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लोककथा // 8 छोटी मत्स्यकन्या // नौर्स देशों की लोक कथाएँ–1 // सुषमा गुप्ता

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8 छोटी मत्स्यकन्या [1] यह लोक कथा भी यूरोप के नौर्स देशों के डेनमार्क देश की लोक कथाओं से ली गयी है। समुद्र में बहुत दूर जहाँ समुद्र का पान...

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8 छोटी मत्स्यकन्या[1]

यह लोक कथा भी यूरोप के नौर्स देशों के डेनमार्क देश की लोक कथाओं से ली गयी है।


समुद्र में बहुत दूर जहाँ समुद्र का पानी कौर्न के फूलों[2] की तरह नीला हो जाता है और क्रिस्टल की तरह बहुत साफ होता है वहाँ वह बहुत गहरा होता है और वहाँ उसकी गहराई कोई नाप नहीं सकता।

वहाँ अगर चर्च की बहुत सारी मीनारें भी एक दूसरे के ऊपर खड़ी कर दी जायें तो भी वे पानी के ऊपर तक नहीं आ सकतीं। ऐसी जगह में समुद्र का राजा[3] अपने लोगों के साथ रहता है।

हमको ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि समुद्र की तली में सिवाय पीली रेत के और कुछ भी नहीं है। वहाँ तो बहुत सारे फूल और पौधे पत्ते और डंडियाँ उगते हैं जो बहुत ही लचीले होते हैं। इतने लचीले कि पानी का थोड़ा सा भी हिलना उनको बहुत हिला देता है।

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वहाँ बहुत सारी छोटी बड़ी मछलियाँ उनके बीच में से ऐसे तैरती रहती हैं जैसे चिड़ियें धरती पर पेड़ों के बीच से उड़ती रहती हैं।

ऐस ही एक जगह जहाँ समुद्र सबसे ज़्यादा गहरा है वहीं पर समुद्र के राजा का किला खड़ा हुआ है। उस किले की मूँगे की दीवारें हैं और उसकी लम्बी लम्बी खिड़कियाँ ऐम्बर[4] की बनी हुई हैं।

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उसकी छत सीपियों की बनी है जो जब उसके ऊपर पानी बहता है तो वे खुलती बन्द होती रहती हैं। और जब ऐसा होता है तो वे बहुत सुन्दर लगती हैं क्योंकि हर सीपी मे एक मोती है जो किसी रानी के ताज में लगने लायक है।

समुद्र के राजा की पत्नी को मरे हुए कई साल हो गये सो उसकी बूढ़ी माँ ही उसके घर की देखभाल करती है। वह एक बहुत ही अक्लमन्द स्त्र्ी है और उसको अपनी कुलीनता पर गर्व भी बहुत है।

इसी लिये वह अपनी पूँछ पर 12 बड़ी सीपियाँ[5] लगा कर रखती है। जबकि औैैर दूसरी जो कुलीन स्त्र्यिाँ हैं वे भी तारीफ के काबिल हैं पर वे केवल छह बड़ी सीपियाँ तक ही लगा सकती हैं।

समुद्र की माँ केवल अपनी कुलीनता के लिये ही नहीं बल्कि अपनी छोटी पोतियों यानी समुद्र की राजकुमारियों की देख भाल के लिये भी बहुत तारीफ के काबिल है।

उसके छह पोतियाँ हैं पर उन सबमें उसकी सबसे छोटी पोती सबसे ज़्यादा सुन्दर है। उसकी खाल गुलाब की सबसे कोमल पंखुड़ी जैसी साफ और कोमल है। उसकी आँखें इतनी नीली हैं जितना कि सबसे गहरे समुद्र का पानी।

पर उसके भी उसकी दूसरी बहिनों की तरह से पैर नहीं हैं ओैर उसका शरीर पीेछे से मछली की पूँछ की शक्ल का है।

सारा दिन वे राजकुमारियाँ या तो किले के बड़े बड़े कमरों में खेलती रहती हैं या फिर उन फूलों में खेलती रहती हैं जो उनके किले की दीवारों में से निकले रहते हैं।

उनके महल की ऐम्बर की बड़ी बड़ी खिड़कियाँ खुली रहती हैं और उनमें से मछलियाँ अन्दर आ जाती हैं। बिल्कुल उसी तरह से जैसे जब हम अपने घरों की खिड़कियाँ खोलते हैं तो चिड़ियें हमारे घरों में आ जाती हैं।

पर यहाँ ये मछलियाँ राजकुमारियों के पास तक आ जाती हैं, उनके हाथ से खाना खाती हैं ओर उनको अपने आपको सहलाने भी देती हैं।

किले के बाहर एक बहुत सुन्दर बागीचा है जिसमे चमकीले लाल और गहरे नीले रंग के फूल खिले हुए हैं जो आग जैसे खिले हुए दिखायी देते हैं। उस बागीचे के फल सोने जैसे चमकते हैं और उनकी पत्तियाँ और डंडियाँ भी थोड़ी थोड़ी देर बाद हिलती रहती हैं।

वहाँ की जमीन पर दुनिया की सबसे बढ़िया रेत है। उस रेत का रंग इतना नीला है जितना कि जलते हुए गंधक[6] की लपट का होता है।

और इस सबके ऊपर एक नीले रंग की चमक है जो ऐसी लगती है जैसे हवा ने उस सबको ढक रखा हो और उस हवा से छन छन कर आसमान का नीला रंग चमक रहा हो न कि समुद्र के पानी का नीला रंग।

जब मौसम शान्त होता है तो वहाँ से सूरज को देखा जा सकता है। उस समय वह वहाँ से जामुनी रंग के फूल जैसा लगता है जिसके चारों तरफ से रोशनी निकल रही हो।

इन छहों राजकुमारियों के पास इस बागीचे में एक एक जमीन का टुकड़ा था जहाँ वे जो चाहतीं उगा सकती थीं। एक राजकुमारी ने अपना जमीन का टुकड़ा एक व्हेल मछली की शक्ल में बना रखा था। तो दूसरी ने सोचा कि उसका जमीन का टुकड़ा एक छोटी मत्स्यकन्या[7] की शक्ल का ज़्यादा अच्छा रहेगा।

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पर सबसे छोटी राजकुमारी की जमीन का टुकड़ा सूरज के जैसा गोल गोल था और उसमें ऐसे लाल रंग के फूल लगे थे जैसी लाल रंग की डूबते सूरज की किरणें होती हैं।

यह सबसे छोटी राजकुमारी कुछ अलग ही किस्म का बच्चा थी। यह सबका बहुत ख्याल रखती थी। जबकि उसकी बहिनें इधर उधर आश्चर्यजनक चीज़ों से अपना मन बहलाना ज़्यादा पसन्द करतीं थीं जो उनको टूटे जहाज़ों से मिल जाती थीं।

पर यह राजकुमारी किसी और चीज़ की कोई परवाह नहीं करती और अपने बागीचे में उगे सूरज के समान लाल लाल फूलों की और एक संगमरमर की मूर्ति की देख भाल में ही लगी रहती।

यह मूर्ति एक बहुत सुन्दर लड़के की थी जिसे एक सफे,द पत्थर में से काट कर बनाया गया था। इसका यह सफेद पत्थर का टुकड़ा एक टूटे हुए जहाज़ में से नीचे गिर पड़ा था।

clip_image008उसने इस मूर्ति के पास एक गुलाबी रंग का वीपिंग विलो का पेड़[8] लगा रखा था। वह पेड़ बहुत अच्छा उग रहा था और जल्दी ही उसकी शाखें बढ़ कर उस लड़के की मूर्ति को ढक कर नीचे की नीली रेत को करीब करीब छूने लगी थीं।

उस पेड़ के साये का रंग कुछ जामुनी रंग का था और वह उस पेड़ की शाखों के साथ साथ हिलता रहता था। इससे ऐसा लगता था जैसे पेड़ के ऊपर का हिस्सा और उसकी जड़ें दोनों आपस में खेल खेल रहे हों।

उसको उससे ज़्यादा खुशी और कहीं नहीं मिलती थी जितनी कि उसको पानी से ऊपर की दुनिया में जो कुछ हो रहा था उसको जान कर मिलती थी।

उसने अपनी दादी से उसको वह सब कुछ बताने के लिये कहा जो वह जहाज़ों और शहरों और आदमियों और जानवरों के बारे में जानती थी।

पर उसके लिये वह सुनना सबसे ज़्यादा मजेदार होता जो वह धरती के ऊपर उगने वाले खुशबूदार फूलों के बारे में सुनती न कि समुद्र के नीचे उगने वाले फूलों के बारे में।

कि जंगल के पेड़ हरे होते हैं। कि उन पेड़ों में घूमती मछलियाँ इतना मीठा गातीं हैं तो उनको सुनने में कितना आनन्द आता। उसकी दादी चिड़ियों को मछलियाँ बोलती थी। क्योंकि उसने कभी चिड़ियें देखी नहीं थी इसलिये वह उनको जानती ही नहीं थी।

उसकी दादी ने कहा — “जब तुम 15 साल की हो जाओगी तब तुमको समुद्र के ऊपर जाने की इजाज़त मिल जायेगी। तब तुम वहाँ चट्टानों पर चाँदनी में बैठ पाओगी। तब तुम वहाँ बड़े बड़े पानी के जहाज़ आते जाते देख पाओगी। और तभी तुम वहाँ के जंगल और शहर भी देख पाओगी। ”

इस बात के अगले साल उनकी एक बहिन 15 साल की हुई पर क्योंकि हर बहिन एक दूसरे से एक साल छोटी थी इसलिये सबसे छोटी बहिन को 15 साल का होने में और समुद्र के ऊपर तक आने के लिये अपनी बारी आने में अभी पाँच और साल लगते।

खैर सब बहिनों ने एक दूसरे से वायदा किया कि जो जो बहिन भी 15 साल की होती जायेगी और वह समुद्र से ऊपर जा कर धरती पर जो कुछ भी देख कर आयेगी वह वहाँ से आ कर अपनी दूसरी बहिनों को वहाँ का हाल बतायेगी।

वह यह भी बतायेगी कि वहाँ सबसे सुन्दर क्या था क्योंकि उनकी दादी उनको वहाँ के बारे में बहुत ज़्यादा नहीं बता सकी थी और उन सबको वहाँ की बहुत सारी चीज़ों के बारे में बहुत सारा जानने की इच्छा भी बहुत थी।

सिवाय सबसे छोटी राजकुमारी के और किसी को 15 साल का होने की इतनी ज़्यादा इच्छा नहीं थी। और उसी को सबसे ज़्यादा समय तक इन्तजार करना था। और वही बहुत शान्त स्वभाव की और सबके बारे में सोचने वाली थी।

कई रातों तक वह खुली खिड़की के पास खड़ी खड़ी उस अँधेरे पानी के ऊपर देखने की कोशिश करती रही। वह बहुत सारी मछलियों को अपने पंख और पूँछ फटकारते देखती रही।

वह वहीं से धुँधले धुँधले चाँद और तारे देखती रही पर पानी में तो वे उसको उससे भी बहुत बड़े बड़े दिखायी देते थे जितनी हम अपनी आँख से देख सकते हैं।

जब कोई काले बादल जैसी कोई चीज़ उसके और उन चाँद तारों के बीच आ जाती तो वह समझ जाती कि या तो उसके सिर के ऊपर कोई व्हेल तैर रही है या फिर आदमियों से भरा कोई जहाज़ जा रहा है।

