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लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड आठ

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भूली बिसरी लोक कथाएँ सीरीज़–24


किस्सये चार दरवेश

अमीर खुसरो – 1300–1325


अंग्रेजी अनुवाद -

डन्कन फोर्ब्ज़ – 1857


हिन्दी अनुवाद -

सुषमा गुप्ता

अक्टूबर 2019

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खंड 8


3 दूसरे दरवेश के कारनामे[1]

जब दूसरे दरवेश के अपने कारनामे सुनाने की बारी आयी वह भी आराम से बैठ गया[2] और बोला —

ओ दोस्तो कुछ इस फ़कीर की कहानी भी सुनो

जो अब मैं तुमसे कहता हूँ शुरू से ले कर आखीर तक

कोई डाक्टर उसका इलाज नहीं कर सकता मेरा दर्द तो लाइलाज है, सुनो

ओ दल्क के कपड़े पहनने वालो। यह अभागा नीच फारस राज्य का राजकुमार है। वहाँ हर तरह की जानकारी वाले लोग पैदा हुए हैं। इसलिये वहाँ की एक कहावत बहुत मशहूर है “इस्फाहान निस्फ़ी जहान” यानी “इस्फाहान तो आधी दुनिया है। ” और वह इसी नाम से मशहूर है।

सातों द्वीपों में उसके जैसा कोई देश नहीं है। उस देश का तारा सूरज है। पुराने देशोंं में से इसके जैसा देश और कोई नहीं है। सातों लोकों में[3] इसका नक्षत्र ही सबसे बड़ा है। इसकी जलवायु बहुत खुशी देने वाली है। इसमें रहने वाले बहुत ज्ञानी हैं और इसकी संस्कृति भी बहुत ऊँची है।

मेरे पिता जो इस देश के राजा थे उन्होंने मुझे राजनीति के सब नियमों को समझाने के लिये बहुत अच्छे टीचर रखे जो बहुत कुछ जानते थे। वे मुझे बचपन से ही पढ़ा लिखा रहे थे। सो हर चीज़ में पूरी शिक्षा लेने के बाद अब मैं सबमें होशियार हो गया।

अल्लाह की कृपा से जब मैं 14वें साल में पहुँचा तब तक मेंने सारा विज्ञान विनम्रता से बातचीत करना अच्छे ढंगचाल आदि सब सीख लिये थे जो कि एक राजा को आने जरूरी थे।

इसके अलावा दिन रात मेरी यही इच्छा रहती कि मैं होशियार लोगों के पास बैठूँ और हर देश का इतिहास जानूँ। मशहूर राजाओं और ऊँची ऊँची इच्छाएँ रखने वाले राजकुमारों के बारे में जानूँ।

एक दिन मुझे एक बहुत ही विद्वान आदमी मिला जिसे इतिहास बहुत अच्छा आता था और जिसने काफी दुनिया देखी थी मुझसे बोला — “हालाँकि किसी भी आदमी को अपनी ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं है फिर भी उनमें कुछ बहुत ही बढ़िया गुण पाये जाते हैं जिनकी वजह से वे बहुत मशहूर हो जाते हैं और जिनकी वजह से वह पीढ़ी दर पीढ़ी और जजमैंट डे तक मशहूर रहते हैं। ”

मैंने उससे विनती की कि वह मुझे ऐसे कुछ लोग बताये जिनके साथ ऐसा हुआ है ताकि मैं उनके बारे में सुन सकूँ और उनके जैसे कामों को कर सकूँ। तब उस आदमी ने मुझे हातिम ताई[4] की ज़िन्दगी की कई घटनाओं में से यह घटना सुनायी —

हातिम के समय में अरब का एक राजा था नौफाल। उसकी हातिम से बहुत बड़ी दुश्मनी थी क्योंकि हातिम बहुत मशहूर था। सो एक बार वह बहुत सारी सेना ले कर उससे लड़ने गया। हातिम एक बहुत ही अच्छा आदमी था और वह खुदा से डरता था।

उसको ऐसा लगा “अगर मैं भी इसी तरह लड़ने की तैयारी करूँ तो खुदा के बहुत सारे प्राणी मारे जायेंगे और बहुत खून खराबा होगा। जिसका नतीजा स्वर्ग में मेरे खिलाफ लिखा जायेगा। ”

ऐसा सोच कर उसने अकेले ही केवल अपनी पत्नी को ही साथ लिया और भाग कर पहाड़ों में एक गुफा में जा कर छिप गया।

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जब हातिम के भाग जाने की खबर अरब के राजा नौफाल को मिली तो उसने हातिम की सारी जायदाद और उसका रहने का घर सब जब्त कर लिया और यह घोषणा करवा दी कि जो कोई भी हातिम को ढूँढ कर पकड़ कर लायेगा उसको शाही खजाने से 500 सोने के सिक्के दिये जायेंगे।

जब लोगों ने यह घोषणा सुनी तो हर किसी के मन में यह लालसा जागी कि वह यह काम करे और हातिम को पकड़वा कर 500 सोने के सिक्के ले ले। सो हर एक ने हातिम की खोज शुरू कर दी।

एक दिन एक बूढ़ा और उसकी पत्नी अपने 2–3 छोटे बच्चों को साथ ले कर लकड़ी चुनने गये तो घूमते घूमते उसी गुफा की तरफ निकल गये जिसमें हातिम अपनी पत्नी के साथ रहता था।

उसी जंगल में पहुँच कर उन्होंने लकड़ी चुनना शुरू कर दिया। बुढ़िया बोली — “अगर हमारे कुछ दिन अभी अच्छे रह गये हैं तो हम लोगों को हातिम का पता लग जाना चाहिये ताकि हम उसको पकड़ कर राजा के पास ले जा सकें।

वह हमको 500 सोने के सिक्के देगा और हम आराम से रह पायेंगे। हमको इस तरह का काम करने से भी छुट्टी मिल जायेगी। ”

बूढ़ा लकड़हारा बोला — “यह आज तुम कैसी बात कर रही हो। यह तो हमारी किस्मत में लिखा है कि हम लोग रोज लकड़ियाँ चुनें उन्हें अपने सिर पर लादें और उन्हें बाजार बेच कर आयें। उससे आये पैसों से रोटी नमक खरीदें।

फिर एक दिन कोई चीता आयेगा और हमको पकड़ कर ले जायेगा। शान्त रहो और अपना काम देखो। हातिम बेचारे को हमारे फन्दे में क्यों फँसाती हो ताकि हमें राजा से उसके लिये पैसा मिल जाये। ”

बुढ़िया एक ठंडी साँस भरते हुए चुप रह गयी।

हातिम ने इन दोनों बूढ़ों की बातें सुन लीं तो उसको लगा कि इन बूढ़ों को ता पैसे की बहुत जरूरत है और इनसे अपने आपको छिपाना तो इन्सानियत नहीं है कि इनके दिलों की इच्छाएँ पूरी न हो पायें। सच तो यह है कि बिना दयावान बने तो कोई इन्सान इन्सान ही नहीं है। और वह आदमी जिसके दिल में भावनाएँ ही न हों तो वह तो कसाई है कसाई।

आदमी तो दया दिखाने के लिये ही पैदा किया गया था

वरना देवदूतों को भक्ति की कोई जरूरत नहीं थी

थोड़े में कहो तो हातिम की इन्सानियत इस बात की गवाही नहीं दे रही थी कि जो कुछ उसने अपने कानों से सुना था उसको सुन कर वह उनसे छिपा बैठा रहे।

वह तुरन्त ही अपनी गुफा से बाहर निकल कर आया और बूढ़े से बोला — “मैं हातिम हूँ। तुम मुझे नौफाल के पास ले चलो। मुझे देख कर वह तुमको उतने पैसे दे देगा जितने उसने मुझे लाने वाले को देने का वायदा किया है। ”

बुढ़िया बोली — “यह सच है कि मेरी भलाई और फायदा तो इसी में है कि मैं यह करूँ पर यह कौन जानता है कि वह आपके साथ कैसा व्यवहार करेगा। अगर उसने आपको मरवा दिया तो मैं क्या करूँगी।

मेरे लिये यह ठीक नहीं होगा कि मैं आपको आपके दुश्मन को केवल इसलिये सौंप दूँ कि मुझे अपने लालच की वजह से उससे पैसे मिल जायेंगे। मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती।

उन पैसों का क्या है वे तो मैं कुछ ही दिनों में खर्च कर दूँगी। और फिर मेरी ज़िन्दगी ही कितनी है। आखिर मैं तो मर ही जाऊँगी तो मैं अल्लाह को जा कर क्या जवाब दूँगी। ”

