आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ६ - आध्यात्मिकता और शिक्षा - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

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अध्याय : ६

आध्यात्मिकता और शिक्षा

पिछले दस वर्ष के दौरान आध्यात्मिकता में लोगों की दिलचस्पी आत्यंत बढ़ गई है. इस का प्रमाण पिछले दशक में इस विषय पर प्रकाशित पुस्तकें और अनेक विद्वानों के निबंध हैं. यह सही में संतोषदायक घटना है. क्यों कि आध्यात्मिकता की समझदारी विद्यार्थिओं के जीवन पर और हमारे समाज की प्रत्येक मनुष्य में अच्छा सा सुधर ला सकती है.

ज्यूडिथ नील (Judith Neal) के एक निबंध 'टीचिंग विद सोल' (Teaching with Soul) में कुछ शिक्षक वर्ग में प्रवेश करने से पहले आध्यात्मिकता को किस प्रकार से निष्पादित करते हैं इस के बारे में सुन्दर शब्दचित्र प्रस्तुत करते हैं:

'गेईल पोर्टर वर्ग में जाने से पहले अपने ऑफिस में मन को शांत कर के, प्रार्थना करते हैं कि उन के विद्यार्थी अच्छी तरह से सीख पाएं और इस में वह हृदयपूर्वक सहायक बने."

दूसरे एक शिक्षक, डेविड बेनर (David Banner) वर्ग में पढ़ाई की शुरुआत करने से पहले प्रत्येक विद्यार्थी पर स्नेहभाव से दृष्टि करते हैं. फिर अपने और विद्यार्थिओं के बीच एक अदृश्य आंतर-प्रवाह का संबंध है ऐसा सोचते हैं. इस से उन्हें स्पर्श करती हुई कोई शक्ति के आंदोलन (तरंग) वर्ग में फ़ैल रहे हैं ऐसी अनुभूति पाते हैं और इस के द्वारा आप शैक्षणिक कार्य किस प्रकार से करना है इस की प्रेरणा पाते हैं.

लेट डेविडसन (Let Davidsan) उमदा आंतरिक समझदारी की बात करते हैं कि 'मैं केवल किसी परमशक्ति का निमित्त मात्र हूँ. जब भी मैं किसी सभा का संचालन कर रहा होता हूँ तब मैं उस शक्ति को मेरे माध्यम के द्वारा कार्यरत होने देता हूँ. पढाते समय भी मैं अपनी और छात्रों के बीच अस्तित्व में रही एक प्रकार की अद्वैत एकता की भावना के प्रति सजग रहता हूँ.'

डोन मेक कोर्मिक (Don Mc Cormic) संस्थाओं में कार्यकर्ताओं को आध्यात्मिकता के बारे में जानकारी तथा मार्गदर्शन देते हैं. वे मैनेजमेंट के छात्रों को मानव संस्कृति के महान ज्ञानी और सदाचारी मनुष्यों की जीवनकथा अध्ययन करने हेतु देते हैं. बाद में जो पढ़ा उस के बारे में मनन कर के जो सिखा उस का उपयोग करते हुए विद्यार्थी सार्थक रूप से कार्य कैसे कर सकते हैं और कार्य करते समय उस में अधिक उच्च उद्देश्य किस प्रकार से जोड़ा जा सकता है इस के बारे में स्पष्ट ज्ञान और प्रेरणा देते हैं.

आध्यात्मिकता के बारे में अब बिजनेस कोलेजों में, मैनेजमेंट परामर्शदाताओं में और व्यावसायिक संस्थाओं में अधिक सहज भाव से विचार-विमर्श होने लगा है. शैक्षणिक और व्यवहारिक संस्थानों के व्याख्यानों में अब 'आध्यात्मिकता' और 'आत्मा' जैसे शब्दों का उपयोग काफी अधिक मात्रा में होने लगा है.

वर्त्तमान समय के शैक्षणिक संस्थानों में और विशेष रूप से मैनेजमेंट शिक्षा क्षेत्र में आध्यात्मिक प्रवृत्ति को मान्यता देने की एक नई प्रवृत्ति स्वीकार्य बनती जा रही है. हो सकता है ऐसा भरोसा व्यक्तिगत रूप से हो, जैसे कि - शिक्षक या अध्यापक अपनी निजी आध्यात्मिक यात्रा कर रहा हो. इस के अलावा शिक्षकगण और व्यावसायिक लोग आध्यात्मिकता की भूमिका के बारे में अन्वेषण कर रहे हैं और उस का अर्थ जानने के लिए प्रयत्नशील हैं. संस्थाओं में आध्यात्मिकता किस प्रकार से मार्गदर्शक बन सकती है और इस प्रकार से उसे अधिक कार्यक्षम बनाया जा सकता है जिस से वह सहायक बन सके उस विषय पर भी संशोधन हो रहे हैं.

फिर भी, पश्चिम के देशों में और विशेष रूप से अमरीका में, आध्यात्मिकता का अध्ययन कराने के लिए शिक्षकों से बात करने पर एकदम सन्नाटा छा जाता है, अथवा अस्वस्थता नजर आती है. कभी कभी तो इस विषय के बारे में विरोध होता हुआ भी दिखाई देता है. अध्यापकों के और विशेष रूप से प्राध्यापकों के ऐसे रवैये के लिए कुछ कारण हैं. सबा से पहला कारण है - ऐसे देशों की नीति जो धार्मिक विश्वासों एवं धारणाओं को कक्षा में डी जाती शिक्षा से अलग करने का सूचन करती है. इस नीति के इतिहास की गहराई में जाने से कुछ रोचक तथ्य मिलेंगे. मध्यकालीन योरप में धर्मगुरुओं का राजनीति में बड़ा आधिपत्य था. उस समय की धार्मिक विश्वासों के खिलाफ कोई कुछ बोल नहीं सकता था. जो कोई भी विरोध दर्शाता था उसे सजा डी जाती थी. उस के ऊपर अत्याचार किए जाते थे और कुछ लोगों को जिन्दा जला दिए जाते थे! वास्तव में उस समय धार्मिक असहिष्णुता का ही राज था. वैज्ञानिक कई बार ऐसी असहिष्णुता के शिकार होते थे. उदाहरण के तौर पर इटालियन वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री गेलेलियो को दूरदर्शक यंत्र (Telescope) का आविष्कार किया और सिद्ध किया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है , सूर्य पृथ्वी के चरों ओर नहीं घूमती. ऐसी घोषणा उस समय के धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध होने से उसका सिर कलम कर देने का फरमान जरी किया गया परंतु अपनी जान बचाने के लिए यह घोषणा गलत थी ऐसा कह दिया था!

जब कोलंबस ने योरप में सब को अमरीका महाद्वीप के बारे में बताया तब ऐसे धार्मिक अत्याचारों से बचने के लिए कुछ लोग अपनी जान खतरे में डालकर भी अमरीका आ गए और सर्व सम्मति से तय किया कि इस नए देश में धार्मिक विश्वासों को राजनीति से अलग रखा जाए. साथ में ऐसी नीति का भी अमल किया गया कि प्रत्येक मनुष्य के अपने धार्मिक विश्वास हो सकते है और उस में राजनीति की कोई दखलंदाजी नहीं होगी. इस के साथ यह भी तय हुआ कि धार्मिक विश्वासों की शिक्षा चर्च में डी जा सकती है किंतु शाली कक्षा में नहीं. ऐसे रुख के पीछे का हेतु अच्छा था कि बच्चे और कोलेज के विद्यार्थी अपनी धार्मिक श्रद्धा का मुक्त रूप से पालन कर सके. परंतु कोई अन्य विद्यार्थी पर उसे जबरन थोप न पाए. क्यों कि कक्षा में कोई एक श्रद्धा के बारे में सिखाया नहीं जा सकता. ख्रिस्ती धर्म में भी कई धार्मिक पंथ हैं, जैसे कि प्रोतेस्तंत, रोमन कैथलिक, बाप्टिस्ट इत्यादि और अब तो विभिन्न धर्मों के कई विद्यार्थी पश्चिम के देशों में जाने लगे हैं.

आजकल 'धर्म का मतलब आध्यात्मिकता' ही होता है ऐसा विचार पश्चिम के देशों में इतना दृढ़ हो गया है कि इस देश के शिक्षक आध्यात्मिकता का उल्लेख करते हुए भी झिझकते हैं और कक्षा में उस की शिक्षा देने के लिए इच्छुक नहीं. वास्तव में यहां का समाज धर्म और आध्यात्मिकता की मिलावट कर रहे हैं. धर्म और आध्यात्मिकता के बीच का फर्क इसी पुस्तक के द्वितीय अध्याय में विस्तृत रूप में दर्शाया गया है. जब तक यह भिन्नता पश्चिम के देशों को समझ में नहीं आती तब तक वहां पर विद्यार्थिओं को कक्षा में आध्यात्मिकता का अध्यापन नहीं कराया जा सकता. यह बड़ी ही शोचनीय बात है. विद्यमान विद्यार्थी पश्चिम के देशों के पाठ्यक्रमों का अविचारी अनुकरण कर रहे हैं और इस से ये विद्यार्थी आध्यात्मिकता के शिक्षण से वंचित रह जाते हैं. इस से अधिक दयनीय स्थिति और कौन सी हो सकती है?

शिक्षण में आध्यात्मिकता की ओर दुर्लक्ष्य का दूसरा कारण यह है कि पश्चिम के शैक्षणिक संस्थान शिक्षा (ज्ञान प्राप्ति) को मर्यादित दिशा की ओर मोड़ते हैं. जो ज्ञान वैज्ञानिक पद्धति से पाया जा सके केवल वही सच्चा ज्ञान है ऐसा ये शैक्षणिक संस्थानों का विश्वास है. संक्षेप में वैज्ञानिक पद्धति से मतलब है जिसे अपनी इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सके ऐसा ज्ञान, ऐसी शिक्षा - जिस का प्रमाण इन्द्रियों के जरिए मिल सके. ऐसा ज्ञान भौतिक विश्व में केवल नापी जा सके ऐसी बातों पर ही केंद्रित रहता है. इस का अर्थ है जो ज्ञान इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता और जिस का वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा अध्ययन नहीं हो सकता उस को पाठ्यक्रम के अंतर्गत समाविष्ट नहीं किया जा सकता.

इस समय पश्चिम के शैक्षणिक संस्थानों का अभिप्राय है कि हम जो कुछ भी जानते हैं उन्हें सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत ऐसे दो क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है: उसे वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ 'सत्य' समझा जाता है. इस से धार्मिक विभाजन का सर्जन होता है. वैज्ञानिक ईश्वर पर विश्वास रख सकते हैं, किंतु उसे सच्चा वैज्ञानिक ज्ञान नहीं समझा जाता. क्यों कि वैज्ञानिक रूप से ईश्वर का प्रमाण नहीं दिया जा सकता. किसी भी वैज्ञानिक की प्रयोगशाला की गतिविधि पर वैज्ञानिक के ईश्वर के विश्वास का प्रभाव नहीं होना चाहिए. ऐसी बातों पर विश्वास करनेवाले लोगों के लिए वैज्ञानिक प्रमाण सब से अधिक महत्वपूर्ण विषय है. क्यों कि वैज्ञानिक अन्वेषण प्रत्येक बात का स्पष्ट व सरल सत्य दर्शाता है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ये लोग अलौकिक तत्व को वैज्ञानिक परीक्षण के लिए अयोग्य कहकर नकार देते हैं या उसे निजी पसंदगी का क्षेत्र समझ लेते हैं, और शैक्षणिक दृष्टि से क्या योग्य है इस के बारे में कायदे-क़ानून वे ही तय करते हैं.

आध्यात्मिकता को कक्षा में अध्ययन से अलग राकहने का तीसरा कारण उसकी परिभाषा की समस्या है. आलोचक ऐसी बहस करते हैं कि आध्यात्मिकता की विविध पुस्तकें और निबन्धों के लेखक आध्यात्मिकता की अस्पष्ट अर्थ में परिभाषा दे कर संतुष्ट हो गए हो ऐसा लगता है. और एक समस्या यह है कि उस विषय पर प्रकाशित साहित्य या लेखों से उसकी स्पष्ट, निश्चित परिभाषा नहीं मिलती. आम तौर पर उच्च शिक्षण में ऐसा विश्वास कायम है कि किसी भी विचार, विश्वास या ख्याल के लिए कोई मानदंड होना आवश्यक है. यह मानदंड निश्चित करने, के लिए उस की उचित परिभाषा का होना आवश्यक है. ऐसे मानदंड के अभाव में उस विषय पर अन्वेषण और अध्ययन नहीं हो सकता. और जिस में संशोधन नहीं हुआ हो ऐसे विषय को उच्चतर शिक्षा में स्थान नहीं दिया जा सकता.

क्या शिक्षण में, विशेष रूप से उच्चतर शिक्षण में ऐसा तर्क आध्यात्मिकता की उपेक्षा करने की बात का समर्थन करता है? हाल के कई शिक्षाशास्त्रियों का कहना है कि ऐसा करना भारी भूल है.

कोई ऐसा तर्क प्रस्तुत कर सकता है कि नेतृत्व का ख्याल, आध्यात्मिकता में परिभाषा जैसी ही कमजोरी दर्शाता है. इसका अर्थ यह हुआ कि विद्वानों के लेखों में नेतृत्व की अवधारणा पर विभिन्न पाठ्यक्रम के अनुसार अध्ययन हो रहा है. नेतृत्व के पाठ्यक्रम में कुछ सैद्धांतिक बातों को समाविष्ट किया गया है. जैसे कि:

ü नेतृत्व के लक्षण पर आधारित सिद्धांत

ü नेतृत्व के आचरण से संबंधित नेतृत्व के सिद्धांत.

ü आकस्मिक संयोग संबंधित नेतृत्व के सिद्धांत.