उनमें से कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि उनके नीचे खड़ी एक मत्स्यकन्या अपने सफेद हाथ फैलाये खड़ी है।

जैसे ही उनकी सबसे बड़ी बहिन 15 साल की हुई उसको समुद्र की सतह से ऊपर जाने की इजाज़त मिल गयी। जब वह ऊपर से वापस आयी तो उसके पास तो बात करने के लिये सैंकड़ों चीज़ें थीं।

उसने कहा कि सबसे अच्छा तो वहाँ समुद्र के किनारे के रेत पर या फिर किनारे के पास के पानी के ऊपर चाँदनी में लेट कर पास के शहर की रोशनी को देखना था जो हजारों की गिनती में सितारों की तरह चमक रही थीं।

इसके अलावा संगीत की आवाज़ सुननी थी, गाड़ियों का शोर सुनना था और लोगों की बाातचीत की आवाज़ें सुननी थीं। चर्च के घंटों की आवाजें सुननी थीं जो उसकी मीनारों से निकल निकल कर बाहर आती थीं।

क्योंकि वह उन सबके पास तक नहीं जा सकी थी इसलिये वह उनके पास तक जाना चाहती थी।

उसका यह सब हाल उसकी सबसे छोटी बहिन बड़े ध्यान लगा कर सुनती। और उसके बाद जब वह अपनी खुली खिड़की के सामने खड़ी होती और अँधेरे पानी में से ऊपर देखने की कोशिश करती तो वह एक बड़े से शहर के बारे में सोचती।

और वहीं खड़े खड़े उस शहर के शोर के और चर्च के घंटों के बारे में सोचती रहती।

उससे अगले साल उसकी एक और बहिन 15 साल की हुई तो उसको भी ऊपर जाने की और इधर उधर तैरने की इजाज़त मिली। वह उस समय पानी से ऊपर उठी जब सूरज डूबने वाला था।

तो उसने आ कर बताया कि इस समय का दृश्य देखने के लिये बहुत सुन्दर था। सारा आसमान सुनहरा चमक रहा और उसमें जामुनी और गुलाबी रंग के बादल उसके ऊपर तैर रहे थे। पर यह वह ठीक से नहीं बता सकी कि वे कहाँ तैर रहे थे।

एक बड़ा सा सफेद हंसों का झुंड भी आसमान में डूबते हुए सूरज की तरफ उड़ता हुआ चला जा रहा था। हंसों का वह झुंड उड़ता हुआ ऐसा लग रहा था जैसे कि समुद्र के ऊपर कोई सफेद परदा लगा हो।

वह खुद भी डूबते हुए सूरज की तरफ तैरी पर वह समुद्र की लहरों में डूब गयी। और फिर तो गुलाबी बादलों का गुलाबी रंग भी समुद्र में धुँधला पड़ गया।

अब तीसरी बहिन की बारी थी। वह इन सब बहिनों में बहादुर और हिम्मत वाली थी। वह समुद्र में ऊपर जा कर एक चौड़ी नदी में उसके ऊपर की तरफ तैर गयी।

उसके किनारों पर उसने हरी हरी पहाड़ियाँ देखीं जो हरी लताओं से ढकी हुई थीं। उसने किले देखे महल देखे जो जंगल के पेड़ों में से झाँक रहे थे। उसने वहाँ चिड़ियों के गीत सुने।

वहाँ सूरज की किरणें इतनी तेज़ थीं कि उसको कभी कभी अपने जलते हुए चेहरे को ठंडा करने के लिये पानी में डुबकी लगानी पड़ती थी।

वहीं से पानी की एक पतली सी धारा एक तरफ को निकल गयी थी। उस धारा में उसने आदमियों के बच्चे खेलते देखे जो नंगे ही खेल रहे थे। पर वह उस मत्स्यकन्या को अपनी तरफ आते देख कर डर के मारे भाग गये।

उसके बाद वहाँ एक काला जानवर आया। वह काला जानवर कुत्ता था पर उस मत्स्यकन्या को पता ही नहीं था कि वह कुत्ता था क्योंकि उसने पहले कभी कुत्ता देखा ही नहीं था। कुत्ता उसको देख कर इतनी ज़ोर से भौंका कि वह डर गयी और तुरन्त ही समुद्र में डुबकी मार गयी।

पर उसका कहना था कि वह वैसे सुन्दर जंगल, हरी हरी पहाड़ियाँ, छोटे छोटे प्यारे बच्चे जो मछली की तरह के पंखों के बिना भी पानी में तैर सकते थे कभी नहीं भूल पायेगी।

चौथी बहिन बहुत शर्मीली थी। वह समुद्र में ही रही पर उसने आ कर बताया कि किनारे के पास जाने पर ज़्यादा अच्छा था। वहाँ से वह मीलों दूर तक देख सकती थी और उसके ऊपर आसमान शीशे के घंटे जैसा लग रहा था।

उसने वहाँ पानी के जहाज़ देखे पर वे बहुत दूर से। इतनी दूर से वे किसी समुद्री चिड़िया जैसे लग रहे थे। समुद्र में डौलफिन मछलियाँ भी खेल रही थीं और बड़ी बड़ी व्हेल मछलियाँ अपने नथुनों से पानी बाहर निकाल निकाल कर फेंक रही थीं। इससे ऐसा लग रहा था जैसे सैंकड़ों फव्वारे चारों तरफ पानी फेंक रहे हों।

पाँचवी राजकुमारी का जन्मदिन जाड़ों में पड़ता था सो जब उसकी ऊपर जाने की बारी आयी तो उसने तो वह देखा जो उसकी दूसरी बहिनों ने पहली बार में नहीं देखा था।

उसने देखा कि समुद्र तो हरा हरा दिखायी दे रहा था पर उसमें बरफ के बहुत बड़े बड़े टुकड़े तैर रहे थे। हर बरफ का टुकड़ा एक मोती जैसा लग रहा था पर वह मोती तो उन चर्चों से भी बड़ा था जो आदमी लोग बनाते थे। उन सबकी शक्लें अलग अलग थीं और वे सब हीरे जैसे चमक रहे थे।

वहाँ जा कर वह एक सबसे बड़े बरफ के टुकडे, पर बैठ गयी। वहाँ हवा चल रही थी वह उसके लम्बे बालों से खेलने लगी।

उसने अपनी बहिनों को यह भी बताया कि सारे जहाज़ बहुत जल्दी जल्दी जा रहे थे और उन बरफ के टुकड़ों से वे जितना दूर हो कर जा सकते थे उतनी दूर हो कर जा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे उन टुकड़ों से डर रहे हों।

शाम के समय जब सूरज डूब गया तो काले काले बादल आसमान में फैल गये और बिजली भी आसमान में चमक चमक कर इधर से उधर तक जाने लगी। उन बरफ के टुकड़ों पर लाल रोशनी पड़ने लगी और वे भी समुद्र की लहरों पर ऊपर नीचे होने लगे।

यह देख कर सारे जहाज़ों के नाविक डर के मारे काँपने लगे जबकि वह खुद उस बरफ के टुकड़े पर शान्ति से बैठी नीली नीली बिजली की चमक देखती रही।

जब इन राजकुमारियों को पहली बार समुद्र के ऊपर जाने को मिला तो इन लोगों ने ऊपर जो कुछ भी नया देखा उस सबसे ये सब बहुत खुश थीं पर अब जब ये बड़ी हो गयी थीं तब अब ये ऊपर कभी भी जा सकती थीं।

इसलिये अब ये ऊपर जाने के लिये उतनी उत्सुक भी नहीं थीं। अब ये चाहती थीं कि अब ये पानी में ही रहें। एक महीने बाद तो वे यह भी कहने लगी थीं कि यहीं नीचे ही ज़्यादा अच्छा था और घर में ही ज़्यादा आरामदेह था।

पर फिर भी पाँचों बड़ी बहिनें शाम को बाँहों में बाँहें डाल कर एक लाइन बना कर समुद्र की सतह के ऊपर आ जातीं। उनकी आवाज़ें किसी भी आदमी की आवाज़ से बहुत अच्छी थीं।

और फिर जब कभी कोई तूफ़ान आता और जब वे यह सोचती कि यह जहाज़ समुद्र में खो जायेगा तो उससे पहले ही वे उस जहाज़ के सामने अपनी मीठी आवाज़ में यह गाती हुई तैरतीं कि समुद्र की तली में भी कितना आनन्द है।

वे उनके मल्लाहों से प्रार्थना करतीं कि अगर उनका जहाज़ समुद्र की तली में डूब भी जाये तो वे डरें नहीं।

पर मल्लाहों की समझ में तो उनका गाना आता ही नहीं था। वे यह समझते कि यह तो तूफान की आवाज़ थी और ये चीज़ें तो उनके लिये कभी सुन्दर हो ही नहीं सकती थीं।

क्योंकि अगर जहाज़ डूब गया तो उनके जहाज़ पर के सब लोग डूब जायेंगे और फिर केवल उनके मरे हुए शरीर ही समुद्र के राजा के महल पहुँचेंगे।

जब वे सब बहिनें इस तरह हाथ में हाथ डाले पानी के ऊपर आतीं तो उनकी सबसे छोटी बहिन नीचे बिल्कुल अकेली खड़ी रह जाती और उनको जाते हुए देखती रहती।

उसको रोना आ जाता पर बिना आँसुओं के क्योंकि मत्स्यकन्याओं के आँसू तो होते नहीं। और इसी लिये उनको और ज़्यादा दुख सहना पड़ता है।

वह सोचती “काश मैं 15 साल की होती। मुझे मालूम है कि मैं ऊपर की दुनिया और उसमें रहने वाले आदमियों को बहुत प्यार करती। ”

आखिर वह भी 15 साल की हुई। उसकी दादी बोली —“सो अब तुम भी बड़ी हो गयीं। आओ अब मैं तुमको भी तुम्हारी दूसरी बहिनों की तरह सजाती हूँ। ”

कह कर उसने उसके सिर पर सफेद लिली का एक गजरा लगाया। उस गजरे के फूल की हर पत्ती आधा मोती था। फिर उसने आठ सीपी मँगवायीं और उसके ओहदे को ऊँचा दिखाने के लिये उनको उसकी पूँछ पर चिपका दिया।

छोटी मत्स्यकन्या बोली — “पर यह तो मुझे दर्द करता है दादी। ”

“पर शान रखने के लिये कुछ तो सहना ही पड़ता है न। ”

पर वह यह सब उतार कर कितनी खुश होती। उसके अपने बागीचे के लाल फूल उस पर कितने अच्छे लगते पर वह क्या करती। सो वह दादी से बोली — “अच्छा दादी विदा। ” और एक बुलबुले की तरह हल्के से पानी की सतह पर पहुँचने के लिये ऊपर उठ गयी।

जब उसने अपना सिर पानी से बाहर निकाला तभी सूरज डूब कर चुका था पर आसमान में बादल अभी गुलाबी पीले हो रहे थे। शाम के धुँधलके में शाम का तारा बड़ी ज़ोर से चमक रहा था। समुद्र शान्त था और हवा मन्द और ताज़ा थी।

एक तीन पाल वाल जहाज़ अपने एक पाल से ही समुद्र के शान्त पानी मे तैर रहा था क्योंकि हवा बहुत ही मन्द थी। मल्लाह लोग जहाज़ के डैक पर आराम से बैठे थे। कुछ लोग गाना गा रहे थे।

जब अँधेरा होने लगा तो जहाज़ पर सैकड़ों रंगीन लालटेनें जल उठीं जैसे कई देशों के झंडे हवा में लहरा उठे हों। वह छोटी मत्स्यकन्या उस जहाज़ के केबिन की खिड़की के पास तक तैर गयी।