हातिम ने उससे बहुत विनती की — “तुम मुझे अपने साथ ले चलो। यह मैं तुमसे अपनी खुशी के लिये कह रहा हूँ। मेरी हमेशा से ही यह इच्छा रही है कि मेरी ज़िन्दगी और सम्पत्ति किसी दूसरे के काम आये तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। ”

पर बूढ़े को किसी तरह से भी हातिम को उसके दुश्मन को सौंपने के लिये और उसको उसे दे देने का इनाम लेने के लिये नहीं मनाया जा सका।

जब वह सब तरफ से निराश हो गया और बूढ़ा भी किसी तरह से नहीं माना तो हातिम बोला — “अगर तुम मुझे जिस तरह से मैं चाहता हूँ वैसे मुझे वहाँ नहीं ले जाओगे तो मैं राजा के पास खुद चला जाऊँगा और कहूँगा कि “इस आदमी ने मुझे पहाड़ों में एक गुफा में छिपा रखा था। ”

बूढ़ा हँसा और बोला — “अगर मुझे भलाई करने का बुरा फल मिलता है तब तो मेरी किस्मत ही खराब है। ”

जब ये सब बातें चल रही थीं तो वहाँ कुछ और लोग इकठ्ठा हो गये। भीड़ जमा हो गयी। उन्होंने हातिम ताई को वहाँ देखा तो तुरन्त ही उसे पकड़ लिया और उसको अपने साथ ले गये।

य्ह देख कर बूढ़ा कुछ दुखी हो गया पर चुपचाप वह उनके पीछे चल दिया। जब वे लोग हातिम को नौफाल के पास ले गये तो उसने पूछा — “इसे यहाँ कौन पकड़ कर ले कर आया है। ”

उस भीड़ में से एक बेकार के निर्दयी आदमी ने कहा — “ऐसा काम और कौन कर सकता है। इसे मैं पकड़ कर लाया हूँ। यह शान का झंडा आसमान में मैंने गाड़ा है। ”

एक और आदमी बोला — “मैंने इसको जंगलों बहुत दिनों तक ढूँढा और आखिरकार पकड़ ही लिया। अब मैं इसको यहाँ ले आया हूँ। कम से कम मेरी मेहनत की तो इज़्ज़त करें और मुझे वह दें जो आपने देने का वायदा किया है। ”

इस तरह से सोने के सिक्के लेने के लिये हर एक ने कहा कि वह हातिम को पकड़ कर लाया है। पर बूढ़ा चुपचाप एक कोने में बैठा रहा और उन सबके शान बघारने के किस्से सुनता रहा और हातिम के लिये रोता रहा।

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जब हर आदमी अपना अपना किस्सा सुना चुका तब हातिम बोला — “अगर तुम सच जानना चाहते हो तो वह यह है, यह बूढ़ा जो सबसे अलग खड़ा हुआ है, यही मुझे यहाँ ले कर आया है। अगर तुम उसकी शक्ल से कुछ अन्दाजा लगा सकते हो तभी इस बात को तय करो कि मुझे कौन पकड़ कर लाया हो सकता है।

मुझे पकड़ने के लिये अपना घोषित किया हुआ इनाम इसी को दो क्योंकि सारे शरीर के सब हिस्सों में ज़बान ही सबसे पवित्र हिस्सा है। किसी भी आदमी के लिये यह बहुत जरूरी है कि वह वही करे जो उसने कहा है। दूसरे कामों के लिये अल्लाह ने जीभ बनायी है जो खूँख्वार जानवरों के पास भी है। इसलिये समझो कि जबान और जीभ में क्या अन्तर है। ”[5]

यह सुन कर नौफाल ने बूढ़े लकड़हारे को अपने पास बुलाया और उससे पूछा — “तुम बताओ कि हातिम को यहाँ पकड़ कर कौन लाया है। ”

उस ईमानदार आदमी ने उसे शुरू से आखीर तक उसको सब सच सच बता दिया और कहा — “सरकार हातिम मेरे लिये यहाँ खुद अपनी मरजी से आये हैं। ”

नौफाल ने जब हातिम के इस इन्सानियत के काम के बारे में यह सब सुना तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसके मुँह से निकला — “दूसरों के लिये यह तुम्हारी कितनी बड़ी दिलदारी[6] है। तुमने तो इस आदमी के लिये अपनी जान की भी परवाह नहीं की।

दूसरे लोग जिन्होंने झूठे दावे किये थे राजा ने उनके हाथ उनकी पीठ पीछे बाँधने का हुकुम दिया और उनको बजाय 500 सोने के सिक्के देने के उसने हर एक के सिर पर 500 जूते इस तरह मारने के लिये कहा ताकि वे कुछ ही देर में गंजे हो जायें।

सच तो यह है कि झूठ बोलना तो इतना बड़ा जुर्म है कि इससे बड़ा जुर्म तो कोई और है ही नहीं। खुदा सबको इस तरह के जुर्म से बचा कर रखे और उनके दिल में झूठ बोलने की इच्छा पैदा न करे।

बहुत सारे लोग झूठ बोलना चाहते हैं पर अगर उनका झूठ पकड़ा जाता है तो उनको उसका इनाम मिलना ही चाहिये।

थोड़े में कहो तो नौफाल ने सबको उनके व्यवहार के अनुसार इनाम दिये। जब कि उसने हातिम को इसका उलटा करने का सोचा। हातिम जैसे आदमी के इन्सानियत के व्यवहार को देख कर जिसके लिये उसके दिल में दुश्मनी भरी हुई थी और जिसको देख कर बहुत सारे लोग खुश थे उसने न केवल उसकी ज़िन्दगी बख्श दी बल्कि वह खुद भी अल्लाह के नियमों का पालन करने लगा।

उसने दोस्ती और प्यार से हातिम का हाथ पकड़ा और कहा — “ऐसा ही क्यों नहीं होना चाहिये। जैसे आदमी तुम हो ऐसा आदमी तो कोई भी काम कर सकता है। ”

फिर राजा ने हातिम को बड़े आदर के साथ अपने पास बिठाया और तुरन्त ही उसकी सारी सम्पत्ति जायदाद आदि और उसका सब कुछ उसको लौटा दिया। उसको ताई जनजाति का नया सरदार बना दिया। बूढ़े को उसने 500 सोने के सिक्के दे कर विदा किया। बूढा, भी राजा को दुआएँ देता हुआ अपने घर चला गया।

जब मैंने हातिम के कारनामे की यह सारी कहानी सुनी तो मेरे दिमाग में उससे जलन की एक भावना मेरे दिल में उठ आयी।

कि “हातिम तो केवल एक ऐसा अकेला सरदार था जो अपनी जाति का सरदार था। उसने अपने एक अच्छे दिलदारी के काम से इतना नाम कमा लिया था। जबकि मैं अल्लाह की दया से सारे ईरान का शाह होते हुए भी मैं इतनी सब सम्पत्ति से वंचित रहूँगा।

यह तो निश्चित है कि इस दुनिया में दिलदारी और दया से बढ़ कर और कोई गुण नहीं है चाहे उसके पास दुनिया भर की सारी दौलत क्यों न हों। क्योंकि उसको केवल उन्हीं का बदला दूसरी दुनिया में मिलता है। अगर कोई आदमी एक बीज बोता है तो वह उसकी पैदावार से कितना पा सकता है।

जब ऐसा मेरे दिमाग में आया तो मैंने अपने सबसे बड़े इमारत बनाने वालों को बुलवाया और उनसे जल्दी से जल्दी शहर के बाहर एक शानदार महल बनाने के लिये कहा जिसमें 40 बहुत बड़े और ऊँचे फाटक हों। [7]

कुछ ही समय में जैसी मेरी इच्छा थी इतना शानदार महल बन कर तैयार हो गया और मैं उसमें बैठ कर दिन रात सुबह से शाम तक गरीबों और जरूरतमन्दों को सोने के सिक्के बाँटता रहा। जिस किसी ने जो कुछ भी मुझसे माँगा मैंने उसे वही दिया और उसकी जरूरत से ज़्यादा ही दिया।

थोड़े में कहो तो बहुत सारे जरूरतमन्द लोग चालीसों दरवाजों से अन्दर आने लगे और जो उनको चाहिये था वह उनको मिलने लगा।

अब एक दिन ऐसा हुआ कि महल के सामने के दरवाजे से एक फ़कीर मेरे पास आया और मुझसे कुछ दान माँगा। मैंने उसको सोने का एक सिक्का दिया। वह सिक्का ले कर चला गया। पर फिर वही फ़कीर दूसरे दरवाजे से मेरे पास आया और उसने मुझसे दो सिक्के माँगे।

हालाँकि मुझे पता चल गया था कि यह वही फ़कीर है जो अभी महल के सामने वाले फाटक से मेरे पास आया था और मैंने उसको एक सिक्का दिया था फिर भी मैंने इस बात को नजरअन्दाज करके उसको दो सिक्के दे दिये।

