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संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) - 5 : यशवंत कोठारी

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संस्थानोपनिषद

(व्यंग्य –उपन्यास )

यशवंत कोठारी


भाग 5 -  

अगले दिन निदेशक ने अंतर राष्ट्रीय सेमिनार का एक विशद प्रोजेक्ट अपने मातहतों को बनाने के निर्देश दिए. विदेशों से आने वाले डेलिगेट्स के लिए दिल्ली में पांच सितारा व्यवस्थाएं जरूरी थी. दिल्ली में विज्ञान भवन की बुकिंग के लिए एक अफसर को दिल्ली भेजा गया. सेमिनार का शानदार प्रोजेक्ट लेकर निदेशक खुद दिल्ली जाना चाहते थे, मगर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा, सचिव महोदय एक शादी में शरीक होने इस कस्बे में पधार रहे है –इस सूचना मात्र से निदेशक को आनंद आ गया. ऑफिस छोड़ कर वे शादीवाले के यहाँ पर हाजरी बजाने चले गए.

सचिव आये लेकिन दुआ सलाम से आगे कोई बात नहीं हो सकी.

हाँ एक काम हुआ सचिव का एक विस्तार व्याख्यान तय हो गया. सचिव के इस व्याख्यान में संस्थान के बाबु, चपरासी,, प्रोफेसर सबको जमा कर दिया गया. भीड़ देख कर सचिव को अच्छा लगा व्याख्यान के बीच बीच में करतल ध्वनि से भी सचिव का दिल खुश हो गया. मौका मुनासिब देख कर निदेशक ने राग सेमिनार छेड़ा, डीन अकेडमिक ने भी तान छेडी, चमचों ने ठेका लगाया, बात धीरे धीरे बन ने लगी. सचिव बोले

तुम पूरा प्रोजेक्ट तीन करोड़ का करके दिल्ली आ जाओ. मेरी पावर में पांच करोड़ तक के काम है. निकाल दूंगा. हाँ ये पी एम् या प्रेसीडेंट के लिए प्रोटोकोल के अनुसार काम करो. अपनी शासी निकाय के अध्यक्ष के पत्र के साथ जाना, हो सके तो उनको साथ ले जाना. राज्य सरकार से भी लिखवाना.

जी सर.

निदेशक ने हाँ में हाँ मिलायी.

सब लोग सचिव को छोड़ने हवाई अड्डे पर गए. उनको यात्रा का एल्बम भेंट किया एक चमची शोध छात्रा ने सेल्फी खिंची और सेमिनार का पहला पड़ाव पार हुआ.

सेमिनार के विषय जोरदार हो, विशेषज्ञ जोरदार हो विदेशी डेलिगेट्स आ जाये प्रधानमंत्री उदघाटन कर दे बस फिर सब मज़े ही मज़े. निदेशक ने सोच समझ के विषय तय कर दिया -भारतीय विद्याओं की शोध की प्रक्रिया याने रिसर्च मेथोडोलोजी ऑफ़ इंडियन साइंसेज. इसे भाई लोग इंडोलोजी भी कहते हैं.. यह तय करके निदेशक ने शोध पत्र चयन समिति बनाई व स्वयम् इसके अध्यक्ष हो गए. अन्य समितियों में अपने लोग अध्यक्ष व विरोधियों को महत्त्व हीन स्थानों पर फिट कर दिया. स्वीकृति की आशा में बजट जारी कर दिया. विज्ञान भवन बुक हो गया. प्रधान मंत्री से मिलने का टाइम ले ने . स्थानीय सरकार के मंत्री के साथ निदेशक प्रधान मंत्री कार्यालय के लिए उड़ चले.

