दिया था।

मैंने उनसे बहुत विनती की कि “मैं एक यात्री हूँ दूर से बहुत तेज़ तेज़ यात्रा करके आ रहा हूँ। अगर आप मेरे लिये यह फाटक खोल देंगे तो मैं अपने लिये और अपने घोड़े के लिये कुछ खाने का इन्तजाम कर पाऊँगा। ”

उन्होंने अन्दर से ही बड़ी रुखायी के साथ जवाब दिया — “इस समय पर हमें यह फाटक खोलने की इजाज़त नहीं है। तुम इतनी देर से आये ही क्यों हो। ”

जब मैंने उनका यह सीधा सा जवाब सुना तो मैं शहर की दीवार के सहारे ही अपने घोड़े पर से उतर पड़ा और अपनी चादर बिछा कर वहीं बैठ गया। पर जागने के लिये मुझे कई बार उठ उठ कर घूमना पड़ता।

जब आधी रात हुई सब कुछ बिल्कुल शान्त पड़ा था। तब मैंने क्या देखा कि एक बक्सा किले की दीवार से धीरे धीरे नीचे गिर रहा है। जब मैंने यह अजीब सा दृश्य देखा तो मैं तो चकित रह गया। यह देखते हुए कि यह क्या तलिस्मान है या फिर अल्लाह मुझ अभागे पर दया कर रहा है कि वह मुझे कोई खजाना देना चाहता है।

जब वह बक्सा जमीन पर उतरा तो मैं उसके पास बड़े डर से पहुँचा तो देखा कि वह तो लकड़ी का बक्सा था। अपनी उत्सुकता को शान्त करने के लिये मैंने उसे खोला तो उसमें से एक बहुत सुन्दर स्त्री निकली जिसको देखते ही किसी भी आदमी की इन्द्रियाँ जवाब दे सकती हैं।

वह घायल थी उसके खून बह रहा था उसकी आँखें बन्द थीं और वह बड़े दर्द में लग रही थी। धीरे धीरे उसके होठ हिले और उनसे बहुत धीमी सी आवाज निकली — “ओ बेवफा नीच। ओ निर्दयी। यह काम जो तूने मेरे साथ किया है क्या मेरे प्यार का यही बदला है। तू एक बार मुझे और मार ताकि तेरा मन सन्तुष्ट हो सके। मैं तेरे और अपने लिये खुदा से इन्साफ माँगती हूँ। ”

इतना कह कर उस बेहोशी की हालत में भी अपने दुपट्टे का एक छोर खींच कर अपने चेहरे पर डाल लिया। उसने मेरी तरफ देखा भी नहीं।

उसकी तरफ देखते हुए इसकी बात सुन कर मैं तो बिल्कुल पागल सा ही हो गया। मैं तो बस यही सोचता रहा गया कि ऐसा कौन सा निर्दयी हो सकता है जिसने इतनी सुन्दर स्त्री को मारा हो। उसका दिल ऐसे कैसे शैतान का दिल था जिसने उसके ऊपर हाथ उठाया जो उसे अभी भी प्यार करती है और मरते मरते भी उसको याद करती है।

मैं यह अपने आप ही बुड़बुड़ा रहा था कि लगता था कि यह आवाज उसको सुनायी दे गयी। तो उसने अपने चेहरे पर पड़ा दुपट्टा हटाया और मेरी तरफ देखा।

जैसे ही उसकी मेरी नजर से मिलीं तो मैं तो बस बेहोश सा ही हो गया और मेरा दिल बहुत ज़ोर जोर से धड़कने लगा। मैंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सँभाला।

बड़ी हिम्मत बटोरते हुए मैंने उससे पूछा — “तुम मुझे सच सच बताओ कि तुम कौन हो और यह जो मैं तुम्हारे साथ हुआ देख रहा हूँ वह सब कैसे हुआ। जब तक तुम मुझे इसे समझाओगी नहीं मेरा दिल शान्त नहीं हो सकता। ”

इन शब्दों को सुन कर हालाँकि उसके अन्दर बोलने की बहुत कम ताकत थी फिर भी वह धीरे धीरे बोली — “तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद। मैं अपनी हालत के बारे में जो मेरे घावों ने की है जिसे तुम देख रहे हो मैं कैसे बोल सकती हूँ। मैं तो केवल कुछ पलों की ही मेहमान हूँ।

जब मेरी आत्मा चली जायेगी तब खुदा के लिये तुम मेरे साथ एक इन्सान की तरह से बरतना। तुम मुझे इसी बक्से में किसी जगह गाड़ देना। उसके बाद मैं अच्छे बुरे सबसे आजाद हो जाऊँगी। तुमको भी भविष्य में इसका इनाम मिलेगा। ”

यह कह कर वह शान्त हो गयी। उस रात मैं उसकी कोई दवा नहीं कर सका। मैं वह बक्सा अपने पास ले आया और बाकी बची रात की घड़ियाँ गिनने लगा।

मैंने तय कर रखा था कि जैसे ही सुबह होगी मैं शहर जाऊँगा और जो कुछ उसके लिये मुझसे बन पड़ेगा करूँगा। थोड़े में कहूँ तो यह रात मेरे ऊपर बहुत भारी थी जिसके बोझ से मुझे अपना दिल बैठा बैठा सा महसूस लग रहा था। मैं सारी रात बहुत बेचैन रहा।

आखिर सारी रात बेचैनी से काटने के बाद सुबह हुई। मुर्गों ने बाँग दी। अपनी सुबह की प्रार्थना के बाद मैंने वह बक्सा एक खुरदरे से कैनवास के कपड़े में बन्द किया और फिर जैसे ही शहर का फाटक खुला तो मैं अन्दर गया और मैंने हर आदमी और दूकानदार से पूछा कि मुझे कोई मकान किराये पर कहाँ मिल सकता है।

काफी ढूँढने के बाद मुझे एक अच्छा सा मकान किराये पर मिल गया। मैंने उसी को किराये पर ले लिया।

