सोमवार, 14 नवंबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें... दिल की बात : किश्त 8 - बीवी की गुलामी

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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

 

बीवी की गुलामी

मेरे भाई कृष्ण कुमार यादव...!

इस समय आप क्या कर रहे हो..? आप जो कर रहे हैं दूसरे की गुलामी कर रहे हैं. कब तक करोगे...? जब तक शरीर में ताकत रहेगी तब तक. लेकिन आपको अपना परिवार ही नहीं अपने माँ-बाप को भी देखना है...

मैं तुम्हारा छोटा भाई, जितना हो सकता है कर रहा हूँ. अपने परिवार के साथ-साथ अपने माँ-बाप को भी देख रहा हूँ. लेकिन वो सिर्फ मेरे माँ-बाप नहीं हैं. वो तुम्हारे माँ-बाप भी हैं. मैं ये नहीं कहता कि तुम भी अपने माँ-बाप के लिए पैसे खर्च करो. बात पैसों की तो है ही नहीं. बात है रिश्तों की जिससे हम अभी भी जुड़े हैं.

माँ और बाबूजी अब भी तुम्हारी राह देखते हैं. ये मत भूलो कि तुम्हारा बेटा भी एक दिन बड़ा होगा और उसकी भी शादी होगी. फिर तुम्हारी भी बहु आएगी. और एक दिन तुम भी बूढ़े होओगे. तब भगवान न करे तुम्हारे सामने यही दिन आयें जब तुम्हारा बेटा तुमसे दूर हो जाए. वो भी सिर्फ अपनी बीवी की बात सुने. उसकी गुलामी करे. और तुम्हें अकेला छोड़ दे.

तुम्हारे माँ-बाप के पास तो दो बेटे हैं. तुम नहीं तो उनके पास मैं हूँ उन्हें सँभालने के लिए, उनकी देखभाल करने के लिए. तुम सोचो, तुम्हारा तो एक ही बेटा है. तुम किसके सहारे बुढ़ापा बिताओगे...? इसलिए मेरी बात मानो. अब भी वक्त है. अपनी बीवी को समझाओ.

भगवान सबको सबके किये की सजा इसी दुनिया में देता है. स्वर्ग और नरक यहीं है भाई. उसके लिए ऊपर जाने की जरुरत नहीं है.

माँ और बाबूजी तुम्हें अब भी नहीं भूले हैं. अपने बड़े पोते को देखने के लिए तरसते हैं. तुम्हारा बेटा तो अब काफी बड़ा हो गया होगा. ले आओ, उसे हम लोग भी देख लें.

तुम शहर में रहते हो. शहर में कोई अपना नहीं होता. सब पैसे के दोस्त होते हैं. आज तुम्हारे पास पैसा है. बहुत लोग घूमते होंगे तुम्हारे आगे-पीछे. लेकिन कुछ रिश्ते-नातों का भी सोचो. यहाँ गाँव में तुम्हारा परिवार रहता है. तुम्हारे अपने रहते हैं. तुम्हारे अपने, जो तुमसे पैसे की दोस्ती नहीं रखते. यहाँ तो सिर्फ तुम रहो यही काफी है.

माना कि तुम्हारा काम शहर में है. कौन कहता है अपना काम छोड़के गाँव में बस जाओ. हम तो बस ये कहते हैं, कभी-कभी आ जाया करो. बूढ़े माँ-बाप को तसल्ली मिल जायेगी. वैसे भी माँ-बाबूजी जिन्दगी से हार चुके हैं. बड़ा बेटा शहर क्या गया सबको भूल गया. इस डर से मुझे शहर जाने से रोकते हैं. और फिर मैं भी शहर में रहूँगा तो उनकी देखभाल कौन करेगा. वैसे मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. मैं खुश हूँ. माँ-बाप की सेवा करके एक अलग ही खुशी मिलती है मेरे भाई. काश... तुम इसे समझ सकते...!

मुझे पता है तुम भी गाँव आना चाहते हो. हम सबसे मिलना भी चाहते हो. मगर अपनी बीवी को समझा नहीं पाते हो. मगर मेरे भाई...! ऐसा कब तक चलेगा...? कब तक तुम उस औरत की गुलामी करते रहोगे जिसने तुम्हें अपने पैदा करने वालों से जुदा कर दिया है. उस औरत को समझाओ, एक दिन हमीं लोग उसके काम आएँगे.

खैर...इसमें उसका भी दोष नहीं है. वो जो कहती है तुम मान लेते हो तो उसे भी लगता होगा वो ठीक ही कहती है और तुम भी यही चाहते होओगे. लेकिन मेरे भाई, कभी उस औरत से पूछना कि उसे कैसा लगेगा जब उसे उसके माँ-बाप से न मिलने दिया जाए तो...?