ü व्यवहार से संबंधित नेतृत्व के सिद्धांत.

ü संस्था को परिवर्तनशील बनानेवाले नेतृत्व के सिद्धांत.

ü प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता से संबंधित नेतृत्व के सिद्धांत.

नेतृत्व और मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम में नेतृत्व से संबंधित उपर्युक्त विषय के गुण दोष के साथ प्रभावकारी ढंग से विस्तृत विचार-विमर्श किया जाता है. विद्यार्थिओं को तथा उस का आचरण करनेवालों को इस सिद्धांत के साथ आगे बढ़ने में अत्यंत लाभ होता है. आधात्मिकता सिखने के समय हम ऐसे ही सिद्धांतों का पालन कर सकते हैं. कुछ लेखकों ने आध्यात्मिकता के विविध परिणाम दर्शाएँ हैं:

डोरोथी मार्सिक ने अपनी पुस्तक 'मेनेजिंग विद द विजडम ऑफ लव' (Dorothy Marcic: 1997: Managing With The Wisdom of Love) में आध्यात्मिक नियम दे कर उस की परिभाषा देने की समस्याओं को समझते हुए अन्य रीत अपनाने का सुझाव दर्शाया है: 'प्राचीन मुसलमान परम्परा 'गुलाब की खुश्बों के उदाहरण' द्वारा आध्यात्मिकता की परिभाषा देने का प्रयत्न करती है. कुछ लोगों का ऐसा कहना है कि ऐसी परिभाषा देना असंभव है. मधुर सुगंध किस कहते हैं यह हम सब जानते हैं और उस के प्रति हम कैसा प्रतिभाव दर्शाते है यह भी हम जानते हैं. किंतु क्या हम उस का शब्दों में वर्णन कर सकते हैं? यह ओर बात है. इसी प्रकार से प्रेम और आध्यात्मिकता ऐसे ही विषय है जो कि इन्द्रियों की भौतिक दुनिया की भाषा में व्यक्त करने की कोशिश करने पर भी सफलता पाने की संभावना कम है."

"हमारी आधुनिक टेक्नोलोजी और बहुत सारी जानकारी विज्ञान की भाषा पर आधारित हैं, यह इस भौतिक विश्व के विषयों की परिभाषाएँ विस्मयकारी तरीके से देती हैं और उसे नाप भी सकते हैं. परंतु यह उतने ही अच्छे तरीके से अध्यात्म और प्रेम के विश्व को नहीं समझा पाती, न ही उसका प्रमाण दे पाती है और न ही उस की मात्रा जान सकती हैं. उदाहरण के तौर पर: 'मैं जानती हूँ कि मेरे पति मुझ को चाहते हैं, किंतु मैं इस बात को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं कर सकती और उस की मात्रा भी नहीं जान सकती. फिर भी मैं मेरे भीतर गहराई से उसका निश्चित रूप से अनुभव करती हूँ.' प्रेम की यह निश्चित अनुभूति का मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती या उसे ठीक रूप से समझा भी नहीं पाती. इसी कारण से मैं आशा करती हूँ कि पतागण यह समझ पाएगा कि भाषा की मर्यादा के कारण आध्यात्मिकता और प्रेम के बारे में लिखने की मेरी कोशिशें अपूर्ण ही रहेंगी."

आध्यात्मिकता आत्मा तथा परम-पवित्र शक्ति की परिभाषा दर्शाता दिशा-निर्देशक शब्द है. यह ऐसा विश्व है जिसे हम देख नहीं पाते या उसे हम नाप नहीं सकते - यह अभौतिक विश्व है, किंतु यह भौतिक विश्व की ही तरह हमारे चारों ओर विद्यमान है. आध्यात्मिकता इस विश्व के साथ संपर्क स्थापित करने का साधन है. उसे हमारी श्रद्धा, आचरण, प्रवृत्ति एवं व्यवहार से समर्थन प्राप्त होता है और इन से उस का विकास होता है. हमारे भौतिक विश्व के साथ के संबंधों में हमारे अपने आध्यात्मिक विकास से संबंधित संकेत नजर आते हैं, जैसे कि हम दूसरों के साथ कैसा आचरण करते हैं, हम सृष्टि के पर्यावरण को किस प्रकार से सुरक्षित रखते हैं और कार्य करने के प्रति हमारा रवैया कैसा है, इन में हमारे आध्यात्मिक विकास की झलक दिखती है.

आध्यात्मिकता का विकास करने के लिए हमें भौतिक विश्व के उस पार के अदृश्य होने पर भी जो विद्यमान है ऐसे अपार्थिव अस्तित्व पर विश्वास करना ही पडता है. इस का प्रमाण हवा से उत्पन्न घंटी की गूँज जितना ही स्पष्ट है. फिर भी कई लोग जाने अनजाने लोग उस पर विश्वास करने में और समझने में संदिग्ध रहते हैं. शायद आध्यात्मिकता को हम आध्यात्मिक नियमों के द्वारा अधिक अच्छी तरह से समझ सकेंगे. ये नियम गुरुत्वाकर्षण के नियम जितने सरल नहीं होते कि जिसे गणित के समीकरण की तरह समझाया जा सके.

Ø आध्यात्मिक नियम :

मैं यह नहीं जानता कि हवाईजहाज कैसे उड़ता है. चाहे मैं यह समझूँ या नहीं, किंतु यह तो उड़ता ही है.

पिछले बीस वर्ष से मैनेजमेंट सलाहकार होने के नाते विश्व के विविध देशों में जाने के लिए मैंने कई बार वायुयान से आवागमन किया है. मैं जब भी हवाईजहाज में बैठता हूँ, मैं विस्मित होता हूँ कि इतना बड़ा, हजारों टन वजनवाला हवाईजहाज हार्बर धरती से ऊपर कैसे से उड़ता होगा! तीव्र गति से गतिमान हो कर इतना विराट पदार्थ हवा में कैसे उड़ सकता है यह मेरी समझ के बाहर था.

मैंने एंजीनियरों को और उड्डयन क्षेत्र के सिद्धांतों में पारंगत लोगों से पूछ कर देखा. उनके स्पष्टीकरण सुनकर और मुझे समझाने के लिए बनाए गए आकारों को ध्यान से देखने के बावजूद मैं यह नहीं समझ सका. भौतिकशास्त्र के मेरे शाली ज्ञान भी हवाईजहाज के उड़ने के बारे बारे में कुछ काम नहीं आया. जब मैंने मित्रों से यह बात कही तब उन्होंने भी मेरे जैसा ही अभिप्राय प्रकट किया कि यह बात उनकी समझ में भी नहीं आती. वास्तव में हममें से किसी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जिसका वजन हजारों टन हो वह ऊपर उठकर आकाश में जा कर कैसे उड़ सकता है. फिर भी यह उड़ता है और मैं भी औरों की तरह हवाई यात्रा का टिकट खरीदता हूँ और विश्व में सर्वत्र सफर करता हूँ. मैं इस बात पर भरोसा रखता हूँ कि जिस प्रकार से उड्डयन के सिद्धांत काम करते हैं उस प्रकार से करते ही रहेंगे और इसी विश्वास पर मैं अपना जीवन दांव पर लगाकर यात्रा करता हूँ. यह श्रद्धा की बात है जिसे मैं समझ नहीं पाता और इस का स्पष्टीकरण भी नहीं दे सकता हूँ.

मेरा विश्वास है कि जिस में हम बसते हैं इस विश्व का संचालक केवल भौतिक नियमों के अनुसार ही होता है ऐसा नहीं है. किंतु उस में आध्यात्मिक नियमों का भी योगदान है. जैसे उड्डयन के विषय में मेरे ज्ञान का अभाव भौतिक नियमों को परिवर्तित नहीं करते हुए हवाईजहाज के उड़ने की बात पर प्रभाव नहीं पड़ता, ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक नियमों का है. हम ये नियमों का स्वीकार करें या न करें, किंतु उन की शक्ति और उन के बारे में उन के महत्व का हम पर जो प्रभाव पड़ता है उस में कोई परिवर्तन नहीं होता. भले ही हम उन्हें समझें या नहीं, फिर भी ये रहस्यमय तरीके से सक्रिय रहते ही हैं.

Ø कई धर्म, एक सन्देश :

जो आध्यात्मिक नियम मनुष्य के आचरण के बारे में उपदेश देते हैं उन्हें विश्व के सभी धर्मों ने और तत्व ज्ञानिओं ने हजारों वर्षों की मेहनत व तजुर्बे के बाद सुनिश्चित किए हैं और उन में उल्लेखनीय सुसंगतता है. विवरण-१ में विविध धर्मों से ऐसे कुछ नियम दर्शाए गए हैं. सही तरीके से जीवन जीने और स्वस्थ समाज का निर्माण करने के लिए हमें इन प्राचीन बोध सारे महान धर्मों के धर्मगुरुओं के द्वारा दिए गए हैं. शब्दरचना भिन्न हो सकती है परंतु मूलभूत रूप से सन्देश वही है. आप के पड़ोसियों से प्रेम करो, प्रामाणिक बनें, न्यायपूर्ण जीवन जिएं, आप के आवेगों को नियंत्रित करें, भ्रष्ट आचरण से दूर रहें, आप के हेतु व इरादे शुद्ध रखें और आप के अन्य बंधु-बांधवों की सेवा करें.

यदि धर्मगुरु हजारों वर्षों से यही उपदेश प्रत्येक युग में देतेरे आए हैं तो फिर उनमें कुछ तो प्रबल तत्व होना ही चाहिए जो हमारा महत्वपूर्ण मार्गदर्शन करने के लिए शक्तिमान है.

Ø प्रेम में दक्षता (समझदारी) :

ये सारे मार्गदर्शक सिद्धांतों की बुनियाद में एक मूलभूत नियम है: आप के पड़ोसियों से प्रेम करें और आप दूसरों से जैसे व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं ऐसा व्यवहार अपने पड़ोसियों के साथ करें. यद्यपि सभी धर्म सिद्धांत 'प्रेम करें' शब्दों का प्रयोग नहीं करते, फिर भी प्रेम करना सारे आध्यात्मिक नियमों का प्रमुख सूर है. इस बोध को 'प्रेम की समझदारी' कहते हैं और उसी के आधार पर प्रतिष्ठित जीवन के सारे नियम बनाए गए हैं.

आध्यात्मिक नियमों का पालन करने से हम अपनी आध्यात्मिक प्रकृति को विकसित कर सकते हैं और इस से हम भरोसा, आदर, धैर्य जैसे सदगुण प्राप्त करते हैं. बाद में यी सदगुण हमारी आंतरिक आध्यात्मिकता को प्रकट करने लगे हैं और उस का मूल निर्मल प्रेम में है, चाहने में है.

जब ऐसा पूछा गया कि सब से अधिक महत्वपूर्ण आदेश (Commandment) कौन सा है तब इशु ने जवाब दिया कि, "आप की आत्मा से हृदयपूर्वक, पूर्ण रूप से ईश्वर को प्रेम करें और दूसरा महत्वपूर्ण आदेश जिस प्रकार आप स्वयं को प्रेम करते हो उसी प्रकार से अपने पडोसी से प्रेम करें," इस से अधिक महान आदेश और कोई नहीं. (मार्क १२:२९:३१). इन आदेशों का महत्व इतना अधिक है कि इन्हें 'सुनहरे नियम' कहते हैं. असल में पश्चिम के समाज में कई लोग इस सिद्धांतों को इशु से पहचाने जाते हैं. परंतु यह ख़याल हजारों वर्षों से अस्तित्व में है और यह अधिकतर धर्मों का अभिन्न अंग बन गया है. इस के मूल यहूदी धर्म, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और प्राचीन जरथुष्ट्र (पारसी) धर्म के समय में पाए जाते हैं. यह बात निम्नानुसार जानकारी से सिद्ध होती है:

विवरण : १ : विश्व के धर्मों के आध्यात्मिक नियमों की एक झलक

नियम धर्मग्रन्थ से उद्धरण (गृहीत अंश)

विश्वसनीय बनें तुम अपने पड़ोसियों के विरुद्ध झूठी गवाही नहीं दोगे.

ख्रिस्ती: द बाइबल : एक्झोडस : २०:१६)

सत्य की भेंट सारी भेटों से कई गुना वेहतर है.

(बौद्ध धर्म, धम्मपद: ३५४, १९७३)

अनासक्त रहें असत्य बोलनेवाले की आत्मा हमेशा पीड़ित रहती है.

अहम से दूर रहें (जोरोस्ट्रीन गाथाएँ: यास्ना: ४५:७, मेहर: १९९१, पृष्ठ-९९)

क्रोध, तिरस्कार और शत्रुता से परे रहें.

जीवन के प्रत्येक कदम पर यह सर्वसम्मत आचरण है. (हिंदु, धर्म सूत्र, ८:१, लेखक मोर्गन, १९५३, पृ.-३२४- ३२५)

सेवा करते रहें सब के कल्याण के लिए जीवन जीने को अपना ध्येय बनाएँ. (हिंदु, भगवद गीता : ३:२०)

क्या विश्व में ऐसा कोई कार्य है जो सब के लिए कल्याणकर सेवा से अधिक उमदा हो? मानवजाति की सेवा ही पूजा है.

('बहाई' पेरिस व्याख्यान: अब्दुल बाहा, पृष्ठ-१७७)

दूसरों से प्रेम करें धिक्कार से धिक्कार को नहीं जीता जा सकता. धिक्कार को प्रेम से ही जीता जा सकता है. यह शाश्वत नियम है.

(बौद्ध धर्म, धम्मपद, ५, १९७३)

आप के शत्रु से प्रेम करें, आप को शाप देनेवाले को आशीर्वाद दें. स्वयं की तरह आप के पडौसी से प्रेम करें.