जब वह समुद्र की लहरों के साथ ऊपर नीचे होती तो वह उस खिड़की के साफ शीशे के अन्दर तक देख सकती थी। उसमें उसको कुछ बहुत अच्छे कपड़े पहने लोग भी दिखायी दिये।

उन आदमियों में एक राजकुमार भी था। वह उन सब आदमियों में सुन्दर था। उसकी बड़ी बड़ी काली आँखें थीं। वह 16 साल का था और उस समय वहाँ उसका जन्मदिन बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा था।

मल्लाह लोग डैक पर नाच गा रहे थे पर जब राजकुमार अपने केबिन से बाहर आया तो सैंकड़ों राकेट छोड़े गये जिससे सारा आसमान दिन की तरह चमक उठा।

वह छोटी मत्स्यकन्या यह देख कर डर गयी और तुरन्त ही पानी के नीचे चली गयी। जब वह दोबारा पानी के ऊपर आयी तो उसने देखा कि आसमान से हजारों सितारे नीचे गिर रहे थे। वह आतिशबाज़ी थी। उसने ऐसी आतिशबाज़ी पहले कभी नहीं देखी थी।

उसे ऐसा लगा जैसे सूरज ने चारों तरफ आग बिखेर दी हो। वह आग नीली हवा में बिखरी तो उनकी परछाईं समुद्र के शान्त पानी में पड़ी जिसमें छोटी से छोटी सी चीज़ तक देखी जा सकती थी।

और वह राजकुमार भी कितना सुन्दर लग रहा था जब वह उन सब आदमियों से मुस्कुरा कर हाथ मिला रहा था। रात की हवा में संगीत की आवाज़ भी खूब गूँज रही थी।

हालाँकि काफी देर हो चुकी थी पर छोटी मत्स्यकन्या उस जहाज़ या फिर यह कहो कि उस राजकुमार के चेहरे से अपनी आँखें ही नहीं हटा पा रही थी।

कुछ देर बाद वे रंगीन लालटेनें बुझा दी गयीं। हवा में अब कोई राकेट नहीं था। आसमान में अब कोई आवाज़ नहीं थी। पर अब समुद्र में तूफान आने लगा था। उसकी लहरों से आवाज़ें आने लगी थीं।

वह मत्स्यकन्या लहरों के ऊपर झूलती रही फिर भी वह उस जहाज़ के केबिन की खिड़की के पास ही रही जिससे वह उसके अन्दर देख सकती थी। उसके बाद वह जहाज़ के पाल खोल दिये गये और उसने अपनी यात्र जारी रखी।

कुछ देर बाद हवायें और तेज़ हो गयीं, लहरें और ऊँची ऊँची उठने लगीं, आसमान में और काले काले बादल घिर आये, दूर बिजली चमकने लगी। लगता था कि बहुत ही भयानक तूफान आने वाला था।

उस जहाज़ के मल्लाहों ने एक बार फिर से अपने जहाज़ के पाल ठीक किये और वह जहाज़ अपनी यात्र पर आगे बढ़ता रहा। लहरें अब इतनी ऊँची हो गयी थीं कि लगता था कि वे पालों के ऊपर से निकल जायेंगी पर जहाज़ उनके नीचे से ऐसे निकल गया जैसे हंस पानी में तैर जाते हैं और फिर उनमें से बाहर निकल आते हैं

छोटी मत्स्यकन्या को तो यह खेल देखने में बहुत अच्छा लगा पर मल्लाहों को नहीं।

आखिरकार जहाज़ में आवाज हुई और वह चटक गया। उसके मोटे मोटे तख्ते टूट गये और उनमें से पानी अन्दर जाने लगा। उसके डैक के ऊपर से भी पानी अन्दर जा रहा था।

clip_image010उसका बड़ा वाला पाल सरकंडे[9] की तरह टूट गया और वह जहाज़ एक तरफ को पानी में गिर पड़ा। पानी उसके अन्दर बड़ी तेज़ी से जा रहा था।

अब छोटी मत्स्यकन्या को लगा कि जहाज़ पर काम करने वाले तो खतरे में थे। वह खुद भी जहाज़ के तख्तों और लठ्ठों से बचने की कोशिश कर रही थी जो जहाज़ से टूट टूट कर पानी में इधर उधर बह रहे थे।

एक समय पर तो इतना अँधेरा हो गया कि वह बेचारी कुछ भी नहीं देख सकी पर तभी बिजली चमकी और उसकी रोशनी में उसको सब दिखायी दे गया। उसने देखा कि जहाज़ में सब लोग थे सिवाय राजकुमार के।

जब जहाज़ थोड़ा सा और आगे बढ़ा तो उसने देखा कि राजकुमार तो ऊँची ऊँची लहरों में डूब रहा था। यह सोच कर वह बहुत खुश हुई कि अब वह उसके साथ रहेगा पर तभी उसको याद आया कि आदमी लोग तो पानी में रह ही नहीं सकते थे। जब तक वह उसके पिता के पास पहुँचेगा तब तक तो वह मर ही जायेगा।

सो वह उन तख्तों और लठ्ठों के सहारे सहारे तैरती रही जो पानी में इधर उधर तैर रहे थे। उस समय तो वह यह भी भूल गयी थी कि वे उसको कुचल भी सकते थे।

फिर उसने पानी में एक डुबकी लगायी और आखिर राजकुमार के पास पहुँच ही गयी। राजकुमार बेचारे की उस तूफानी समुद्र में तैरने की ताकत धीरे धीरे खत्म होती जा रही थी।

उसके जोड़ भी काम नहीं कर रहे थे। उसकी सुन्दर आँखें बन्द होती जा रही थीं। अगर वह छोटी मत्स्यकन्या उसकी सहायता के लिये न पहुँचती तो वह तो बेचारा मर ही जाता।

उसने राजकुमार का सिर पानी से ऊपर उठा दिया और पानी की लहरें उसके सिर के इधर उधर से जाने लगीं।

सुबह जा कर कहीं वह तूफान थमा पर जहाज़ के किसी टुकड़े का कहीं नामो निशान नहीं था। सूरज निकल आया था और पानी के ऊपर चमक रहा था। उसकी रोशनी की किरणों से राजकुमार के गालों का रंग तो लौट आया था पर उसकी आँखें अभी भी बन्द थीं।

मत्स्यकन्या ने उसका ऊँचा माथा चूमा और उसके गीले बालों को सहलाया। वह उसको उसके बागीचे में खड़ी हुई संगमरमर की मूर्ति की तरह लग रहा था। उसने उसको एक बार फिर चूमा और प्रार्थना की कि वह लम्बे समय तक ज़िन्दा रहे।

इसी समय उसको जमीन दिखायी देखने लगी थी। उसने बड़े बड़े नीले पहाड़ देखे जिन पर बरफ पड़ी हुई थी। वह बरफ उन पर पड़ी हुई ऐसी लग रही थी जैसे उन पर बहुत सारे सफेद हंस लेटे हुए हों।

किनारे के पास ही एक बहुत सुन्दर जंगल था और उसके पास ही एक बहुत बड़ी इमारत खड़ी थी। वह या तो कोई चर्च था या फिर कौनवैन्ट यह वह नहीं बता सकी।

उसके बागीचे में सन्तरे और मौसमी के पेड़ खड़े थे और उसके दरवाजे के सामने बड़े बड़े ताड़ के पेड़ खड़े थे।

यहाँ आ कर समुद्र ने एक खाड़ी बना ली थी। इस खाड़ी में पानी तो बिल्कुल शान्त था पर वह खाड़ी काफी गहरी था सो वह राजकुमार के साथ उस खाड़ी के किनारे तक तैर गयी।

किनारे पर बहुत बारीक सफेद रेत पड़ा हुआ था। उसने राजकुमार को ले जा कर वहाँ लिटा दिया। लिटाते समय उसने उसका सिर उसके बाकी के शरीर से थोड़ा ऊँचा रखा।

तभी उस बड़ी सफेद इमारत में घंटियाँ बजनी शुरू हुईं और बहुत सारी नौजवान लड़कियाँ बागीचे में बाहर निकल आयीं।

उनको देख कर मत्स्यकन्या वहाँ से दूर चली गयी और पानी में खड़ी हुई एक चट्टान के पीछे छिप गयी। उसने अपना चेहरा और गरदन समुद्र के फेन से ढक लिया ताकि वह किसी को दिखायी न दे सके।

वहीं से वह अब यह देखने की कोशिश करने लगी कि उस बेचारे राजकुमार का अब क्या होगा। उसे देखते ज़्यादा देर नहीं हुई थी कि उसने देखा कि एक नौजवान लड़की उधर आयी जहाँ वह राजकुमार लेटा हुआ था।

एक पल के लिये तो वह कुछ डरी डरी सी दिखायी दी पर फिर वह वहाँ कई लोगों को बुला लायी। मत्स्यकन्या ने देखा कि राजकुमार ज़िन्दा हो गया था और मुस्कुरा कर अपने चारों तरफ खड़े लोगों की तरफ देख रहा था।

पर उसने उसकी तरफ मुस्कुरा कर नहीं देखा। उसको तो पता ही नहीं था कि उसी ने तो उसको बचाया था। इस बात से वह बहुत दुखी हुई।

जब वह उस बड़ी इमारत में अन्दर चला गया वह दुखी हो कर डुबकी मार कर पानी में नीचे चली गयी और अपने पिता के किले में चली गयी।

वह हमेशा से ही शान्त रहती थी और दूसरों के बारे में सोचती थी और इस घटना के बाद से तो वह कुछ और ज़्यादा ही शान्त हो गयी और कुछ और ज़्यादा ही दूसरों के बारे में सोचने लगी।

उसकी बहिनों ने पूछा कि उसने अपने पहली बार पानी से ऊपर जाने में क्या देखा तो वह कुछ नहीं बोली। कई दिनों और रातों को वह उस जगह तक गयी जहाँ वह राजकुमार को छोड़ कर आयी थी।

वहाँ उसने बागीचे में पके फल देखे जब तक वे तोड़ नहीं लिये गये, पहाड़ों पर पिघलती बरफ देखी पर उसने राजकुमार को वहाँ फिर कभी नहीं देखा।

वह बार बार वहाँ से निराश हो कर पहले से भी ज़्यादा दुखी हो कर वापस आ जाती और आ कर अपने बागीचे में बैठ जाती। उसका अपना बागीचा ही एक जगह थी जहाँ उसको थोड़ा बहुत आराम मिलता था।

वहाँ आ कर वह अपनी बाँहें उस संगमरमर की मूर्ति के चारों ओर डाल देती जो उसे उस राजकुमार की तरह ही लगती थी जिसको वह समुद्र के किनारे ले कर गयी थी।

पर उसने अपने फूलों की देख भाल करनी छोड़ दी थी। अब वे जंगली पेड़ों की तरह बढ़ गये थे और रास्तों पर फैल गये थे। उनकी डंडियाँ और लम्बे लम्बे पत्ते पेड़ों से जा कर लिपट गये थे जिससे वहाँ कुछ अँधेरा सा हो गया था।

आखिर वह अपना भेद और नहीं छिपा सकी और उसने अपनी एक बहिन से यह सब कह दिया। जल्दी ही उसका यह भेद दूसरी मत्स्यकन्याओं को भी पता लग गया। उनमें से दो मत्स्यकन्याएँ ऐसी थीं जिनके एक दोस्त को यह पता था कि वह राजकुमार कौन था।