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प्रधान मंत्री कार्यालय की दिव्य व भव्य छटा देख कर स्थानीय मंत्री व निदेशक चकित रह गए. अफसर ही अफसर. हर काम के लिए अलग अफसर. प्रधान मंत्री जो स्वयम को जनता का प्रधान सेवक कहते थे, पूरे सामंतवादी रस्मों रिवाज के साथ रहते थे. मिलने से पहले इतनी ज्यादा सेकुरिटी जाँच की आदमी बिदक जाय . सुना था वे अठारह घंटे काम करते हैं, एक समय भोजन बस, नवरात्रि में केवल निम्बू पानी. एक मेडिकल टीम दफ्तर में, एक घर पर, व एक हर समय साथ, लेकिन क्या कोई यमराज से बच सका है आज तक. निदेशक निमन्त्रण पत्र के साथ प्रतीक्षा कक्ष में बैठ गये. मंत्री जी के कारण जल्दी ही बुलावा आ गया.

पी एम सर ने उद घाटन का न्योता स्वीकार कर लिया क्योंकि विज्ञान भवन में आयोजन था. वे बोले -

मेरा विषय से सम्बन्धित एक भाषण लिख कर भेज देना, मेरे सलाहकार देख लेंगे. यह कह कर प्रधान सेवक संसद के किये प्रस्थान कर गए. एक सहायक ने उनको स्वीकृति पत्र दे दिया. परम प्रसन्न मन निदेशक उड़ते हुए वापस अपने संस्थान को आ गये. वे समझ गए अब अच्छे दिन आये ही समझो.

ज्योहीं यह खबर फैली की संस्थान एक अंतर राष्ट्रीय सेमिनार देश की राजधानी में करने जा रहा है, पत्रकारों के पंख लग गए. ख़बरों का भयंकर अकाल था. समाचारों के दानव का रोज पेट भरने के लिए चौबीस घंटे की बाईट चाहिए थी. ऐसा सुनहरा अवसर कौन हाथ से जाने देता. प्रिंट मीडिया, ऑडियो विजुअल मीडिया लाव लश्कर के साथ संस्थान की सेवा में बिना बुलाये मेहमान की तरह आने लगे. एक जाता दूसरा आता दूसरा जाता तीसरा आता.

पत्रकारों में दो समूह बन गया एक संस्थान के क्रिया कलापों की तारीफ करता दूसरा आलोचना, जो आलोचना करता उसे मैनेज करने के लिए मास्टरों को लगाया गया, अफसरों की सेवाएँ ली गयी मगर बात बनी नहीं, धूर्त मीडिया के केप्सूल सुबह से शाम तक चलने लगे. बातें मंत्रालय से पी एम ओ तक जाने लगी, एक स्वतंत्र पत्रकार ने एक लम्बा आलेख एक विदेशी अख़बार में छपा मारा, प्रशासन कुछ न कर सका. स्थिति विस्फोटक थी. निदेशक को रोज़ सचिव की डाट पड रही थी, लेकिन संस्थान का एक तबका खुश था क्योंकि वह अपने आपको उपेक्षित मान रहा था...

एक स्थानीय पत्रकार जिसकी बीबी के नाम से चल रही फर्म से सामान नहीं ख़रीदा गया था, बड़ी दूर की कौडी लाया, उसने अपने पेम्फलेट रुपी पत्र में यह रहस्योद्घाटन किया की संस्थान के छात्रा होस्टल के पीछे कुछ दिनों पहले एक लाश मिली थी. इस की जाँच का क्या हुआ. परिसर में ही एक सुसाइड पॉइंट के भी समाचार पत्रकार जी ने बॉक्स बना कर छाप दिया.

इस मामले को साबित करने के बजाय दृश्य –श्रव्य माध्यम ने किस्से को इतना उछाला की उनकी टी आर पी बढ़ गयी मामला पिपली लाइव फिल्म जैसा हो गया. सेमिनार कही बहुत पीछे छूट गयी.

निदेशक इस बवाल से पिंड छुड़ाने के लिए छुट्टी जाने की सोचने लगे. लेकिन फिर एक घटना से सब ठीक होगया. हुआ यों की प्रदेश में निकाय चुनाव आ गये. पत्रकार व्यस्त हो गए उनको नए ग्राहक मिल गये, पीने खाने का जुगाड़ हो गया . उन लोगों ने संस्थान को बख्श दिया.