इस तरह से वह महल के सारे दरवाजों से हो कर मेरे पास आया और हर बार अपनी माँग में एक सिक्के की बढ़ोत्तरी कर देता और मैं जान बूझ कर उसको नजरअन्दाज करके उसे इतने ही सिक्के देता रहा जितने वह माँगता रहा।

सो जब वह चालीसवें फाटक से आया तो उसने मुझसे 40 सिक्के माँगे। उस बार भी मैंने उसको 40 सिक्के देने के लिये कहा और उसको 40 सिक्के दे दिये गये।

पर इतना पैसा लेने के बावजूद वह फिर से महल के पहले वाले दरवाजे से अन्दर आया और फिर से दान माँगा।

इस बार मुझे उसका व्यवहार कुछ अच्छा नहीं लगा सो मैं बोला — “ओ लालची आदमी। तू यह किस तरीके का फ़कीर है जो इन तीन अक्षरों का मतलब भी नहीं समझता जो “फ़क्र”[8] से बनते हैं। फ़कीर को उस शब्द का मतलब समझते हुए ही रहना चाहिये। ”

वह बोला — “ओ दयालु आत्मा। आप खुद मुझे इसका मतलब समझायें। ”

मैंने कहा — “अरबी में “फ़” का मतलब है फ़ाका यानी उपवास रखना, “क़िनात” का मतलब है सन्तुष्ट रहना[9] और “र” का मतलब है “रियाज़त” यानी भक्ति। जिस आदमी के अन्दर ये तीन गुण नहीं होते वह फ़कीर नहीं होता।

यह जो कुछ भी तुमने मुझसे लिया है उससे खाओ पियो। और जब यह पैसा खत्म हो जाये तो मेरे पास फिर आ जाना और तुम्हें जितना चाहिये फिर ले जाना। यह दान जो तुम्हें दिया गया है यह तुम्हारी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिये दिया गया है न कि इकठ्ठा करके रखने के लिये।

ओ लालची तूने महल के 40 फाटकों से अन्दर आ कर एक सिक्के से ले कर 40 सिक्कों तक इकठ्ठे कर लिये हैं। ज़रा हिसाब लगा कर देख तूने कितने सिक्के इकठ्ठे कर लिये हैं। और केवल इतने ही नहीं इतना इकठ्ठा करने के बाद भी तेरा लालचीपना तुझे महल के पहले फाटक से फिर मेरे पास माँगने के लिये ले आया है।

तुम इतना सारा पैसा इकठ्ठा करके क्या करोगे। एक सच्चे फ़कीर को आने वाले कल की चिन्ता नहीं करनी चाहिये। अगला दिन तुम्हें अल्लाह खाने के लिये फिर देगा।

अब तुम कुछ शर्म करो और भलमनसाहत दिखाओ, धीरज रखो, सन्तुष्ट रहो। यह किस तरह की फ़कीरी तुम्हारे गुरू ने तुम्हें सिखायी है। ”

अपना यह अपमान सुन कर वह नाखुश और गुस्सा हो गया और वे सारे सिक्के नीचे जमीन पर डाल दिये जो उसने मुझसे लिये थे। वह बोला — “बस काफी है। आप इतने गरम न हों। आप अपने ये सिक्के वापस ले लें और इन्हें अपने पास रख लें। और आगे से आप कभी अपने आपको दानी न कहें।

दानी होना कोई आसान काम नहीं है। आप दानी होने का बोझ सँभालने के लायक नहीं हैं। आपको उस तरह का होने में अभी बहुत समय लगेगा। आप अपनी मंजिल से अभी बहुत दूर हैं।

अरबी शब्द सख्य या उर्दू शब्द सखी[10] भी तीन अक्षरों से बना हुआ शब्द है। पहले इन तीन अक्षरों से बने हुए शब्द का पालन कीजिये तभी आप दरियादिल बन पायेंगे। ”

यह सुन कर मैं थोड़ा बेचैन हो गया और फ़कीर से कहा — “ओ पवित्र तीर्थयात्री। पहले तुम मुझे इन तीन अक्षरों का मतलब समझाओ। ”

फ़कीर बोला — “अरबी भाषा में “स” सीन अक्षर से “समायी” निकला है जिसका मतलब होता है “सहना”। अरबी भाषा के “ख” अक्षर से है “खौफ़े इलाही” यानी अल्लाह से डरना। और अरबी भाषा के “य” यानी “ये” अक्षर से बना है “याद” – यानी जन्म और मौत की याद।

जब तक कि किसी में ये गुण न हों तब तक किसी को दरियादिल या दयालु कहने का अधिकार नहीं है। दयालु कहलवाने का अधिकार उसको भी है जिसमें अगर दूसरे गुण न भी हों तो भी वह अपने दयालु होने के गुण की वजह से अपने बनाने वाले का प्यारा होता है।

मैं बहुत सारे देश घूमा हूँ पर मैंने इससे पहले कभी इतना दयालु आदमी नहीं देखा जितनी कि वह बसरा की राजकुमारी। अल्लाह ने दया तो उसके रोम रोम में भर रखी है। बाकी सब नाम तो चाहते हैं पर उसके जैसे काम नहीं करते। ”

यह सुन कर मैंने उस फ़कीर से उस सब अपमान की माफी माँगी जो मैंने उसका किया था और विनती की कि उसे जो चीज़ जितनी चाहिये ले जाये। पर वह किसी तरह भी मेरी कोई भी भेंट लेने के लिये तैयार नहीं हुआ।

बल्कि वह ये शब्द दोहराता हुआ वहाँ से चला गया — “अब चाहे आप मुझे अपना पूरा राज्य भी क्यों न दे दें मैं तो अब उसके ऊपर थूकूँगा भी नहीं और न ही मैं , , ,। ”

सो इतना कह कर वह तीर्थयात्री तो वहाँ से चला गया पर बसरे की राजकुमारी के बारे में सुन कर मेरे दिल में चैन कहाँ। उससे मिलने का कोई आसान सा रास्ता भी सुझाई नहीं दे रहा था। मेरे दिल में बस यही इच्छा उठ रही थी कि किसी भी तरह से मुझे बसरा पहुँचना चाहिये और उसे देखना चाहिये।

इस बीच मेरे पिता राजा मर गये और मुझे वहाँ का शाह बना दिया गया। मुझे अब राज्य तो मिल गया था पर मेरे दिल में से बसरा जाने की इच्छा कहीं नहीं गयी थी।

मैंने अपने वजीर और कुलीन लोगों से सलाह की जो शाह का सहारा थे जो राज्य की नींव थे कि मैं बसरा जाना चाहता हूँ। आप लोग अपनी अपनी जगह पर ठीक से बने रहें। अगर मैं तन्दुरुस्त रहा तो वहाँ का रास्ता मेरे लिये छोटा ही रहेगा। मैं जल्दी ही वापस आ जाऊँगा।

मेरे इस इरादे से कोई भी खुश नहीं लग रहा था। अपनी मजबूरी की वजह से मेरा दिल उदास और और उदास रहने लगा। और फिर एक दिन मैं बिना किसी से पूछे मैंने अपने एक प्राइवेट भरोसेदार वजीर को बुलवाया उसको युवराज बनाया अपनी गैरहाजिरी में अपने सारे अधिकार सौंपे और उसको अपनी राज्य का सबसे ऊँचा ओहदा सौंप कर वहाँ से चल दिया।

मैंने गेरुआ कपड़े पहने तीर्थयात्री फ़कीर का वेश रखा और बसरा की सड़क पर अकेला ही चल पड़ा। कुछ ही समय में उसकी सीमा तक जा पहुँचा और बराबर मुझे यही द्दश्य दिखायी देता रहा।

जहाँ भी मैं रात को रुकता राजकुमारी के नौकर हमेशा ही मेरा स्वागत करने के लिये तैयार रहते और फिर मुझे आलीशान घरों में ठहराते। वे मुझे वहाँ मुझे बहुत ही बढ़िया खाना खिलाते और सारी रात मेरी सेवा में खड़े रहते। अगले दिन मैं फिर जहाँ रुका वहाँ भी मुझे ऐसा ही स्वागत मिला।

ऐसी सुख सुविधाओं में मैं कई महीने यात्रा करता रहा। आखिर मैं बसरा की सीमा में घुसा। जैसे ही मैं बसरा में घुसा कि एक बढ़िया कपड़े पहने हुए तमीजदार सुन्दर नौजवान मेरे पास आया। देखने से वह एक अक्लमन्द आदमी लग रहा था।