(ख्रिस्ती, बाइबल, मेथ्यु : ५:४४, १९:१९)

शेरी एल. होप अपनी पुस्तक 'सर्चिंग फॉर स्पिरिचुअलिटी इन हायर एज्युकेशन' (Sherry L. Hoppe: Searching for Spirituality in Higher Education) में आध्यात्मिकता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करते हैं:

'हालांकि शैक्षणिक एवं व्यावसायिक संस्थानों में हाल में आध्यात्मिकता सब से अधिक परिचर्चा का विषय है, फिर भी इस विषय की अधिकतर पुस्तकें शायद ही उसकी कोई एक सर्वसम्मत परिभाषा पर सहमत होते हैं. यह सुन्दर और अलौकिक विषय की परिभाषा देने के प्रयासों में साथ मिलकर काम करने की भावना (टीमवर्क) जैसी सरल बात से ले कर दिव्य तत्व के साथ संबंधित बातों पर विचार-विनिमय किया गया है. मार्सिक (Marcic) आध्यात्मिकता के विषय पर पिछले दस वर्षों में प्रकाशित लगभग १०० पुस्तकें और उतने ही लेख-निबन्धों का अध्ययन करने बाद नोट करते हैं कि उनमें से २० प्रतिशत जितने प्रकाशन ईश्वर अथवा परम शक्ति का उल्लेख करते हैं. उस की तुलना में उनके अधिकतर लेख समूह भावना, आत्मीयता, समत्व, नैतिकता, उपासना और सर्जनात्मक शक्ति से संबंधित बातों पर अधिक जोर देते हैं. जो लेखक आध्यात्मिकता को ऐसे शब्दों में प्रस्तुत करते हैं वे साधारण रूप से उसे धर्म के साथ जोड़ते नहीं है. अन्य एक लेखक, हेरियट (Heriot) धर्म और आध्यात्मिकता का तफावत स्पष्ट करते हैं और ऐसा करने में आप आध्यात्मिकता के कई पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं. जिन में धर्म और लोगों की अंतरतम भावनाओं का समावेश होता है. उस आध्यात्मिकता को जीवन के निजी मंतव्यों के साथ और मनुष्य की आंतरिक शक्ति के रूप में दर्शाया गया है. धर्म को बाह्य प्रथा के रूप में समझा जाता है. हेरियट के द्वारा जो मानव चेतना की आवश्यकताओं का निरूपण किया है, उस में जीवन का अर्थ के हेतु, दुःख के कारण, प्रेम व संबंध के तानेबाने, क्षमा, ज्ञान प्राप्ति की तीव्र इच्छा, जीवन के अदभुत रहस्य तथा आत्मा को पहचानने की भावना जैसी बातों का भी समावेश होता है. इनमें से कुछ बातें धर्म के द्वारा भी समझाईं जा सकतीं. जब की अन्य बातें दिव्यता या परम शक्ति के बगैर नहीं समझाईं जा सकतीं. क्लर्क (Clerk) आध्यात्मिकता और धर्म के बीच कुछ अधिक सुमेल देखते हैं, परंतु आपकी परिभाषा दोनों के बीच का अंतर भी दर्शाती है: "आध्यात्मिकता मन से पृथक ऐसे अपार्थिव स्वरूप को सूचित करती है, जब कि धर्म उस के शास्त्रीय सिद्धांतों के साथ संबंधित है और यह उस धर्म के लोगों की श्रद्धा एवं विश्वास पर आधारित है."

अमरीका के प्राध्यापक होप (Hoppe) आध्यात्मिकता की परिभाषा इस प्रकार से देते हैं:

'अपने समग्र अस्तित्व की गहराई की और अर्थ की खोज.'

Ø नेताओं के लिए आध्यात्मिकता के सन्दर्भ में आवश्यकताएँ:

नेताओं में अनिवार्य रूप से होनी चाहिए ऐसी निम्नानुसार आवश्यक बातों से नेताओं की आध्यात्मिकता उजागर होती हैं:

ü सहास्तित्व और एकता की दृढ़ भावना.

ü अखंडितता (पक्षपात एवं पूर्वग्रह रहित आचरण) और समत्व.

ü श्रद्धा, विश्वास, मूल्य और सदाचरण के सुमेल से मिलती शक्ति.

ü परिस्थिति पर आधारित घटनाओं का स्वीकार, समझदारी और सहिष्णुता तथा क्षमा के प्रति झुकाव.

फेन-यी-होन्ग (Fan Yi Hong) अपनी पुस्तक 'ट्रांसफ़ोर्मिंग केम्पस लाइफ' (Transforming Campus Life) में प्रकाशित निबंध 'क्रिएटिंग अ लर्निंग कम्यूनिटी एंड द कोर वेल्यूज ऑफ स्पिरिचुअलिटी' (Creating a Learning Community and the Core Values of Spirituality) में अलग ही पहलूओं के साथ आध्यात्मिकता के अन्य मूल्य दर्शाए गए हैं.

Ø आध्यात्मिकता के मूलभूत मूल्य :

ü विभिन्न संस्कृति और भिन्न धार्मिक्तावाले लोगों की आध्यात्मिकता के विषय की समझदारी और परिभाषा अलग अलग होती है. इसलिए आध्यात्मिकता के सर्वसम्मत मूल्यों का सर तत्व जानना अत्यंत आवश्यक है. इस विषय के कुछ अभ्यासी समझ पाएं हैं कि प्रत्येक मनुष्य में जीवन का प्रमुख हेतुं और गहन अर्थ समझने की तीव्र इच्छा हमेशा विद्यमान होती है. आध्यात्मिकता के मूलभूत मूल्यों की सविस्तार विचार-विमर्श शिकागो में १९९० में आयोजित एक महत्वपूर्ण अधिवेशन में किया गया था. उस में विभिन्न सामाजिक तथा धार्मिक विश्वास रखनेवाले, अंतरराष्ट्रीय स्तर के ८० प्राध्यापकों ने हिस्सा लिया था. उन्होंने सर्वसम्मति से निर्णय लिया था कि आध्यात्मिकता में निम्न लिखित बातों का समावेश होता है:

ü एकदूसरे के साथ संयुक्त रूप से रहने की भावना.

ü प्रतिदिन जीवन का प्रमुख उद्देश्य और अर्थ खोजने की तीव्र उत्कंठा.

ü अखंडित (भेदभाव या पक्षपात रहित) और एकदूसरे पर आधारित जीवन का अनुभव.

ü भौतिक वस्तुओं की अधिकता रहित जीवन जीने की और अभिमुख होना.

ü निष्कपट और रचनात्मक भावों से भरा जीवन.

ü जीवन के गूढ़ रहस्य के बारे में गहन समझदारी व कृतज्ञता के भाव.

ये सब वास्तव में उत्तम आदर्श हैं, परंतु उनका शिक्षण में और व्यवहार में किस प्रकार से पालन किया जा सकता है? प्रवर्तमान असंगत, विभाजित, प्रतिकूल और नीरस बनते जा रहे शिक्षण में परिवर्तन कैसे लाया जाए ता कि यह अधिक सुविचारित, उत्तेजनात्मक और समाज की परिस्थिति के लिए अनुरूप व सुयोग्य बन सके. जिस से विद्यार्थिओं में सीखने की तीव्र उत्कंठा जगे और शिक्षण के प्रति तिरस्कार के भावों के स्थान पर अध्ययन का आनंद ले सकें.

कोलेज और युनिवर्सिटी का हाल का रुधिग्रस्त पाठ्यक्रम का ढांचा जो शिक्षण को सीमित कर रहा है, उस में अच्छा सुधर कैसे किया जा सकता है इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए.

क्या केवल कक्षा में ही शिक्षण संभव है? क्या एक घंटे का तस होना आवश्यक है? शिक्षण का मानदंड क्या केवल अर्जित गुणों के आधार पर ही हो सकता है? क्या केवल शिक्षक को ही शिक्षा का ताजगी मानकर सारे शिक्षण का संपूर्ण दायित्व उसे ही सौंप देना चाहिए?

यदि हम साथ मिलकर शिक्षण का विकास करना चाहते हैं और इस विषय में हम स्वयं सिखने के लिए तैयार होते हैं तो एक जानेमाने शिक्षणशास्त्री हमें ऐसे प्रश्न करने के सुझाव देते हैं.

ऐसे प्रश्न करने का उद्देश्य यह है कि आध्यात्मिकता केवल निश्चित समय पर कक्षा में ही नहीं, किंतु कक्षा के बाहर दैनिक जीवन में विद्यार्थी उस का पालन अपने आचरण में कर सके इस में केवल शिक्षक ही नहीं, किंतु समाज का प्रत्येक मनुष्य योगदान दे सकता है; और एकदूसरे के सहयोग से सीख सकें ऐसी शिक्षा जीवन पर्यंत चलती रहे यह आवश्यक है. एलेकझंडार और हेलन ऑस्टिन तथा जेनिफर लिंडहाम (Alexander & Helan Austin and Jennifer Lindham) अपनी पुस्तक में आग्रहपूर्वक यह दर्शाते हैं कि आध्यात्मिकता के भिन्न भिन्न पहलू स्पष्ट रूप से जान कर समझ सकते हैं और तदनुसार उस की परिभाषा दे कर उसकी मात्रा नापी जा सकती है.

किसी मनुष्य या विद्यार्थी की आध्यात्मिकता को मात्रा और उसके भाव और भीतर के दो और दो बाहर के अंकों को जांच कर नापा जा सकता है.

नोट: इन भावों को जानने के लिए एक प्रश्नपत्र तैयार किया जाता है और जो लोग ऐसे परीक्षण में शामिल होना चाहते हैं उन्हें दिया जाता है. प्रत्येक व्यक्ति इस प्रश्नपत्र में पूछे गए प्रश्नों के जवाब लिखकर उसे लौटाते हैं. इस पद्धति को अंग्रेजी में 'क्वेश्चनेर सर्वे (Questionnaire Survey) (प्रश्नोत्तरी सर्वेक्षण) कहा जाता है. इन प्रत्युत्तरों का विश्लेषण कर के उसका अंक तय किया जाता है. इस से मनुष्य कितना आध्यात्मिक है यह जाना जा सकता है.

Ø आध्यात्मिकता की भीतरी भावनाओं का विवरण :

१) आध्यात्मिकता के बारे में जानने की उत्कंठा.

- जीवन का हेतु और अर्थ जानने की कोशिश.

- जीवन के रहस्यों की खोज.

- जीवन में सुमेल-संगति की भावना/चाह.

- कुछ विकसित करने की, सिद्ध करने की, प्राप्त करने की, जानने की इच्छा.

२) स्वभाव की स्वस्थता :

- जीवन में शांति और समता बनाए रखने की शक्ति.

- संकट के समय में उस का अर्थ समझने की शक्ति/योग्यता.

-प्रत्येक दिन को जीवन की अत्यंत मूल्यवान भेंट के स्वरूप में स्वीकार कर आनंद मनाने की समझदारी.

(स्वभाव की ऐसी स्वस्थता को आध्यात्मिकता की मूलभूत अवस्था के रूप में स्वीकार जाता है.)

Ø आध्यात्मिकता की बाहरी भावनाओं का विवरण:

ऐसे भावों से मनुष्य अपने आसपास के लोगों के साथ अपने संबंधों की डोर कितनी सुदृढ़ है, कितनी मजबूत है तथा सब की परवाह करने की और सेवा करने की भावना कैसी है और उसकी मात्रा जानी जा सकती है.

- किसी मनुष्य का आवश्यक मूल्यों के प्रति दायित्व लेने की भावना, उदाहरण के लिए आपत्ति में दूसरों को सही करना, विश्व की यातनाएं दूर करने की कोशिश करना, वर्ण भेद, जाति भेद इत्यादि की सही परख करना और लोगों की अनुचित विचारधारा में परिवर्तन लाना और दुनिया को रहने के लिए रमणीय बनाना.

- दान देने के प्रति झुकाव रखना, सामाजिक सेवा में शामिल होना, धन का दान करना, मित्रों को और रिश्तेदारों को मुश्किलें दूर करने में सहयोग देना.

- वैश्विक एकता की भावना, अन्य धर्मों के विश्वासों को समझने और उनका अध्ययन करने की इच्छा, दूसरे देशों की सभ्यता के बारे में जानकारी प्राप्त करने की और झुकाव, समस्त मानवजाति के साथ एकता का अनुभव करना, सभी में कुछ न कुछ अच्छे गुण विद्यमान होते है और सब एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं ऐसी दृढ़ प्रतीति. जो जैसा हो वैसे ही उस का स्वीकार करने की समझदारी और प्रत्येक महान धर्म का मूल सच्ची प्रेमभावना है ऐसा दृढ़ विश्वास.

इसी प्रकार से दूसरी प्रश्नावली बनाकर व्यक्ति की या विद्यार्थी की धार्मिकता का अंक प्राप्त कर के उस की मात्रा जानी जा सकती है. इस प्रश्नावली में धर्म के विभिन्न पहलुओं और भावनाओं के बारे में प्रश्न पूछे जाते हैं. उपर्युक्त प्राध्यापक/अन्वेषक: अलेकझांडर, हेलन और जेनिफर (Alexander, Helen and Jennifer) ने ऐसा प्रश्नपत्र तैयार किया है. किंतु यहां उस के बारे में बात करने की आवश्यकता नहीं है.

अन्य संशोधकों ने आध्यात्मिक जीवन की विशेषताओं के विषय में परिचर्चा करते हुए यह दर्शाया है कि उस की प्रमुख विशेषता मनुष्य के जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों के ऊपर आधारित है. विश्व सदाचार संस्था: इंस्टीटयूट फॉर ग्लोबल एथिक्स (Institute for Global Ethics) के द्वारा किए गए एक संशोधन में विश्व के विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विश्वास रखनेवाले कई लोगों के मानवता के मूल्य विषयक अभिप्राय जानकार निम्नलिखित सारांश प्रस्तुत किया गया है:

- न्यायपूर्ण प्रामाणिक व्यवहार/आचरण.