घर में घुसते ही पहला काम तो मैंने यह किया कि मैंने उस सुन्दर लड़की को बक्से से बाहर निकाला और उसको रुई के एक बहुत ही मुलायम बिछौने पर लिटाया।

फिर मैंने उसके पास एक भरोसे का आदमी छोड़ा और एक चीरफाड़ करने वाले डाक्टर की खोज में निकला। बाहर निकल कर मैंने हर एक से पूछा कि इस शहर में सबसे अच्छा चीरफाड़ करने वाला डाक्टर कौन सा है और वह कहाँ रहता है।

एक आदमी ने बताया कि वहाँ एक नाई था जो बहुत अच्छी चीरफाड़ करता था और शरीर के बारे में बहुत अच्छी तरह से जानता था। और इस कला में वह बहुत होशियार था।

अगर तुम उसके पास कोई मरा हुआ आदमी भी ले कर जाओ तो अल्लाह की दुआ से वह उसको भी ज़िन्दा कर देगा। वह यहीं पास में रहता है। उसका नाम ईसा[17] है।

इस अक्लमन्द का नाम सुन कर मैं उसकी खोज में निकला। बहुत जगह पूछताछ करने के बाद आखिर में मुझे वह उसी दिशा में मिल गया जहाँ लोगों ने उसे बताया था।

मैंने देखा कि उसके सफेद दाढ़ी थी और वह अपने दरवाजे के पास ही बैठा हुआ था। कई आदमी और स्त्रियाँ उसके लिये कुछ कुछ कूटने पीसने में लगे हुए थे।

मैंने आदरपूर्वक उसको सलाम किया और बोला — “आपके बारे में आपकी होशियारी जान कर मैं आपसे कुछ सहायता माँगने आया हूँ। मेरा मामला यह है कि मैं दूर देश से यहाँ व्यापार करने के लिये आया था। मेरी पत्नी भी मेरे साथ आयी थी क्योंकि मैं उससे बहुत प्यार करता था।

जब मैं इस शहर के पास आया तो मैं इस शहर से कुछ दूरी पर ही रुक गया क्योंकि वहाँ मुझे शाम हो गयी थी। मैंने एक अनजाने देश में रात को यात्रा करना भी सुरक्षित नहीं समझा। सो मैं मैदान में ही एक पेड़ के नीचे रुक गया।

सुबह होने से कुछ पहले ही कुछ डाकुओं ने हमारे ऊपर हमला कर दिया। उन्होंने मुझसे मेरा सारा पैसा और जो कुछ भी मेरे पास था सब ले लिया और मेरी पत्नी को घायल कर दिया क्योंकि वह अपना गहना और कीमती पत्थर जो उसके पास थे नहीं देना चाहती थी। मैं उनको रोक नहीं सका और बची हुई रात जैसे तैसे गुजारी।

जैसे ही सुबह हुई मैं इस शहर में आया एक मकान किराये पर लिया उसको घर में छोड़ा तुरन्त ही आपको देखने यहाँ चला आया। आप इस काम में होशियार हैं मेहरबानी करके इस अभागे यात्री के घर आ कर इसकी सहायता कीजिये।

अगर आप उसकी ज़िन्दगी बचा देंगे तो आपकी बहुत प्रसिद्धि हो जायेगी। मैं भी आपका ज़िन्दगी भर गुलाम रहूँगा। ”

ईसा डाक्टर बहुत ही भला और अच्छा इन्सान था। उसको मेरे दुर्भाग्य पर बहुत दया आयी वह मेरे साथ साथ मेरे घर चला। उस लड़की के घाव देख कर उसने मुझे तसल्ली दी और आशा बँधायी — “अल्लाह की दुआ से इस स्त्री के घाव 40 दिन में ठीक हो जायेंगे। उसके बाद इसको अपने ठीक हो जाने की पूजा करानी होगी। ”

थोड़े में कहो तो उसने स्त्री के घाव नीम[18] उबाले हुए पानी से अच्छी तरह से धोये। जिनको उसने सिलने के काबिल समझा उनको सिल दिया। कुछ दूसरे घावों पर उसने कुछ बूटी लगा दी और मरहम लगा दिया। फिर उसने अपना बक्सा निकाला और उन सब पर पट्टी बाँध दी।

इसके बाद उसने बड़े प्यार से कहा — “मैं सुबह शाम तुम्हें देखता रहूँगा। इसका ख्याल रखना कि यह शान्त रहे कहीं इसके घावों के टाँके न खुल जायें। इसको थोड़ा थोड़ा सा मुर्गे का पानी[19] देते रहें अक्सर गुलाबजल के साथ “बद मुश्क” देते रहें ताकि इसको ताकत मिलती रहे। ”

इस तरह से ईसा इस लड़के को समझा बुझा कर वहाँ से चला गया। मैंने भी हाथ जोड़ कर उसको बहुत बहुत धन्यवाद दिया और कहा — “जो धीरज आपने मुझे दिया है उससे तो मेरी ज़िन्दगी ही वापस आ गयी है। नहीं तो मुझे अपनी मौत के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं था। अल्लाह आपको सुरक्षित रखे। ”

फिर मैंने उसको इत्र और पान दे कर विदा किया। उस सुन्दर स्त्री की मैं रात दिन सेवा करता रहा। मैं उसके पास हमेशा ही बैठा रहता। उस समय अपना आराम करना तो मैं बिल्कुल ही पाप समझता था। अल्लाह की देहरी पर मैं हमेशा उसके ठीक होने की प्रार्थना करता रहता।

अब ऐसा हुआ कि जिस सौदागर को मैंने अपना सामान दिया था वह वहाँ आ पहुँचा और उसने मुझे मेरा सामान वापस दे दिया। मुझे उस पर पूरा विश्वास था कि उसने उसकी ठीक से परवाह की होगी। जब जब मुझे मौका मिला मैंने उसे बेचना शुरू कर दिया। उससे जो पैसा आता था वह मैं उसकी दवाओं पर खर्च कर देता था।