उसने बड़ी मीठी बोली में मुझसे कहा — “मैं तीर्थयात्रियों की देखभाल करता हूँ। मैं हमेशा ऐसे ही यात्रियों की खोज में रहता हूँ तो फिर वे चाहे तीर्थयात्री हो या फिर कोई भी यात्री जो इस शहर में आता है मैं उसको अपने घर ले जाता हूँ।

किसी अजनबी के लिये मेरे घर के सिवा यहाँ ठहरने की कोई और जगह नहीं है। सो ओ पवित्र आदमी आप मेरे साथ आइये। मेरे घर आ कर मेरा और मेरे घर का मान बढ़ाइये। ”

मैंने उससे पूछा — “आप भले आदमी नाम क्या है। ”

वह बोला — “सारे लोग मुझे बेदर बख्त[11] कह कर पुकारते हैं। ”

उसके अच्छे गुणों और तौर तरीकों को देख कर मैं उसके साथ चला गया और उसके घर आया। मैंने देखा कि उसका घर तो एक बहुत शानदार महल था जो शाही ढंग से सजा हुआ था। वह मुझे एक बहुत बढ़िया कमरे में ले गया और वहाँ बिठाया।

फिर उसने गरम पानी मँगवाया और अपने नौकरों से मेरे हाथ पैर धुलवाये। फिर दस्तरख्वान[12] बिछवाया। नौकर ने मेरे सामने कई प्रकार के खाने लगाये और बहुत सारे फल और केक और बिस्किट लगाये।

अपना इतना शानदार स्वागत देख कर तो मेरी तो आत्मा तक तृप्त हो गयी। मैंने एक एक कौर हर तरह के खाने में से खाया और फिर अपना हाथ खींच लिया। नौजवान बार बार मुझसे जिद करता रहा — “जनाब आपने खाया ही क्या है। यह तो ऐसा लग रहा है जैसे यह खाना केवल रखने के लिये हो खाने के लिये नहीं। आप बिना किसी हिचक के कुछ और लें। ”

मैंने कहा — “खाने में क्या शर्म। अल्लाह तुम्हारे घर में बढ़ोत्तरी करे। मैंने पेट भर कर खा लिया है। तुम्हारे खाने की बड़ाई करने के लिये मेरे पास शब्द काफी नहीं हैं। अभी तक मेरी जबान पर तुम्हारे खाने का स्वाद चढ़ा हुआ है। मेरी हर डकार के साथ तुम्हारे खाने की खुशबू आ रही है। बस अब इसे वापस ले जाओ। ”

जब दस्तरख्वान हटा लिया गया तो फिर वहाँ काशानी मखमल[13] का कालीन बिछाया गया। नौकर लोग हाथ धुलाने वाला जग और तसला और खुशबूदार साबुन और गरम पानी ले कर आये ताकि मैं अपने हाथ धो सकूँ। फिर उसने एक जवाहरात जड़े सोने के डिब्बे में सुपारी और कई तरह की मुखवास[14] पेश की।

जब भी कभी मैंने पानी माँगा तो नौकर लोग हमेशा बरफ से ठंडा किया हुआ पानी ले कर आये। शाम को शीशे के बरतनों से ढकी हुई कपूर मिली हुई मोमबत्तियाँ जलायी गयीं। उसके बाद वह नौजवान मेरे पास बात करने के लिये आ कर बैठ गया और मेरा दिल बहलाने लगा।

जब एक प्रहर रात बीत गयी तो वह मुझसे बोला — “आप यहाँ इस पलंग पर सोइये जिसके चारों तरफ मसहरी[15] लगी हुई है। ”

मैंने कहा — “हम तीर्थयात्रियों के लिये तो एक चटाई या हिरन की खाल ही काफी है। यह सुख और आराम तो आप दुनिया वालों के लिये हैं। ”

वह बोला — “ये सब चीज़ें तो तीर्थयात्रियों के लिये ही हैं। इसमें मेरी कोई चीज़ नहीं है। ”

जब उसने काफी जिद की तो मैं जा कर उस पलंग पर लेट गया। वह बिस्तर तो उसका इतना मुलायम था जितना कि कोई फूलों का बिस्तर भी नहीं होगा।

उसके दोनों तरफ गुलाब के गमले रखे थे और फूलों की टोकरियाँ महक रही थीं। मैं जिस तरफ भी करवट लेता उस तरफ ही एलो की खुशबू सूँघने को मिलती। इस तरह खुशबुएँ सूँघता सूँघता मैं पता नहीं कब सो गया।

जब सुबह हुई तो नौकर मेरे लिये नाश्ता ले आये। नाश्ते में बादाम पिस्ता अंगूर अंजीर नाशपाती अनार और खजूर थे और इनके साथ फलों से बना शरबत था। इस तरह के आराम में मैंने तीन दिन तीन रात वहाँ काटीं।

चौथे दिन मैंने उससे विदा माँगी तो नौजवान ने हाथ जोड़ कर कहा — “ऐसा लगता है कि मैं आपकी तरफ पूरा ध्यान नहीं दे पाया इसलिये आप नाराज हो गये हैं। ”

मैंने आश्चर्य से कहा — “खुदा के लिये यह तुम क्या कह रहे हो। मेहमानदारी तो केवल तीन दिन की होती है। और वे तीन दिन अब पूरे हो गये हैं। इससे ज़्यादा यहाँ रुकना ठीक नहीं है। इसके अलावा मैं तो यात्रा के लिये निकला हूँ अगर मैं केवल एक जगह पर ही रह गया तो भी यह मेरे लिये ठीक नहीं होगा। इसी लिये मैं अब यहाँ से जाना चाहता हूँ।

दूसरे तुम्हारी मेहमाननवाजी तो इतनी अच्छी थी कि मेरा दिल तुमसे बिछड़ने के लिये नहीं कर रहा। ”

वह फिर बोला — “आपकी जैसी इच्छा हो वैसा कीजिये पर ज़रा ठहरिये। मैं ज़रा राजकुमारी जी से मिल कर आता हूँ और अब आप क्योंकि जा रहे हैं तो आपको यह भी मालूम होना चाहिये कि आपके सारे पहनने के कपड़े बिस्तर सोने चाँदी के बरतन इस कमरे के सब जवाहरात जड़े बरतन अब आपके हैं।

इनको यहाँ से ले जाने के लिये आप मुझे जो भी करने के लिये कहेंगे मैं उसका इन्तजाम कर दूँगा। ”

मैंने कहा — “ऐसी बातें करना छोड़ो। मैं तो एक तीर्थयात्री हूँ न कि कोई घूमता फिरता भाट[16]। अगर मेरे मन में ज़रा सा भी लालच होता तो मैं तीर्थयात्री ही क्यों बनता। और फिर मेरी इस दुनियावी ज़िन्दगी की बुराइयाँ कैसे जातीं। ”

वह मेहरबान नौजवान बोला — “ अगर राजकुमारी जी ऐसा सुनेंगी तो वह तो मुझे नौकरी ही से निकाल देंगी। और अल्लाह ही जानता है कि और क्या क्या सजा मुझे मिलेगी।

अगर आप इन सबको अपने साथ नहीं ले जाना चाहते तो इन सबको एक कमरे में बन्द करवा दीजिये और उसका दरवाजे पर अपनी सील लगा दीजिये। उसके बाद फिर उसका जो चाहें और जब आप चाहें तब वह कीजियेगा। ”

मैं उसकी इस सलाह को भी मानने वाला नहीं था और वह भी मेरी बात को नहीं मान रहा था तो आखिर में यही तय पाया गया कि उन सबको मैंने एक कमरे में बन्द कर दिया और दरवाजे पर मैंने अपनी सील लगा दी। अब मैं बेसब्री से उससे विदा लेने का इन्तजार कर रहा था।

इस बीच एक खास नौकर[17] वहाँ आया। उसके सिर पर पगड़ी थी और कमर के चारों तरफ एक छोटा सा कपड़ा लिपटा हुआ था। उसके हाथ में जवाहरातों से जड़ी हुई सोने की एक गदा थी। उसके साथ और भी बहुत सारे ऊँचे ओहदे वाले नौकर थे।

इस शानो शौकत के साथ वह खास नौकर मेरे पास आया। उसने मुझसे इतनी नम्रता और कोमलता से कहा जिसे मैं बता नहीं सकता — “जनाब। अगर आप मुझ पर मेहरबान हों तो मेहरबानी करके मेरे घर आने की कृपा करें तो मैं बड़ा कृतज्ञ होऊँगा।

अगर राजकुमारी जी को भी यह पता चला कि यहाँ एक तीर्थयात्री आया था और वह जैसे आया था वैसे ही चला गया किसी ने उसका ठीक से स्वागत नहीं किया खातिरदारी नहीं की तो मुझे पता नहीं कि वह मुझे क्या क्या सजा देंगी और वह मुझसे कितनी गुस्सा हो जायेंगी। और हाँ यह मेरी ज़िन्दगी पर भी असर डालेगा। ”