- स्वतन्त्र रूप से सोचने की आदत.

- एकता.

- सहनशीलता.

- जिम्मेवारी.

- जीवसृष्टि के लिए आदर.

- प्रेम.

उपरोक्त सूची देखकर कोई अपने आप से प्रश्न कर सकता है कि क्या मेरे भीतर ये मूल्य है भी? इस सूची में मैं क्या जोड़ सकता हूँ अथवा मुझ में क्या कमी है? ऐसा प्रश्न करने का हेतु यह है कि हम क्या है और हमें क्या करना चाहिए यह जानने का हमें अवसर मिलता है. और क्या हमारे भीतर कोई विशिष्ट गुण है यह भी जान सकते हैं. इस प्रकार हम अपनी आंतरिक क्षमता को पह्चान कर कौन सा गुण हमारे जीवन में सब से अधिक महत्वपूर्ण है यह सुनिश्चित कर सकते हैं.

मौजूदा गतिशील विश्व में, जहाँ असाधारण तेजी से परिवर्तन हो रहा है ऐसी स्थिति में प्राचीन समय के सूत्र व आदेश हमें सतर्क करते हैं और दिशानिर्देश भी करते हैं कि हमें ऐसे मूल्यों की (लंगर की) आवश्यकता है, जो हमें स्थिर रख सकें. जो जीवन की दिशा के विषय में निर्णय करने में सहयोगी बनें.

Ø शिक्षण में और समाज में आध्यात्मिकता के प्रति उदासीनता:

जुडी रेपर (Judy Raper) आपने एक निबंध में, विशेष रूप से, शिक्षा में आध्यात्मिकता के प्रति उदासीनता के विषय में अवलोकन करते हुए स्पष्ट रूप से कहतीं हैं कि, इस समय का समाज ऐसे रवैये के लिए भारी कीमद चुका रहा है.

"शैक्षणिक क्षेत्र में आध्यात्मिकता और धर्म के विषय के प्रति उदासीनता के कारणों को मैंने देखा है. इस समय के कोलेज के विद्यार्थिओं की नीतिमत्ता, भावनाएं और आध्यात्मिकता के बारे में विश्वासों का भी मानसिक शब्दचित्र बनाने की कोशिश की है. इस बात को ध्यान में रखते हुए शैक्षणिक संस्थानों का मौन और कक्षा में आध्यात्मिकता की उपेक्षा और नापसंदगी का प्रभाव भविष्य की पीढ़ी पर कैसा होगा? ऐसा सवाल अवश्य होता है. इस समय की नई पीढ़ी चेतना की परिपूर्णता का अर्थ समझना चाहती है, अच्छे-बुरे की परिचर्चा कर के अपने हिसाब से निष्कर्ष पर आना चाहती है. इस में उसे समाज से सहायता नहीं मिलेगी तो उस की बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को कितना नुकसान होगा क्या इस की किसी को परवाह है? विशेष रूप से शैक्षणिक संस्थान क्यों इस की परवाह नहीं करते?

शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थिओं की कक्षा के बाहर कुछ सीखने की प्रवृत्ति को प्रेरणा देनेवाले लोगों की यह जिम्मेवारी है कि विद्यार्थिओं का समग्र रूप से विकास हों. विद्यार्थिओं का आध्यात्मिक विकास उन के बौद्धिक, सामाजिक और शारीरिक विकास जितना ही महत्वपूर्ण है. उन के आध्यात्मिक विकास के प्रति उदासीनता दर्शाने का अर्थ ऐसा होता है कि विद्यार्थिओं के लिए यह आवश्यक नहीं. नतीजन विद्यार्थिओं की आध्यात्मिक यात्रा उन के भरोसे छोड़ दी जाती है और इस यात्रा की मुश्किलों का सामना किसी की भी सहायता के अभाव में उनको महाप्रयास से करना पडता है और जीवन के मूलभूत प्रश्न जो सब के मन में घुमड़ते हैं उनका सामना करना पड़ता है.

इस के उपरांत धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों की परिचर्चा कक्षा में नहीं करने से विद्यार्थिओं का विकास भी अपूर्ण रहता है. क्यों कि विद्यार्थी स्वतन्त्र रूप से सोचे और किसी भी विश्वास के अच्छे-बुरे पहलूओं की ठीक से जांच पड़ताल करें तथा उचित विचार-विमर्श करने के बाद ही उस का स्वीकार करें यही शिक्षा के विकास का प्रमुख व बौद्धिक हेतु है. यदि विद्यार्थिओं को धर्म या आध्यात्मिक विषय पर स्वतन्त्र रूप से सोचने और विचार विनिमय करने का अवसर नहीं मिलने पर, उन के बौद्धिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. इतना ही नहीं परंतु इन विषयों पर विद्यार्थी ने अपने परिवार से जो ज्ञान पाया है वही सबकुछ है, वही सर्वश्रेष्ठ है ऐसा विश्वास कायम कर लेते है, और अपनी मनोवृत्ति ऐसी ही बना लेते हैं. शैक्षणिक संस्थान ऐसे चिंतन व जांच-पड़ताल किए बटेर विद्यार्थिओं के ऐसे रुख का स्वीकार कैसे करें? जीवन के ये अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अत्यंत मूल्यवान विश्वास हैं. ये जांच रहित रहे ऐसा कैसे हो सकता है? धार्मिक व आध्यात्मिक विषय कक्षा में नहीं पढाने के दुष्परिणाम कई लोगों के ध्यान पर नहीं आते वे ये हैं कि इसी से विद्यार्थी नशीले पदार्थ व अनुचित पेय की ओर मुड जाते हैं. कोलेज के वरिष्ठ व प्रमुख संचालक प्रत्येक वर्ष शिकायत करते हैं कि विद्यार्थिओं में ऐसे अयोग्य पदार्थों का सेवन करने से हुल्लड, दंगे-फसाद, आत्महत्या के किस्से, निरंकुश जातीय संबंध और पढाई के प्रति लापरवाही बढाती जाती है. कोलेज के संचालक विद्यार्थिओं के ऐसे दुराचरण में सुधार लाने की कोशिश करते हैं, कई बार सख्त रवैया अपनाते हैं और अधिक व्यय करते हैं फिर भी ऐसे आचरण में सुधार नहीं होता और उनकी संख्या प्रति वर्ष बढती जाती है. यहां पर प्रश्न होता है कि संस्थानों की इतनी सारी कोशिशें कामयाब क्यों नहीं होती?

विद्यार्थी ऐसे अनुचित पदार्थों का सेवन क्यों करते हैं? इस का एक विवरण १९९८ में प्रकाशित हुआ था. उस में विद्यार्थिओं ने बताया था कि इस से हमें ऐसा अनुभव होता है कि हम अकेले नहीं हैं. वास्तव में दूसरे मनुष्य के साथ संयोग साधने की इच्छा आध्यात्मिकता की निशानी है, और इसे ऐसे नशीले पदार्थों के सेवन से कुछ समय के लिए प्राप्त किया जा सकता है व्यसन के आदी हो जाने के कारणों की जांच करने से पता चलता है कि ऐसे मादक पदार्थों के सेवन का हेतु आध्यात्मिकता प्राप्त करने का आवेश खतरनाक है! ऐसे नशे से अल्प समय के लिए उत्पन्न होती स्थिति गंभीर एवं खुद के लिए विनाशक है. परंतु उस का हेतु आख़िरकार ऐसी आंतरिक परिपूर्णता की भावना संतुष्ट करने की है. (जिसे सही तरीके से धार्मिक संस्थानों में से और एकांतिक स्थान पर मनन करने से संतुष्ट किया जा सकता है.) व्यसनिओं को ऐसी अयोग्य आदतों से मुक्ति दिलवाने के सफल कार्यक्रमों में आध्यात्मिकता सिखाई जाति है इस बात पर आश्चर्य नहीं होगा!

जब हार्वर्ड युनिवर्सिटी के भूतपूर्व अध्यक्ष डेरिक बोक (Derek Bok) से पूछा गया कि, आप इस समय के विद्यार्थिओं के अनुरूप कौनसे विशेषण का प्रयोग करेंगे? जवाब में आपने कहा कि, 'रिक्तता (खालीपन/शून्यता). अक्सर विद्यार्थी ऐसी रिक्तता/अकेलापन से बचने के लिए विनाशकारी मार्ग अपनाते हुए पाए गए हैं. किंतु वास्तव में वे जीवन का हेतु समन्वय की भावना, स्वयं को पहचानने की आतुरता, जीवन में सुसंवादिता/सुमेल और उसका अर्थ खोजने की गहन भावना व्यक्त कर रहे होते हैं. श्री बोक जिस खालीपन की बात करते हैं वह मानसिक व आंतरिक समस्याओं का परिणाम होने से उन से मुक्ति पाने का उपाय निस्संदेह विद्यार्थिओं को आध्यात्मिकता अपनाने से मिल सकता है.

विद्यार्थिओं की यह एकाकीपन और निराशाजनक मानसिकता को बदलने के लिए कौन से व्यावहारिक उपाय करने चाहिए?

शैक्षणिक संस्थानों की आध्यात्मिकता के प्रति उदासीनता के विषय में विद्यार्थी क्या सोचते होंगे? पलभर के लिए हम सोचते हैं कि जीवन की ऐसी दुखद फिर भी महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर हमारी उदासीनता क्या सूचित करती है? क्या विद्यार्थिओं को खालीपन के अनुभव से और अर्थहीन भविष्य के विचारों से ऊपर उठाने के लिए सहायक बनना शिक्षा संस्थानों का कर्तव्य नहीं है?

शैक्षणिक संस्थानों को इस विषय पर अत्यंत सुचिंतित विचार करना बहुत ही आवश्यक है. विद्यार्थिओं को अपनी आजीविका के लिए तैयार करने के अलावा ये संस्थानों का उतना ही महत्वपूर्ण दायित्व उनको जीवन का हेतु और उसकी परिपूर्णता कैसे प्राप्त की जा सकती है यह सिखाने का भी है. इस समय के विद्यार्थीओं को एक संस्था के संचालक 'क्षतिग्रस्त माल' कहते हैं. ऐसे विद्यार्थी बोझ बनकर समाज में आते हैं. यह निस्संदेह सत्य हकीकत है. इस समय हमारा अत्यंत महत्वपूर्ण ध्येय हमारे विद्यार्थी मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर एक दूसरे के साथ किस प्रकार से संयोजित हो सकते हैं यह सिखाना है और विद्यार्थिओं की आध्यात्मिकता के विषय की आवश्यकता पूर्ण करने का है. उनकी बुद्धि ही नहीं किंतु ह्रदय और अंतरात्मा तक पहुँचने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहने का है.

Ø आध्यात्मिक मूल्यों की सही समझ :

दैनिक व्यवहार में सतत व्यस्त न रहता हो ऐसा मनुष्य कभी न कभी आंतरिक खोज की तरफ मुड़ता है. जो इस प्रकार से खोज नहीं करता वह सर्वदा निराशा से घिरा रहता है. हम सब संसार को समझ ने के लिए मंथन करते हैं. इस का अर्थ जाने बगैर जीवन निरर्थक सा लगता है. महान तत्ववेत्ता नीत्शे (Nitzche) ने कहा है कि, 'जो लोग यह समझ पाते हैं कि जीना क्यों जृति है, उन्हें कैसे जीना चाहिए यह बात अपने आप समझ में आ जाति है.' हममें से कौन ऐसा है जिसने स्वच्छ नीरव रात्रि के तारकित आकाश को देखकर यह प्रश्न नहीं किया कि, 'यह सब किसने बनाया?' जब हम निजी व्यथाओं से घिरे हुए होते हैं तब कुआं यह प्रश्न नहीं करता कि, 'ऐसी व्यथा मुझे ही क्यों?' अथवा 'मुझे ही इस प्रकार से व्यथित होना चाहिए यह कौन तय करता है?' ऐसे सवालों के जवाब महत्वपूर्ण नहीं, किंतु ऐसे प्रश्न करना बड़ी ही महत्वपूर्ण बात है.

एक और विश्व प्रसिद्ध तत्वज्ञानी इमेन्युअल कान्ट (Emmanuel Kant) आग्रहपूर्वक कहते हैं कि, 'हमें अपने आध्यात्मिक विश्वासों के विषय में तीन प्रश्न करने चाहिए: 'क्या मैं जान पाऊंगा?' 'क्या मैं कर पाऊंगा?' 'क्या मैं उम्मीद रख पाउँगा?' मुझे लगता है कि बतौर शिक्षणशास्त्री शायद ये तीन महत्वपूर्ण प्रश्न हमें अपने आप से करने चाहिए: क्या मैं जान सकता हूँ? क्या मैं कर सकता हूँ? और क्या मैं उम्मीद रख सकता हूँ? कि जिससे मुझे यथेच्छ अनुभव प्राप्त हो सके और जिस से मेरे विद्यार्थी भी ऐसा अनुभव प्राप्त कर सके. कान्ट भी फिर से यही कहते हैं; इन सवालों के जवाबों की अपेक्षा सवालों की अगत्यता अधिक है. (क्यों कि ये सवाल आप को आंतरिक खोज करने के लिए प्रेरित करते हैं.)