ईसा बड़े नियमित ढंग से उसे देखने आता रहा। जल्दी ही उसके घाव भर गये। उसके कुछ दिन बाद उसने अपने इलाज की पूजा की। मेरा दिल खुशी से भर गया। मैंने ईसा को एक बहुत ही कीमती खिलात[20] और बहुत सारे सोने के सिक्के दिये।

मैंने सुन्दर लड़की के लिये बहुत बढ़िया कालीन बिछवाये और मसनद[21] लगवा कर उसको उस पर बिठाया। इस खुशी के समय पर काफी पैसे मैंने गरीबों को दान में भी दिये। मुझे तो इतनी खुशी हो रही थी जैसे मुझे सातों लोकों का राज्य मिल गया हो।

जब वह स्त्री ठीक हो गयी तो उसके चेहरे का रंग गुलाबी हो गया और उसका चेहरा सूरज की तरह चमकने लगा जैसे वह बिल्कुल असली सोने का हो।

उसकी सुन्दरता की चमक की वजह से मैं उसकी तरफ देख ही नहीं पाता था। मैं हमेशा उसकी ही सेवा में लगा रहता अअैर वह जो कुछ भी कहती उसे बड़े उत्साह से करता।

वह कहती — “अपनी परवाह करो अगर तुम मेरी बात मानना चाहो तो। मेरा काम करते करते तुम साँस भी नहीं लेते। मैं जो भी कहती हूँ तुम उसे बिना किसी हिचकिचाहट के पूरा कर देते हो। तुम एक साँस का भी इन्तजार नहीं करते। तुम्हें पछताना पड़ेगा। ”

उसकी ढंग चाल से ऐसा लगता था कि उसको यह मालूम था कि अगर उसे मेरी सेवाओं का बदला चुकाना पड़ा तो वह उसे कैसे चुकाना था।

मैं भी उसकी मरजी के खिलाफ कोई काम नहीं कर पाता था। और उसका हर हुकुम बड़ी वफादारी से बजा लाता था।

कुछ समय उसके भेद कि वह कौन थी क्या थी और मेरी सेवाओं में बीत गया। जिस किसी चीज़ की उसकी इच्छा होती मैं उसको वह तुरन्त ही ला देता। जो कुछ पैसा मुझे अपना सामान बेच कर मिला था वह सब पैसा अब खत्म हो रहा था – मूल भी और ब्याज भी।

एक विदेशी जगह में जहाँ के लिये मैं बिल्कुल अनजान था मेरे ऊपर कौन भरोसा करता। आखिर मैं पैसे की तरफ से दुखी रहने लगा। यहाँ तक कि मुझे रोजमर्रा के खर्चे में भी मुश्किल पड़ने लगी। इसलिये दिल ही दिल में मुझे शरमिन्दगी महसूस होने लगी।

मैं इस चिन्ता में रोज ही घुलता रहा। मेरे चेहरे का रंग उतरने लगा। पर मैं वहाँ किससे सहायता माँगता। जो दुख मेरे दिल को था वह तो अब मुझे ही सहना था। गरीब आदमी का दुख तो उसी की आत्मा को खाता है।

एक दिन उस सुन्दर स्त्री को अपनी ताकत से यह पता चल गया कि मैं बहुत दुखी हूँ। उसने कहा — “ओ नौजवान। तुमने जो मेरे ऊपर खर्चा किया है उसके लिये तुम दुखी न हो। तुम मुझे एक कागज का टुकड़ा ला दो और कलम और स्याही ला दो। ”

जैसे ही उसने यह कहा तो मुझे लगा कि यह स्त्री किसी राजघराने की है नहीं तो यह मुझसे इतनी बहादुरी से नहीं बोलती। मैं तुरन्त ही उसके लिये एक कागज और एक कलमदान[22] ले आया और ला कर उसके सामने रख दिया।

उसने अपने सुन्दर हाथों से एक सन्देश लिखा और मुझे दे कर बोली — “किले के पास ही एक तिरपौलिया[23] है। उसके बराबर से जो सड़क जा रही है उस पर एक बहुत बड़ा मकान है। उस मकान का मालिक सिद्दी[24] बहार के नाम से मशहूर है। तुम जाओ और यह नोट उसको दे देना। ”

उसके हुकुम के अनुसार मैं वहाँ गया। नाम और पते से मैंने उसको जल्दी ही ढूँढ लिया। चौकीदार के हाथों मैंने अन्दर सन्देश भिजवाया कि मैं एक चिठ्ठी ले कर आया हूँ। जैसे ही उसने मेरा सन्देश सुना एक सुन्दर सा नीग्रो मुझसे मिलने के लिये बाहर निकल कर आया।

उसने एक मोटी सी पगड़ी अपने सिर पर बाँध रखी थी। हालाँकि उसका रंग थोड़ा काला था पर उसके चहरे पर उसके भाव साफ दिखायी दे रहे थे।

उसने मेरे हाथ से वह नोट ले लिया पर कुछ कहा नहीं। उसने कोई सवाल भी नहीं पूछा। वह जिस तरह से बाहर आया था उसी तरह से अन्दर चला गया। थोड़ी ही देर में वह फिर बाहर आया तो वह अपने कई दासों के साथ आया जिनके सिरों पर 11 बन्द थालियाँ थीं और वे ब्रोकेड[25] के कपड़े से ठकी हुई थीं।

उसने अपने दासों से कहा — “जाओ इस नौजवान के साथ चले जाओ और ये थालियाँ दे आओ। ”

मैंने उसको अपने तरीके से विदा कहा और वहाँ से चल दिया। उन दासों को मैं अपने घर ले आया। मैंने उनको अपने घर के दरवाजे से ही वापस कर दिया और उन सारी थालियों को खुद ही उस सुन्दर लड़की के सामने ले आया।

