जल तू जलाल तू - 8// प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास // प्रबोधकुमार गोविल

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जल तू जलाल तू

प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास

प्रबोधकुमार गोविल


अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 | अध्याय 4 | अध्याय 5 | अध्याय 6 | अध्याय 7 |


आठ

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना...जब यह कहानी नाना ने पूरी की। रोज का यही नियम था, डिनर के बाद दोनों बच्चे नाना के पास आ बैठते और किसी धाराप्रवाह बहते झरने-सी यह कहानी चलचित्र के दृश्यों की तरह मानस-नहर में बहते तिनके-सी बढ़ने लग जाती। कभी अटकती, कभी दौड़ती तो कभी डूब-उतराकर घुमड़ती। उन बच्चों के माता-पिता ने भी दाँतों में अँगुली दबाकर यह लम्बी कहानी सुनी।

इस कहानी का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि बच्चों के मन से ‘आत्मा’ का वह डर निकल गया जिसने पिछले दिनों अजीबो-गरीब घटनाओं से उनके दिल में दहशत भर दी थी। उन्हें अहसास हो गया कि आत्मा तो खुद एक निरीह प्राण होती है, वह भी केवल अपने दुःख और विफलता में सराबोर। वह भला किसी को क्या कष्ट पहुँचाएगी? नाना ने बताया कि आत्मा केवल पानी के बुलबुलों जैसा अहसास है, जो कभी स्थायी नहीं रहता। उससे किसी को जो भी कष्ट या भय होता देखा जाता है वह भी क्षणिक प्रभाव के लिए ही होता है...बाकी सब अपने चित्त की कमजोरी है। या फिर वे तमाम अनुभव और सुनी-सुनाई बातें हैं जो हमारे जेहन के गुंजलक में रहती हैं।

बच्चों को भी नाना की यह बात दिलचस्प लगी कि जब भी कोई नया जन्म होने को होता है, चाहे किसी भी रूप में, किसी भी योनि में हो, तभी क्षणांश के लिए जीव छटपटाता है। और यदि वह पिछले जन्म की किसी अतृप्त आत्मा का प्राण होता है तो वही ‘आत्मा’ रूपी अवस्थिति से अपने मन की बात कहने की कोशिश करता है। किसी उपाय-प्रयास-प्रायश्चित या संयोग से सन्तुष्ट होकर वह अपने अगले जन्म की ओर बढ़ जाता है।

बच्चों की समझ में जो भी, जितना भी आया, उसने उनका बुखार उतार दिया। वे बाहर खुली हवा में खेलने के लिए निकल पड़े, जहाँ आसपास के घरों के बच्चे भी खेलने के लिए जमा थे।

हाथ में सूप की बॉटल लिए बच्चों के माता-पिता तो नाना के सामने ऐसे जड़वत बैठे थे मानो हिलना-डुलना भूल ही गए हों। उन्हें इस संयोग से भी हैरानी थी कि वे दोनों अमेरिकन लड़कियाँ किस तरह अचानक उन्हें पर्यटक-स्थल पर मिलीं और उन्हें सही हाथों में सांप गईं, जिनके सान्निध्य में उनकी बाधा अपने आप हल हो गई। न जाने पराए देश में उनका क्या हाल होता यदि वे मुसीबत में घिरे इधर-उधर घूमते रहते।

नाना ने कहा, ”जैसे किसी अण्डाशय में निषेचन के पूर्व डिम्ब की ओर शुक्राणु दौड़ते हैं, वैसे ही दुनिया में हर क्षण आने के लिए करोड़ों-अरबों प्राण भी छटपटाते हैं। वीर्य प्रकृति का बनाया वह जादुई जल है जिसमें भूत-भविष्य-वर्तमान के तमाम रहस्य छिपे हैं। किसी शरीर से इसके निष्कासन की भी अद्भुत व्यवस्था कुदरत ने कर रखी है। किसी दूसरे शरीर को देखने, छूने या सोचने-मात्रा से यह जीवन-जल अपने प्याले में छटपटाने लगता है, और जब निकलता है तो सैकड़ों जादुई कहानियों के बीज लेकर!... ...एक बर्तन से दूसरे पात्र में इस जल को छलकाने की पद्धति और आकांक्षा में ही आत्मा-परमात्मा के तमाम रहस्य छिपे हैं।“ नाना की इस बात को अद्भुत हैरानी से सुनती बच्चों की माता ने जब बर्तन समेटकर रसोई की ओर जाने के लिए ट्रे उठाई, तब तक काफी गहरा अँधेरा हो उठा था।

भारतीय गृहिणी को रसोई को अपना घरेलू मुकाम बनाने में जरा भी वक्त नहीं लगता। मानो वह यह प्रशिक्षण नैसर्गिक रूप से लेकर ही धरती पर आती हो।