Ø आध्यात्मिकता सीखने और सिखाने की प्रारंभिक कोशिशें:

अब कोलेज के प्राध्यापकों में कक्षा में आध्यात्मिकता का अध्ययन करने के विचारों में परिवर्तन हुआ है ऐसे संकेत मिलने लगे हैं. इतना ही नहीं, किंतु आध्यात्मिकता सीखने-सिखाने के लिए जागरूक हुए हैं और उत्साहपूर्वक यह दायित्व निभाने के लिए सजग बने हैं. विद्यार्थिओंके आध्यात्मिक विकास के लिए उच्चतर शिक्षण में जो कोशिशें हो रही है उनका विवरण कुछ शिक्षणशास्त्रिओं ने निम्नानुसार दिया है:

§ विद्यार्त्निओं के शैक्षणिक विकास के लिए विदेश प्रवास, विदेशी भाषा सीखना, विदेशी लोग और उनकी सभ्यता के साथ संपर्क और विचारों का आदान-प्रदान, शैक्षणिक सम्मेलनों में और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेना तथा विद्वान व अनुभवी लोगों के भाषण सुनना और ऐसी गतिविधियों में दिलचस्पी लेना सीखना.

§ विद्यार्थिओं में सामाजिक सेवा की भावना विकसित हों इस प्रकार उन्हें प्रेरित करना, ऐसी सेवा में जुड़ना, अलग अलग विषय सिखाने के लिए उसकी कक्षा में जाना और उनके भिन्न भिन्न मूल्य और उपयोग, इस समय के जटिल, सामाजिक, राजकीय एवं आर्थिक प्रश्नों के समाधान में किस प्रकार से हो सकता है इस के बारे में जानकारी पाना और समझना.

§ एक शिक्षण पद्धति ऐसी है जिसने बहुत कम कोलेज और युनिवर्सिटीओं ने अपनाई है. यह है गहन चिंतन व मनन की क्रिया. विद्यार्थिओं को चाहिए कि वे ध्यान, आत्म-निरीक्षण और आत्म-चिंतन करना सीखें. इस समय की खोजें दर्शातीं हैं की ये पद्धतियाँ विद्यार्थिओं के आध्यात्मिक विकास के लिए बहुत ही सशक्त साधन हैं.

§ विद्यार्थिओं को आंतरखोज करने के अवसर देने से वे अपने शैक्षणिक विकास के अतिरिक्त नेतृत्व के गुणधर्म, आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य का विकास भी कर पाएँगे और कोलेज के वर्ष के दौरान आत्म-संतोष का अनुभव कर पाएंगे.

§ संक्षेप में, यह उच्च शिक्षण का दायित्व है कि यह विद्यार्थिओं की आध्यात्मिकता विकसित करने के हर संभव प्रयास करें.

§ आध्यात्मिक रूप से विकसित विद्यार्थिओं की ऐसी नई पीढ़ी समस्त विश्व की समझदारीयुक्त, अन्य को सहाय करने की भावनायुक्त, सामाजिक अनर्थों के खिलाफ लड़नेवाली, अधिक सौम्य, विरोधी तत्वों तथा परेशानियों का सामना करनेवाली होगी. हाल में तेज रफतार से हो रहे वैज्ञानिक विकास तथा आविष्कारों के कारण विश्व में जो परिवर्तन हो रहे हैं उनका स्वागत यह नई पीढ़ी कर पाएगी और उस के पहले की पीढ़ी से कुछ विशिष्ट कार्य कर पाएगी.

प्राध्यापकों के आध्यात्मिकता कि शिक्षा विद्यार्थिओं को देने के लिए इस विषय पर खोज करनी चाहिए ऐसा कई लोगों का अभिप्राय है. तो फिर क्या आध्यात्मिकता जैसी व्यक्तिगत भावना पर उपर्युक्त आविष्कार लाभ कर एवं फलदायक बन सकते हैं? कई शिक्षाशास्त्रियों का कहना है कि ऐसे आविष्कार शिक्षा के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं. युनिवर्सिटी व कोलेजों में आते विद्यार्थी केवल भौतिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही नहीं आते, किंतु वे सत्य की खोज के लिए उत्सुक होते हैं इसलिए आते हैं. उन को भौतिक ज्ञान के अतिरिक्त खोज के लिए उत्सुक होते हैं इसलिए आते हैं. उन को भौतिक ज्ञान के अतिरिक्त आंतरिक ज्ञान की प्यास भी बुझानी होती हैं. उच्चतर शिक्षण संस्थानों का यह दायित्व बनाता है कि विद्यार्थिओं की यह प्यास बुझाएं. क्या शिक्षण संस्थानों आध्यात्मिकता का सर्वग्राही अध्ययन करने और उसको पाठ्यक्रम के अंतर्गत सम्मिलित करने के लिए तैयार हैं?

इस के जवाब में कई प्राध्यापकों ने कहा है कि वे आध्यात्मिकता के विषय में खुलेआम बातचीत करने के लिए तैयार हैं और उनका हेतु एवं अर्थ अपने निजी और शैक्षिक जीवन में हरदया से अपनाना चाहते हैं.

दो प्रसिद्द प्रोफ़ेसर बहुत अफ़सोस जताते हुए कहते हैं कि शैक्षणिक संस्थानों ने लंबे अरसे से हमें विभाजित किया है और हमारा अवास्तविक मार्गदर्शन किया है. जिस के अंतर्गत या तो हम आध्यात्मिक नहीं है या फिर शैक्षणिक कार्य में हमारे जीवन का आध्यात्मिक पहलू अनावश्यक है ऐसा लगता है. आध्यात्मिकता को यदि आत्मविद्या के रूप में नहीं स्वीकारा गया तो दुर्भाग्यवश मनुष्य के जीवन में उस के चिंताजनक परिणाम सामने आएँगे. जीवन में अपूर्णता, अश्रद्धा, अविश्वास एवं शून्यता (खालीपन) की भावनाएं हावी हो जाएंगीं. जब आध्यात्मिकता का गहन ज्ञान पाने के लिए खोज और उसे से संबंधित प्रामाणिक सवाल उस के अस्तित्व में विश्वास रखने की भावना और उस की अपार शक्ति की भावना दृढ़ हो जाएगी तब समग्र शिक्षा संस्थान के लिए आध्यात्मिकता सत्य की खोज में नाना रूप से मार्गदर्शक बनी रहेगी.

जानेमाने प्राध्यापक जुडिथ नील (Judith Neal) ने आध्यात्मिकता को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थिओं को कक्षा में किस प्रकार से पढाया जाना चाहिए इस विषय पर बहुत अच्छा मार्गदर्शन दिया है. इस में वह पांच महत्वपूर्ण नियम दर्शातीं हैं, जो इस प्रकार से हैं:

'मैंने इस विषय पर लिखने की शुरुआत की तब मुझे लगा कि मैं कुछ महत्वपूर्ण बात कहूँ: जैसे कि विद्यार्थिओं को धर्म और आध्यात्मिकता के बीच का स्पष्ट फरक बताना चाहिए. कक्षा में इस प्रकार के वातावरण का सर्जन करना चाहिए कि जिस में विद्यार्थी एकदूसरे के विश्वासों को सद्भावपूर्वक स्वीकारना सीखें. फिर बाद में मेरे मन में ख़याल आया कि मेरे विद्यार्थिओं को यदि मुझे आध्यात्म के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए मैनेजमेंट का विषय सिखाना है तो मैं स्वयं अपने दैनिक जीवन में और व्यवसाय में आध्यात्मिकता का आचरण किस प्रकार से करती हूँ यह बात अधिक प्रेरक बनेगी. साधारण रूप से प्राध्यापक ऐसे विषयों की बातचीत नहीं करते. इसलिए अन्य प्राध्यापक जिस तरीके से मैं सिखाती हूँ इस तरीके से सिखाते हैं कि नहीं यह मैं नहीं जानती, परंतु मैंने अपनी कक्षा में नीचे दर्शे हुए पांच नियमों का सफलतापूर्वक पालन किया है और विद्यार्थिओं के लिए वे अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं:

(१) स्वयं को पहचानो:

आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने की शुरुआत स्वयं को पहचान ने से होती है. इसलिए आंतरिक खोज अत्यंत आवश्यक है. अध्ययन का कार्य आंतरिक जागृति पाने के लिए बड़ा अवसर प्रदान करता है. कोलेज के सत्र का प्रारंभ होने पर पढाने के मेरे विषयों को मैं किस प्रकार से पढाऊं इस के बारे में मैं गहराई से सोचती हूँ. शिक्षा और विद्यार्थिओं को पढाने के मेरे विश्वास (पध्धति) में कोई परिवर्तन हुआ हो तो मैं उस पर ध्यान देती हूँ. विद्यार्थिओं के बारे में मेरी प्रमुख राय क्या है ऐसा प्रश्न भी मैं खुद से फिर से करती हूँ. विद्यार्थिओं को मैं कैसे अधिक अच्छे से पढ़ा सकती हूँ इस के लिए मैं निरंतर प्रयत्नशील रहती हूँ और उसी में ही मैं अपनी पूरी शक्ति लगा देती हूँ. मैं हमेशा अपने आप से पूछती रहती हूँ कि क्या मेरा आचरण आध्यात्मिकता के उच्च कोटि के नियमों अनुरूप हैं? मेरी समझ में आया है कि जब भी मैं किसी नए मार्ग अपनाती हूँ तब मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. कक्षा में पढाने के लिए प्रेरक वातावरण बनाने की मेरी कोशिशें मुझे मेरी अपनी प्रगति के मार्ग पर ले जाति है. इतना ही नहीं, परंतु ऐसा वातावरण मेरे विद्यार्थिओं को भी प्रोत्साहन देनेवाला बन जाता है. जब कोई भी विषय मैं एक ही तरीके से पढाती हूँ तब मुझे ऐसा लगता है कि वह शुष्क हो जाता है. इसे मैं किस प्रकार से नए तरीके से दिलचस्प व रोचक बना कर पढाया जा सकता है यह बात प्रत्येक शिक्षक के लिए चुनौती है, किंतु यह आवश्यक प्रयास है.

कक्षा में विद्यार्थी जो कुछ भी सीखता है उस का पालन अपने जीवन में कैसे कर सकते हैं यह समझाने के मेरे कर्तव्य के प्रति मैं हमेशा सजग रहती हूँ. ममें मेरे विद्यार्थिओं को अक्सर कहती हूँ कि किसी भी अच्छे व्यावसायिक संचालक (नेता) को चाहिए कि सब से पहले वह स्वयं को पहचानना सीखे. इसलिए मेरी कक्षा में खुद को कैसे पहचान सकते हैं इस के बारे में सुझाव दे कर, व्यवहार में और आचरण में उनका पालन कैसे किया जा सकता है इस पर आग्रहपूर्वक कहने में विश्वास करती हूँ.

(२) जीवन में मेलजोलभरा और सही आचरण करें:

हम क्या कर रहे हैं इस के बजाय हम कैसा आचरण करते हैं यह देखकर विद्यार्थी अधिक सीखते हैं. सही का अर्थ हैं हमारा अपना - हमारे जीवन जीने के सिद्धांत, जीवन में मेल-मिलाप (सुमेल) का अर्थ है मानवता से भरा जीवन. कक्षा में पढ़ाते समय कई प्राध्यापक ऐसे विश्वास के साथ पढाते हैं कि वे स्वयं अध्यापक है इसीलिए वे विद्यार्थिओं की तुलना में उच्च कोटि के हैं और इसलिए विद्यार्थिओं के ऊपर नियंत्रण बनाएँ रखना उनका कर्तव्य हैं. वे इस बात का बहुत ख्याल रखते हैं कि कहीं विद्यार्थी उनके बारे में ऐसी राय कायम न कर लें कि वे भले और सरल मनुष्य हैं. फिर भी यह हमारा अनुभव है कि जो अधिकारी दूसरों के साथ मेल-मिलाप के साथ और सही तरीके से पेश आते हैं वे अधिक सफल हुए हैं. यही बात प्रोफेसरों पर भी उतनी ही लागू होती है.

मैं यह क़ुबूल करती हूँ कि कक्षा में इस प्रकार का आचरण करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है. उदाहरण के लिए जब मैंने कोई विषय कुछ खास तरीके से सिखाना तय किया होता है तो सिखाते समय यदि मैं इस पर अस्वस्थता महसूस करने लगती हूँ तो मुझे इस का स्वीकार करना मुश्किल लगता है. फिर भी मेरी समझ में इतना आ गया है कि ऐसी स्थिति उपस्थित होने पर प्रामाणिक रूप से विद्यार्थिओं के सामने इस का स्वीकार कर के कक्षा में साथ मिलकर उस विषय को किस प्रकार अच्छी तरह से सिखाया जा सकता है और विद्यार्थी इस में किस प्रकार सहायक बन सकते हैं इस की खुल के बात करने से मैंने देखा है कि सीखने-सिखाने में प्रभावकारी फरक पडता है और विद्यार्थिओं की उत्सुकता में वृद्धि होती है.

कक्षा में विद्यार्थिओं के बीच सुमेल, सौहार्दपूर्ण और सही वातावरण बने यह भी बहुत महत्वपूर्ण बात है. ऐसे वातावरण में वे अपने विचार, भावनाएँ और मंतव्य नि:संकोच रूप से कक्षा में प्रस्तुत कर सकते हैं. मैं हमेशा संस्थानों के संचालकों की जिम्मेदारी एवं प्राध्यापकों की जिम्मेदारी की तुलना करती हूँ. दोनों को चाहिए कि वे अपनी संस्था और कक्षा में ऐसे वातावरण का सर्जन करें ताकि संस्था के कार्यकर्ता और कक्षा के विद्यार्थी उमंग से अध्ययन कर सकें. मैं कक्षा में जो कुछ भी करती हूँ यह क्यों कर रही हूँ इस के बारे में मैं अपने विद्यार्थिओं से निष्कपट भाव से कहती हूँ. और ऐसा इसीलिए करती हूँ कि ऐसा करने से मैं यह अनुभव करती हूँ कि इस से मेरे आध्यात्मिक नियमों का पालन होता है. फिर कक्षा में इस विषय पर बातचीत होती है कि नियम और व्यावहारिक आचरण संस्थानों में फायदेमंद सिद्ध हो सकता है या नहीं.