उनको देख कर उसने मुझसे कहा — “लो ये 11 थैले सोने के सिक्के लो और इस पैसे से घर का खर्चा ठीक से चलाओ। ”

यह सब देख कर हालाँकि मुझे अपने मन में बहुत तसल्ली हुई फिर भी मेरे मन में कुछ उथल पुथल रही। मैंने अपने मन में कहा — ओ अल्लाह। यह कैसी अजीब सी बात है कि एक अजनबी जो किसी के लिये अनजान है उसके लिखे हुए एक कागज के टुकड़े पर बिना कुछ कहे सुने पूछे किसी को इतना सारा पैसा दे दे।

मैं उस सुन्दर स्त्री से इस बात को पूछने की हिम्मत नहीं कर सका क्योंकि उसने मुझसे यह बात पूछने के लिये पहले ही मना कर रखा था। डर के मारे मेरे मुँह से तो एक शब्द भी नहीं निकला।

इस घटना के आठ दिन बाद वह सुन्दर स्त्री मुझसे बोली — “अल्लाह ने आदमी को इन्सानियत की एक ऐसी पोशाक दे रखी है जो न तो कभी मैली होती है और न फटती है। हालाँकि फटे कपड़े भी उसकी इन्सानियत को कम नहीं करते पर फिर भी जनता में वह अच्छा नहीं लगता।

इसलिये तुम इसमें से दो थैले सोने के सिक्के ले जाओ और चौक में यूसुफ व्यापारी की दूकान पर चले जाओ। वहाँ से अपने लिये दो जोड़ी बढ़िया कपड़े और कुछ गहने खरीद लो और उन्हें यहाँ ले कर आओ। ”

मैं तुरन्त ही अपने घोड़े पर चढ़ा और उसी दूकान पर चला गया जो उसने मुझे बतायी थी। मैंने उस दूकान पर एक नौजवान बैठे देखा जो नारंगी रंग के कपड़े पहने बैठा था। वह एक गद्दी पर बैठा था। वह इतना सुन्दर था कि उसको देखने के लिये सारी सड़क खड़ी हो जाती थी। सारा बाजार का बाजार उसको देखता रहता।

मैं उसकी दूकान पर गया और उसे सलाम बोला। जा कर बैठ गया और उससे वे चीज़ें माँगीं जो मुझे चाहिये थीं।

अब क्योंकि मेरे बोलने का ढंग उस शहर के रहने वालों के बोलने के ढंग से अलग था। फिर भी उस नौजवान ने बड़ी मुलायमियत से कहा — “जनाब आपको जो कुछ चाहिये वह सब तैयार है। पर क्या जनाब आप मुझे बतायेंगे कि आप कौन से देश से आये हैं। और इस नये शहर में रहने का आपका क्या मतलब है। अगर आप मुझे इस बारे में बता देंगे तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। ”

मैं उसको अपने हालात बिल्कुल भी बताने के लिये तैयार नहीं था इसलिये मैंने उसको कोई कहानी बना कर सुना दी। फिर मैंने उससे गहना और कपड़ा लिया, उसको पैसे दिये और उससे जाने के लिये विदा माँगी।

मेरी इस बात से मुझे वह कुछ नाखुश सा लगा। उसने कहा — “कोई बात नहीं जनाब। अगर आप नहीं बताना चाहते तो शुरू में ही आपको इतने प्यार से सलाम करने की कोई जरूरत नहीं थी। जो लोग अच्छे घरों से आते हैं उनके लिये इस तरह का सलाम करना कुछ मायने रखता है। ”

उसने यह सब मुझसे इतनी अच्छी तरह से कहा कि मेरा दिल खुश हो गया। मुझे भी यह सुन कर अच्छा नहीं लगा कि उससे इतनी जल्दी और इस तरह से विदा ले कर चला जाऊँ। सो उसको खुश करने के लिये मैं थोड़ी देर वहाँ और बैठ गया।

मैंने कहा — “तुम ठीक कहते हो। मैं तैयार हूँ। ”

मेरे ऐसा कहने से वह बहुत खुश हो गया। उसने मुस्कुरा कर कहा — “अगर तुम्हें मेरा गरीबखाना पसन्द आये तो तुम आज शाम को वहाँ एक छोटी सी पार्टी के लिये आओ। हम लोग वहाँ थोड़ा आनन्द करेंगे। ”

जब से मैं उस सुन्दर लड़की से मिला था मैंने अभी तक उसको कभी अकेला नहीं छोड़ा था सो मुझे उसके अकेलेपन का ख्याल आया तो मैंने उसको कई बहाने बना कर टाल दिया। पर वह नौजवान मेरा कोई भी बहाना सुनने को तैयार नहीं था।

उसने मुझसे यह वचन ले ही लिया कि जैसे ही मैं घर यह सब सामान ले कर जाऊँ उसके थोड़ी ही देर बाद मैं उसके घर पहुँच जाऊँ। इसी शर्त पर उसने मुझे घर जाने की इजाज़त दी।

मैं कपड़े और गहने ले कर सुन्दर लड़की के पास चला। वहाँ पहुँचा तो उसने मुझसे सब चीज़ों की कीमत पूछी और यह भी पूछा कि व्यापारी की दूकान पर क्या हुआ। मैंने अपनी खरीदारी की सारी बातें उसको बता दीं और साथ में मैंने उसको उस पार्टी के बारे में भी बता दिया जिसके लिये उसने मुझे बुलाया था।

उसने कहा — “किसी भले आदमी के लिये उसका अपना वायदा तोड़ना ठीक नहीं है। तुम मुझे अल्लाह की रक्षा में छोड़ जाओ और अपनी बात रखो। हमारे धर्मदूत ने हमें यह सिखाया है कि अगर हमें कोई प्रेम से बुलाये तो हमें जरूर जाना चाहिये। ”

मैं बोला — “मेरा मन नहीं करता कि मैं तुम्हें यहाँ अकेला छोड़ कर यहाँ से जाऊँ। पर अगर तुम्हारा यही हुकुम है और मुझे जाना ही है तो मेरा दिल जब तक मैं वापस लौट कर आता हूँ तुम्हारे पास ही रहेगा। ”