नाना को भी अपने मेहमानों के साथ में पारिवारिक जीवन का भरपूर सुख मिल रहा था और मिल रहे थे तरह-तरह के भारतीय व्यंजन भी।

बहुत दिन हो गए थे। भारतीय मेहमान अब वापस भी लौटना चाहते थे।

उन्हें अपने अमेरिका-प्रवास में भी भारतीय दर्शन-सी गूढ़ता झेलनी तो पड़ी थी, किन्तु वे यहाँ उसकी सरल प्रामाणिकता के कायल भी हो गए थे।

बच्चों के पिता, जो प्रायः चुप रहकर संजीदा श्रोता ही बने रहते थे, नाना से बोले, ”मुझे एक बात लगातार मथ रही है। आपकी कहानी में ये ऑरेंज कलर की मछली का जो जिक्र बार-बार आता था, वह क्या था? ये मछली क्या वास्तव में होती है? क्या ये यहीं होती है? इसे तो किन्जान के दोस्त अर्नेस्ट ने भी देखा। यह कहाँ मिलती है?“ नाना मन्द-मन्द मुस्करा उठे। उन्हें इस बात से अनन्य तृप्ति मिल रही थी कि उनकी सुनाई लम्बी कहानी को भारतीय परिवार ने न केवल पूरी तन्मयता से सुना था, बल्कि वे उस कहानी के पात्रों से इतना जुड़ाव भी महसूस कर रहे थे।

यहाँ तक कि उनके नाम तक उन्हें याद हो गए थे।

नाना बोले, ”यह एक मछली होती है। बहुत ही दुर्गम पनीले स्थानों पर पाई जाती है। यह भी इसकी वैज्ञानिक प्रामाणिकता है कि यह मछली अपना भोजन इसी तरह करती है। यह दुर्लभ मछली एकदम साफ पानी में पैदा होती है। शीशे की तरह चमकता ऐसा पानी जिसके तल में पड़े रेत कणों को भी गिना जा सके।“ बच्चों के पिता को भी एकाएक ध्यान आया कि वास्तव में किसी नदी के òोत या उद्गम-स्थल पर ऐसा ही पानी होता है। उन्होंने पर्यटन के दौरान ऐसे स्थल कई बार देखे भी थे। किन्तु कभी ऐसा संयोग नहीं हुआ था कि उन्हें उस सुनहरी केसरिया मछली के दर्शन हुए हों। उन्हें इस बाबत कोई जानकारी भी तो नहीं थी। हो सकता है कि उन्हें कहीं दिखी भी हो पर उन्होंने उस पर ध्यान न दिया हो।

नाना कह रहे थे, ”यह मछली अपने शरीर से ऐसी गैस छोड़ती है जिससे पानी मटमैला और धुँधला हो जाता है और आसपास के कई कीट-मकोड़े इसे उथला पानी समझ इसमें तैरते हुए चले आते हैं। जबकि यह गहरा पानी एक भँवर की शक्ल में होता है; इसमें फँसकर वे दम तोड़ देते हैं और इस जादुई सुनहरी मछली का ग्रास बनते हैं।“ नाना की यह जानकारी चांकानेवाली थी कि कई तान्त्रिक इस मछली से विलक्षण दवाएँ तैयार करते हैं। वे इसे प्राण रचने की क्षमतावाली मछली भी मानते हैं। कुदरत की रहस्य रखने की दुर्लभ कन्दरा है यह मछली! यह सुनकर बच्चों के पिता के रोंगटे खड़े हो गए। उन्हें याद आया कि भारत में भी कई हकीम-तान्त्रिक या ओझा इस तरह की दवाएँ तैयार करने का दावा करते रहते हैं। उन्होंने अपने वैज्ञानिक सरोकारों के चलते कभी इस तरह की बातों को गम्भीरता से नहीं लिया था। किन्तु अब अपने ही बच्चों के साथ परदेस में घटी घटनाओं ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था। अब उन्हें नाना की यह बात पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं लग रही थी कि इस मछली के नर और मादा अलग-अलग नहीं होते। एक ही शरीर में दोनों युक्तियाँ होने से यह ‘प्राण’ पैदा करने में सक्षम होती है। इसका अवसान भी अलौकिक होता है। यह मारी नहीं जा सकती।