(३) अन्य के दृष्टिकोण का सत्कार करें और उन का आदर करें:

अपनी खुद की आध्यात्मिकता के विषय में कक्षा में बातचीत करना अनुचित व जोखिमभरा लगता है, परंतु असल में यदि आध्यात्मिकता आप के जीवन का सही लक्ष्य है - और पढाने का यह सही लक्ष्य है, यदि जीवन में आप मेलजोल, सुमेल और सच्चाई का पालन करते हैं तो ये बात विद्यार्थिओं से छिपी नहीं रह सकती. मुझे पता है कि ये सब मुश्किल है, जो एक बहुत ही पतली डोर पर चलने जैसा है. किसी प्राध्यापक को युनिवर्सिटी के अध्यक्ष की ऑफिस में बुलाया गया था, क्यों कि उसने कक्षा में 'आध्यात्मिकता' शब्द का उच्चारण किया था! एम.बी.ए. के दो विद्यार्थिओं ने शिकायत की थी कि इस शब्द का उच्चारण कक्षा में असंगत व गलत है.

मैंने देखा है कि सब से अच्छा उपाय यह है कि सब से पहले कक्षा में निष्कपट और भरोसे का वातावरण बनाया जाए और मेरे अपने मंतव्यों से और विचारों से जो अलग मंतव्य या विचार रखते हैं उनका आदर करना चाहिए. बाद में जब उचित अवसर मिलने पर मैं अपना आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हूँ और आग्रहपूर्वक स्पष्ट करती हूँ कि ये मेरा अपना दृष्टिकोण हैं और कई लोगों के दृष्टिकोण मेरे दृष्टिकोण से भिन्न हो सकते हैं और मैं उनका अवश्य आदर करती हूँ. मैं अपने दृष्टिकोण को, विशेष रूप से मेरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण को विद्यार्थिओं पर थोपती नहीं.

कक्षा में कई बार किसी विषय पर बातचीत करते समय मैं अपने विद्यार्थिओं के मूल्यों का आकलन करती हूँ. एक कागज़ पर विद्यार्थी अपने जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य और किसी खास विषय के सन्दर्भ में अपने दृष्टिकोण लिख कर मुझे देते हैं. जब वे अपने मूल्यों और दृष्टिकोण की दूसरे विद्यार्थिओं के साथ तुलना करते हैं तब एक आवश्यक बात उनके ध्यान पर आती है कि दूसरों के दृष्टिकोण अपने दृष्टिकोण से भिन्न हो सकते हैं; यह आम बात है.

(४) यथासंभव विश्वसनीय बनें :

यह नियम कई भिन्न भिन्न स्थिति में उपयोगी बनाता है. कक्षा में मैं परस्पर विश्वास का मनौल बनाती हूँ. शुरुआत ससे ही मैं विद्यार्थिओं के समक्ष यह महत्वपूर्ण स्पष्टता कर देती हूँ कि मैं आप सब पर भरोसा करती हूँ की आप पढाई में काफी यत्न करेंगे और ध्यान से पढेंगे और हर संभव मेहनत करेंगे. मुझे आप सब पर पूरा यकीन है कि आप सब हमेशा सच ही बोलेंगे. एम. बी. ए. की एक कक्षा में नेतृत्व के विषय पर पूरा सत्र अच्छे नेतृत्व के नियम, उनका आचरण और उनके वैविध्य के बारे में बातचीत हुई. उस दौरान इस कक्षा के अंतिम दिन मेरे पासवाली कक्षा में एक संकटकालीन घटना घटी. उस कक्षा का एक विद्यार्थी आत्महत्या करने पर तुला हुआ था. उसे सम्हालने का कर्तव्य मेरा था. अन्य किसी शिक्षक को पांच-दस मिनिट के लिए इन विद्यार्थिओं का ध्यान रखने के लिए कह कर मैं अपने एम.बी.ए. की कक्षा में ठीक समय पर पहुंची. कक्षा के इस अंतिम दिन पर विद्यार्थी अपने द्वारा तैयार किए गए रिपोर्ट प्रस्तुत करनेवाले थे. उन की प्रस्तुतियों को ध्यान में लेते हुए मुझे उनको मार्क्स देने थे. मैंने कहा कि पासवाली कक्षा में उपस्थित हुए संकट के कारण मैं अभी कक्षा में नहीं आ पाउंगी. हमने इस सत्र के दौरान विश्वसनीय बनने की बात की है. इस समय उस का पालन करने का अवसर मिला है. मेरी अनुपस्थिति में जब एक विद्यार्थी अपना रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा तब अन्य विद्यार्थी अत्यंत प्रामाणिकता से उसका मूल्यांकन करा के मुझे बताएँगे. उस को ध्यान में रखते हुए मैं उस विद्यार्थी को कितने मार्क्स देने है यह तय करुँगी. जब कक्षा का समय पूर्ण होनेवाला था तब मैं फिर से कक्षा में पहुंची. जब मैंने विद्यार्थिओं के मूल्यांकनों को जांचे और बाद में पूछा कि कक्षा में सबकुछ कैसा रहा, तब सभीने बताया कि उन्होंने इसी से बहुत कुछ सिखा. हमारे लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया.

विश्वसनीय बनाने का नियम मुझे भी कहता है कि खुद पर भरोसा रखो. मैं जब इस प्रकार का आचरण करती हूँ तब मेरे भीतर के आत्मा की आवाज अथवा आंतरिक आध्यात्मिकता अवश्य मेरा मार्गदर्शन करती है. मेरा अपना विश्वास है कि मेरे जीवन में परम शक्ति सक्रिय है; और महत्वपूर्ण परिस्थिति में हमेशा उस का मार्गदर्शन मुझे मिलता रहता है. जब भी मैं कक्षा में आती हूँ तब पलभर के लिए मैं मन ही मन उस परमशक्ति से प्रार्थना करती हूँ कि मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं कक्षा में जो कुछ भी सिखाऊं, विद्यार्थिओं के लिए वह अत्यंत प्रेरणात्मक बने.

(५) आध्यात्मिक आचरण का हमेशा पालन करते रहें :

जो लोग जीवन में आध्यात्मिकता को आत्मसात कर के कार्यरत रहते हैं उस के विषय में मेरे अध्ययन से यह जानकारी प्राप्त होती है कि आध्यात्मिक जीवन जीने के कई मार्ग हैं. अधिकतर लोगों के मंतव्य के अनुसार सब से प्रचलित मार्ग प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताने का है. अन्य पद्धतियों में प्रार्थना, उपासना, आध्यात्मिक पुस्तकों का वचन, योग, जंगल के निर्जन पथ पर भ्रमण करना इत्यादि सुझाव होते हैं. इं लोगों का अभिप्राय ऐसा है कि आप को जिस किसी पद्धति में विश्वास हो उस का अनुसरण करना महत्वपूर्ण है. ऐसा करने से आध्यात्मिकता की बुनियाद मजबूत बनती है.

मेरा अपना अनुभव है कि जब मैं अपनी आध्यात्मिक पद्धति का श्रद्धा से पालन करती हूँ, तब मैं आंतरिक शांति का अनुभव करती हूँ. मेरी रचनात्मक शक्ति अधिक विकसित होती है और मैं मेरे विद्यार्थिओं के साथ गहन सहयोग प्राप्त कर सकती हूँ तथा अधिक सहानुभूति के साथ व्यवहार कर सकती हूँ. जब जीवन की अनेक बातें, आवश्यकताएं मेरी शिक्षा प्रवृत्ति में आड़े आतीँ हैं तब मैं अधिक तनाव का अनुभव करती हूँ, अस्वस्थ बन जाति हूँ और अधिक संघर्ष करना पड़े ऐसी घटनाओं में उलझ जाति हूँ. इस से मेरी कक्षा में पढाने की क्षमता पर हानिकर प्रभाव पड़ता है.

पिछले कुछ वर्षों में मनुष्य की आध्यात्मिकता के विषय में निष्कपट भाव से बातचीत के प्रति झुकाव बढ़ता जाता है और उस के साथ जीवन में आपसी संबंधों को और सामाजिक कार्यों को सर्व प्रकार से आत्मसात करने के प्रयत्नों का प्रारंभ हुआ है.

जीवन में आध्यात्मिक नियमों का दृढतापूर्वक पालन करना और उन के साथ सुमेल और सुयोग बनाए रखना विल्कुल आसान नहीं है, परंतु यह अत्यंत हेतुयुक्त और संतोषप्रद है इस में कोई संदेह नहीं.

मैं आशा करती हूँ कि उपर्युक्त नियम मार्गदर्शक बन कर सब की यात्रा सुगम बनाएँ.

कुछ शैक्षणिक तजज्ञों ने पढाने-पढाने की प्रक्रिया के विषय में अपने अनुभव एवं मंतव्य प्रस्तुत किए हैं जिन में से कुछ निम्नानुसार हैं:

१) 'कई बार मुझे अपने विद्यार्थिओं का वर्तन पसंद न होते हुए भी मैंने उन के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करने का निश्चय किया है. मेरा प्रेमपूर्ण व्यवहार दर्शाता है कि मुझे उनके प्रति गहरा भाव है. एकदूसरे के प्रति जिम्मेवारी की भावना है. एक-दूसरे के साथ सदाचरण की उचित सीमाएं हैं, मानव संबंध हैं और अच्छी शिक्षा देने की दृढता है. विद्यार्थी और मैं पढने-पढाने की दिशा में समझदारी रखते हुए समकक्ष मनुष्य हैं...और मानवता के संबंध से जुड़े हुए हैं. परंतु विद्यार्थी जानते है कि मैं उन का मित्र नहीं हूँ. मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि मैं उन के कल्याण की पूरी परवाह करता हूँ और और उनके विकास के लिए तत्पर हूँ. मैं उन से मिलने के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ. मेरे संबंध सरल व निष्कपट हैं और जीवन में पढ़ाई का हतु स्पष्ट करने का है. फिर भी जब शिक्षक की हैसियत से मैं अपनी निपुणता और प्रेरक शक्ति का दृढ़ संकल्प के साथ उपयोग करता हूँ तब हमारे बीच की आत्मीयता गहन बनती है. यह सच है कि मैं अपने विद्यार्थिओं के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, इस बात पर मुझे पूरा विश्वास है. जिस विषय को मैं पढाता हूँ उस के लिए भी मुझे अत्यंत प्रेम व उत्सुकता है. पढना-पढ़ाना एक उत्तम कला है और मैं उस की बड़ा चाहक हूँ. संक्षेप में, ये तीन प्रकार की प्रेम की भावनाएं प्राध्यापक के लिए अनिवार्य हैं: विद्यार्थिओं के लिए प्रेम, पढाने के विषयों के प्रति प्रेम और पढने-पढाने की कला के प्रति प्रेम. यदि इन में से एक भी भावना की कमी होती है तो शिक्षण की क्रिया दिशाशून्य, निरंकुश, शुष्क और निपुणता रहित बन जाती है.'

२) 'पढ़ना-पढ़ाना एक आध्यात्मिक साधना है. यह एक आत्मसंयम है जिस में से आध्यात्मिक प्रवाह का उदभव होता है, जिस में से शिक्षण कला विकसित होती है और उसे पोषण मिलता है. चारित्र्य शुद्धि, एकता की भावना और जीवन को हेतुयुक्त बनाने की प्रक्रिया पढ़ने-पढाने का हार्द है, केंद्र है. ये आध्यात्मिक तत्व और उनका पालन करने की पद्धतियाँ पढ़ने-पढाने की क्रिया का अमोली रसायन है.

आध्यात्मिकता केवल पढ़ने-पढाने की खुद में विकसित करने लायक भावना ही नहीं, या फिर कुछ समय के लिए शिक्षण की वेशभूषा नहीं है. यह तो शक्ति का एक स्रोत है जो हमारे अंदर सीखने की तीव्र उत्कंठा जागृत करता है. यह एक आंतरिक उत्तेजना है जो पढाने के लिए आत्मा की आवाज को फिर से प्रज्ज्वलित करती है और अच्छे शिक्षण को अंतरात्मा के साथ जोड़ देती है. हम शिक्षा में उम्मीदों के विभिन्न रंग भरनेवाले हैं. आशाओं के दीप प्रज्ज्वलित करनेवाले हैं और विशेष अधिकार प्राप्त शिक्षणशास्त्री हैं. उच्चतर शिक्षण क्षेत्र की प्रवर्तमान स्थिति का आकलन करते हुए उस को विकसित कर के और उस में निहित मूलभूत शक्ति को नई चेतना प्रदान कर के उस स्थिति में बड़ा परिवर्तन लेन का हमारा गंभीर दायित्व है.'

३) स्पेक और होप (Speck & Hoppe) ने अलग अलग तजज्ञों के द्वारा आध्यात्मिकता के बारे में लिखे गए निबंध-लेख एकत्रित कर के एक सुन्दर पुस्तक प्रकाशित किया है: 'उच्चतर शिक्षण में आध्यात्मिकता की खोज'(Searching for Spirituality in Higher Education) जिस में विभिन्न विषय सिखाने में आध्यात्मिकता किस तरह से जोड़ी जा सकती है उस के सुझाव दिए हैं. उदाहरण के लिए इतिहास, धर्म, कला क्षेत्र, राजनीति, मनोविज्ञान, अर्थशाश्त्र, क़ानून, चिकित्सकीय ज्ञान, नेतृत्व के नियम इत्यादि. इस ग्रन्थ में बहुत ही अच्छे निबन्धों का समावेश किया गया है.