उससे इतना कह कर मैं उस व्यापारी के घर चला गया जहाँ वह एक कुरसी पर आराम से बैठा मेरा इन्तजार कर रहा था। मुझे देखते ही वह बोला — “आइये ओ भले आदमी। मैं तो आपकी राह ही देख रहा था। ”

कह कर वह तुरन्त ही उठा और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने साथ ले चला। वह मुझे एक बागीचे की तरफ ले गया। वह एक सुन्दर बागीचा था जिसमें कई प्रकार के फूल लगे हुए थे नहरें बह रही थीं फव्वारे लगे हुए थे।

वहाँ बहुत तरीके के फलों से लदी डालियाँ नीचे को झुकी जा रही थीं। बहुत तरीके की चिड़ियाँ पेड़ों की डालियों पर बैठी हुई थीं और अपनी मीठी आवाज में गा रही थीं। बागीचे के बीच में वहाँ एक बड़ा सा शानदार महल था जिसमें हर कमरे में वेशकीमती कालीन बिछे हुए थे।

एक नहर के किनारे हम लोग एक कमरे में बैठ गये। एक पल के बाद ही वह उठा और बाहर गया और कुछ ही पलों में कीमती कपड़े पहन कर आ गया।

उसको देख कर मैंने कहा — “अल्लाह की जय हो। खुदा करे तुम्हें किसी की बुरी नजर न लगे। ”

यह सुन कर वह मुस्कुराया और बोला — “अगर तुम अपने कपड़े बदल लो तो यह बात तो तुम्हारे लिये भी ठीक है। ”

उसको खुश करने के लिये मैंने भी दूसरे कपड़े पहन लिये। उस नौजवान ने मेरे लिये बहुत सारी आनन्द की चीज़ें इकठ्ठी कर रखी थीं और जो भी उसके हाथ में था। वह मुझसे बड़े स्नेह और तरीके से बात कर रहा था।

इसी समय एक शराब पिलाने वाला वाइन से भरी सुराही, एक क्रिस्टल का प्याला और तरह तरह के स्वादिष्ट माँस ले कर वहाँ आया। सब कुछ सबको दिया जाने लगा।

जब तीन या चार बार शराब पी ली गयी तो चार नाचने वाले लड़के वहाँ आये। वे बहुत सुन्दर थे और उन्होंने लम्बी ढीली और चारों तरफ को उड़ती हुई सी पोशाक पहन रखी थी। वहाँ आ कर उन्होंने गाना शुरू कर दिया।

उनका गाना उनके सुर आदि सब देखने में इतना अच्छा लग रहा था कि ऐसा लग रहा था कि जैसे उस समय वहाँ पर तानसेन[26] भी होते तो वह भी अपना आपा भूल गये होते और बैजू बावरा[27] भी उसको सुन कर पागल हो गये होते।

इस सब आनन्द के बीच नौजवान सौदागर की आँखें अचानक आँसुओं से भर गयीं। उसके आँसुओं की दो तीन बूँदें उसके गालों पर ढुलक गयीं।

वह मेरी तरफ घूमा और बोला — “अब तो हममें ज़िन्दगी भर की दोस्ती हो गयी है तो अपने दिलों के भेद एक दूसरे से छिपाना किसी भी धर्म में नहीं लिखा। आज मैं तुम्हें अपनी दोस्ती के विश्वास में बिना कुछ छिपाये हुए अपनी ज़िन्दगी का एक भेद बताता हूँ।

अगर तुम मुझे जाने की इजाज़त दो तो मैं अपनी पत्नी को यहाँ बुलाना चाहता हूँ क्योंकि उसके बिना मैं किसी भी आनन्द का आनन्द नहीं उठा सकता। उसके बिना मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता। ”

उसने ये शब्द इतनी गहरी इच्छा से कहे कि हालाँकि मैंने उसकी पत्नी को देखा नहीं था पर मेरी इच्छा हो आयी कि मैं उसे देखूँ।

मैंने उससे कहा कि तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है। इससे ज़्यादा अच्छी बात और क्या हो सकती है। बुलाओ उसे जल्दी से बुलाओ।

यह सच है कि प्रेमिका के बिना किसी चीज़ में आनन्द नहीं आता। नौजवान ने चिक की तरफ देख कर एक इशारा किया और उधर से एक काली स्त्री जो किसी राक्षसी जैसी भद्दी और बदसूरत थी अन्दर आयी जिसको तो देख कर ही कोई आदमी बिना अपनी मौत आये मर जाये। वह उस नौजवान के पास आयी और आ कर बैठ गयी।

मैं तो उसको देख कर ही डर गया। उसको देखते हुए मैं सोचने लगा कि क्या यह सुन्दर नौजवान इसको प्यार कर सकता है। और क्या यह वही लड़की है जिसकी वह इतनी तारीफ कर रहा था और उसके लिये प्यार दिखा रहा था।

मैंने उसके ऊपर कुछ जादू के शब्द पढ़े और चुप हो गया। इन्हीं हालातों में शराब और संगीत का यह आनन्द तीन दिन और तीन रात चला।

चौथी रात को सब बेहोश से होने लगे और नींद भी आने लगी। मैं भी कुछ भूलने की सी हालत में आ गया और सो गया। अगली सुबह नौजवान सौदागर ने मुझे जगाया और फिर से वैसे ही बेहोशी लाने वाले और सुलाने वाली शराब के प्याले पर प्याले पिलाने शुरू कर दिये।

उसने अपनी पत्नी से कहा — “मेहमान को इससे ज़्यादा परेशान करना ठीक नहीं है। ”

उसने मेरे दोनों हाथ पकड़े और हम दोनों उठे। मैंने उससे जाने के लिये विदा माँगी। मेरे नरम व्यवहार से खुश हो कर उसने मुझे जाने की इजाज़त दे दी। मैंने अपने पुराने कपड़े पहने और घर की तरफ चला जहाँ वह परियों जैसी स्त्री मेरा इन्तजार कर रही थी।