. सेमिनार दिल्ली में थी सो सब ने राहत की साँस ली.

सेमिनार के लिए दिल्ली में एक केम्प ऑफिस बनाया गया. इसे सेमिनार सचिवालय का बड़ा सा नाम दे दिया गया. दिल्ली के मीडिया को सँभालने के लिए एक बड़ी पी आर एजेंसी को संविदा पर लिया गया, यह तो बहुत बाद में पता चला की यह एजेंसी शासी निकाय के अध्यक्ष की पुत्र वधु चलाती है. एक इवेंट मैनेजमेंट कमेटी को भी उपकृत किया गया, जो एक उपसचिव की बेटी चलाती थी.

निश्चित दिन विज्ञान भवन को दुल्हन की तरह सजाया गया. संस्थान के निदेशक की हैसियत दुल्हन के बाप की तरह हो रही थी. सम्बन्धित मंत्री व सचिव खुद सब इंतजाम देख रहे थे. हाल की शुरू की सीटों पर मंत्रालय के अधिकारियों व् उनके परिवार के लोगों का कब्ज़ा था. विशेषज्ञों को पीछे बैठाया गया था. संस्थान के अधिकारी कर्मचारी अध्यापकों को इधर उधर खड़ा रहना पड़ा. बीच की जगह पर मीडिया वाले काबिज थे. सरकारी जनसंपर्क वाले व् पी आर एजेंसी वाले भी काम में लगे थे.

पी एम आये जल्दी से दीपक जलाया, चित्र पर माल्यार्पण किया. और सीधे भाषण देने के लिए डायस पर चले गए. पी एम् बोले और खूब बोले. सेमिनार का उदघाटन किया वर्तमान राजनीति पर चालू हो गये. विपक्ष मुझे व् मेरी सरकार को का म नहीं करने देता है, इस देश को विपक्ष मुक्त किया जाना चाहिए. वे सेमिनार के लिए लिखे भाषण को भूल कर अपने सरकार के गुणगान में व्यस्त रहे.

वे बोले –

भाइयों और बहनों,

आज पूरी दुनिया हमारी और देख रहीं है. हमें विश्व को नेतृत्व देना है. हर क्षेत्र में दुनिया को दिखा देना है की हम किसी से कम नहीं है. वी आर प्राउड टू बी इंडियन्स लेट अस बी वर्दी ऑफ़ इंडिया हम एक विशाल और महान देश में हैं, बस ये विपक्ष राष्ट्र द्रोह से बाज़ नहीं आता.

मीडिया ने भी उनको पूरा कवरेज दिया. एक दो छोटे चैनलों ने सीधा प्रसारण भी दिखा दिया. पी आर एजेंसी ने सब ठीक कर दिया. पूरा मामला आर्थिक है श्रीमान.

पी एम के जाने के बाद अलग अलग सेशन शुरू होने से पहले औपचारिक पंजीकरण हुए, किट, कूपनों व् गिफ्ट को लेकर कुछ झिक-झिक हुई जिसे सेमिनार के आयोजन सचिव ने संभाला, तकनीकी सत्र शुरू हुए मगर अब भीड़ नदारद थी. विशेषज्ञों के पर्चे पढ़े हुए माने जाने लगे. कई विदेशी मेहमान दिल्ली आगरा, जयपुर के गोल्डन ट्राईएंगल की और निकल गए. कुछ लोग अपनी महिला मित्रों के साथ सेमिनार करने चले गए, ये लोग दूसरे दिन ही आये. सेमिनार के दूसरे दिन फिर तकनीकी सेशन हुए. कुछ प्रतापी विशेषज्ञों ने मौखिक लम्बे चौडे व्याख्यान दिए, क्योंकि लिख कर बोलने में बड़े खतरे थे. मौखिक बोल कर बाद में यह कहा जा सकता था की मेरे कहने के गलत मतलब निकले गए. मगर श्रोताओं की कमी ही रही. सायंकाल सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए जिसमें लोक कलाकारों, छात्रोंने भाग लिया. कुछ अध्यापकों ने भी प्रतिभा दिखाई. डिनर से पहले आचमन की व्यवस्था थी कुछ सदाचारी अपने होटल कक्ष में ही गम गलत करते रहे. हर बार सेमिनारों में यहीं सब होता रहा है. हुआ और आगे भी होता रहेगा. स्वादिष्ट व् सफल सेमिनार ही ज्ञान विज्ञान को आगे बढाती है. छोटा कार्यक्रम करो तो मज़ा नहीं आता. नंगा क्या नहाये और क्या निचोड़े.