देर रात को भोजन की मेज पर एक साथ बैठे हुए बच्चों को जब पता चला कि अब वे लोग वापस जानेवाले हैं, तो उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्होंने सामने बैठे नाना की ओर हसरतभरी निगाहों से देखा, जो किसी गुलाबी रूई से बने टैडीबीयर की तरह बैठे उस इडली का आनन्द ले रहे थे जो उनकी मम्मी ने अभी-अभी सबको परोसी थी। बड़े सफेद चम्मच से साम्भर पीते नाना बच्चों को कभी बर्फीले हिमालय पर बैठे शिव से दिखाई देते तो कभी लॉन में उनके साथ खेलने के लिए हाथ में लॉलीपॉप लिए हुए आए किसी बच्चे जैसे। यहाँ से चले जाना भला बच्चों को कैसे रुचता! बच्चे अब पूरी तरह स्वस्थ थे। उनके पिता उन्हें बता रहे थे कि अब वे लोग एक-दो दिन में वापस न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान कर जाएँगे। नाना चुपचाप भोजन करते हुए बच्चों का वार्तालाप सुन रहे थे। शायद मन-ही-मन उन्हें भी यह अच्छा नहीं लग रहा था कि उनके ये नन्हे मेहमान कभी उन्हें छोड़कर जाएँ। नाना ने अपनी कहानी से बच्चों में ज्ञान भर दिया था तो बच्चों ने भी अपनी भोली जिज्ञासा से नाना के सूने जीवन में प्राण भर दिया था। बच्चे फिर से अपनी अधूरी सैर की ओर जागरूक हो गए थे। तभी तो कहा जाता है कि बच्चे होते ही तोता-चश्म हैं, उन्हें अतीत बिसारकर भविष्य निहारने में पलभर की देर भी नहीं लगती। बच्चे खेलकर थक भी गए थे, खाना खाकर सोने चले गए।

नाना ने तब धीरे से कहा, ”अगले शनिवार को मेरी दोनों बेटियाँ, आपकी मित्र आएँगी। वे मुझे कहकर गई हैं कि उनके आने तक आपको जाने न दूँ!“ नाना अपनी नातिनों को बेटियाँ ही कहते थे। तभी एकाएक भारतीय दम्पति को याद आया कि उन्होंने सचमुच लौटने का कार्यक्रम अपने आप ही बना लिया है, अपने मेजबान से अनुमति नहीं ली है। वे थोड़े शर्मिन्दा हुए। बच्चों की मम्मी बोलीं, ”ऐसा ही होगा। जब आप कहेंगे, हम तभी जाएँगे। वैसे भी उन लोगों से बिना मिले जाने को तो हमारा भी मन नहीं मानेगा।“ इस आत्मीयता से नाना अभिभूत हो गए। भोजन से निवृत्त होने के बाद बच्चों की मम्मी तो अपने कामों में लग गईं और पिता नाना के साथ उनके कमरे में चले आए। कुछ देर की चुप्पी के बाद नाना उन्हें एक अलमारी से निकालकर कुछ तस्वीरें दिखाने लगे। तस्वीरें बहुत सारी थीं और उनमें उस घोंसले की भी कई आकृतियाँ थीं जो नाना के घर के बाहर बनाया गया था। बच्चों के पिता एकाएक सिहर गए जब उन्हें याद आया कि ऐसी ही तस्वीर उन्होंने एक होटल में फलों के डिब्बे पर देखी थी जहाँ उनकी बच्ची के उस डिब्बे को छूते ही उसमें आग लग गई थी। सब-कुछ एकाएक जीवन्त हो गया।

रात बहुत गहरी हो गई थी, मगर अमेरिका में रात और दिन में कोई विशेष अन्तर न था। वैसे भी वे लोग सुबह से घर में थे अतः नींद आने जैसी बोझिलता अभी किसी को महसूस नहीं हो रही थी। बच्चों के पिता ने नाना को संक्षेप में वह सारा किस्सा बता दिया जब उन्होंने उस घोंसले के चित्रवाले डिब्बे को देखा था।

नाना यह सुनकर हँसे। फिर बोले, ”हाँ, मेरी बेटी ने मुझे बताया था।

दरअसल इस देश में सम्पन्नता ऐसे ही नहीं आई। इसके लिए बहुत प्रयास करने पड़े हैं।“ यह सुनकर बच्चों के पिता चौंके। उन्हें लगा, इस बात में देश की सम्पन्नता की बात कहाँ से आई? क्या नाना घोंसले का जिक्र न करके बात को बदलना चाहते हैं? शायद उन्हें घोंसले का जिक्र अच्छा न लगा हो। लेकिन ऐसा नहीं था। नाना उनकी बात का ही जवाब दे रहे थे। नाना ने बताया कि अमरीका में दुनिया की कई चीजों को पेटेण्ट के माध्यम से अपना बना लेना और फिर उसे दुनिया के सामने अजूबे की तरह रखने का चलन बहुत पुराना है। यह भी ऐसी ही बात थी। नाना से घोंसले की तस्वीर, जिस विज्ञापन कम्पनी ने खरीदी थी, उसने तस्वीर के अनोखे रंगों में कुछ रसायनों का प्रयोग इस तरह किया था कि वह अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग वातावरण में तरह-तरह की क्रियाओं से गुजरते थे। कहीं उन केमिकलों के प्रभाव से रंग बदल जाते थे, तो कहीं उनमें तापमान की घट-बढ़ से बहु-आयामी प्रभाव आ जाता था। कभी वे बर्फ की तरह ठण्डे हो जाते थे तो कभी ‘थ्री-डी’ जैसी संरचना में आ जाते थे। उनमें रखे फलों का बेहतरीन संरक्षण होता था।