उनके दोस्त ने भी उसको उस दिन देखा था। उसको मालूम था कि वह राजकुमार कहाँ से आया था और उसका महल कहाँ था।

सो उसकी बहिनों ने कहा — “आओ बहिन आओ। ”

उन्होंने एक दूसरे की बाँहों में बाँहें डालीं और लाइन बना कर सब पानी के ऊपर उसी जगह आ गयीं जहाँ राजकुमार का महल था।

राजकुमार का महल चमकीले पीले पत्थर का बना हुआ था जिसमें संगमरमर की बहुत सारी सीढ़ियाँ चली गयीं थीं। उनमें से एक सीढ़ी समुद्र के अन्दर तक चली गयी थी।

उसकी छत पर बहुत सुन्दर सुन्दर छतरियाँ बनी हुई थीं। चारों तरफ खम्भे लगे हुए थे जिनके बीच संगमरमर की मूर्तियाँ बनी हुई थीं। क्रिस्टल की बड़ी बड़ी खिड़कियाँ थीं जिनमें से कमरे के अन्दर तक का देखा जा सकता था।

उन कमरों में सिल्क के परदे पड़े हुए थे और टैपेस्ट्री लटकी हुई थी। दीवारों पर तस्वीरें लटकी हुई थीं जो देखने में बहुत सुन्दर लग रही थीं।

उसके सबसे बड़े कमरे के सामने एक बहुत बड़ा फव्वारा था जिसमें से पानी निकल निकल कर छत पर बनी शीशे की छतरी तक जा रहा था।

सूरज की रोशनी उस शीशे की छतरी में से छन छन कर नीचे फव्वारे के फर्श पर पड़ रही थी जिसके चारों तरफ सुन्दर सुन्दर पौधे लगे हुए थे।

अब जबकि उसे पता चल गया था कि वह राजकुमार कहाँ रहता था तो वह अपने दिन और रात उसी महल के आस पास गुजारती थी। वह किनारे के काफी पास तक तैर जाती ओर वहाँ से महल को देखती रहती।

एक बार तो वह उस महल की संगमरमर के छज्जे के पास तक तैर गयी। उस छज्जे का साया पानी में काफी दूर तक पड़ रहा था। वह वहाँ बैठ जाती और देर तक राजकुमार को देखती रहती।

उसने देखा कि राजकुमार वहाँ चाँदनी में बैठ कर बहुत अकेलापन महसूस करता था। कई रातों को उसने राजकुमार को एक नाव में बैठ कर समुद्र में खेते देखा। उसकी नाव में संगीत बजता रहता और झंडे फहराते रहते।

वह हरी हरी झाड़ियों में से अपना सिर बाहर निकाल कर उसको देखती और अगर हवा उसके चेहरे पर से उसका सफेद परदा हटाती तो जो कोई उसको अगर देखता भी तो वह उसको अपने पंख फैलाये हंस की तरह लगती।

कई रातों में जब मछियारे अपनी लालटेनें ले कर मछली पकड़ने के लिये समुद्र में निकलते तो वह उनको राजकुमार के बारे में बहुत अच्छी अच्छी बातें करते सुनती। तब उसको बहुत खुशी होती कि उसने राजकुमार की जान तब बचायी जब वह आधा मरा सा लहरों पर उछल रहा था।

उसको सब याद था कि उस दिन क्या क्या हुआ था पर क्योंकि राजकुमार को तो कुछ पता ही नहीं था इसलिये वह तो उसके बारे में कुछ सोच ही नहीं सकता था।

धीरे धीरे वह आदमियों की तरफ और खिंचती चली गयी और यह चाहने लगी कि वह आदमियों की दुनिया में ज़्यादा से ज़्यादा घूम सके जिनकी दुनिया उसकी अपनी दुनिया से कहीं ज़्यादा बड़ी थी।

वे अपने जहाज़ों से समुद्र के ऊपर उड़ सकते थे, ऊँचे ऊँचे पहाड़ों पर चढ़ सकते थे जो बादलों से भी ऊँचे होते थे और जमीन पर भी चल सकते थे। उनके जंगल और उनके मैदान तो इतने फैले पड़े थे जहाँ तक उसकी नजर भी नहीं जा पाती थी।

उसको कितना सब जानने की इच्छा थी पर उसकी कोई बहिन उसके सवालों के जवाब ही नहीं दे पा रही थी।

तब उसने अपनी दादी से पूछा जो ऊपर की दुनिया के बारे में सब कुछ जानती थी। पर वह भी उस ऊपर वाली दुनिया को समुद्र के ऊपर वाली दुनिया ही कहती थी उसके बारे में उसको ज़्यादा कुछ नहीं बता पाती थी।

एक दिन छोटी मत्स्यकन्या ने पूछा — “दादी अगर आदमी न डूब जायें तो क्या वे हमेशा के लिये ज़िन्दा रहते हैं? क्या वे कभी नहीं मरते जैसे हम लोग समुद्र में मरते हैं?”

दादी बोली — “नहीं बेटी ऐसा नहीं है। वे भी मरते हैं बल्कि उनकी ज़िन्दगी तो हमारी ज़िन्दगी से भी बहुत कम होती हैं। हम लोग कभी कभी तो 300 साल तक रहते हैं पर जब हम यहाँ मर जाते हैं तब हम समुद्र के ऊपर का फेन बन जाते हैं। इसलिये हम यहाँ नीचे अपने प्रिय लोगों की कोई कब्र भी नहीं बना पाते हैं।

हम कोई अमर आत्मा नहीं हैं। एक बार मरने के बाद हम लोग फिर कभी नहीं रहेंगे। समुद्री हरी घास की तरह जो एक बार काटने के बाद बढ़ जाती है, हम फिर कभी नहीं फलेंगे फूलेंगे।

जबकि आदमी लोगों की आत्मा होती है जो हमेशा रहती है। वह उस समय तक भी रहती है जब तक उनका शरीर धूल में मिल जाता है। उसके बाद वह साफ हवा के सहारे सहारे तारों के ऊपर तक चली जाती है।

जैसे हम पानी के ऊपर उठ कर धरती की जमीन देखते हैं उसी तरह वे भी ऊपर उठ कर अनजानी जगहों पर चले जाते हैं जिन्हें हम कभी नहीं देख पायेंगे। ”

छोटी मत्स्यकन्या ने दुखी हो कर पूछा — “हमारी आत्मा अमर क्यों नहीं होती दादी? मैं तो अपनी ज़िन्दगी के सैकड़ों साल एक दिन के लिये आदमी बनने के लिये खुशी से दे दूँगी ताकि मैं सितारों से ऊपर उन अनजानी जगहों को देख सकूँ जहाँ वे मर कर जाते हैं। ”

दादी बोली — “ऐसा नहीं कहते बेटी। हम तो अपने आपको आदमियों से कहीं ज़्यादा खुशकिस्मत समझते हैं। ”

छोटी मत्स्यकन्या बोली — “तो जब मैं मर जाऊँगी तो समुद्र के पानी के ऊपर का फेन बन जाऊँगी और फिर लहरों का संगीत कभी नहीं सुन पाऊँगी।

और फिर सुन्दर फूल कभी नहीं देख पाऊँगी और न ही लाल सूरज देख पाऊँगी। क्या मैं ऐसा कुछ कर सकती हूँ जिससे मुझे अमर आत्मा मिल जाये?”

दादी बोली — “नहीं बेटी। यह बहुत मुश्किल काम है। जब तक कि कोई आदमी तुमको इतना प्यार न करे कि तुम उसके लिये उसके माता पिता से भी ज़्यादा हो जाओ। उसके सारे विचार और उसका सारा प्यार तुम पर ही न सिमट जाये।

पुजारी उसका दाँया हाथ तुम्हारे हाथ में न रख दे और वह यहाँ और मरने के बाद दूसरी दुनिया में तुम्हारा वफादार रहने का वायदा न करे।

तब उसकी आत्मा तुम्हारे शरीर में आ जायेगी और फिर तुम उसके साथ उसकी आगे आने वाली खुशी में हिस्सा बाँट सकोगी। इस तरह वह अपनी आत्मा तुमसे बाँट लेगा पर बेटी ऐसा कभी नहीं हो सकता।

तुम्हारी मछली की पूँछ जो हम सबकी पूँछों में सबसे अच्छी मानी जाती है, धरती पर बहुत ही भद्दी मानी जाती है। वे इससे ज़्यादा भद्दी चीज़ को तो जानते ही नहीं, वे समझते हैं कि सुन्दर दिखायी देखने के लिये दो टाँगों का होना बहुत ज़रूरी है। ”

छोटी मत्स्यकन्या ने एक लम्बी साँस भरी और दुख से अपनी पूँछ की तरफ देखा।

उसकी दादी फिर बोली — “हम लोगों को हम जिस हाल में हैं खुश रहना चाहिये और हम लोगों को 300 साल जो भी हम ज़िन्दा रहते हैं आराम से गुजारने चािेहये। ये 300 साल हमारे लिये काफी हैं। उसके बाद हमको आराम करना चाहिये।

आज शाम को हम दरबार में नाच के लिये जा रहे हैं। यहाँ इतना सुन्दर दृश्य होगा जैसा हम धरती पर कभी देख ही नहीं सकते। ”

नाच के कमरे की दीवारें और छत बहुत मोटी थी पर पारदर्शी क्रिस्टल की बनी थी। कुछ गहरे लाल रंग की और कुछ घास के हरे रंग की सैकड़ों बहुत बड़ी बड़ी सीपियाँ वहाँ सब तरफ लाइन बनाये खड़ी थीं।

उनके अन्दर नीले रंग की आग जल रही थी जिससे सारा कमरा जगमगा रहा था। उसकी रोशनी में दीवारों से हो कर बाहर जा रही थी जिससे समुद्र भी चमक रहा था

छोटी बड़ी अनगिनत मछलियाँ उस कमरे की क्रिस्टल की दीवार के आस पास तैर रही थी। उनमें किसी किसी की खाल जामुनी रंग में चमक रही थी जबकि दूसरों की खाल रुपहले और सुनहरे रंग में।

इन कमरों में से हो कर एक पतली सी नदी बह रही थी जिसमें मत्स्यकुमार और मत्स्यकन्याएँ अपने ही संगीत की धुन पर नाच रहे थे। उनकी जैसी मीठी आवाज धरती पर किसी की नहीं थी।

छोटी मत्स्यकन्या ने उन सबमें सबसे मीठा गाया। सारे दरबार ने उसके लिये तालियाँ बजायीं। कुछ देर के लिये तो उसका दिल खुशी से भर गया क्योंकि वह जानती थी कि उसकी आवाज़ समुद्र और धरती दोनों पर रहने वालों में सबसे अच्छी थी।

पर जल्दी ही वह फिर से पानी के ऊपर की दुनिया के बारे में ही सोचने लगी क्योंकि वह उस सुन्दर राजकुमार को भूल ही नहीं पा रही थी। और न ही वह अपने उस दुख को भूल पायी थी जो राजकुमार की तरह उसे अपने अन्दर अमर आत्मा के न होने का था।

इसलिये वह चुपचाप अपने पिता के महल से खिसक गयी। जबकि अन्दर अभी भी खुशी और गाने का माहौल था पर वह अपने बागीचे में जा कर कुछ दुखी सी अकेली जा कर बैठ गयी।