विद्यार्थिओं को अपने जीवन के मूल्य एवं हेतु स्पष्ट रूप से समझ में आ सके इसलिए मैंने (लेखक ने) जिस पद्धति को अपनाया है इस की जानकारी देना आवश्यक समझता हूँ:

२००३ में मैं सेवा निवृत्त हुआ तब तक मैं शिक्षणक्षेत्र में २२ वर्ष तक सेवा कर चुका था. उसी दौरान मैंने बिजनेस के पूर्व-स्नातक (अन्डर ग्रेजुएट) और स्नातक (ग्रेजुएट) विद्यार्थिओं को अमरीका, बहरीन और नेपाल की युनिवर्सिटीओं में पढ़ाया है. प्रत्येक सत्र के अंत में मैं विद्यार्थिओं को चार प्रश्न करता हूँ जो कि पाठ्यक्रम के सन्दर्भ में नहीं होते. ये प्रश्न अंतिम परीक्षा के पहले सत्र पूर्ण होने के अंतिम दिन की कक्षा में पूछे जाते हैं. इस के साथ यह भी सुस्पष्ट किया जाता है कि इं प्रश्नों के उत्तर का प्रभाव विद्यार्थी की अंतिम परीक्षा के मार्क्स पर बिलकुल नहीं होगा और सत्र के दौरान कक्षा में जो पढ़ाया गया है इस के साथ ये प्रश्न संबंधित नहीं. फिर भी इं प्रश्नों के उत्तर आप के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. इं प्रश्नों की कुछ विशेषता पर ध्यान देना उचित होगा:

ü इन प्रश्नों के उत्तर आपको अपने घर पर जा कर लिखने होंगे.

ü उत्तर लिखने के लिए कोई समय मर्यादा नहीं है; आप चाहे उतना समय ले सकते हैं.

ü आप के उत्तर किसी को दिखने की जरुरत नहीं है, किंतु यदि आप चाहें तो उन्हें किसी भी व्यक्ति को या मुझे दिखा सकते हैं. यदि मुझे दिखेंगे तो मैं उन्हें गोपनीय रखूंगा.

ü आप के उत्तर आप ही को जांचने होंगे और आप ही मार्क्स तय करेंगे. आप खुद को १०० में से १०० मार्क्स दे सकते हैं या कम अंक देने का निर्णय भी ले सकते हैं.

ü यदि आप को ऐसा लगे कि आपने खुद को दिए गए मार्क्स ठीक नहीं है तो आप जब तक आपको मन चाहे मार्क्स नहीं मिलते तब तक बार बार उत्तर लिख सकते हैं.

ü इन प्रश्नों के उत्तर किसी पाठ्य पुस्तक या वेबसाईट पर नहीं मिलेंगे.

ऐसी विशेषताएँ जानकार विद्यार्थी अधीर व उत्सुक बनकर तुरंत प्रश्न जानने की तत्परता दर्शाते हैं:

v पहला प्रश्न :

क्या आपने अब तक जीवन में जो पाया है उसे पाने में सहायक व्यक्तियों के नाम की सूची बनाई है? यदि नहीं बनाई है तो अब बनाइए. परंतु केवल सूची बनाकर रुक मत जाना. यदि आप हृदयपूर्वक ऐसा मानते हैं कि ये लोग आपने जो कुछ भी पाया है उस में वाकई सहायक बने हैं तो उनके प्रति सच्चे डील से कृतज्ञता प्रकट कीजिए और उनसे रूबरू, पत्र द्वारा, टेलीफोन (मोबाइल) पर या फिर इमेल से यह बात कहिए.

इस प्रश्न का विचार मुझे इंटरनेट पर पढ़ी हुई एक सत्य घटना से आया था. उस का शीर्षक है: 'कृतज्ञता से वंचित लोग' (Unthanked People). वास्तव में बहुत सारे लोग दूसरों को सहाय करते हैं, किंतु बहुत ही कम लोग उन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. घटना कुछ इस प्रकार घटी थी:

प्राध्यापक विलियम स्टीडगर (William Stidger) बोस्टन युनिवर्सिटी में पढ़ाते थे तब एकबार आपने सोचा कि उनके जीवन में ऐसी कई ऐसे लोग अहि जिन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना वे भूल गए हैं. जिन्होंने उसका ख्याल रखा, पालापोसा, प्रेरणा दी, जिन का उस के जीवन पर गहरा और अविस्मरणीय प्रभाव है.

ऎसी ही एक व्यक्ति अपने बचपन की शिक्षिका थीं जिसके बारे में उसे बरसों तक कोई खबर नहीं मिली थी. किंतु इस प्राध्यापक को याद आया कि इस शिक्षिका ने उनका कर्तव्य नहीं होते हुए भी उसके बचपन के अध्ययन के समय में उसके भीतर कविता के प्रति दिलचस्पी जागृत की थी, उस के बाद ही प्राध्यापक विलियम जीवनपर्यंत कविता प्रेमी बन गए. आख़िरकार आपने अपनी शिक्षिका के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हुआ पत्र लिखा.

उन्हें शिक्षिका की ओर से प्रत्युत्तर मिला, जो अवस्था के कारण टेढ़ीमेढ़ी लिखावट में था. पत्र का प्रारंभ इस प्रकार था: 'मेरे प्रिय विली' (विलियम का बचपन का लाडला नाम) इतना पढकर प्रोफ़ेसर का मन आनंद विभोर हो गया. ६० वर्ष से ऊपर की आयु, गंजा सिर, पत्नी की मृत्यु के पश्चात एकाकी जीवन. उन्होंने सोच कि अब इस संसार में उसे 'विली' के नाम से पुकारनेवाला कोई नहीं रहा. पूरा पत्र इस प्रकार से था:

'मेरे प्रिय विली,

पत्र मिलने से मेरे ह्रदय में जो प्रसन्नता छा गई उसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाउंगी. अस्सी वर्ष की आयु है. अकेली, एक छोटे से कमरे में रहकर खाना पका कर खा लेती हूँ, अकेलापन खाने को दौडता है, पतझड़ के मौसम में गिरते पत्तों की तरह मैं भी झड़कर गिर जाने पर हूँ. तू जानता होगा कि मैंने ५० वर्षों तक निष्ठापूर्वक पढ़ाया है. किंतु कृतज्ञता प्रकट करता हुआ पत्र इतने वर्षों में पहली बार तुमसे प्राप्त हुआ है. ऐसा लगा जैसे कोई देवदूत यह पत्र दे गया है! कई वर्षों के बाद मेरा ह्रदय उल्लास से सराबोर हो गया.'

आम तौर पर अपनी भावनाओं पर काबू रखनेवाले प्राध्यापक की आँखें पत्र पढकर आंसूओं से छलछला गईं. जिस के प्रति अपने जीवन में कभी कृतज्ञता प्रकट नहीं की ऐसे लोगों में समाविष्ट ऐसी यह शिक्षिका थीं. विलियम का ह्रदय पसीज गया. हम सब के जीवन में ऐसे लोग हैं यह हम जानते हैं. उदाहरण के रूप में एक शिक्षक - कि जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता; संगीत शिक्षक अथवा प्रार्थना मंदिर में कार्य करते कार्यकर्ता कि जिन्होंने हमें अपने आप पर भरोसा रखना सिखाया और उस स्काउट के नेता या लीडर कि जिसने हमें सेवा एवं शिस्त के संस्कार दिए.

हमारी स्मृति में ऐसे कई लोग होते हैं जि का हमारे जीवन निर्माण में बहुत बड़ा योगदान होता है. जिन की प्रेरणा से हमें अपने जीवन में आगे बढ़ने के ने मार्ग मिले हुए होते हैं. परंतु प्राध्यापक विलियम ने ऐसे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और पत्र लिख भेजा.

क्या आप के जीवन में भी ऐसे लोग हैं जिन के प्रति आपने अभी तक कृतज्ञता प्रकट नहीं की? उन्स के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने में शायद अभी भी देर नहीं हुई...!

मैं अपने विद्यार्थिओं को समझाता हूँ कि इस प्रकार से कृतज्ञता प्रकट करने के कई फायदे हैं:

o ऐसा करने से आप विनम्र और आनंदित होंगे. पत्र प्राप्त करनेवाली व्यक्ति को भी उतनी ही प्रसन्नता होगी. कई बार सफलता के नशे में आदमी होश खो देता है और इस से अक्खडपनवाली उद्दंडता आ जाती है. शराब पीने से मनुष्य पर नशा छा जाता है. परंतु इस से भी खतरनाक अन्य वस्तुएँ हैं जिन से मनुष्य पर अधिक नशा छा जाता है जैसे कि सत्ता, धन, सौंदर्य और बुद्धिमत्ता (किसी विषय के तजज्ञ या बहुत पढ़ाई कर के विद्वान बने हुए लोगों का नशा. यह भी सही है कि सब को नशा नहीं चढता किंतु कुछ लोगों के सिर पर चढ जाता है. विद्यार्थिओं को चाहिए कि वे ध्यान से ऐसी खतरनाक मादक वस्तुओं को जान लें और उन के प्रभाव में न आएं. विद्यार्थिओं से मेरी दूसरी सलाह यह है कि उनको अपने जीवन में सहायक बने हुए लोगों की सूची में आवश्यकतानुसार वृद्धि करते रहें. ऐसे लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर के हमें अधिक विनम्र बनना चाहिए.

o कई बार जो लोग हमेशा दूसरों को सहाय करते हैं उनके मन में ऐसा भाव जागृत होता है कि ऐसी सही का कोई मतलब नहीं, सहाय लेनेवाले को इस बात की कोई परवाह नहीं है. इस से शायद वे दूसरों को सहाय करने से अपने आप को रोक लेते हैं. किंतु ऐसे लोगों को एकाध मनुष्य की ओर से कृतज्ञता प्रकट करता हुआ पत्र मिले तो उन्हें लगेगा कि किसी ने तो याद कर के कृतज्ञता प्रकट कि और इस से प्रेरित हो कर वे सहाय करना चालू रख सकते हैं.

v दूसरा प्रश्न :

क्या आपने आप के दोषों व कमजोरियों की सूची बनाई है? यदि नहीं बनाई है तो अवश्य बनाएँ. इस सूची में पांच छः कमजोरियां लिखी हो तो अच्छा है. ऐसी कौन सी व्यक्ति है जिस में छः सात या उस से अधिक कमजोरियां नहीं होती? केवल ढूँढने का प्रयास करने की जरुरत होती है. इस खोज में कई लोग सहायक बन सकते हैं. उदाहरण के टूर पर निकट के मित्र, साथ में कार्य करनेवाले कार्यकर्ता अथवा सहाध्यायी, पत्नी या पति, बच्चें, माता-पिता इत्यादि. आप उनसे विनम्रता से कहिए: 'मेरी कौन सी कमजोरी आप के ध्यान पर आती है? यदि आप मुझे बताएँगे तो मैं आप का बहुत एहसानमंद रहूँगा.' इस प्रकार की सूची बनाने का बड़ा लाभ यह है कि हमें अपनी कमजोरियों का पता चलता है. एक बार पता लग जाने के बाद हम उसे दूर करने के या उस के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर सकते हैं. सूची में समय समय पर सुधर होता रहेगा.

यह सब जानते हैं कि कोई सर्वगुण संपन्न नहीं है. इसलिए मनुष्य होने के नाते अपनी अंतिम सांस तक कोई न कोई कमजोरी तो रहेगी ही रहेगी. किंतु ऐसी सूची को सामने रखकर जीवनपर्यंत कमजोरी दूर करने की कोशिश करते रहने से हम एक अच्छे मनुष्य बनाने के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ पाएंगे.

तीसरा और चौथा प्रश्न बताने से पहले मैं अपने विद्यार्थिओं को कुछ सावधान करता हूँ क्यों कि यस दोनों प्रश्न मृत्यु के संदर्भ में हैं.

v तीसरा प्रश्न:

स्वयं के बारे में श्रद्धांजलि व्यक्त करनी हो तो आप उसे किन शब्दों में व्यक्त करेंगे? इसे लिख कर आप के निजी मित्र या रिश्तेदार को सौंप कर बिनती करना कि मेरी अंतिम क्रिया के पश्चात शोकसभा में इसे पढेंगे तो मैं आप का एहसानमंद रहूँगा.

अधिकतर लोग अपनी मृत्यु के बारे में बहुत नहीं सोचते. परंतु मृत्यु के बाद लोग आप को किस प्रकार से याद करेंगे यह महत्वपूर्ण बात है. मैं विद्यार्थिओं से कहता हूँ कि खुद के बारे में श्रद्धांजलि लिखना अत्यंत कठिन कार्य है. इस के लिए आप को आप के भीतर कुछ छानबीन करने की जरुरत पड़ेगी. हाल ही में जिनकी मृत्यु हुई हो ऐसे ८ से १० मनुष्यों की शोकसभा में उपस्थित रहकर लोगों ने उन मृतात्माओं के बारे में क्या कहा यह नोट करना. उस का सार समझेंगे तो आप को लगेगा कि लोग बहुधा मृत व्यक्ति के जीवन के बारे में कुछ न कुछ अच्छा ही बताएँगे. उदाहरण के लिए: उस का स्वभाव, दूसरों की परवाह करने की आदत, उदारता, निष्कपट प्रकृति, माफ करने की आदत, दूसरों के लिए सहायक बनने की इच्छा इत्यादि. (इन में से बहु सी बातें आध्यात्मिकता के लक्षण दर्शातीं हैं). लोग अक्सर ऐसा कहते हैं कि इसने दूसरों के लिए क्या किया? दान-धरम में कितना योगदान दिया? कितने छात्रों को पढ़ने में सहायता की? समाजसेवा के अंतर्गत क्या किया? इत्यादि.

इस में से हमें क्या सीख मिलती है? हम दूसरों के लिए जो करेंगे उसे संसार के लोग याद रखेंगे. इसीलिए हमारी आदत दूसरों को कुछ देने की हो यह आवश्यक है. हमें चाहिए कि हम दूसरों को सहाय करें.