नाना से यह सुनकर बच्चों के पिता सन्न रह गए कि बच्ची ने अपने नाखून से घोंसले के चित्रा को खुरचना चाहा होगा जिस कारण नाखून के कैलशियम से घोंसले के चाँदी के रंग ने आग पकड़ ली और वे लोग डर गए।

बच्चों के पिता को अब समझ में आ रहा था कि वैज्ञानिकता किस सीमा तक जा सकती है! वैसे भी वे लोग ऐेसे देश में थे जो चन्द्रमा पर पाँव रख चुका था और मंगल ग्रह पर करोड़ों साल पहले आई बाढ़ की फॉसिल्स को पढ़ रहा था।

उन्होंने लगभग हाँफते हुए जब नाना की कही बात बच्चों की मम्मी को बताई तो वह चकित रह गईं। नाना रात देर तक उन लोगों से बात करते रहे।

सुबह की धूप ने बगीचे की ओस पर जब हीरे की कनियाँ बनानी शुरू कीं, बच्चों को भी यह समाचार मिल गया कि वे अभी कुछ दिन और यहाँ रहेंगे। उनके उल्लास में इजाफा हुआ। वे भी दोनों दीदियों से मिलने की प्रतीक्षा आतुरता से करने लगे, जो दो दिन बाद वीकेण्ड पर यहाँ आनेवाली थीं।

आज बच्चों के आग्रह पर नाना ने सबको बाजार ले जाने का कार्यक्रम बनाया। एक भारतीय स्टोर से बच्चों के पिता ने ढूँढकर नाना के लिए रेशमी कुर्ते और धोती का खालिस भारतीय परिधान भी खरीदा, जिसे अपने शरीर से लगाकर नाना की बूढ़ी आँखें छलक पड़ीं। नाना ने भी तरह-तरह के उपहार अपने उन मेहमानों को दिलवाए।

मेहमान इस बात से आश्चर्यचकित थे कि इस देश में आयु इन्सानी शरीरों पर आसानी से हावी नहीं होती थी। उम्रदराज नाना भी जब घर से बाहर निकले तो पूरी तरह अपने आप पर ही आश्रित होकर। उनके उत्साह और चपलता में कहीं कोई ऐसी बात न थी जो बच्चों से अलग हो। शायद लगातार जीवन-संघर्ष और सक्रियता यहाँ हड्डियों में गजब की लोच भर देते हों! शाम को नाना बच्चों के साथ मैदान में थोड़ी देर खेलने भी निकले। ऐसा लगता था जैसे इतने दिनों अकेले रहकर नाना ने केवल उम्र ही खर्च की थी, जिन्दगी खर्च नहीं की, वह उनकी जेब में बदस्तूर बची रखी थी। साँझ के झुटपुटे में नाना के घर के नजदीक पेड़ पर बने घोंसले का आकर्षण बच्चों के लिए अब भी बरकरार था। बल्कि अब वे उससे भयभीत नहीं थे। अब तो उनकी जिज्ञासा यह जानने में थी कि नाना के कहे अनुसार इस घोंसले में एक दिन अण्डे अपने आप कैसे आते हैं। क्योंकि बच्चों ने आते-जाते या खेलते हुए उस घोंसले के इर्द-गिर्द कोई परिन्दा कभी नहीं देखा था। घोंसला किसी शिवमन्दिर में रखे शंख की भाँति सफेद-गुलाबी आभा से इस तरह चमकता था कि उसके तिनके सोने के तारों जैसे दिखते थे। फिर भी उस नीड़ के निर्माण में कहीं बनावटीपन नहीं झलकता था। वह पूरी तरह प्राकृतिक ही दिखाई देता था। बच्चे अमेरिकी माहौल से अब काफी परिचित भी हो चुके थे। आसपास के बच्चों से उन्हें खेलने-कूदने के दौरान काफी सारी जानकारी भी मिल चुकी थी जिसे वे भारत पहुँचकर अपने मित्रों के साथ बाँटने के लिए आतुर थे। बफलो नगर का वह शान्त व निर्जन इलाका उनके मन में रच-बस गया था।