तभी उसने समुद्र के पानी में कुछ गुड़गुड़ाने की आवाज सुनी तो उसने सोचा “मुझे यकीन है कि ऊपर वही अपनी नाव में जा रहा होगा। वही जिसके ऊपर मेरी इच्छाएँ निर्भर हैं और जिसके हाथों में मैं अपनी ज़िन्दगी भर की खुशियाँ रख देना चाहती हूँ।

अमर आत्मा को पाने के लिये मैं उसको ढूँढूँगी जबकि मेरी बहिनें अपने पिता के महल में नाचती गाती रहेंगी। मैं समुद्र की उस जादूगरनी[10] के पास जाऊँगी जिससे मैं हमेशा ही डरती रही हूँ। वह मुझे जरूर ही कोई सलाह देगी और मेरी सहायता करेगी। ”

यही सोच कर वह छोटी मत्स्यकन्या अपने बागीचे में से उठी और फेन वाले भँवर की तरफ चल दी जिसके पीछे वह जादूगरनी रहती थी।

वह उस रास्ते पर पहले कभी नहीं गयी थी। वहाँ न तो कोई फूल खिलता था और न ही कोई घास ही उगती थी केवल भूरे रंग की रेत ही उस भँवर तक फैली पड़ी थी।

वहाँ पहिये के घूमने से पानी में जैसे फेन बनते हैं उसी तरह से फेन बन रहे थे और उनमें जो भी चीज़ आ रही थी वह भी घूमे जा रही थी और उसमें वे सब नीचे की तरफ चली जा रही थीं।

उस जादूगरनी के घर तक पहुँचने के लिये उस छोटी मत्स्यकन्या को इसी रास्ते से हो कर जाना था। उसके बाद का रास्ता गरम दलदल से हो कर जाता था और जादूगरनी का घर उस दलदल के उस पार एक अजीब से जंगल में था जिसके फूल आधे जानवर और आधे पौधे थे।

वे देखने में साँप जैसे लगते थे जिनके सौ सौ सिर जमीन में से उगे हुए थे। उनकी बाँहें लम्बी लम्बी और गिलगिली थीं और उनकी उँगलियाँ लम्बे लम्बे कीड़ों जैसी थीं। वे नीचे जड़ से ले कर ऊपर तक सारे के सारे हिलते रहते थे।

समुद्र में उनको जो भी मिल जाता वे पौधे उसी को पकड़ ,लेते थे। उनकी पकड़ इतनी अचूक थी कि कोई उनकी पकड़ से बच नहीं पाता था।

छोटी मत्स्यकन्या ने तो जब यह देखा तो वह तो बहुत डर गयी। डर से उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी और उसका रंग साँवला पड़ गया। वह तो वहीं की वहीं खड़ी रह गयी हिल भी नहीं सकी।

पर फिर उसने राजकुमार और आदमी की अमर आत्मा के बारे में सोचा जिनको वह पाना चाहती थी तो उसकी हिम्मत वापस आ गयी।

उसने अपने लम्बे बाल अपने सिर के चारों तरफ बाँध लिये ताकि वे पौधे रूपी जानवर उसको बालों से न पकड़ लें। उसने अपने हाथ अपने आगे मोड़ लिये। बस फिर वह उन बदसूरत जानवरों में से होती हुई एक मछली की तरह से पानी में तैरती आगे बढ़ती चली गयी।

रास्ते में उसने देखा कि उन जानवरों के हाथों में कोई चीज़ थी जैसे कोई लोहे का छल्ला हो। आदमी लोग जो समुद्र में बहुत नीचे डूब कर मर गये थे उनके सफेद हड्डियों के ढाँचे, जमीन के जानवरों के ढाँचे, पतवार, लकड़ी की आलमारियाँ आदि भी उनके लम्बे हाथों में फँसी हुई थीं।

यहाँ तक कि उनकी पकड़ में एक मत्स्यकन्या भी थी जिसको उन्होंने पकड़ लिया था और उसको उसका गला घोट कर मार दिया था। यह दृश्य देख कर तो उस छोटी राजकुमारी के रोंगटे ही खड़े हो गये।

चलते चलते अब वह उस जंगल के दलदल वाले हिस्से में आ गयी थी जहाँ बहुत बड़े बड़े और मोटे मोटे साँप इधर से उधर घूम रहे थे। उनके मटमैले शरीर उसके दिल में डर पैदा कर रहे थे।

इसी जगह के बीच में उस जादूगरनी का घर था। उसका यह घर जहाज़ से डूबे हुए लोगों की हड्डियों से बना हुआ था और उसी घर में वह समुद्र की जादूगरनी बैठी हुई थी।

clip_image012उस समय एक मेंढक उसके मुँह में से खाना खा रहा था जैसे लोग कभी कभी कैनेरी चिड़िया को चीनी का टुकड़ा खिलाते हैं।

वह अपने उन बदसूरत साँपों को अपनी मुर्गियाँ कह कर बुलाती थी और उनको अपने शरीर पर चारों तरफ घूमने देती थी।

समुद्री जादूगरनी ने मत्स्यकन्या को देखते ही कहा — “मुझे मालूम है कि तुमको क्या चाहिये। यह तुम्हारी बहुत बड़ी बेवकूफी है। फिर भी एक रास्ता है पर वह रास्ता तुमको बहुत दुख देगा, मेरी सुन्दर राजकुमारी।

तुम अपनी मछली वाली पूँछ से छुटकारा पाना चाहती हो न और उसकी बजाय दो टाँगें चाहती हो जैसी कि आदमियों की होती हैं ताकि वह नौजवान राजकुमार तुमसे प्यार करने लगे और तुम उसकी तरह से अमर आत्मा पा सको। ”

कह कर वह जादूगरनी इतनी ज़ोर से हँसी कि वह मेंढक और साँप उसके शरीर पर से नीचे गिर पड़े और इधर उधर घूमने लगे।

जादूगरनी आगे बोली — “तुम बहुत ठीक समय से आयी हो क्योंकि कल सुबह सूरज निकलने के बाद अगला साल खत्म होने तक फिर मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर पाती।

मैं तुम्हारे लिये एक पेय तैयार करती हूँ जिसको ले कर तुम कल सुबह सवेरे सूरज निकलने से पहले ही धरती पर तैर जाना। और वहाँ जा कर समुद्र के किनारे बैठ कर उसे पी लेना।

कुछ ही देर में तुम्हारी पूँछ गायब हो जायेगी और वह आदमी लोग जिनको टाँगें कहते हैं वहाँ तक सिकुड़ जायेगी। इससे तुमको बहुत दर्द होगा। तुमको ऐसा लगेगा जैसे कोई तलवार तुहारे अन्दर घुस रही है पर बाद में तुम देखोगी कि तुम दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की हो।

तुम उसके बाद भी मछली की तरह से तैरने की शान से चल पाओगी और कोई भी तुम्हारी तरह से हल्के कदमों से नहीं नाच पायेगा। पर जब भी तुम कदम रखोगी तब तुमको ऐसा लगेगा जैसे तुम तेज़ चाकुओं पर चल रही हो और तुम्हारे खून निकल आयेगा।

अगर तुम यह सब सहने के लिये तैयार हो तो मैं तुम्हारी सहायता करने के लिये तैयार हूँ। ”

राजकुमारी राजकुमार और अमर आत्मा के बारे में सोचती हुई काँपती आवाज में बोली — “हाँ मैं तैयार हूँ। ”

जादूगरनी आगे बोली — “हाँ एक बात और। एक बार तुम आदमी बन गयीं तो फिर तुम कभी मत्स्यकन्या नहीं बन पाओगी। तुम पानी में नहीं आ पाओगी या अपनी बहिनों से नहीं मिल सकोगी या अपने पिता के महल में भी नहीं आ पाओगी।

और अगर तुम राजकुमार का दिल इस तरह नहीं जीत पायीं कि वह तुमको अपने पूरे दिल से प्यार करने के लिये तुम्हारे लिये अपने माता पिता को छोड़ दे। और पुजारी को अपना दाँया हाथ तुम्हारे हाथ में न देने दे ताकि तुम पति पत्नी बन जाओ तब तुमको उसकी अमर आत्मा भी नहीं मिलेगी।

शादी के बाद अगली पहली सुबह को जब वह किसी और से शादी करेगा तो तुम्हारा दिल टूट जायेगा और तुम फेन बन कर समुद्र की लहरों पर बहने लगोगी। ”

यह सुन कर छोटी मत्स्यकन्या पीली पड़ गयी और बोली — “मैं समझ गयी। ”

समुद्री जादूगरनी बोली — “पर इसके लिये तुम्हें मुझे कुछ देना पड़ेगा और इसके लिये मैं तुमसे कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं माँगूगी। समुद्र में जितने भी लोग रहते हैं उन सबमें तुम्हारी आवाज सबसे मीठी है।

और तुमको यह भी यकीन है कि तुम अपनी उस मीठी आवाज से राजकुमार का मन मोह लोगी। मैं तुमसे तुम्हारी यही आवाज माँगती हूँ।

जो तुम्हारे पास सबसे अच्छी चीज़ है मेरे उस पेय की कीमत वही है। मेरा अपना खून उस पेय से मिल जाना चाहिये ताकि वह पेय दोधारी तलवार की तरह तेज़ हो जाये।

छोटी मत्स्यकन्या बोली — “पर अगर तुम मेरी आवाज ले लोगी तो फिर मेरे पास क्या रह जायेगा?”

“तुम्हारी सुन्दर शक्ल, तुम्हारी सुन्दर चाल, तुम्हारी सुन्दर आँखें। मुझे यकीन है कि तुम इस सबसे किसी भी आदमी को मोह लोगी।

क्या हुआ? क्या तुम्हारी हिम्मत टूट गयी? निकालो अपनी ज़बान बाहर निकालो ताकि मैं उसे अपने पेय की कीमत की तरह से काट सकूँ। उसके बाद ही तुमको वह पेय मिलेगा। ”

छोटी मत्स्यकन्या बोली — “ऐसा ही होगा। ”

तब समुद्री जादूगरनी ने पेय बनाने के लिये अपना बरतन आग पर रखा। उसने कई साँपों की एक गाँठ बाँधी, और उनसे उस बरतन को साफ करते हुए बोली — “सफाई अच्छी चीज़ है। ”

फिर उसने अपनी छाती में कोई नुकीली चीज़ चुभा कर काला खून निकाला और उसकी बूँद उन साँपों की गाँठ पर डाल दी। उस खून की भाप से उस बरतन में कुछ ऐसी भयानक शक्लें बनी कि उनको देख कर डरे बिना कोई रह ही नहीं सकता था।

हर बार जब भी वह जादूगरनी उस बरतन में कुछ भी डालती और वह उबलता तो उसमें से ऐसी आवाज आती जैसे कोई मगर रो रहा हो। आखिर वह पेय बन गया। जब वह बन कर तैयार हो गया तो उसका रंग बिल्कुल साफ पानी जैसा था।

जादूगरनी ने वह पेय मत्स्यकन्या को देते हुए कहा — “यह लो। ” और यह कह कर उसने उसकी जबान काट ली। अब वह न बोल सकती थी और न ही गा सकती थी।

जादूगरनी फिर बोली — “अब जब तुम जंगल में से हो कर वापस जाओगी और अगर तुमको कोई जानवर वाला पौधा पकड़ ले तो तुम उसके ऊपर इस पेय की कुछ बूँदें डाल देना। इससे उसकी उँगलियों के हजारों टुकड़े हो जायेंगे।

पर उस छोटी मत्स्यकन्या को इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि जैसे ही उन्होंने उसके हाथों में चमकता हुआ पेय देखा जो उसके हाथों में एक चमकते हुए तारे की तरह चमक रहा था तो वे डर के मारे खुद ही पीछे को हट गये।