मुझे ये भी पता है भाई तुम सब्र कर रहे होगे कि एक दिन ये औरत खुद समझ जायेगी. लेकिन मेरे भाई तब तक देर हो सकती है. माँ तो अक्सर बीमार ही रहती है. बाबूजी भी लाचार पड़े रहते हैं.

तुम अपनी बीवी को समझाओ. हम उससे कोई काम करने को नहीं कहेंगे. वो बस तुम्हें लेके आ जाया करे. तुम लोग अगर मेहमान की तरह भी आओगे तब भी चलेगा.

मैं ये सब इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे बूढ़े माँ-बाप की मौत किसी चीज के लिए तरसते हुए न हो. बस, और कुछ नहीं. भगवान ने जरुरत भर का दिया है. और यहाँ किसी को किसी चीज का लालच है नहीं. गाँव की ताज़ी हवा खाते हैं. स्वस्थ रहते हैं.

आखिर में मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि एक बार मेरी बातों पे गौर करना. माँ-बाप के लिए औलाद से बढ़कर कुछ नहीं होता. तुम्हारा भी बेटा जब गिरता होगा, उसे कहीं चोट लगती होगी, तो तुम्हें भी तकलीफ होती होगी. इन्सान की बनावट ही ऐसी है. अपना खून जब तकलीफ में होता है तो अपना खून ही मचलता है. यही सच है. बाकी सब यारी दोस्ती तो कहने की है. जब सबको पता चलेगा तब तुम्हारे पास आएँगे. लेकिन जो अपने होते हैं वो बिना पास रहे अपनों को याद करते हैं. उनकी सलामती की दुआ करते हैं. ऐसे ही ये दुनिया चल रही है. यही काम माँ-बाबूजी तुम्हारे लिए करते हैं. तुम उनका खून हो. उनका भी मन मचलता है तुम्हें देखने को. तुम्हारी तरक्की में सबसे ज्यादा माँ-बाबूजी का आशीर्वाद है. इस बात को हमेशा याद करना. माँ-बाप चाहे जैसे भी हों. अपनी औलाद के लिए उनके मुँह से हमेशा दुआ ही निकलती है. अब तो उनका बेटा भी बाप बन गया है. कम से कम पोते का मुँह तो दिखा दो. अब तो वो बोलने भी लगा होगा.

याद करो एक दिन तुम भी ऐसे ही छोटे से बच्चे थे और यही बाबूजी थे जो आज लाचार निगाहों से तुम्हारी राह देखते हैं. तब यही बाबूजी तुम्हें अपनी उँगली के सहारे चलना सिखाते थे. तुम तो बड़े थे. मुझसे ज्यादा प्यार तो तुम्हें मिला है माँ-बाबूजी का. तुम पहले जो थे.

तुम अपने बाबूजी को कैसे भूल गए. बाबूजी ने तुम्हें अपने कन्धों पे बैठा कर पूरा गाँव घुमाया है. गाँव वाले जब बाबूजी से कहते थे, “क्या यादव जी...! आप तो हमेशा बेटे को कन्धे पे लिए घूमते हैं. देख लेना, बेटा है. बीवी का मुँह देखते ही हाथ भी नहीं आएगा.” तब बाबूजी सीना ठोककर कहते थे “मेरा बेटा है. ऐसा नहीं करेगा.” आज बाबूजी की बात झूठी हो गई भाई. पूरा गाँव हँसता है बाबूजी पे. बाबूजी अन्दर ही अन्दर घुटे जा रहे हैं.

एक बीवी के आते ही तुमने सारे रिश्ते तोड़ लिए. आज बीवी सबसे प्यारी हो गई तुम्हें...? सब भूल गए तुम...? पूरे गाँव में तुम्हीं थे जो इस बात पे सीना ठोक के कहते थे कि, “मैं अपनी पत्नी की गुलामी कभी नहीं करूँगा. कहाँ गया वो कृष्ण...?”

मेरे भाई...! तुम्हें एक दिन सब समझ में आएगा. मगर अफ़सोस तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी. तुमसे छोटा हूँ. कुछ बुरा लगा हो तो माफ करना. क्या करूँ...? माँ-बाबूजी की हालात देखी नहीं जाती. मेरी बातों का बुरा मत मानना. आ जाना, माँ-बाबूजी के जाने से पहले एक बार आ जाना.

तुम्हारा छोटा भाई

बलराम

***************

कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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