मैंने उसकी इस प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया पर वह जिद करता रहा और मुझसे जीत गया। वह मुझे एक और घर में ले गया जे पहले वाले घर से ज़्यादा अच्छा था। पहले मेज़बान की तरह से उसने भी मेरी उसी तरह से दिन में दो बार तीन दिन और तीन रात तक मेहमाननवाजी की। सुबह और तीसरे पहर में फल और शरबत भिजवाता था।

चलते समय उसने भी मुझसे यही कहा कि मैं वहाँ पर रखी हर चीज़ का मालिक था और मैं उसका वही करूँ जो मैं चाहूँ।

ऐसे अजीब सी बातें सुन कर मैं तो भौंचक्का रह गया। मैंने प्रार्थना की कि ओ खुदा मुझे इस शहर से किसी तरह बचा। खास नौकर को लगा कि मैं शायद कुछ परेशान हो रहा हूँ।

वह बोला — “ओ अल्लाह के बन्दे। जो भी आपकी इच्छाएँ हों वे आप मुझे बताएँ तो मैं उनको राजकुमारी जी को जा कर बताऊँगा। ”

मैंने उससे कहा — “मैं एक तीर्थयात्री हूँ। दुनिया की किसी भी ऐसी चीज़ को हासिल करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है जो तुम पूरी करना चाहते हो। ”

वह फिर बोला — “दुनियावी चीज़ों की इच्छा किसी का दिल नहीं छोड़ती। वह तो हमेशा बनी ही रहती है। इसी लिये किसी कवि ने ये लाइनें लिखी हैं।

मैंने साधुओं को देखा हे बिना नाखून काटे हुए

मैंने दूसरों को देखा है जटाएँ रखे हुए

मैंने जोगियों को देखा है अपने कान काटे हुए

अपने शरीर पर भस्म लगाये हुए

मैंने मुनि देखे हैं जो कभी नहीं बोलते

मैंने सेवरस[18] देखे हैं अपने सिर के बाल मुँडाये हुए

मैंने लोग देखे हैं बन खंडी के जंगल में शिकार खेलते हुए

मैंने बहादुर भी देखे हैं मैंने हीरो भी देखे हैं

मैंने बहुत सारे अक्लमन्द भी देखे हैं और बेवकूफ भी देखे हैं

मैंने वे भी देखे हैं जिनको यही पता नहीं है कि उन्हें करना क्या है

अपनी खुशहाली में सब कुछ भूल कर बैठे हैं

मैंने वे भी देखे हैं जो हमेशा खुश रहे हैं

और मैंने वे भी देखे है जो जन्म से ही दुखी हैं

पर मैंने ऐसे आदमी कभी नहीं देखे जिनके मन में लालच नहीं होता

ये लाइनें सुन कर मैं बोला — “तुमने अभी जो कुछ भी कहा है वह ठीक कहा है पर मुझे वास्तव में कुछ नहीं चाहिये। पर अगर तुम मुझे इजाज़त दो तो क्या मैं एक नोट लिख सकता हूँ जिसमें मेरी इच्छाएँ लिखी होंगी और उस नोट को तुम जब राजकुमारी जी से मिलो तो उनको दे सकते हो। यह मेरे ऊपर तुम्हारा बड़ा एहसान होगा और मुझे लगेगा कि मुझे दुनिया का सारा खजाना मिल गया है। ”

खास नौकर बोला — “मैं आपका यह काम बड़ी खुशी से कर दूँगा। इसमें तो कोई मुश्किल ही नहीं है। ”

सो मैंने तुरन्त ही एक नोट लिखा जिसमें मैंने लिखा। सबसे पहले तो मैंने उसमें अल्लाह को धन्यवाद दिया। फिर यह कहते हुए अपने हालात बताये कि “मैं अल्लाह का यह बन्दा कुछ दिन से इस शहर में आया हुआ है और आपकी सरकार से मुझे बहुत अच्छा व्यवहार और खातिरदारी मिली है।

जैसा कि मैंने आपकी सरकार में आपके लोगों से आपके बारे में सुना है तो मुझे आपको देखने की इच्छा जाग उठी है। मुझे लगता है कि वे गुण जो आपके लोगों ने आपके बारे में बताये हैं उनसे चार गुना कहीं ज़्यादा वे गुण आपमें होने चाहिये।

आपके कुलीन लोगों ने मुझे यह इजाज़त दे दी है कि मैं अपनी इच्छाओं को आपके सामने रख सकूँ इस वजह से मैं बिना किसी रस्मो रिवाज के आपके सामने अपनी इच्छाएँ रखना चाहता हूँ।

मुझे इस दुनिया का कोई भी खजाना नहीं चाहिये। मैं अपने देश का राजा हूँ। मेरी यहाँ इतनी मेहनत करके इतनी दूर आने की बस एक ही वजह है। वह है मेरी तीव्र इच्छा आपसे मिलने की। वही एक उद्देश्य मुझे वहाँ से यहाँ इस तरह अकेले खींच लाया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरे ऊपर यह कृपा करके मेरे दिल की इच्छा को पूरा करेंगी। उसके बाद मैं सन्तुष्ट हो जाऊँगा। और कोई दूसरे ऐहसान अगर आप मेरे ऊपर करना चाहें तो वे आपकी खुशी के ऊपर हैं।

पर अगर इस अभागे की यह विनती स्वीकार न हुई तो यह बन्दा इसी हालत में आप के लिये जो इसके मन में भावनाएँ हैं उनको अपने मन में दबाये हुए मुसीबतों को झेलता हुआ अपनी बेचैन ज़िन्दगी को बरबाद करते हुए इधर उधर घूमता रहेगा। और मजनूँ और फ़रहाद की तरह से किसी जंगल या फिर पहाड़ पर अपनी जान दे देगा। ”[19]

इस तरह की इच्छाएँ लिख कर मैंने वह नोट उस खास नौकर को दे दिया। वह उसको राजकुमारी जी के पास ले गया। कुछ देर बाद ही वह लौट आया और मुझे शाही हरम[20] के दरवाजे तक ले गया।

वहाँ पहुँच कर मैंने एक बड़ी सी उम्र वाली स्त्री को देखा। उसने बहुत सारे जवाहरात पहन रखे थे और वह सोने के स्टूल पर बैठी थी। बढ़िया कपड़े पहन कर बहुत सारे खास नौकर और दूसरे नौकर उसके सामने अपने हाथ अपने दूसरे कन्धे पर रखे वहाँ खड़े हुए थे।

मैंने उसको यह सोचते हुए कि यह राजकुमारी के मामलों की देखभाल करने वाली होगी और उसे एक इज़्ज़तदार स्त्री समझते हुए झुक कर सलाम किया।

उस बड़ी स्त्री ने पलट कर मेरे सलाम का जवाब दिया और बोली — “आओ बैठो। यहाँ तुम्हारा स्वागत है। सो वह तुम हो जिसने राजकुमारी जी को इतना प्यारा सा नोट लिख कर भेजा था। ”

यह सुन कर शर्म से मैंने सिर झुका लिया और चुपचाप बैठा रहा। कुछ देर बाद वह बोली — “ओ नौजवान। राजकुमारी जी ने आपको अपना सलाम भेजा है और कहा है कि —

“मुझे शादी करने में कोई ऐतराज़ नहीं है जैसा कि आपने अपने नोट में लिखा है पर आपके राज्य के बारे में मुझे कहना यह है कि आपको इस भिखारी की हालत में देख कर आपको एक राजा सोचना और आपको राजा बनने का गर्व होना यह सब मेरी समझ से बाहर है।

इसी लिये सब लोग एक बराबर हैं हालाँकि उनमें से कुछ लोग मुहम्मद साहब को मानने वाले होने की वजह से ऊँचे हो सकते हैं। मुझे भी काफी समय से यह इच्छा है कि मैं शादी करूँ।

और क्योंकि जैसे आपकी दुनियावी सम्पत्ति में कोई रुचि नहीं है उसी तरह से अल्लाह ने मेरी रुचि भी कुछ ऐसी ही बनायी है। लेकिन एक शर्त है कि आप पहले मेरी शादी का हिस्सा[21] यानी “मेहर” यानी राजकुमारी की भेंट इकठ्ठा कर लें। ”

वह बड़ी उम्र वाली स्त्री ने आगे जोड़ा — “और वह मेहर है मेरा एक काम जिसे अगर आप कर सकें तो। ”

मैं बोला — “मैं हर काम के लिये तैयार हूँ। आपके काम को पूरा करने के लिये मैं अपनी सारी सम्पत्ति और जान तक भी लगा सकता हूँ। आप मुझे बताएँ कि वह काम क्या है। ”