मैं अपने विद्यार्थीओं को विनती करता रहता हूँ कि जब आप अच्छे कार्य-कारोबार में लग जाओ और आप के हाथों में पहली कमाई के रुपये आए तब दस डॉलर का चैक हमारी अपनी युनिवर्सिटी को भेजना. यदि आप को ऐसा लगे कि इस संस्थान ने आप को जीवन में कुछ अच्छा सिखाया है और आज आप जिस पड़ पर हो यह इस संस्थान की बदौलत हो तो ही ऐसा करना. मैं विद्यार्थिओं को ऐसा करने के लिए इसलिए सिखाता हूँ ता कि युवा वय से ही उन में कुछ देने की भावना जागृत हो जाए.

v चौथा प्रश्न :

सदभाग्य से यदि आप जान पाओ कि आप की मृत्यु ७२ घंटे के बाद होनेवाली है तो इस ७२ घंटे के दौरान आप कौन से कार्य करेंगे उन की सूची कार्य की अगत्यता अनुसार बना पाओगे? सब को पता है कि मृत्यु अटल है, परंतु आम आदमी उस का नियत समय नहीं जान पाता. सदभाग्य इसलिये कि आप को मृत्यु के बारे में पता चल गया है और अब आप को आप के अपूर्ण कार्यों को पूर्ण करने का अवसर प्राप्त हुआ है.

संस्था के संचालकों को मैनेजमेंट के विषय पर चल रहे शोध-अनुसंधान से वाकिफ कराने के लिए मैं प्रायः तीन-चार दिन के सेमिनार का आयोजन करता हूँ. ऐसे सेमिनार के दौरान मैं उनको ये प्रश्न पूछता हूँ और ऐसी सूची बनाने के लिए दस-पन्द्रह मिनट का समय देता हूँ. बाद में उस विषय पर बातचीत होती है, उनके जवाबों में एक बात अधिकतर सुनाई देती है: आप आप के साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते. मेरी संपत्ति का अधिकतर हिस्सा मैं मेरे परिवार के लिए रखूंगा, किंतु शेष हिस्सा मेरे रहते हुए ही कोई उचित, अच्छे कार्य करनेवाली संस्थाओं को दान कर दूंगा. बार बार फिर से दान करने की, दूसरों को सहाय करने की बात आ ही जाती है. कक्षा में जैसे मेरे विद्यार्थी इस का अनुभव कर रहे हो ऐसा माहौल छा जाता है.

मेरे विद्यार्थी ७२ घंटे में जीवन पूरा होनेवाला है इस विचार से जब सूची तैयार कर रहे होते हैं तब एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है. उस सूची में कुछ अनुचित या हे या तिरस्कार उत्पन्न करें ऐसे कार्यों का समावेश नहीं होता है, किंतु जाने से पहले सत्कार्य करने की तीव्र वृत्ति ही पाई जाती है.

हकीकत में सचमुच एक समय आएगा जब अपने जीवन में केवल ७२ घंटे ही शेष बचे होंगे. परंतु हमें उस की जानकारी नहीं होगी. मैं विद्यार्थिओं को समझाता हूँ कि ऐसी सूची हमें सूचित करती है कि जीवन में कब क्या हो जाए इसका कोई भरोसा नहीं. इसलिए जीवन हमेशा आनंद से और दूसरों को उपयोगी बनकर जीना चाहिए, इस से जीवन सार्थक बन जाएगा ऐसी सजगता आप को अनुचित कार्य करने से भी रोक लेगी.

ये चार प्रश्नों के उपरांत मैं विद्यार्थिओं को नीचे दर्शाई गईं चार बातों के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को उदाहरण के साथ समझाता हूँ जिस से उनकी आध्यात्मिकता विषयक जानकारी अधिक स्पष्ट हो सकती है:

- सामग्री - (अंग्रेजी में उसे डेटा (Data) कहते हैं).

- जानकारी - (अंग्रेजी में उसे इन्फोर्मेशन(Information) कहते हैं).

- ज्ञान : इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किया गया भौतिक ज्ञान: (अंग्रेजी में उसे नोलेज (Knowledge) कहते हैं).

- समझदारी - प्रज्ञा - दक्षता या अंतर्ज्ञान: जो हमें आध्यात्मिकता के मार्ग पर ले जा सकती है. (अंग्रेजी में उसके लिए विझडम या इंट्यूशन (Wisdom and Intution) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है.

मैं कक्षा में बोर्ड पर ये अंक लिखता हूँ: ०२८१३५७६६२७ और बाद में पूछता हूँ कि यह क्या है? विद्यार्थी बताते हैं कि यह अंक है. मैं स्पष्टता करता हूँ कि इसे हम सामग्री कहते हैं. उदाहरण के लिए देश में कुछ वर्षों के बाद जनसंख्या गणना होती है और सेंसस बोर्ड सब लोगों से इस के लिए सामग्री एकत्रित करता है.

फिर से मैं बोर्ड पर वे ही अंक अलग तरीके से लिखता हूँ: ०२८१ १३५ ७६६२७ अब यह क्या है? तक़रीबन सभी विद्यार्थिओं को समझ में आ जाता है कि यह एक टेलीफोन नंबर है. कुछ अंकों के बीच रिक्त स्थान (स्पेस) रखकर लिखने से ये अंक टेलीफोन नंबर है ऐसी जानकारी मिल गई. मतलब यह कि सामग्री को खास प्रकार से, व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करेंगे, या उस का विश्लेषण करेंगे तब हमें आवश्यक जानकारी मिल सकती है. अब हमारे लिए यह जानकारी हो गई. उदाहरण के लिए जनसंख्या गणना में सेंसस बोर्ड प्राप्त सामग्री को जब विशेष रूप से प्रस्तुत या विश्लेषित करता है तब हमें आवश्यक जानकारी मिलती है. जैसे कि देश में कुछ खास उम्र के कितने पुरुष हैं, कितनी औरतें हैं, वे कहाँ तक पढ़े-लिखे हैं इत्यादि.

यह टेलीफोन नंबर राजकोट स्थित मेरे रिश्तेदार का है. मेरी मां गाँव से मेरे पास अमरीका आईं हुई है. मां ने इस इस रिश्तेदार से टेलीफोन पर बात करना चाहा. मैंने मेरा मोबाइल फोन मां को दिया और रिश्तेदार का नंबर भी दिया. मेरी मां पुराने डायल टेलीफोन से परिचित थी किंतु मोबाइल फोन का उपयोग कैसे किया जाता है इस का ज्ञान उसे नहीं था. इस से सामग्री एवं ज्ञान के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है. यदि आप के पास सामग्री होते हुए भी उस का किस प्रकार से उपयोग किया जाता है यह ज्ञान नहीं हो तो ऐसी सामग्री खास उपयोगी नहीं बन सकती.

मैंने मां को मोबाइल फोन का उपयोग किस प्रकार से किया जाता है यह समझाया और उसने फोन पर बात कर ली. संक्षेप में सामग्री का उपयोग कैसे हो सकता है इस की जानकारी प्राप्त करने को ज्ञान प्राप्त हुआ ऐसा कह सकते हैं.

कई व्यापारी संस्थानों के संचालक हम - प्रोफेसरों - से शिकायत करते हैं कि आप के विद्यार्थी हमारे यहां नौकरी करने के लिए आते हैं तब उन के पास बहुत सारी सामग्री होती है. किंतु उसे व्यवहार में कैसे इस्तेमाल करें इस बात का ज्ञान नहीं होता. (ऐसी शिकायतों पर ध्यान देने की शुरुआत युनिवर्सिटीओं में अब हो रही है).

इस बातचीत को निम्नानुसार संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

- सामग्री : विश्लेषण कर के जानकारी में बदला जा सकता है.

- जानकारी : सामग्री का कैसे इस्तेमाल किया जाए यह जान कर उसे ज्ञान में बदला जा सकता है.

- ज्ञान : आध्यात्मिकता का पालन करने से ज्ञान को अंतर्ज्ञान में बदला जा सकता है.

मैं विद्यार्थिओं के सामने यह स्पष्टता करना चाहता हूँ कि यह अंतिम चरण: ज्ञान से अंतर्ज्ञान की ओर की यात्रा मेरा खुद का विश्वास है, किंतु विश्व के भिन्न भिन्न धर्मों ने इस का अन्गुलिनिर्देश अवश्य किया है. यह अनुभव का विषय है. और विद्यार्थी यह अनुभव कर पाएं इस के लिए मैं अत्यंत स्नेहपूर्वक उन्हें प्रेरित करने की कोशिश करता हूँ.

यह अंतर्ज्ञान किस प्रकार से पाया जा सकता है? अथवा आध्यात्मिकता का पालन कैसे किया जा सकता है? एक अच्छे मनुष्य बनाने के लिए आध्यात्मिकता का आचरण करना आवश्यक है. सब से पहले मैं मेरे विद्यार्थिओं को इंटरनेट पर इस विषय पर अनुसन्धान करने की सलाह देता हूँ. मनुष्य के इतिहास में आध्यात्मिकता का उपदेश देनेवाले इस का दृढतापूर्वक आचरण करनेवाले मनुष्य के जीवनी पढ़ें और उन के उपदेशों का जीवन में पालन करना सीखें.

वेइन डायर (Wayne Dyer) अपनी पुस्तक 'विझडम ऑफ एजिस' (युगों का अंतर्ज्ञान) की प्रस्तावना में लिखते हैं कि:

"पायथागोरस, बुद्ध, इशुख्रिस्त, माइकल एंजेलो, सहेली, शेक्सपियर, एमर्सन और अन्य बहुत सारे लोग जिन्हें हम आध्यात्मिकता के गुरु और उपदेशक की हैसियत से उच्च आदरभाव से मस्तिष्क झुकाते हैं, वे इसी धरती पर घूमे, उन्होंने यहीं पर जलपान किया, इसी चन्द्रमा का दर्शन किया और यही सूर्य से उष्मा पाई. यह विचार मुझे कुतूहल से और अवर्णनीय भवनों से मुग्ध कर देता है. इस से भी अधिक विस्मयकारी बात यह है कि वे हमारे लिए कितने उत्तम उपदेश छोड़ गए!"

आखिरकार मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यदि हम विश्व में आध्यात्मिक परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हम सब के लिए ये महान आत्मा क्या कह गए हैं ये जानना और जीवन में उस का पालन करना आवश्यक है. उन के जीवन के परम अनुभव और उपदेश काव्य रूप में, संवाद के रूप में, व्याख्यानों के रूप में, ग्रन्थ रूप में वे हमारे लिए छोड़ गए हैं. हमें उन्हें पढाने-समझने चाहिए. भले ही वे हमसे अलग समय पर और विश्व की विभिन्न स्थितियों में जीवन यापन कर गए, फिर भी वे हमें अपने उपदेश के द्वारा बहुत कुछ सिखाते गए हैं.

इं महापुरुषों के लेख पढ़ने से हम अपनी अंतर्यात्रा कर पाएंगे - आत्मखोज की ओर कदम उठा सकेंगे. हम कौन हैं यह जानने के लिए हमें भीतर अत्यंत गहराई में जाना पड़ेगा. और जीवन का ध्येय और हेतु समझने के लिए दृढ़ संकल्प करना पड़ेगा.

मैं चाहता हूँ कि विद्यार्थी अपने जीवन में अपने आप से नीचे दिए गए प्रश्न पूछते रहीं, यह मेरा खास अनुरोध है:

clip_image001 मैं कौन हूँ?

clip_image001[1] विश्व में यह सब कहाँ से आया है?

clip_image001[2] जीवन का हेतु क्या है? मुझे क्या बनना/होना चाहिए?

clip_image001[3] मेरे क्या क्या मूल्य हैं?

clip_image001[4] मैं किस पर विश्वास करता होण? इस के क्या कारण हैं?

clip_image001[5] मुझे जीवन में कौन प्रेरणा देता है?

clip_image001[6] मुझे जीवन जीने की शक्ति कौन प्रदान करता है?

clip_image001[7] मुझे रचनात्मक बनाने और सत्य की खोज करने के लिए कौन प्रेरित करता है?

इन प्रश्नों के उत्तर विद्यार्थी खोज-अनुसन्धान कर के लिखें और उन पर मनन करना भी सीखें यह महत्वपूर्ण है. अन्य विद्यार्थिओं और निकटस्थ व्यक्तिओं के साथ निष्कपट भाव से इस विषय पर परिचर्चा करेंगे तो उन्हें अमूल्य मार्गदर्शन प्राप्त होगा. आखिर तो ये विद्यार्थिओं की अपनी ही आंतरिक यात्रा हैं. इसी में से जीवन जीने की आंतरिक शक्ति प्राप्त करनी होती है, जो खुद के सिवा और कोई नहीं कर सकता.

वैलेस्ली (Wellesley) कोलेज की अध्यक्षा श्रीमती डायेना चेपमेन वोल्श के द्वारा आध्यात्मिकता के लिए कहे गए शब्द बहुत ही ध्यान देने योग्य, सटीक एवं हृदयंगम हैं: 'उच्चतर शिक्षा में आध्यात्मिकता विषय के लिए हमें एक नया ही परिवेश, नया ही वातावरण, नया ही अभिगम और नई ही दृढ़ता पैदा करने के लिए मन में मंथन करना पड़ेगा. यह ऐसा मंथन होगा जो हमारे सभी संस्थानों को भिन्न और आवश्यक मार्गदर्शन देने के लिए और मौजूदा विश्व की कई समस्याएं, जैसे कि पढने और पढाने की समस्याएँ, संचालन की समस्याएँ और आखीर में हमारे समूचे जीवन की समस्याओं का समाधान करने के लिए शक्तिमान होगा.'

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0 टिप्पणी "आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : ६ - आध्यात्मिकता और शिक्षा - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे"

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