पर मेरे मामले में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं उसको अकेला छोड़ कर कहीं जाऊँ और रात रात भर बाहर रहूँ। मुझे इस बात के लिये अपने ऊपर बहुत शरम आ रही थी कि मैं घर से तीन दिन तीन रात बाहर रहा।

मैंने घर पहुँच कर इस बात के लिये उससे कई बार माफी माँगी। उससे मैंने कहानी के सारे हालात बताये और साथ में यह भी कहा कि उसने मुझे इससे पहले आने ही नहीं दिया।

वह दुनिया की रीति रिवाज अच्छी तरह से जानती थी सो वह हँस कर बोली — “इससे क्या फर्क पड़ता है क्योंकि अगर मुझे अपने दोस्त पर कोई ऐहसान करना ही हो तो मैं तुम्हें तुरन्त माफ करती हूँ।

तुम्हारे ऊपर इसका कोई इलजाम नहीं है। जब कोई आदमी इस तरह से किसी आदमी के घर पार्टी में जाता है तो वह तभी लौटता है जब उसका मेजबान उसे लौटने देता है।

पर तुमने जब उसके घर इतना सब खाया पिया है तो क्या तुम उसका खा पी कर चुप बैठे रहोगे या फिर तुम भी बदले में कुछ उसे खिलाओगे पिलाओगे।

मैं समझती हूँ कि तुमको उस नौजवान सौदागर के पास जाना चाहिये और उसको तुम्हें जितनी बड़ी दावत उसने तुम्हें दी है उससे दोगुनी बड़ी दावत तुम्हें उसे देनी चाहिये। ऐसे आनन्द के लिये तुम सामान के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचना।

अल्लाह की कृपा से उसके लिये तुम्हारे पास वे सब चीज़ें आ जायेंगी जिनकी तुम्हें जरूरत होगी। और यह दावत बहुत अच्छे ढंग से होगी। ”

उसकी इच्छा के अनुसार मैं उस जौहरी की दूकान पर गया और दोस्ती के नाते उससे बोला — “देखो मैंने तुम्हारी बात खुशी से रखी अब क्या तुम दोस्ती के नाते मेरी बात नहीं रखोगे। ”

वह बोला — “मैं तुम्हारी बात तो अपने दिल और अपनी आत्मा से मानूँगा। बोलो। ”

तब मैंने कहा — “अगर तुम अपने इस दास के घर एक बार आओगे तो वह मेरे लिये बड़ी खुशी की बात होगी। ”

उस नौजवान ने भी बहुत बहाने बनाये पर मैं अपनी बात छोड़ने वाला नहीं था। काफी कहने सुनने के बाद वह तैयार हो गया और मैं उसको अपने घर ले आया।

पर रास्ते में मैं अपने यह सोचने से नहीं रह सका कि “अगर मेरे पास साधन होते तो मैं अपने मेहमान को उसकी हैसियत के अनुसार ही ले कर आता। पर अब तो मैं उसको अपने साथ लिये जा रहा हूँ। देखता हूँ कि इसका क्या नतीजा निकलता है। ”

इन्हीं विचारों में खोया हुआ मैं अपने घर के पास आ पहुँचा।

वहाँ आ कर तो मैं आश्चर्य में पड़ गया कि मेरे घर के सामने बहुत भीड़ थी। दरवाजे के सामने बहुत सारे लोग आ जा रहे थे। सड़कें साफ थीं उन पर पानी छिड़का हुआ था। चाँदी की गदा और डंडे लिये लोग हमारे इन्तजार में खड़े थे।

जो कुछ भी मैंने देखा तो उससे तो मैं ठगा सा खड़ा रह गया। पर मैं जानता था कि यह मेरा ही घर है सो मैं उसमें घुस गया। अन्दर घुस कर मैंने देखा कि मेरे घर में हर कमरे के अनुसार उसमें कालीन बिछे हुए हैं। और भी कई जगह वे बिछे हुए हैं।

कीमती मसनद लगे हुए हैं। पानों के डिब्बे रखे है। गुलाबपाश[28] रखे हैं। इत्रदान पीकदान फूलों के गुलदस्ते आदि सब बड़ी तरतीबवार लगे हुए हैं। दीवार के सहारे सहारे कई तरह के सन्तरे और रंग बिरंगे केक और बिस्किट आदि रखे हुए हैं।

साइप्रस और कमल की शक्लों के लैम्प लगे हुए हैं और वे जल रहे हैं। बड़े कमरे में कपूर की मोमबत्ती सोने के मोमबत्तीदानों में जल कर अपनी सुगन्ध फैला रही है। हर नौकर अपनी अपनी जगह खड़ा है।

रसोईघर में बरतनों की खड़खड़ाहट सुनायी दे रही है। अब्दरखाने में पानी ठंडा किया जा रहा है। पानी के घड़े चाँदी के खाँचों पर रखे हुए हैं। घड़े सब ढके हुए हैं। पास में ही एक चबूतरा है जिस पर गिलास और चम्मचें रखी हुई हैं। वहाँ कुलफी भी है। पानी के गिलासों को बरफ में डाल कर ठंडा किया जा रहा है।

थोड़े में कहो तो वहाँ हर किस्म की आराम की सुविधा मौजूद थी जो उसको एक राजकुमार साबित करने के लिये चाहिये थी। गाने नाचने वाले लड़के और लड़कियाँ और साज़ बजाने वाले सब वहाँ इन्तजार कर रहे थे। कुछ गा नाच भी रहे थे। मैं उस नौजवान को हाथ पकड़ कर अन्दर ले गया और उसे मसनद पर बिठाया।

मैं तो यह सब देख कर बहुत ही आश्चर्य कर रहा था कि इतने कम समय में इतनी सारी तैयारी कैसे की गयी। मैं चारों तरफ देख रहा था और घूम रहा था पर मुझे वह सुन्दर स्त्री कहीं दिखायी नहीं दी।