वह स्त्री बोली — “आप यहाँ आज और कल ठहरें। मैं आपको वह काम बताऊँगी। ”

मैंने खुशी से उसकी बात मान ली और उससे विदा ले कर मैं वहाँ से चला आया।

इस बीच दिन तो बीत गया और फिर आयी रात। रात को एक खास नौकर मुझे बुलाने के लिये आया और वह मुझे हरम में ले गया।

वहाँ पहुँच कर मैंने देखा कि वहाँ बहुत सारे कुलीन लोग अक्लमन्द लोग गुणी लोग और अल्लाह को जानने वाले संत लोग मौजूद थे। मैं भी उन सबके साथ वहाँ जा कर बैठ गया।

इस बीच खाने के लिये दस्तरख्वान बिछाया गया। मीठे और नमकीन के बहुत सारे तरीके के खाने वहाँ लाये गये। उन सबने खाना शुरू कर दिया। उन्होंने मुझसे भी खाना खाने के लिये कहा तो मैंने भी उनके साथ खाना खाया।

जब खाना खत्म हो गया तब हरम के अन्दर से एक दासी आयी और बोली — “बहरावर[22] कहाँ है। उसे बुलाओ। ”

जो नौकर वहाँ खड़े थे वे उसको ले कर तुरन्त ही वहाँ आ गये। वह देखने में एक बहुत ही इज़्ज़तदार आदमी लग रहा था। उसकी कमर से सोने और चाँदी की कई चाभियाँ लटकी हुई थीं। मुझे सलाम करके वह मेरे पास ही बैठ गया।

उसी दासी ने फिर कहा — “ओ बहरावर। जो कुछ तूने सुना वह सब ठीक ठीक इनको बता। ”

बहरावर मेरी तरफ घूमा और बोला — “ओ दोस्त। हमारी राजकुमारी के पास हजारों दास हैं पर मैं उनका सबसे प्यारा पुश्तैनी दास हूँ। वह उनको लाखों रुपये का व्यापार करने के लिये बहुत सारा सामान ले कर अलग अलग देशों को भेजती हैं जिसको वे अपनी देखभाल में ले जाते हैं।

जब ये लोग अपने अपने उन देशों से व्यापार करके वापस आते हैं जिन जिन देशों को इन्हें भेजा गया है तब राजकुमारी जी खुद उन सबसे जहाँ जहाँ वे व्यापार करने के लिये गये थे उन उन देशों के रीति रिवाजों के बारे में पूछताछ करती हैं और उनको ध्यान से सुनती हैं।

एक बार ऐसा हुआ कि यह सबसे नीच दास व्यापार करने के लिये नीमरोज़ शहर[23] गया। यह देख कर कि वहाँ सारे लोग काले कपड़े पहने घूम रहे हैं और बराबर रो रहे हैं और आहें भर रहे हैं तो मुझे ऐसा लगा कि उनके ऊपर कोई बहुत बड़ी मुसीबत आ पड़ी है। मैंने बहुतों से इस माहौल की वजह पूछी पर कोई मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं देता था।

एक दिन जैसे ही सुबह हुई शहर के सारे लोग चाहे वे छोटे थे या बड़े ऊँचे थे या नीचे गरीब थे या अमीर शहर के बाहर गये और आपस में एक मीटिंग करने लगे। वहाँ के देश का राजा भी अपने घोड़े पर सवार हो कर अपने कुलीन लोगों को साथ ले कर वहाँ पहुँचा हुआ था। उन सबने एक लाइन बना रखी थी और वे सब एक लाइन में खड़े हुए थे।

मैं भी उनके साथ ही उस अजीब दृश्य को देखने के लिये खड़ा हुआ था। क्योंकि उस तरह से खड़े होने के ढंग से मुझे ऐसा लग रहा था कि वे वहाँ किसी का इन्तजार कर रहे थे।

करीब एक घंटे बाद एक देवदूत जैसा सुन्दर नौजवान जो करीब 15–16 साल का रहा होगा बहुत ज़ोर की आवाज करता हुआ भूरे बैल पर सवार हो कर एक हाथ में कुछ पकड़े हुए दूर से आता हुआ दिखायी दिया। वह हमारे पास आ कर खड़ा हो गया।

फिर वह बैल पर से उतर गया और नीचे पालथी मार कर बैठ[24] गया। उसके एक हाथ में घोड़े की लगाम थी और दूसरे में नंगी तलवार। एक गुलाबी रंग का सुन्दर सा नौकर उसके साथ था।

नौजवान लड़के ने उसके हाथ में कुछ दिया जिसको ले कर उसने शुरू से आखीर तक सबको दिखाया पर वह कोई ऐसी चीज़ थी जिसको जिसने भी देखा वह बहुत ज़ोर से रोया।

इस तरह उसने उस चीज़ को एक के बाद हर एक को दिखाया और हर एक को रुलाया। फिर इसको बाद वह लाइन के शुरू में चला गया और फिर अपने मालिक के पास चला गया।

जैसे ही वह उसके पास गया तो वह नौजवान उठ कर खड़ा हो गया और अपनी तलवार से उस नौकर का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। अपने बैल पर चढ़ कर वह फिर से उसी दिशा में चला गया जिधर से वह आया था। वहाँ खड़े सारे लोग उसको जाते देखते रह गये। शहरी लोग सब वापस आ गये।

मुझे यह सब बहुत अजीब लगा तो मैं उत्सुकता से सबसे पूछने लगा कि यह अजीब घटना कैसी थी। इस बात की सफाई जानने के लिये मैंने उनको पैसे का लालच भी दिया, उनसे विनती भी की, उनकी चापलूसी भी की कि वह नौजवान कौन था, उसने यह काम क्यों किया, वह कहाँ से आया था और फिर कहाँ चला गया। पर कोई मुझे ज़रा सी भी बात नहीं बता रहा था। न मैं ही कुछ समझ सका।

जब मैं घर वापस आया तो मैंने इस घटना के बारे में राजकुमारी जी को बताया जो मैंने देखी थी। उस दिन से राजकुमारी जी भी परेशान हैं। वह भी इस बात को जानने के लिये बहुत चिन्तित हैं कि उसकी वास्तविक वजह क्या है।

इसी लिये उन्होंने इसी बात का पता लगाने के लिये अपनी मेहर की यह शर्त रखी है कि जो कोई आदमी उस घटना की सच्ची कहानी पता करके लायेगा वह उसी से शादी करेंगीं। वही उनका, उनके देश का और उनकी सारी सम्पत्ति का मालिक होगा। ”

बहरावर ने अन्त में कहा — “आपने उस घटना का पूरा हाल सुन लिया। आप विचार कर लीजिये कि अगर आप उस नौजवान के बारे में सारी खबर ला सकते हैं या नहीं। अगर हाँ तो आप नीमरोज़ जाने की जल्दी से तैयारी कीजिये और नहीं तो मना कर दीजिये और घर वापस चले जाइये। ”

मैंने जवाब दिया — “अगर अल्लाह मुझसे खुश हुआ तो मैं इस मामले की सारी खोज करके राजकुमारी जी के पास जल्दी ही लौटूँगा। और अगर मेरी किस्मत ने साथ नहीं दिया तो फिर इसका कोई इलाज नहीं है। पर राजकुमारी जी को मुझसे वायदा करना होगा कि वह अपने वायदे से मुकरेंगी नहीं।

इसके अलावा अब मेरे दिल में एक बेचैन सा विचार उठ रहा है। अगर राजकुमारी जी मुझको एक बार अपने सामने बुला लें और मुझे परदे के बाहर बैठने की इजाज़त दें और मुझे अपने सामने यह विनती करने की इजाज़त दें ताकि वह उसे अपने कानों से सुन लें और उसे सुन कर अपने होठों से जवाब दें तभी मेरे दिल को शान्ति मिलेगी। और उसके बाद में ही मैं अपने काम में सफल हो पाऊँगा। ”

मेरी यह विनती दासी ने जा कर राजकुमारी को बतायी तो उसने मुझे अपने सामने लाने का हुकुम दिया। वही दासी फिर लौट कर आयी और मुझे राजकुमारी के कमरे तक ले गयी जहाँ वह बैठी हुई थी।

मैंने देखा वाह वहाँ क्या दृश्य था। वहाँ काल्मुक, तुर्किस्तान, अबिसीनिया, उज़बक, टारटरी और काशमीर की सुन्दर दास दासियाँ और हथियारबन्द सुन्दर लड़कियाँ दो लाइनों में खड़े हुए थे। सभी ने कीमती गहने पहन रखे थे और सभी अपने सीने पर अपनी एक बाँह को दूसरी बाँह पर रखे खड़े हुए थे।