बफलो शहर तक नाना की दोनों नातिनों के साथ आते हुए यद्यपि बच्चों की मम्मी को यह जानकर अचम्भा था कि ये दोनों अमेरिकी युवतियाँ केवल भारत के बारे में यही जानती हैं कि वहाँ सिमी ग्रेवाल नाम की एक अभिनेत्री है और वहाँ पानी की बहुत बड़ी समस्या है, किन्तु इससे भी बड़ा अचम्भा उन्हें यह देखकर हुआ कि नाना के कक्ष में रखी किताबों और डायरियों में भारत के बारे में भी बहुत-सी जानकारी है! किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं है, ऐसा संस्कार भारत में उन्हें बचपन में दिया गया था, अतः वह मनोयोग से कोई डायरी तो नहीं पढ़ सकीं, किन्तु एकाध किताब जरूर उन्होंने पढ़ने के लिए उठाई थी। ‘किताब किसी की नहीं होती, वह उसी की होती है जो उसे पढ़े!’ बारीक अक्षरों में लिखी यह इबारत उन्हें एक जगह एक किताब में दिखी तो उनके मन से यह बोध जाता रहा कि उन्हें दूसरों की किताबों को नहीं छूना चाहिए। ऐसी ही एक किताब ने उन्हें पश्चिमी देशों के उस दर्शन से भी परिचित करा दिया जो भारतीय सोच को पश्चिम से पूरी तरह विलगाता है।

‘...पश्चिम में शरीर के अंगों को छिपाना नहीं सिखाया जाता। इसमें कोई रहस्य नहीं है। शरीर की तमाम स्पष्ट प्रणालियाँ हैं और इन प्रणालियों के अपने-अपने कर्तव्य हैं। इन प्रणालियों पर किसी को कोई आपत्ति करने की न तो जरूरत है और न ही अधिकार। जो पूर्वी देश ऐसा करते हैं वह वैज्ञानिक स्वास्थ्य के नाम पर नुकसान ही उठाते हैं। शरीर की सैकड़ों हड्डियों, हजारों अंगों, लाखों कोशिकाओं, दर्जनों क्रियाओं में से किसे हम अवर्णनीय, त्याज्य, टिप्पणी न करने योग्य मुकर्रर करें? और क्यों? शरीर में एक छेद भोजन जाने के लिए है वैसे ही एक भोजन का अपशिष्ट बाहर निकालने के लिए। दोनों को ही रोज साफ रखना भी जरूरी है, कीटाणु-बैक्टीरिया दोनों में पनपकर उन्हें रोगग्रस्त कर सकते हैं, तो दोनों में से एक को अश्लील या छिपाने योग्य कहकर हम क्या सिखाना चाहते हैं? केवल कुण्ठा, अवसाद, रुग्ण मानसिकता।...’ किताब में रस आ रहा था किन्तु बच्चों के पापा ने चाय की फरमाइश कर दी। उन्हें चाय बनाने किचन में जाना पड़ा। नाना भी भारतीय तरीके से बनी चाय को पसन्द करते थे। वे अपनी ओर से कभी वैसी चाय बनाने का आग्रह नहीं करते थे किन्तु बनकर सामने आ जाने से वे उसे चाव से पीते भी थे। माँ ने तन्मय होकर भारतीय तरीके से चाय बनाई।

वे लोग यह भी जानते थे कि दोनों बहनें शनिवार को आते ही उन्हें तुरन्त वापस नहीं जाने देंगी इसलिए उन्होंने रविवार को प्रस्थान करने का कार्यक्रम बना लिया। बच्चे भी इस परिवर्तन से खुश थे। मौसम बदलने लगा था और अब बच्चों को अपने देश और अपने शहर की याद भी आने लगी थी।

उन्हें वहाँ के अपने कुछ मित्रों के नाम, दुकानों के नाम और पकवानों के बारे में भी बहुत-सी जानकारी मिल चुकी थी जिसे वे भारत लौटकर अपने साथियों को सुनाने के लिए उतावले थे।

कहते हैं, संस्कृतियों के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम भी बच्चे ही होते हैं। वे रहन-सहन, खान-पान और भाषा-व्यवहार के बारे में नई जानकारी जल्दी जान लेते हैं, इसी अवधारणा ने शायद उन दोनों भारतीय बच्चों को भी अपनी उम्र से कुछ आगे कर दिया था। उन्हें अपने विद्यालय के कुछ ऐसे दृष्टान्त याद आ रहे थे जिनमें टीचर ने किसी लड़के को केवल इसलिए कक्षा से बाहर निकल जाने की सजा दी थी, कि किसी लड़की ने उसके ‘किस’ माँगने की शिकायत टीचर से की थी। यहाँ वे देखते थे कि बच्चे आराम से खेल-खेल में अपने साथी को चूम लेते हैं।

शाम को नाना के बनाए उस घोंसले को छूने के लिए जब कुछ बच्चे पेड़ पर चढ़े तो सब बच्चे नीचे खड़े-खड़े यह जानने को उत्सुक हो गए कि उस घोंसले में अण्डे आ गए या नहीं, किन्तु वहाँ कोई अण्डा नहीं आया था, न ही ऐसी कोई सम्भावना थी।