तीसरे दिन भी यहीं नाटक. यहीं नौटंकी.

समापन समारोह में विशेष अतिथि विभाग के काबिना मंत्री को बनाया गया. ताकि बजट की समस्या न रहे. मंत्रीजी ने सेमिनार को सफल घोषित कर दिया. खूब करतल ध्वनि हुई. इस सेमिनार की एक उपलब्धि हुई एक सामान्य अध्यापक को पद्मश्री मिली. एक अन्य चाटुकार को एक विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया. निदेशक मंत्रालय में फिट होने के सपने देखने लगे. लेकिन ये छिपे हुए फायदे है जो काफी दिनों के बाद में नज़र आते हैं.

तीन दिवसीय सेमिनार में पढ़े गए शोध पत्रों की पुस्तक प्रधानमंत्री के चित्र के साथ छाप दी गयी.

इसे पी एम ओ आफिस में स्वयं विभाग के मंत्री ले गए ताकि उनके नम्बर बढ़ सके.

कुछ दिनों के बाद मंत्री जी एक राज्य के राज्यपाल बना दिये गए. उनके मंत्री पद के समय के सब पाप धुल गए. वे राष्ट्र पति बनने के सपने देखने लगे. जैसे उनके दिन फिरे सबके फिरे, प्रभु.

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सेमिनार की अपार सफलता व् प्रधान मंत्री के साथ फोटो खिचवा के निदेशक व पूरी पार्टी गदगद भाव से अपने परिसर में लौटी. दो दिनों का अघोषित अवकाश रहा.

आज संस्थान फिर खुला है. पुस्तकालय के बाहर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी धूप सेंकते बतिया रहे हैं.

सुना है दिल्ली में भारी सेमिनार हुयी. प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया ‘

प्रधानमंत्री के पास और काम ही क्या है, उद्घाटन, शिलान्यास और मीटिंग.

सुना तो हमने भी है, मगर इससे विज्ञान का क्या भला हुआ?

विज्ञान का न सही अफसरों, अधिकारियों का तो फायदा हुआ. तीसरा बोल पड़ा.

दो –तीन करोड़ फूंक दिए हैं,

बीस प्रतिशत तो ईमानदारी का ही बनता है. यहीं देवता का भाग कहलाता है.

हाँ ये तो है, कमाई में ही समाई है.

प्रशासन की तो पांचों उंगली घी में और सर कडाही में.

लेखा शाखा की भी बल्ले बल्ले. एक बोला -

संस्थान में कुल बीस पद है जिनपर ऊपर की कमाई होती है. सब मिल बाँट कर खाते हैं.

अपन ग़रीबों को कौन पूछता है. चलो भाई काम करो साहब लोगों के आने का समय हो रहा है.

सेमिनार के विडीओ बनाये गए थे. सब वीडियो देख-देख कर खुश होते रहे. जो लोग दिल्ली न जा पाए थे उन्हें परिसर में ही फिल्म दिखाई गयी. उत्सव का यह वातावरण ज्यादा दिन नहीं चला. स्थानीय ऑडिट पार्टी ने आकर डेरा जमाया.

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