ऐसे दरबार को मैं क्या कहूँ – क्या इन्द्र का दरबार? या फिर ये सब परियों के देश से आये थे। इनको देख कर मेरे दिल से एक आह सी निकल गयी और मेरा दिल धड़कने लगा। पर मैंने उसको जबरदस्ती दबा कर रखा हुआ था।

उन सबके सामने थोड़ा झुकते हुए मैं आगे बढ़ा पर मेरे पैर तो जैसे सौ सौ मन[25] भारी हो गये थे। जब भी मैं किसी लड़की की तरफ देखता तो मेरा दिल उसकी तरफ बढ़ने के लिये मना करने लगता।

कमरे के एक तरफ एक परदा लटका हुआ था और उसके पास ही जवाहरातों से जड़ा हुआ एक स्टूल रखा हुआ था। इसके अलावा वहाँ चन्दन की लकड़ी की एक कुरसी भी रखी हुई थी।

दासी ने मुझे जवाहरातों से जड़े हुए स्टूल पर बैठने का इशारा किया तो मैं उस पर बैठ गया। वह खुद चन्दन की लकड़ी की कुरसी पर बैठ गयी। फिर वह मुझसे बोली — “अब आपको जो कुछ कहना हो वह दिल से और साफ साफ कहो। ”

मैंने सबसे पहले तो राजकुमारी जी के गुणों का न्याय का और उनकी दरियादिली का बखान किया। फिर मैंने उनसे कहा — “जबसे मैं इस देश के अन्दर आया हूँ मैंने अपने हर पड़ाव पर यात्रियों के लिये रहने की जगह और बड़ी बड़ी इमारतें देखी हैं। उनमें हर तरह के नौकर चाकर और दूसरी जरूरतों के लोग उन यात्रियों की सेवा के लिये रखे हुए हैं।

मैंने यहाँ अपने हर पड़ाव पर तीन दिन गुजारे हैं और जब मैं चौथे दिन वहाँ से चलने के लिये होता हूँ तो भलमनसाहत में कोई यह नहीं कहता कि “आप जाइये। ” बल्कि जो भी चीज़ और फर्नीचर मैंने वहाँ इस्तेमाल किया हुआ होता है वे उसके लिये कहते हैं कि वह सब मेरा है।

मैं उन्हें चाहे ले जाऊँ या बेच जाऊँ या फेंक जाऊँ और या फिर उन्हें अपने भविष्य में इस्तेमाल करने के लिये सोचने तक के समय के लिये किसी कमरे में बन्द कर जाऊँ और फिर जब चाहे जब आ कर ले जाऊँ। यह सब मेरी खुशी पर है।

मैंने ऐसा ही किया पर आश्चर्य की बात तो यह है कि अगर कोई अकेला मेरे जैसा तीर्थयात्री को ऐसा स्वागत मिले तब तो हजारों यात्री आपके राज्य में आ जायेंगे और आपकी उन जगहों में रहेंगे।

और अगर हर आदमी को इसी तरह का स्वागत मिलता रहा तब तो बहुत पैसा खर्च हो जायेगा। इतना सारा पैसा आयेगा कहाँ से जहाँ से उसे इस पर खर्च किया जायेगा। और उस खर्च का नाम क्या होगा। इसके लिये तो कारूँ का खजाना[26] भी कम पड़ जायेगा।

और अगर हम राजकुमारी जी के राज्य को देखें तो साफ दिखायी देता है कि उनके राज्य की आमदनी तो इसके रसोईघर के लिये भी काफी नहीं है दूसरे खर्चों की तो बात ही छोड़ दो।

राजकुमारी जी अगर आप अपने मुँह से इस बात पर थोड़ी रोशनी डाल सकें तो शायद मेरा दिमाग कुछ शान्त हो। उसके बाद मैं नीमरोज़ चला जाऊँगा और किसी तरह वहाँ पहुँच कर उस अजीबोगरीब घटना के बारे में पूरी जानकारी ले कर आपकी सेवा में हाजिर होता हूँ।

अगर अल्लाह ने मेरी जान बख्श दी तो मैं राजकुमारी जी के पास लौट कर आता हूँ और अपने दिल की इच्छा पूरी करता हूँ। ”

यह सुन कर राजकुमारी खुद बोली — “ओ नौजवान। अगर तुम्हारी यह इच्छा बहुत ज़्यादा है कि तुम इन हालातों को पूरी तरीके से जानो तो तुम्हें यहाँ आज और रुकना पड़ेगा। मैं तुम्हें शाम को बुलाऊँगी और अपने इस बड़े खजाने का राज़ तुम्हें बिना कुछ भी छिपाये बताऊँगी। ”

इससे सन्तुष्ट हो कर मैं वहाँ से चला गया और यह सोचते हुए बड़ी बेचैनी से शाम का इन्तजार करने लगा कि कब शाम आयेगी और कब राजकुमारी के खजाने के बारे में जानने की मेरी उत्सुकता शान्त होगी।

इस बीच में एक खास नौकर कुछ ढकी हुई थालियाँ कुछ लोगों के सिर पर लदवा कर वहाँ ले कर आया और उनको मेरे सामने ला कर रख दिया और बोला — “राजकुमारी जी ने आपके लिये अपनी मेज से यह खाना भेजा है। [27] मेहरबानी करके आप इसे खायें। ” जब उसनेे उन थालियों को खोला तो उनमें से माँस की नशीली खुशबू मेरे दिमाग में बस गयी और मेरी तो आत्मा तक सन्तुष्ट हो गयी।

मैंने खूब पेट भर कर खाया और बाकी बचा हुआ खाना मैंने राजकुमारी जी को धन्यवाद के साथ वापस भेज दिया।

आखिर जब सारे दिन का यात्री सूरज थक कर अपने घर चला गया और चाँद अपने साथियों के साथ अपने महल से बाहर निकला तब एक दासी मेरे पास आयी और बोली — “आइये राजकुमारी जी आपको बुला रही हैं। ”

मैं उसके साथ चल दिया। वह मुझे राजकुमारी जी के अपने कमरे में ले गयी। वहाँ हो रही रोशनी का कुछ ऐसा असर था कि उसके सामने शबे–कद्र भी हल्की पड़ रही थी।

कीमती कालीन पर सोने के काम किये गये कपड़े चढ़े मसनद रखे हुए थे। जवाहरात जड़े हुए ब्रोकेड के कपड़े से ढके हुए तकिये भी रखे हुए थे। उन पर मोतियों की झालरें लटकी हुई थीं।

मसनदों के सामने ही जवाहरातों से जड़े हुए और उन्हीं के फूल पत्ते लगे हुए नकली पेड़ खड़े थे। वे पेड़ देखने में ऐसे लग रहे थे जैसे असली हों। वे सोने की क्यारियों में लगे हुए थे।

दाँये और बाँये हाथ को कई दास और दासियाँ हाथ जोड़े खड़े हुए थे। उनकी आँखें नीची थीं और वे सब बड़ी इज़्ज़त से खड़े थे। गाने नाचने वाली लड़कियाँ तैयार साज़ों के साथ तैयार खड़ी थीं। यह दृश्य देख कर तो मेरी सारी इन्द्रियाँ सुन्न पड़ने लगीं।

मैंने अपने साथ आयी हुई दासी से कहा — “यहाँ तो दिन में भी इतनी खुशी का दृश्य है और रात को भी कितना शानदार दृश्य रहता है कि हर दिन ईद का दिन होता है और हर रात शबे–बरात होती है।

इसके अलावा अगर कोई दुनिया भर का भी राजा हो तो इतनी शानो शौकत से नहीं रह सकता। क्या राजकुमारी जी का दरबार हमेशा ही ऐसा रहता है। ”

दासी बोली — “राजकुमारी जी के दरबार में हमेशा ही ऐसी ही शानो शौकत दिखायी देती है जैसी कि आप अभी देख रहे हैं। इसमे कोई भेद नहीं होता। सिवाय इसके कि कभी कभी वह बड़ा हो जाता है। आप यहाँ बैठिये। राजकुमारी जी दूसरे कमरे में हैं। मैं उन्हें जा कर बताती हूँ कि आप यहाँ बैठे हैं। ”

यह कह कर दासी अन्दर चली गयी पर जल्दी ही लौट आयी। आ कर बोली “आइये। राजकुमारी के पास चलें। ”

जब मैं राजकुमारी जी के कमरे में घुसा तो मैं तो आश्चर्य से दंग रह गया। मुझे तो यही पता नहीं चला कि दरवाजा कहाँ है और दीवारें कहाँ हैं क्योंकि वे सब अलैप्पो के शीशों से ढके हुए थे।