इसलिये वह जंगल, दलदल और भँवरों को जल्दी ही पार कर गयी। जब वह अपने पिता के महल में पहुँची तो उसने देखा कि उसके नाच के कमरे में सब मशालें बुझ चुकी थीं और सब सो गये थे।

पर अब वहाँ उसकी जाने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि एक तो अब वह गूँगी हो चुकी थी और दूसरे कल सुबह वह उनको हमेशा के लिये छोड़ कर जाने वाली थी। उसको लगा जैसे उसका दिल टूट जायेगा।

वह बागीचे में चली गयी वहाँ से अपनी हर बहिन के बागीचे से एक एक फूल तोड़ा, फिर उसने अपने हाथ को महल की तरफ करके हजारों बार चूमा और समुद्र के नीले पानी में ऊपर तैर गयी।

जब वह राजकुमार के महल के पास तक आयी तब तक सूरज नहीं निकला था। पर चाँद अभी भी अपनी पूरी चमक के साथ चमक रहा था। वह संगमरमर की सुन्दर सीढ़ियों के पास तक आयी।

छोटी मत्स्यकन्या ने वह पेय पी लिया। उसको पीते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कोई दोधारी तलवार उसके कोमल शरीर को चीरती हुई चली गयी। वह वहीं बेहोश हो गयी और मरी जैसी पड़ गयी।

जब सूरज निकला और समुद्र के ऊपर चमका तब उसको होश आया। उसको बहुत दर्द था। उसने अपने इधर उधर देखा तो सामने उस सुन्दर राजकुमार को खड़े पाया। उसकी कोयले जैसी काली आँखें उसी के ऊपर जमी हुई थीं। उसने अपनी आँखें झुका लीं।

तभी उसको लगा कि उसकी मछली वाली पूँछ तो गायब हो गयी है और दो छोटे छोटे पैरों के साथ उसकी दो टाँगें आ गयी हैं जैसी कि एक बहुत सुन्दर लड़की की होनी चाहिये। पर वह कपड़े नहीं पहने थी तो उसने अपने आपको अपने लम्बे घने बालों से ढक लिया।

राजकुमार ने उससे पूछा “तुम कौन हो और कहाँ से आयी हो?” मत्स्यकन्या ने उसको अपनी नीली आँखों से बड़ी कोमलता और दुख भरी दृष्टि से देखा पर वह बोल नहीं सकी।

जैसा कि उस जादूगरनी ने कहा था वह हर कदम जो रखती थी उसको ऐसा लगता था जैसे वह किसी तेज़ चाकू पर रख रही हो। पर वह उसको अपनी इच्छा से सहती रही।

वह राजकुमार के बराबर में इतनी हल्के से चलती रही जैसे वह पानी के बुलबुलों पर चल रही हो। इससे दूसरों को यही लगा कि वह कितनी शान से चल रही है।

जल्दी ही उसको सिल्क और मलमल के कपड़ों में सजा दिया गया और वह सारे महल में सबसे सुन्दर लड़की दिखायी देने लगी। पर वह तो गूँगी थी न, सो न तो वह बोल ही सकी और न गा ही सकी।

राजकुमार की सुन्दर दासियाँ सिल्क ओर सोने में सजी धजी आयीं और उन्होंने राजा रानी और राजकुमार के सामने गाया। एक ने और दूसरी दासियों से अच्छा गाया तो राजकुमार ने उसके लिये ताली बजायी और उसकी तरफ मुस्कुराकर देखा।

इससे छोटी मत्स्यकन्या को बहुत दुख हुआ। उसको मालूम था कि कभी पहले वह कितना मीठा गाती थी। उसने सोचा “काश राजकुमार यह जान पाता कि मैं पहले कितना मीठा गाती थी। उसके बाद उसके साथ रहने के लिये चाहे मैंने अपनी आवाज हमेशा के लिये दे दी होती। ”

उसके बाद दासियों ने संगीत की मीठी आवाज पर फिर कुछ परियों जैसे नाच दिखाये। यह देख कर छोटी मत्स्यकन्या ने अपनी सफेद बाँहें उठायीं और अपने अँगूठों पर खड़ी हो गयी। वह इतनी अच्छी तरह से फर्श पर फिसल रही थी कि अब तक किसी ने वैसा नाच नहीं नाचा था।

हर पल उसकी सुन्दरता और निखरती चली आ रही थी और उसकी सुन्दर आँखें लोगों के दिलों को ज़्यादा असर कर रही थीं बजाय दासियों के गीतों के।

उसके नाच ने सब पर जैसे जादू डाल दिया था, खास करके राजकुमार पर। राजकुमार तो उसको अपनी छोटा छोड़ा हुआ बच्चा[11] कह कर पुकारता था।

वह राजकुमार को खुश करने के लिये खुशी से फिर नाची। हालाँकि जब भी वह फर्श पर पैर रखती उसको लगता कि वह किसी तेज़ चाकू पर अपना पैर रख रही हो।

राजकुमार ने कहा कि वह हमेशा उसके साथ रहेगी। उसको राजकुमार के कमरे के दरवाजे पर एक मखमल के गद्दे पर सोने की इजाज़त भी मिल गयी।

उसने उसके लिये नौकर की एक पोशाक बनवा दी ताकि वह उसके साथ उसके घोड़े पर उसके साथ पीछे बैठ कर जा सके।

अब वे दोनों खुशबूदार जंगलों से हो कर साथ साथ घुड़सवारी करते जहाँ पेड़ों की हरी हरी डालियाँ उनके कन्धों को छूती रहतीं। चिड़ियें उनके ताज़ा पत्तों के बीच से चहचहाती रहतीं।

वह राजकुमार के साथ ऊँचे ऊँचे पहाड़ों की चोटियों पर जाती। हालाँकि उसके कोमल पैरों से खून निकलता और इससे उसके कदमों के निशान बन जाते फिर भी वह हँसती रहती और उसके पीछे चलती रहती जब तक वे अपने नीचे बादलों को नहीं देख लेते।

वे उड़ते हुए बादल उसको ऐसे लगते जैसे चिड़ियों के झुंड के झुंड कहीं दूर जगह जा रहे हों।

राजकुमार के महल में जब सब सो रहे होते वह जा कर संगमरमर की सीढ़ियों पर पानी में पैर लटका कर बैठ जाती। इससे उसके दर्द भरे पैरों को कुछ आराम मिलता। वह वहाँ बैठी बैठी समुद्र के नीचे रहने वालों के बारे में भी सोचती रहती।

एक बार रात को उसकी बहिनें बाँहों में बाँहें डाले दुख से गाती हुई पानी के ऊपर आयीं। जब वे ऊपर आयीं तो उसने उनको पुकारा तो उन्होंने भी उसको पहचान लिया। वे बोलीं कि उसने उनको कितना दुखी किया।

उसके बाद तो वे वहाँ रोज आने लगीं। एक दिन उसने दूर से अपनी दादी को भी देखा जो पिछले बहुत सालों में समुद्र के ऊपर ही नहीं आयी थी।

उसकी बहिनों ने उसकी तरफ हाथ फैलाये पर उसको वे इतने पास नहीं लगे जितने कि उसकी बहिनों को उसके हाथ उनके अपने पास लगे।

जैसे जैसे दिन गुजरते गये छोटी मत्स्यकन्या का प्यार राजकुमार के लिये और बढ़ता गया। उधर राजकुमार उसको ऐसे प्यार करता था जैसे वह किसी बच्ची को प्यार कर रहा हो। उसके दिमाग में यह कभी आया ही नहीं कि वह उसको अपनी पत्नी बना ले।

पर फिर भी जब तक वह उसको अपनी पत्नी नहीं बना लेता वह उसकी अमर आत्मा नहीं ले सकती थी। और अपनी शादी के बाद अगली सुबह राजकुमार जब दूसरी किसी से शादी कर लेगा तब वह समुद्री फेन में बदल जायेगी।

अब वह मत्स्यकन्या बोल तो सकती नहीं थी पर जब भी राजकुमार उसको प्यार से अपनी बाँहों लेता और उसका गोरा माथा चूमता तो उसकी आँखें राजकुमार से हमेशा पूछती रहतीं “क्या तुम मुझे सबसे ज़्यादा प्यार नहीं करते?”

राजकुमार कहता — “हाँ तुम मुझे बहुत प्यारी हो क्योंकि तुम्हारा दिल बहुत अच्छा है। और तुम भी मुझे बहुत प्यार करती हो। मेरे लिये तुम उस नौजवान लड़की की तरह हो जिसको मैंने एक बार देखा था पर फिर अब शायद कभी नहीं देखूँगा।

एक बार मैं एक जहाज़ पर था जो तूफान में फँस गया था। लहरों ने मुझे समुद्र के किनारे बने एक मन्दिर के पास ले जा कर पटक दिया था। वहाँ बहुत सारी लड़कियाँ पूजा कर रही थीं। उनमें से जो सबसे छोटी लड़की थी उसने मुझे किनारे पर देखा और मेरी जान बचायी।

मैंने उसको दो बार देखा। दुनिया में केवल वही है जिसको मैं प्यार कर सकता हूँ। पर क्योंकि तुम भी करीब करीब वैसी ही दिखायी देती हो इसलिये तुमने मेरे दिमाग से उसकी तस्वीर निकाल दी है।

वह लड़की तो उस मन्दिर की है और मेरी खुशकिस्मती ने उसकी जगह तुमको मेरे पास भेज दिया है। अब हम कभी अलग नहीं होंगे। ”

छोटी मत्स्यकन्या ने सोचा कि “क्योंकि इसको तो यह पता ही नहीं है कि मैंने इसकी जान बचायी है। मैंने ही इसको समुद्र के पानी के ऊपर ले जा कर जंगल में मन्दिर के पास लिटाया था।

फिर समुद्र के फेन के नीचे बैठ कर इसको तब तक देखती रही जब तक कि वे लड़कियाँ इसकी सहायता करने के लिये नहीं आ गयीं। इसलिये यह तो उसी लड़की को अपना बचाने वाला समझता है। मैंने तो उस लड़की को भी देखा है जिसको यह मुझसे ज़्यादा प्यार करता है। ”

और मत्स्यकन्या ने एक गहरी उसाँस भरी पर वह आँसू नहीं बहा सकी। “यह कहता है कि वह लड़की मन्दिर की है इसका मतलब यह हुआ कि वह अब दुनिया में कभी नहीं लौटेगी। ये दोनों अब कभी नहीं मिलेंगे जबकि मैं इसके साथ होऊँगी और इसको रोज देखूँगी।

मैं इसकी ठीक से देख भाल करूँगी, इसको प्यार करूँगी और इसके लिये अपनी जान भी दे दूँगी। ”

बहुत ही जल्दी जैसा कि कहा गया था राजकुमार की शादी हो जायेगी और पड़ोसी देश के राजा की सुन्दर राजकुमारी उसकी पत्नी बन जायेगी। क्योंकि वहाँ एक बहुत ही बढ़िया जहाज़ इसके लिये तैयार किया जा रहा था।

हालाँकि राजकुमार ने यह कह रखा था कि वह उस पड़ोसी राजा से केवल मिलने जा रहा था पर सचमुच में वह उस लड़की को शादी के लिये देखने जा रहा था।

उसके साथ बहुत सारे लोग जाने वाले थे। छोटी मत्स्यकन्या मुस्कुरायी और अपना सिर उसने ना में हिलाया। वह राजकुमार के विचारों को दूसरों के मुकाबले में ज़्यादा अच्छी तरह से जानती थी।

राजकुमार ने मत्स्यकन्या से कहा — “मुझे यात्र पर जाना है। मुझे इस सुन्दर राजकुमारी को देखना है क्योंकि यह मेरे माता पिता की इच्छा है। पर यह मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि वे मेरी इच्छा के बिना उसको मेरी दुलहिन बना कर नहीं लायेंगे।

मैं उसको प्यार नहीं कर सकता क्योंकि वह उस मन्दिर वाली लड़की की तरह से सुन्दर नहीं है जिससे तुम्हारी शक्ल मिलती है। अगर मुझे दुलहिन पसन्द करने के लिये ज़ोर दिया गया तो मैं तुमको अपनी दुलहिन चुनना ज़्यादा पसन्द करूँगा, ओ मेरी गूँगी छोड़ी हुई बच्ची। ”

यह कहते हुए उसने उसके लम्बे बालों से खेलते हुए उसका गुलाबी मुँह चूम लिया और अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। और मत्स्यकन्या को लगा कि उसको आदमी वाली खुशी और अमर आत्मा मिल रही है

राजकुमार उस जहाज़ के डैक पर बैठता हुआ आगे बोला जो उस राजा के राज्य जाने वाला था — “तुम समुद्र से तो नहीं डरती न मेरी गूँगी बच्ची?”