उसको ढूँढते ढूँढते मैं रसोईघर में पहुँचा तब वह मुझे वहाँ मिली। उसका ऊपर वाला कपड़ा उसकी गरदन पर पड़ा था उसके जूते उसके पाँवों में थे एक सफेद रूमाल उसके सिर पर था। उसने बहुत सादा से कपड़े पहन रखे थे। उसके शरीर पर कोई गहना नहीं था।

जिसको खुदा ने इतनी सुन्दरता दे रखी थी उसको किसी गहने की जरूरत नहीं थी

देखो ज़रा वह चाँद कितना सुन्दर लग रहा है बिना किसी सजावट के

वह दावत की देखभाल में बहुत ज़्यादा व्यस्त थी। हर एक को वह किसी न किसी खाने के बारे में बता रही थी। जिस तरीके से वह वहाँ काम कर रही थी मैं उसको दुआ दे रहा था। मैंने जो कहा तो उसको सुन कर वह नाराज हो गयी और बोली — “बहुत सारे काम तो इन्सान बन कर ही करने पड़ते हैं। वे देवदूत नहीं कर सकते। मैंने किया ही क्या है जो तुम इतने ज़्यादा आश्चर्यचकित हो रहे हो।

बस काफी हो गया। मुझे बहुत सारी बातें पसन्द नहीं हैं। पर ज़रा मुझे यह तो बताओ कि यह कहाँ का तरीका है कि तुम अपने मेहमान को अकेला छोड़ कर यहाँ आ गये और यहाँ इनको देख देख कर आनन्द ले रहे हो।

वह तुम्हारे ऐसे व्यवहार के बारे में क्या सोचेगा। जाओ तुरन्त ही उसके पास जाओ और जा कर उसकी देखभाल करो। उसकी पत्नी को भी बुला लो और उसको उसके पास बिठाओ। ”

यह सुन कर मैं तुरन्त ही बाहर अपने मेहमान के पास चला आया और उसे अपने दोस्त की तरह से घुमाया। जल्दी ही दो सुन्दर गुलाम अन्दर आये जो कीमती रत्न जड़े गिलासों में शराब ले आये थे। वह उन्होंने हमको दी।

इस बीच मैंने देखा और उससे कहा कि “मैं हर तरह से तुम्हारा दोस्त की तरह से ख्याल रख रहा हूँ पर फिर भी यह और भी अच्छा होता अगर तुम्हारी पत्नी जिसको तुम इतना प्यार करते हो वह खुद यहाँ आ कर इस आनन्द में हिस्सा लेती। यह मुझे बहुत अच्छा लगता। अगर तुम ठीक समझो तो मैं एक नौकर को उसे लाने के लिये भेज दूँ। ”

यह सुन कर तो वह बहुत खुश हो गया और बोला — “अरे मेरे दोस्त यह तो बहुत ही अच्छा होगा। तुमने तो मेरे दिल की बात बोल दी। ”

मैंने अपना एक दास[29] उसको लाने के लिये भेज दिया। जब आधी रात बीत गयी तब वह बदसूरत बुढ़िया अपने एक शानदार चौदोल[30] पर बैठ कर वहाँ आयी जैसे कोई बुरी आत्मा अचानक आ जाये।

अपने मेहमान को खुश करने के लिये मुझे उसको लाने के लिये आगे जाना पड़ा। बड़ी इज़्ज़त से मैं उसको अन्दर ले कर आया और उसको उस सुन्दर नौजवान के पास ला कर बिठा दिया। वह तो उसको देख कर इतना खुश हो गया जैसे उसको दुनिया भर की दौलत मिल गयी हो।

वह बदसूरत बुढ़िया उस सुन्दर नौजवान के गले से चिपक कर वहाँ बैठ गयी। सच पूछो तो उस समय उनको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे चौदहवीं के चाँद को ग्रहण लग गया हो। वहाँ मौजूद लागों में से बहुत सारे लोगों ने यह देख कर अपने दाँतों तले उँगली दबा ली।

शायद वे भी यही कह रहे होंगे कि “यह इतना सुन्दर नौजवान ऐसी बदसूरत के प्रेम में कैसे पड़ा। ” सबकी आँखें उन्हीं की तरफ घूम गयीं। वे सब अपना काम तो भूल गये और बस उसी जोड़े की तरफ देखते रहे।

कुछ लोगों ने सोचा कि “प्यार” और “तर्क” में बहुत अन्तर होता है। जो चीज़ न्याय सोच भी नहीं सकता वह यह प्यार कर दिखाता है। लैला को मजनूँ[31] की नजर से देखो। ” वहाँ मौजूद सारे लोग बोले “हाँ यह ठीक है। यह सच है। ”

सुन्दर स्त्री के कहे अनुसार मैंने अपने आपको अपने मेहमानों की सेवा में लगाया। हालाँकि सुन्दर नौजवान ने मुझसे बहुत जिद की कि मैं उसके साथ ही खाऊँ और उतना ही खाऊँ जितना वह खा रहा था पर मैंने सुन्दर स्त्री के डर से ऐसा नहीं किया। पर आनन्द के लिये खाना पीना छोड़ा भी नहीं।

चौथी रात[32] को नौजवान ने मुझसे बड़े प्यार से कहा — “अब मैं तुम्हारी इजाज़त लेना चाहूँगा। मैंने तुम्हारी खुशी के लिये तीन दिन में बहुत नुकसान सहा है और तुम्हारे पास ही बैठा रहा हूँ। मेहरबानी करके तुम भी पल भर के लिये मेरे पास बैठो और मेरा दिल खुश कर दो। ”

मैंने अपने मन में सोचा “अगर इस समय मैं इसकी यह बात नहीं मानता हूँ तो यह बहुत दुखी हो जायेगा। इसको बहुत बुरा लगेगा। और यह भी जरूरी है कि मैं अपने नये दोस्त को नाराज न करूँ। ”