उस दिन, रात के समय जब खा-पीकर दोनों बच्चे अपने सोने के कमरे में आए तो काफी देर हो चुकी थी। बच्चों की मम्मी भी सो चुकी थीं लेकिन नाना और उनके पिता की कभी-कभी बातें करने की हल्की आवाज आ जाती थी।

अगले दिन शनिवार था। नाना की नातिन, दोनों बहनों को आज आना था।

मम्मी ने सुबह जल्दी उठकर नाश्ते में तरह-तरह के व्यंजन तैयार किए थे। बच्चों पर भी दोगुना उत्साह था। एक तो दोनों दीदियों के आने की प्रतीक्षा थी और दूसरे अब वापस लौटने का समय भी नजदीक आ रहा था। नाना भी प्रफुल्लित थे।

मम्मी ने समय निकालकर थोड़ी-थोड़ी सामान की पैकिंग भी करनी शुरू कर दी थी। दोनों बच्चे नाना से मिले गिफ्ट दीदियों को दिखाने के लिए लिए फिर रहे थे।

उन्होंने अभी मम्मी को उन्हें पैक भी नहीं करने दिया था।

नाना बाहर की गुनगुनी धूप में लॉन पर उछलते-कूदते बच्चों से कह रहे थे कि तुम्हारी दीदियाँ भारत के बारे में बहुत कम जानती हैं इसलिए आज जब वे आएँ तो उन्हें इण्डिया के बारे में खूब सारी बातें बताना, हो सके तो उन्हें... नाना की बात अधूरी ही रह गई। उससे पहले ही बच्चों के पापा बोल पड़े कि वे लोग सबको भारत आने का न्यौता देंगे। नाना ने इस बात पर बहुत खुशी जाहिर की। उनका चेहरा और भी लाल होकर नई आभा से दमकने लगा। वे बोले, ”अब मेरा तो यात्रा करने का साहस नहीं होता है मगर वे बच्चियाँ भारत जाकर जरूर बहुत खुश होंगी।“ इस बात ने भारतीय परिवार को भी खुश कर दिया। तभी कार की आवाज सुनकर सब बाहर आए।

कार का दरवाजा खोलकर जैसे ही दोनों बहनें उतरीं, दोनों बच्चे आकर उनसे लिपट गए। दोनों ने प्यार से बच्चों के सिर पर हाथ फेरा। उन सब मेहमानों को खुश देखकर वे दोनों भी प्रफुल्लित हो गईं। जब उन्हें बताया गया कि वे लोग अब वापस जानेवाले हैं तो सबसे पहले उन्होंने यही पूछा, ”क्या अब बच्चों की तकलीफ बिलकुल ठीक हो गई?“ बड़ी बहन खुद ही बोल पड़ी, ”हाँ, देखो, अब इनके सिर पर कोई चक्र नहीं है।“ ”सिर पर चक्र कैसा होता है?“ बेटे ने मासूमियत से पूछा।

”जब कोई बेचैन ‘पास्ट’ दुनिया में घूम रहा होता है तो वह किसी भी चेहरे पर सात रंगों की हल्की रिंग बनाकर मँडराने लगता है। जिसके सिर पर ऐसा रिंग बना हो, वह बीमार या बेचैन हो जाता है। इस रिंग से उस व्यक्ति की कनेक्टिविटी थोड़ी देर के लिए अतीत के किसी भी व्यक्ति से जुड़ जाती है जो दुनिया के किसी भी ग्रह पर मँडरा रहा होता है। दुनिया सब ग्रहों के माध्यम से अपने तमाम अतीत और समस्त सम्भावित भविष्य से जुड़ी है।“ बच्चों की मम्मी को याद आया कि यह सब उन्होंने उस किताब में पढ़ा था जो नाना की किताबों में थी। उसी में यह भी लिखा था कि करोड़ों स्पर्म जब निषेचन की लालसा में किसी डिम्ब की ओर भाग रहे होते हैं तो उन्हीं की भीड़ में ऐसी अतृप्त आत्मा भी होती है जो फिर पैदा होने के लिए छटपटा रही होती है।

यही आत्मा किसी घुमड़ते हुए सागर की भाँति अपना अभीष्ट ढू़ँढती है। इसी आत्मा के प्रभाव से किसी भी दूसरे शरीर में जगह बनाने की प्रबल भावना जाग्रत होती है। इसी बुखार से रावण सीता को चुराता है, इसी से मीरा पत्थर की मूर्ति पर सिर रगड़ती है, इसी के प्रताप से अभिमन्यु कोख को चीरना चाहता है और इसी के ताप से भस्मासुर शिव के पीछे भागता है।“ घर खिलखिलाहटों से भर गया। दोनों बहनों को मेहमानों ने उस रात वहीं, नाना के घर रोक लिया क्योंकि अगली सुबह उन लोगों को न्यूयॉर्क के लिए निकल जाना था, जहाँ कैनेडी हवाई अड्डे से उन्हें कुछ दिन बाद हिन्दुस्तान का जहाज पकड़ना था।