फिर उसने उसको तूफानी और शान्त समुद के बारे में, गहरे समुद्र में रहने वाली अजीब मछलियों के बारे में, डुबकी मारने वालों ने समुद्र में नीचे क्या देखा इस सबके बारे में बताया।

वह इस सबके बारे में सुन कर केवल मुस्कुरा दी क्योंकि समुद्र की तली के आश्चर्यों के बारे में उससे ज़्यादा अच्छी तरह से और कौन जान सकता था।

रात को चाँदनी में जब सिवाय मल्लाह के सब लोग डैक पर सो गये तो वह डैक पर बैठ गयी और समुद्र के साफ पानी में नीचे झाँकने लगी। उसको लगा कि वहाँ से वह अपने पिता के महल को देख सकती थी और उसमें बैठी अपनी दादी को जो चाँदी का ताज पहनती थी।

तभी उसकी बहिनें लहरों के ऊपर आयीं और उसकी तरफ अपने सफ़ेद दाँत कटकटाते हुए दुखी नज़रों से देखा। छोटी मत्स्यकन्या ने उनकी तरफ देख कर अपना हाथ हिलाया।

वह उनको बताना चाहती थी कि वह वहाँ कितनी खुश है पर तभी केबिन का नौकर आ गया और तभी उसकी बहिनें नीचे डुबकी लगा गयीं।

जब तक उस केबिन के नौकर ने समुद्र की तरफ देखा तो वहाँ उसको समुद के पानी के ऊपर केवल उसके फेन ही दिखायी दिये।

अगली सुबह वे उस राजा के शहर के बन्दरगाह में आ पहुँचे जिस राजा के घर उन्हें आना था। वहाँ चर्च में घंटियाँ बज रही थीं और उसकी ऊँची ऊँची मीनारों से बिगुल बज रहे थे। वे लोग जिन चट्टानों से हो कर आये थे उन चट्टानों के सामने बहुत सारे सिपाही लाइन लगा कर खड़े थे।

वहाँ हर दिन त्यौहार था, हर दिन नाच होता था और हर दिन मनोरंजन होता था।

पर राजकुमारी का कहीं अता पता नहीं था। लोगों का कहना था कि राजकुमारी किसी धार्मिक घर में बड़ी हुई थी जहाँ उसने शाही तौर तरीके सीखे थे। आखिर वह राजकुमारी वहाँ आ गयी।

छोटी मत्स्यकन्या राजकुमारी को केवल इसलिये देखने के लिये बहुत बैचैन थी कि वह देखना चाहती थी कि वह कितनी सुन्दर थी पर जब उसने राजकुमारी को देखा तो वह भी यह मानने पर मजबूर हो गयी कि हाँ वह राजकुमारी बहुत सुन्दर थी।

उसकी खाल बहुत ही मुलायम थी और उसकी लम्बी पलकों के नीचे उसकी नीली आँखें सच्चाई से चमक रही थीं।

राजकुमार उस राजकुमारी को दिखा कर मत्स्यकन्या से बोला — “यह तुम थीं जिसने मेरी जान बचायी थी जब मैं रेत पर मरे जैसा पड़ा था। ” कह कर उसने अपनी शरमीली दुलहिन को अपनी बाँहों में ले लिया।

फिर उसने छोटी मत्स्यकन्या से कहा — “ओह मैं कितना खुश हूँ। मेरी सब इच्छाएँ पूरी हो गयीं। तुम मेरी खुशियों पर खुश होगी क्योंकि मेरे लिये तुम्हारा प्रेम बहुत ज़्यादा और वफादार है। ”

छोटी मत्स्यकन्या ने राजकुमार के हाथ चूमे और उसको लगा कि उसका दिल तो पहले से ही टूट चुका है क्योंकि राजकुमार की शादी की अगली सुबह को तो वह मर ही जायेगी और फिर फेन में बदल जायेगी।

चर्च के सारे घंटे बज उठे। राजा के आदमी सारे शहर में राजकुमार की शादी की खबर फैलाने अपने अपने घोड़ों पर सवार होकर चले गये। खुशबूदार तेल चाँदी के कीमती लैम्पों और हर वेदी पर जल रहा था। पुजारी लोग धूप हिला रहे थे और दुलहा और दुलहिन एक दूसरे का हाथ पकड़े बिशप का आशीर्वाद ले रहे थे।

clip_image013छोटी मत्स्यकन्या ने सिल्क और सोना पहना हुआ था और दुलहिन की पोशाक की ट्रेन[12] पकड़ी हुई थी। उसके कानों में केवल उस मौके का संगीत ही गूँज रहा था। और उसकी आँखें उस समय केवल शादी की रस्म ही देख रही थीं।

वह उस समय केवल अपनी मौत के बारे में सोच रही थी जो उसे अगली सुबह आने वाली थी और उस सबके बारे में सोच रही थी जो उसने इस दुनिया में आ कर खो दिया था।

उसी शाम दुलहा और दुलहिन दोनों जहाज़ पर गये। तोपें छूट रही थीं और झंडे फहरा रहे थे। जहाज़ के बीच में एक जामुनी और सुनहरे रंग का एक खेमा लगा हुआ था। उसमें रात को दुलहिन के स्वागत के लिये शानदार काउच पड़े हुए थे।

जहाज़ के पाल में हवा भर चुकी थी। हवा अनुकूल थी और जहाज़ समुद्र के पानी पर बहा चला जा रहा था। जब थोड़ा अँधेरा हुआ तो बहुत सारे रंगीन लैम्प जल उठे। मल्लाह लोग डैक पर खुशी से नाचने लगे।

छोटी मत्स्यकन्या को उस समय अपना पहली बार पानी से बाहर निकलना याद आया जब वह पहली बार पानी से बाहर निकली थी और उसने पहली बार वैसा ही दृश्य देखा था।

उसने भी नाचना शुरू कर दिया। वह हवा में ऐसे कूद रही थी जैसे चिड़िया अपना शिकार पकड़ने के लिये कूदती है। वहाँ सब नाचने वालों ने उसके लिये तालियाँ बजायीं।

वह इतने शानदार तरीके से पहले कभी नहीं नाची थी। उसके कोमल पैर जमीन पर रखने से ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे उसने अपना पैर किसी तेज़ चाकू पर रख दिया हो पर उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी क्योंकि इससे ज़्यादा तेज़ चाकू तो उसके सीने में पहले ही घुस चुका था।

उसको मालूम था कि यह शाम उसकी आखिरी शाम थी जब वह अपने उस राजकुमार को देख रही थी जिसके लिये उसने अपनी बहिनें छोड़ीं, अपना घर छोड़ा, अपनी सबसे मीठी आवाज छोड़ी और चुपचाप कितना दर्द सहा। और जबकि उस राजकुमार को तो यह सब मालूम भी नहीं था।

यह उसकी आखिरी शाम थी जब वह उसके साथ उसी हवा में साँस ले रही थी या उसके साथ तारों भरी रात या गहरा समुद्र देख रही थी।

एक न खत्म होने वाली रात उसका इन्तजार कर रही थी जिसमें न वह कुछ सोच रही होगी और न ही कोई सपना देख रही होगी। उसकी कोई आत्मा नहीं थी और न ही वह कोई आत्मा अब ले पायेगी।

बस अब जहाज़ पर तो आधी रात के बाद तक केवल खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी और वह अपने दिल में मौत के बारे में सोचती रही और उन नाचने वालों के साथ नाचती रही।

राजकुमार अपनी सुन्दर पत्नी को देख रहा था जबकि वह उसके काले बालों के साथ खेल रही थी। फिर वह उसके साथ खेमे में बैठने के लिये चला गया।

उसके बाद जहाज़ पर सब कुछ रुक गया और शान्त हो गया। केवल जहाज़ पर काम करने वाले ही जागे रहे और इधर उधर देखते रहे।

छोटी मत्स्यकन्या ने अपनी सफेद बाँहें जहाज़ के किनारे की दीवार से नीचे लटका दीं और पूर्व की तरफ सूरज की पहली किरण निकलने की तरफ देखा क्योंकि यही पहली किरण उसकी मौत बन कर आने वाली थी।

तभी उसने अपनी बहिनों को पानी में से बाहर निकलते देखा। वे भी उसी की तरह पीली पड़ी हुई थीं पर उनके लम्बे काले बाल अब हवा में नहीं हिल रहे थे क्योंकि उनको काट दिया गया था।

उन्होंने अपनी छोटी बहिन को बताया कि उन्होंने अपने बाल उस जादूगरनी को दे दिये थे ताकि वे उसके लिये उससे सहायता ले सकें। ताकि वह आज की रात मर न सके।

उन्होंने बताया कि उसने उनको एक चाकू दिया, “देखो वह चाकू यह रहा। और देखो यह चाकू तेज़ भी बहुत है। सूरज निकलने से पहले पहले तुम राजकुमार के दिल में कूद जाओ।

जब उसका गरम खून तुम्हारे पैरों पर पड़ेगा तो वे फिर से एक साथ बढ़ कर मछली की पूँछ में बदल जायेंगे और तुम एक बार फिर से मत्स्यकन्या में बदल जाओगी।

और तुम एक बार फिर से मरने से और नमकीन समुद्री फेन बनने से पहले हमारे साथ 300 साल तक रहने के लिये हमारे पास आ जाओगी। जल्दी करो। या तो तुम या फिर वह, तुम दोनों में से एक को सूरज निकलने से पहले मरना है।

हमारी दादी इस बात से बहुत दुखी है कि तुमको मरना पड़ रहा है। उसके सफ़ेद बाल इस दुख से गिर रहे हैं जैसे हमारे बाल उस जादूगरनी ने अपनी कैंची से काट लिये।

तुम जल्दी से जाओ और राजकुमार को मार कर आओ। जल्दी करो, क्या तुमको आसमान में लाल धारी दिखायी नहीं दे रही? कुछ मिनटों में ही सूरज निकल आयेगा और फिर तुमको मरना ही पड़ेगा। ”

कह कर उन्होंने उसको वह चाकू दिया और फिर दुखी हो कर एक गहरी साँस ले कर पानी में नीचे चली गयीं।