वे सब आदमी की ऊँचाई वाले थे और जिनके फ्रेमों में हीरे और मोती जड़े हुए थे। एक की परछाँई दूसरे पर पड़ रही थी जिससे ऐसा लग रहा था मानो सारा कमरा जवाहरातों से जड़ा हुआ हो।

एक तरफ को एक परदा लटका हुआ था जिसके पीछे राजकुमारी बैठी हुई थी। परदे के पास ही दासी बैठ गयी। उसने मुझे भी बैठने के लिये कहा। फिर उसने राजकुमारी की इजाज़त से यह कहना शुरू किया —

“सुनो ओ अक्लमन्द नौजवान। इस देश का सुलतान एक बहुत ही ताकतवर राजा था। इस घर में उसके सात बेटियाँ थीं। एक दिन उसके घर में कोई त्यौहार था और उसकी सातों बेटियाँ उसके सामने बहुत बढ़िया बढ़िया कपड़े पहने खड़ी थीं। वे सब 16–16 जवाहरात पहने थीं 12–12 गहने पहने थीं और अपने बालों में हाथी दाँत पहने थीं।

उनको उस तरह खड़े देख कर राजा के दिमाग में कुछ आया और वह अपनी बेटियों से बोला — “अगर तुम्हारा पिता एक राजा न हुआ होता और तुम लोग किसी गरीब आदमी के घर पैदा हुई होतीं तब तुम्हें राजकुमारी कौन कहता।

इसके लिये तुम लोग अल्लाह को धन्यवाद दो कि तुम राजकुमारी कहलाती हो। तुम्हारी सारी खुशकिस्मती मेरी ही वजह से है। ”

उसकी छह बेटियों का दिमाग एक जैसा चलता था वे बोली — “योर मैजेस्टी ठीक कहते हैं। हमारी सारी खुशियाँ केवल आप ही की वजह से हैं। ”

पर उसकी सातवीं बेटी जो उम्र में तो सबसे छोटी थी पर समझदारी और अक्ल में उन सबमें बड़ी थी चुपचाप खड़ी रही। उसने अपनी बहिनों की तरह से जवाब नहीं दिया क्योंकि जो वह कहना चाहती थी वह कहना ठीक नहीं था।

राजा को उसको चुपचाप खड़ी देख कर कुछ गुस्सा सा आ गया। वह उससे बोला — “बेटी तुमने कुछ नहीं कहा इसकी क्या वजह है। ”

तब राजकुमारी ने अपने दोनों हाथ एक रूमाल से बाँध लिये और नम्रतापूर्वक जवाब दिया — “अगर योर मैजेस्टी से मैं जान की बख्शीश पाऊँ और अपनी बात की माफी पाऊँ तो यह दासी आपके ऊपर अपना दिल खोल सकती है। ”

राजा बोले — “बोलो क्या बोलना चाहती हो। ”

राजकुमारी बोली — “ओ ताकतवर राजा। आपने सुना होगा कि सच हमेशा कड़वा होता है उसकी वजह से अपनी ज़िन्दगी की परवाह न करते हुए मैं आपसे यह कहने की हिम्मत करती हूँ कि उस बड़े लिखने वाले ने जो कुछ भी मेरी किस्मत में लिख दिया है उसे कोई नहीं टाल सकता।

उसको बदलने के लिये चाहे हम अपने आप ही अपने पैर क्यों न घायल कर लें और चाहे कालीन में सिर गड़ा गड़ा कर प्रार्थना क्यों न कर लें जो कुछ भी किसी की किस्मत में लिखा हुआ है वह तो हो कर ही हेगा।

वह सारी ताकतों का मालिक जिसने आपको राजा बनाया है उसी ने मुझे भी राजकुमारी बनाया है। उसके पास इतनी ताकत है कि उसके राज्य में किसी और को कोई ताकत नहीं है। आप मेरे राजा हैं और मेरा भला करने वाले हैं।

अगर मैं आपके पैरों के नीचे की धूल का अपनी आँखों में सुरमा बना कर लगाऊँ तो वह मेरा हो जायेगा पर किस्मत तो हर एक की अपनी अपनी होती है और उसी के साथ रहती है। ”

राजा उसकी यह बात सुन कर बहुत गुस्सा हुआ। उसका जवाब उसको बहुत नाखुश करने वाला था।

वह गुस्से में बोला — “तुम्हारे इतने छोटे से मुँह से इतने बड़े शब्द निकल रहे हैं। इसके लिये अब तुम्हारी यही सजा है कि तुम अपने ये सारे जवाहरात और गहने निकाल दो और तुमको एक कुरसी पर बठा कर जंगल में ऐसी जगह बिठा दिया जाये जहाँ न कोई आदमी हो न कोई आदमज़ाद। तब हम देखेंगे कि तुम्हारी किस्मत में क्या लिखा है। ”


[1] Adventures of the Second Darwesh (Tale No 2) – Taken from :

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/baghobahar/03_seconddarvesh_a.html

This anecdote of Hatim is founded on Arabian history.

[2] The phrase char-zanu ho-baithna, signifies "to sit down with the legs crossed in front as our tailors do when at work." It is the ordnary mode of sitting among the Turks.

[3] The Muhammadans divide the world into seven climes, and suppose that a constellation presides over the destiny of each clime.

[4] Hatim Tai

[5] Here a distinction is drawn between the words zaban and jibh. Although both signify 'tongue,' but the word zaban in Persian and Hindustani means both the fleshy member of the body, called the tongue, and also language or speech, just like word "tongue" in English which has both significations. Jibh, in Hindi and Hindustani, means the tongue only in the sense of the member of the body, never in the sense of speech; hence it is equally applicable to man or brute. Ask any physician who has practised in India the Hindustani for "show the tongue," he will tell you jibh dikhao, or zaban dikhao; and if he was a man of discernment, he would use jibh with a Hindu, and zaban with a Musalman; but still he would be perfectly understood by either party.

[6] I am sorry that I had to use this word because I could not find any appropriate Hindi word for the word “Liberality”.

[7] It is related by grave historians, that Hatim actually built an alms-house of this description. On Hatim's death, his younger brother, who succeeded him, endeavoured to act the generous in the above manner. His mother dissuaded him, saying, "Think not, my son, of imitating Hatim: it is an effort thou canst not accomplish;" and in order to prove what she said, the mother assumed the garb of a faqir, and acted as above related. When she came to the first door the second time, and received her son's lecture on the sin of avarice; she suddenly threw off her disguise, and said, "I told thee, my son, not to think of imitating Hatim. By him I have been served three times running, in this very manner, without ever a question being asked."

[8] Faqr, in Arabic, means poverty.

[9] Translated for the word “Contentment”

[10] Arabic word Sakhya, or Urdu word Sakhi, means Generous

[11] Bedar Bakht

[12] "Dastar-khwan" literally signifies the "turband of the table". How they manage to make such a meaning out of it is beyond ordinary research; and when done, it makes nonsense. They forget that the Orientals never made use of tables in the good old times. The dastar-khwan is, in reality, both table and table-cloth in one. It is a round piece of cloth or leather spread out on the floor. The food is then arranged thereon, and the company squat round the edge of it, and, after saying Bism-Illah, fall to, with what appetite they may; hence the phrase dastar-khwan par baithna, to sit on, (not at,) the table.

[13] Kashani Velvet

[14] Oriental people use several kinds of good scented things for chewing after the food to freshen their mouth, such as betelnut, betel leaf, peppermint etc.

[15] Masahri means Mosquito net

[16] Who praises others describing their forefathers, especially of kings etc.

[17] Translated for the word “Eunuch”. I am sorry I have not used the proper word for it because of decency of the language.

[18] Jain mendicants

[19] Majnun is a mad lover of Eastern romance, who pined in vain for the cruel Laili. Farhad is equally celebrated as an unhappy amant who perished for Shirin.

[20] Harem – place to live for women only in Ottoman Empire

[21] Translated for the wotds “Marriage Portion”. The marriage portion here alluded to is “Mehar“ which denotes a present made to, or a portion settled on, the wife at or before marriage.

[22] Bahrawar

[23] Nimroz is that part of Persia which comprehends the Provinces of Sijistan and Mikran, towards the south-east.

[24] Sitting cross-legged.

[25] A Man (or Mound) used to be of 40 Seers and was used in India and around as a weighing measure of dry material and liquid before the metric measurements were introduced in 1950. One Seer is a little less than the Kilogram or about two pounds.

[26] Treasure of Karun – like Hindus’ Kuber’s treasury.

[27] Literally, "her own leavings." In the East it considered a very high compliment on the part of a person of rank to present his guest with the remnants of his own dish. In fact it does not mean that the Princess had sent the food from her very own plate after finishing her eating; but it means that “when she had eaten, she has sent the remaing food or dishes from her table.”

(क्रमशः अगले खंडों में जारी...)

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लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड आठ
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