बच्चे दिनभर दोनों दीदियों से चिपके रहे। उनकी मम्मी के बनाए स्वादिष्ट व्यंजन सभी ने चाव से चटखारे ले-लेकर खाए।

दोनों बहनें शक्ल-सूरत में इतना ज्यादा मिलती थीं कि पहली बार इसी गफलत ने उन्हें भारतीय परिवार से मिलाया। लेकिन अब बच्चे दोनों को खूब अच्छी तरह से पहचान गए थे। वे उन्हें बड़ी दीदी और छोटी दीदी कहकर पुकारने लगे थे। उन दोनों ने भी बच्चों के नाम रख छोड़े थे। वे बिटिया को ‘सिमी’ कहती थीं और उसके भाई को ‘वाटरमेलन’। इस नए नामकरण पर बच्चे तो आनन्दित थे ही, उनके माता-पिता भी अन्तरतम से अभिभूत थे।

बच्चों ने उस शाम को अपना बाहर खेलने जाना भी मुल्तवी रखा क्योंकि यह वहाँ बफलो नगर में उनकी आखिरी शाम थी। कौन जानता था कि जिन्दगी में अब उनका अमरीका दोबारा आना होनेवाला भी था या नहीं।

शाम को घर के बाहर बड़े लॉन में मेजबान और मेहमान एक साथ खेलने के लिए निकल आए। बच्चों ने पहली बार अपने माता-पिता को भी अपने साथ खेलते हुए देखा। बच्चों ने जहाँ बॉल पर कब्जा जमाया वहीं दोनों बहनों ने बैट पकड़कर मोर्चा सम्भाला। नाना दूर बरामदे में बैठे आरामकुर्सी से ही खेल का आनन्द लेने लगे।

एक बार जब जोरदार शॉट से छोटी दीदी ने बॉल को सिक्सर के लिए उछालकर दूर फूलों की क्यारियों तक पहुँचा दिया, दोनों बच्चे बॉल ढूँढते क्यारियों की ओर दौड़े। बिटिया बॉल लेकर वापस लौट ही रही थी कि बेटा एकाएक हाथों में दो लकड़ी की पुरानी तख्तियाँ लेकर घुमाता हुआ आया जो उसे क्यारी में पड़ी दिखाई दी थीं। उसे वे तख्तियाँ दीवार के सहारे विकेट की तरह गाड़ने के लिए सर्वथा उपयुक्त लगीं। जैसे ही तख्तियों को लेकर बेटा तेज लाइट में आया, उसने तख्तियों पर लिखी इबारत पढ़ी। बाग की क्यारी में उपेक्षित पड़ी वे पट्टियाँ असल में नेमप्लेट थीं जिन पर पुरानी, धुँधली मिटी हुई-सी आकृति में सना और सिल्वा के नाम लिखे हुए थे। सना रोज और सिल्वा रोज।

नाम पढ़ते ही बेटे को करेण्ट लगा और वह बिजली-सी गति से अपनी बहन की ओर, उसे वह तख्तियाँ दिखाता हुआ भागा, ”देख, ये किसके नाम हैं?“ बिटिया ने देखा तो वह भी दोगुने आवेश से उछल पड़ी। बच्चों के दिमाग में अभी तक नाना की सुनाई कहानी के पात्र जीवन्त थे। उन्हें समझते देर न लगी कि उनकी दोनों दीदियाँ ही वस्तुतः सना और सिल्वा थीं जो किन्जान की बेटी डेला की बच्चियाँ थीं। इसका मतलब यह था कि नाना की कहानी का ‘घर’ वही था और खुद नाना ही किन्जान थे।

बच्चों के ही नहीं, उनके माता-पिता के भी रोंगटे यह जानकर खड़े हो गए कि उन्हें जो कहानी सुनाई गई थी वह कोई काल्पनिक गाथा नहीं बल्कि इसी घर की आपबीती थी। बच्चे एक साथ चिल्ला उठे, ”नाना ही किन्जान हैं, नाना ही किन्जान हैं...किन्जान अंकल जिन्दा हैं, किन्जान अंकल मरे नहीं...नाना ही किन्जान हैं...।“ दोनों बच्चे नाना के पास पहुँचने के लिए घर के भीतर की ओर भागे। वे तुरन्त पहुँचकर किन्जान नाना को छूना चाहते थे...उनसे बात करना चाहते थे... उनसे इस बात के लिए माफी माँगना चाहते थे कि उन्होंने मोमबत्तियाँ जलाकर एक दिन नाना के सामने ही उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का उपक्रम किया। वे नाना से पूछना चाहते थे कि क्या वे अब भी अपना सपना पूरा होने की इच्छा रखते हैं? उधर मम्मी ने भी ट्रे में जूस के गिलास लिए प्रवेश किया और पहला गिलास जैसे ही नाना की ओर बढ़ाना चाहा, नाना का सिर आरामकुर्सी पर एक ओर लुढ़क गया। नाना के प्राण-पखेरू उड़ चुके थे। उनका चेहरा निढाल होकर झुक गया था।