यह सोचते हुए मैं बोला — “ओह यह तो मेरे लिये बहुत खुशी की बात होगी कि मैं तुम्हारा कहा करूँ और तुम्हें इज़्ज़त दूँ। क्योंकि यह कहना तो मेहमानों की सेवा करने से भी बड़ी रस्म है। ”

यह सुन कर उसने मुझे एक वाइन का गिलास दिया और मैंने उसे पी लिया। कि तभी वह वाइन का गिलास मेरी आँखों के सामने इतनी ज़ोर से चारों तरफ घूम गया कि मुझे लगा कि मैं जैसे बहुत पी गया कुछ समझने के लायक नहीं रहा और फिर बेहोश भी हो गया।


[1] Adventures of the First Darwesh (Tale No 1) - Taken from ;

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/baghobahar/02_firstdarvesh_a.html

[2] This is the Persian way of sitting comfortably.

[3] Yemen is the South-west Province of Arabia

[4] Malikut Tujjar means the Chief of Merchants in Persian and Arabian.

[5] Khwaja Ahmed – name of the father of the First Darwesh

[6] Kafni and Saili – Kafni is a peculiar dress for Fakirs. And Saili or Seli is a necklace of thread worn as a badge worn as a distinction by certain class of Fakirs.

[7] The 40th day is an important period in Muhammadan rites; it is the great day of rejoicing after birth, and of mourning after death. To dignify this number still more, sick and wounded persons are supposed, by oriental novelists, to recover and perform the ablution of cure on the 40th day. The number "forty" figures much in the Sacred Scriptures, for example, "The flood was forty days upon the earth", “the Israelites forty years in the wilderness”, etc.

[8] The Fatiha is the opening chapter of the Kuran, which, being much read and repeated, denotes a short prayer or benediction in general.

[9] ”Pagadee Baandhna” is a ceremony to a person, normally son, after the death of the family head or father. It denotes that After the death of this family head now this person is the Head of the household.

[10] Diwan-Khana is that part of a dwelling where male company are received.

[11] Chicks are curtains, or hanging screens, made of fine slips of bamboos, and painted and hung up before doors and windows, to prevent the persons inside from being seen from outside, and to keep out insects; but they do not exclude the air, or the light from without. If there is no light in a room, a person may sit close to the chick, and not be seen by one who is without.-- However, no description can convey an adequate idea of pardas and chicks to the mere European. A picture of Chic is shown above.

[12] Karoon – a personage famed for his wealth, like the Croesus of the Greeks, or Kuber in Hindus, etc.

[13] A farthing was a coin of the Kingdom of England worth one quarter of a penny, ​1⁄960 of a pound sterling. In those times 1 Pound = 20 Shillings, 1 Shilling = 12 Pence. Thus 1 Pound = 960 quarters of Pence. That quarter of a Pence was called Farthing. It was minted in bronze and replaced the earlier copper Farthings. See its coin above.

[14] Giving alms to poor

[15] The tora is a bag containing a 1,000 pieces (gold or silver). It is used in a collective sense, like the term kisa, or "purse," among the Persians and Turks; only the kisa consists of five hundred dollars.

[16] Damishk or Damascus is the capital of Syria. It is called “City of Jasmine” too.

[17] Isa is the name of Jesus among the Muhammadans; who all believe, (from the New Testament, transfused into the Kuran,) in the resurrection of Lazarus, and the numerous cures wrought by this Saviour. This, perhaps, induced Mir Amman to call the wonder-performing barber and surgeon 'Isa.

[18] The Neem is a large and common tree in India, the leaves of which are very bitter, and used as a decoction to reduce contusions and inflammations; also to cleanse wounds.

[19] Translated for the words “Chicken Broth”

[20] The khil'at is a dress of honour, in general a rich one, presented by superiors to inferiors. In the zenith of the Mughal empire these khil'ats were expensive honours, as the receivers were obliged to make rich presents to the emperor for the khil'ats they received. The khil'at is not necessarily restricted to a rich dress; sometimes, a fine horse, or splendid armour etc may also form an item of it.

[21] Masanad are round long thick pillows

[22] Here Kalamdan means the small tray containing pens, inkstand, a knife etc.

[23] Tirpauliya means three arched gates; there are many such which divide grand streets in Indian cities, and may be compared to our Temple Bar in London, only much more splendid.

[24] Ethiopian, or Abyssinian slaves, are commonly called Sidis. They are held in great repute for their honesty and attachment.

[25] The cloth woven with golden or silver threads

[26] Tansen was a very famous singer of Indian music. His real name was Ramtanu Pandey. He was one of the Nav-Ratna in the court of Emperor Akbar (reigned during 1556-1605). How Tansen has been referred to here. It can only be guessed that maybe the writer has added this name to this story. The author could never have been.

[27] Baiju Bawara is another musician of the Indian music world. Baiju learnt music Swami Haridas (1512–1607). He was called Bawra (crazy) because he was insanely in love with a court dancer in Chanderi. Initially he was a musician at the court of the Raja of Chanderi and later in the court of Raja Mansingh Tomar. Thus he was also there during Akbar’s reign.

[28] Gold or silver pots to keep the rose water to sprinkle on guests to welcome them.

[29] Translated for the word “Eunuch” to keep decency in the language.

[30] A Choudol is a kind of palki or sedan, for the conveyance of the women of people of rank in India.

[31] Majnun, a lover famed in eastern romance, who long pined in unprofitable love for Laila, an ugly hard-hearted mistress. The loves of Yusuf and Zulaikha, Khusru and Shirin, also of Laila and Majnun, are the fertile themes of Persian romance.

[32] Mohammadans reckon their day from Sunset.

(क्रमशः अगले खंडों में जारी...)

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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,245,लघुकथा,1272,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,340,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2014,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,715,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,806,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,92,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,212,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड छः
लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड छः
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रचनाकार
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