गुलाबी रेशों से बना वह टैडीबीयर सचमुच अब एक निर्जीव खिलौना बन गया था।

सना और सिल्वा समझ नहीं पाईं कि पहले अपने नाना की पार्थिव देह को सम्भालें, या फिर उन भारतीय मेहमान प्यारे बच्चों को, जो अब गश खाकर गिरने लगे थे। माता-पिता भी हतप्रभ थे। उनके देखते-देखते उनका संरक्षक, उनका आत्मीय मेजबान स्वर्ग सिधार गया था।

कुछ देर बाद जब सिटी ऑफिस से ताबूत लेकर एक खुली वैन खामोशी से घर के बाहर आकर ठहर गई तो अफरा-तफरी के बीच भी बच्चों ने देख लिया कि थोड़ी दूर, पेड़ पर बने घोंसले के आसपास कुछ परिन्दे पर फड़फड़ाने लगे हैं। वहाँ किसी जादुई जमाल से तीन छोटे-छोटे, प्यारे-प्यारे अण्डे भी आ गए थे। नन्हे बच्चे अकस्मात् यह भी देख रहे थे कि घोंसले में तीन अण्डे थे...और रस्बी आंटी की माँ के हाथों भी रेगिस्तान की तपती रेत पर तीन अण्डे ही गिरकर फूटे थे। बच्चों की आँखें रेगिस्तान की रेत हो गईं और उन पर आँसुओं की शक्ल में समन्दर टपकने लगा।...

जल तू जलाल तू

जो जीता उसे तो दुनिया सिकन्दर मान लेती है, लेकिन जो हारा वह कौन? क्षण के सौवें हिस्से के अन्तर से भी हारकर खिलाड़ी ' विक्ट्री स्टैण्ड ' पर चढ़ने का सपना लिए वापस लौट आते हैं । सपनों की उम्र निकल जाती है और वे बूढ़े हो जाते हैं । फिर जिस तरह बरसों तक उपेक्षित पड़े मैदान पर घास-फूस उगती है, महीनों तक सड़ते पानी में काई जमती है, उसी तरह अपने सपने से छिटके इन्सान के जिगर में भी हताशा की धुन्ध जमती है । हताशा की इसी धुन्ध से कभी-कभी चकमक की रगड़ से उपजी चिनगारियों जैसे शरारे भी पैदा हो जाते हैं । ये शरारे फिर इन्सान के दिल में बरसों तक सुलगते हुए ईर्ष्या की तेज जलन भी दे सकते हैं और व्यवहार के उजाले भी ।

रस्जी ने कभी ' नायग्रा ' झरने से घुमड़ते पानी के तूफानी सैलाब में बहते जाने के जीवट- भरे जुनून से अपने बेटे किन्जान को रोकने की कोशिश की थी । तब वह कहाँ जानती थी कि उम्र से हौसला हटते ही केवल हार बचती है ।

हाँ जिन्दगी से पानी हटते ही केवल आग बचती है!

और तब उम्र का एक-एक पल बूँद की तरह इस आग में टपककर भस्म होता रहता है ।


इन्सान की साँसें ताउम्र एक ही मन्त्र जपती रहती हैं.. .जल तू जलाल तू!

(समाप्त)

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प्रबोध कुमार गोविल

जन्म : 11 जुलाई, 1953 ( अलीगढ़, उत्तर प्रदेश)

प्रकाशित कृतियाँ :

उपन्यास –

देहाश्रम का मनजोगी

बेस्वाद माँस का टुकड़ा

वंश

रेत होते रिश्ते

आखेट महल

सेज गगन में चाँद की

जल तू जलाल तू

कहानी-संग्रह –

अंत्यास्त

मेरी सौ लघुकथाएँ

सत्ताघर की कंदराएँ

थोड़ी देर और ठहर

कविता –

रक्कासा-सी नाचे दिल्ली

शेयरखाता खोल सजनिया

उगती प्यास दिवंगत पानी

नाटक –

मेरी जिन्दगी लौटा दे

अजबनार्सिस डॉट कॉम

निबंध –

अपना बोझा अपने कंधे

याद रहेंगे देर तक ( संपादित)

बाल-साहित्य –

उगते नहीं उजाले

संस्मरण - रस्ते में हो गई शाम


सम्प्रति - निदेशक, ज्योति विद्यापीठ, महिला विश्वविद्यालय, जयपुर संपर्क : बी- 3०1, मंगलम जाग्रति रेजीडेंसी, 447, कृपलानी मार्ग, आदर्शनगर, जयपुर- 3०2००4 ( राजस्थान)

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