चाकू ले कर छोटी मत्स्यकन्या ने राजकुमार के खेमे का लाल परदा खींचा तो देखा कि वह सुन्दर राजकुमारी तो राजकुमार के सीने पर अपना सिर रख कर सो रही थी। वह झुकी और झुक कर उसने राजकुमार की भौंहों को चूमा।

फिर उसने आसमान की तरफ देखा जहाँ गुलाबी सुबह चमकीली और और ज़्यादा चमकीली होती जा रही थी। फिर उसने उस तेज़ चाकू की तरफ देखा। और एक बार फिर राजकुमार की तरफ देखा जो सोते में भी अपनी पत्नी का नाम ले रहा था। ”

वह सोच रही थी, चाकू उसके हाथ में काँप रहा था कि कुछ सोच कर उसने वह चाकू दूर समुद्र के पानी में फेंक दिया। जहाँ वह जा कर गिरा वहाँ का पानी लाल हो गया। उसके गिरने से पैदा हुई बूँदें ऐसी लग रही थीं जैसे वे खून की बूँदें हों।

उसने राजकुमार की तरफ एक बार और देखा और जहाज़ से यह सोचते हुए समुद्र में कूद पड़ी कि वह अब समुद्री फेन में बदल रही है।

सूरज लहरों के ऊपर उठा और उसकी गरम किरणें छोटी मत्स्यकन्या के ठंडे फेन के ऊपर पड़ीं पर उसको यह लगा ही नहीं कि वह मर रही थी। उसने सूरज की तरफ देखा और देखे अपने चारों तरफ तैरते हजारों पारदर्शक लोग। ”

वह उनके उस पार आते जाते जहाज़ों के सफेद पाल और आसमान में उड़ते लाल बादल देख सकती थी। उनकी आवाज बहुत मीठी थी पर वह इस दुनिया के कानों के सुनने के लिये बहुत दैवीय थी जैसे वे खुद भी इस दुनिया की आँखों से नहीं देखे जा सकते थे।

छोटी मत्स्यकन्या ने देखा कि उसका अपना शरीर भी उनके जैसा ही था और वह फेन में से और ऊपर उठती जा रही थी।

वह बोली “मैं कहाँ हूँ। ” उसको अपनी ही आवाज वैसी ही दैवीय लगी जैसी कि उसके साथ वालों की थी। उस आवाज को दुनिया का कोई भी आदमी नकल नहीं कर सकता था।

जो उसके पास थीं उनमें से एक बोली — “हवा की बेटियों में किसी भी मत्स्यकन्या की अमर आत्मा नहीं हो सकती जब तक कि वह किसी आदमी का प्यार न जीत ले। दूसरे की ताकत पर ही उसके अमर होने की किस्मत निर्भर है।

हालाँकि हवा की बेटियों की अमर आत्मा नहीं होती फिर भी अच्छे काम करके वे अपने लिये अमर आत्मा पा सकती हैं। हम लोग गरम देशों में जाते हैं और वहाँ की नमकीन हवा को ठंडी बनाते हैं ताकि वहाँ के लोग उस नमकीन हवा से पैदा हुए कीड़ों से मरें नहीं।

हम उनको तन्दुरुस्त करने और फिर उनको तन्दुरुस्त बनाये रखने के लिये फूलों की खुशबू ले जाते हैं।

जब जो कुछ भी हमारे वस में अच्छा होता है वह हम 300 साल तक करते रहते हैं तब हमको भी अमर आत्मा मिल जाती है और फिर हम भी आदमियों की सेवा कर सकते हैं।

तुम बेचारी मत्स्यकन्या ने भी वह सब करने की अपने पूरे दिल से कोशिश की जो हम कर रहे हैं। तुमने भी बहुत कुछ सह कर अच्छे काम करके अपने आपको आत्माओं की दुनिया तक ऊपर उठा लिया। अब इसी तरह से 300 साल तक अच्छे काम करके तुम भी अमर आत्मा को पा लोगी। ”

छोटी मत्स्यकन्या ने अपनी आँखें सूरज की तरफ घुमायीं और उसको देख कर पहली बार अपनी आँखों में आँसू महसूस किये।

उस जहाज़ पर जहाँ वह मत्स्यकन्या राजकुमार को छोड़ आयी थी वहाँ खूब शोर हो रहा था। उसने देखा कि राजकुमार और उसकी पत्नी उसको ढूँढ रहे थे।

दुखी हो कर उन्होंने समुद्र के मोती जैसे फेन की तरफ देखा जैसे कि वे जानते हों कि वह समुद्र की लहरों में कूद पड़ी थी।

छिपे छिपे रह कर उसने राजकुमार की दुलहिन को उसके माथे पर चूमा, राजकुमार की हवा की और फिर हवा के दूसरे बच्चों के साथ एक गुलाबी बादल की तरफ चली गयी जो आसमान में तैर रहा था।

एक बोली — “इस तरह से 300 साल बाद हम लोग स्वर्ग में तैरेंगे। ”

दूसरी बोली — “और यह भी हो सकता है कि हम वहाँ इससे पहले ही पहुँच जायें। हम छिप कर उन आदमियों के मकानों में घुस जायेंगे जहाँ बच्चे होंगे और हर दिन जब भी हम कोई अच्छा बच्चा पायेंगे जो अपने माता पिता की खुशी होगा और उनके प्यार का अधिकारी होगा तो हमारा यह समय कम हो जायेगा।

जब हम उसके कमरे में उड़ेंगे तो बच्चे को तो पता नहीं चलेगा पर हम उसके अच्छे व्यवहार पर खुश होंगे और इस तरह से हमारे 300 सालों में से एक साल कम हो जायेगा।

पर जब हम कोई शैतान और बुरा बच्चा देखेंगे तो हम आँसू बहायेंगे और हमारे हर एक आँसू के लिये हमारे उस समय में एक दिन बढ़ जायेगा। ”

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देश विदेश की लोक कथाओं की सीरीज़ में प्रकाशित पुस्तकें —

36 पुस्तकें www.Scribd.com/Sushma_gupta_1 पर उपलब्ध हैं।

नीचे लिखी हुई पुस्तकें हिन्दी ब्रेल में संसार भर में उन सबको निःशुल्क उपलब्ध है जो हिन्दी ब्रेल पढ़ सकते हैं।

Write to :- E-Mail : hindifolktales@gmail.com

1 नाइजीरिया की लोक कथाएँ–1

2 नाइजीरिया की लोक कथाएँ–2

3 इथियोपिया की लोक कथाएँ–1

4 रैवन की लोक कथाएँ–1

नीचे लिखी हुई पुस्तकें ई–मीडियम पर सोसायटी औफ फौकलोर, लन्दन, यू के, के पुस्तकालय में उपलब्ध हैं।

Write to :- E-Mail : thefolkloresociety@gmail.com

1 ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ — 10 लोक कथाएँ — सामान्य छापा, मोटा छापा दोनों में उपलब्ध

2 इथियोपिया की लोक कथाएँ–1 — 45 लोक कथाएँ — सामान्य छापा, मोटा छापा दोनों में उपलब्ध

नीचे लिखी हुई पुस्तकें हार्ड कापी में बाजार में उपलब्ध हैं।

To obtain them write to :- E-Mail drsapnag@yahoo.com

1 रैवन की लोक कथाएँ–1 — इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस

2 इथियोपिया की लोक कथाएँ–1 — प्रभात प्रकाशन

3 इथियोपिया की लोक कथाएँ–2 — प्रभात प्रकाशन

4 शीबा की रानी मकेडा और राजा सोलोमन — प्रभात प्रकाशन

5 राजा सोलोमन — प्रभात प्रकाशन

6 बंगाल की लोक कथाएँ — नेशनल बुक ट्रस्ट

नीचे लिखी पुस्तकें रचनाकार डाट आर्ग पर मुफ्त उपलब्ध हैं जो टैक्स्ट टू स्पीच टैकनोलोजी के द्वारा दृष्टिबाधित लोगों द्वारा भी पढ़ी जा सकती हैं।

1 इथियोपिया की लोक कथाएँ–1

http://www.rachanakar.org/2017/08/1-27.html

2 इथियोपिया की लोक कथाएँ–2

http://www.rachanakar.org/2017/08/2-1.html

3 रैवन की लोक कथाएँ–1

http://www.rachanakar.org/2017/09/1-1.html

4 रैवन की लोक कथाएँ–2

http://www.rachanakar.org/2017/09/2-1.html

5 रैवन की लोक कथाएँ–3

http://www.rachanakar.org/2017/09/3-1-1.html

6 इटली की लोक कथाएँ–1

http://www.rachanakar.org/2017/09/1-1_30.html

7 इटली की लोक कथाएँ–2

http://www.rachanakar.org/2017/10/2-1.html

8 इटली की लोक कथाएँ–3

http://www.rachanakar.org/2017/10/3-1.html

9 इटली की लोक कथाएँ–4

http://www.rachanakar.org/2017/10/4-1.html

10 इटली की लोक कथाएँ–5

http://www.rachanakar.org/2017/10/5-1-italy-lokkatha-5-seb-wali-ladki.html

11 इटली की लोक कथाएँ–6

http://www.rachanakar.org/2017/11/6-1-italy-ki-lokkatha-billiyan.html

12 इटली की लोक कथाएँ–7

http://www.rachanakar.org/2017/11/7-1-italy-ki-lokkatha-kaitherine.html

13 इटली की लोक कथाएँ–8

http://www.rachanakar.org/2017/12/8-1-italy-ki-lokkatha-patthar-se-roti.html

14 इटली की लोक कथाएँ–9

http://www.rachanakar.org/2017/12/9-1-italy-ki-lok-katha-do-bahine.html

15 इटली की लोक कथाएँ–10

http://www.rachanakar.org/2017/12/10-1-italy-ki-lok-katha-teen-santre.html

16 ज़ंज़ीबार की लोक कथाएँ

http://www.rachanakar.org/2018/05/blog-post_54.html

17 चालाक ईकटोमी

http://www.rachanakar.org/2018/05/blog-post_88.html

नीचे लिखी पुस्तकें जुगरनौट डाट इन पर उपलब्ध हैं

https://www.juggernaut.in/authors/2a174f5d78c04264af63d44ed9735596

1 सोने की लीद करने वाला घोड़ा और अन्य अफ्रीकी लोक कथाएँ

2 असन्तुष्ट लड़की और अन्य अमेरिकी लोक कथाएँ

3 रैवन आग कैसे लेकर आया और अन्य अमेरिकी लोक कथाएँ

4 रैवन ने शादी की और अन्य अमेरिकी लोक कथाएँ

5 कौआ दिन लेकर आया और अन्य अमेरिकी लोक कथाएँ

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Updated on May 27, 2018


लेखिका के बारे में

clip_image016सुषमा गुप्ता का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में सन् 1943 में हुआ था। इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से समाज शास्त्र् और अर्थ शास्त्र् में ऐम ए किया और फिर मेरठ विश्वविद्यालय से बी ऐड किया। 1976 में ये नाइजीरिया चली गयीं। वहाँ इन्होंने यूनिवर्सिटी औफ़ इबादान से लाइबे्ररी साइन्स में ऐम ऐल ऐस किया और एक थियोलोजीकल कौलिज में 10 वर्षों तक लाइब्रेरियन का कार्य किया।

वहाँ से फिर ये इथियोपिया चली गयीं और वहाँ एडिस अबाबा यूनिवर्सिटी के इन्स्टीट्यूट औफ़ इथियोपियन स्टडीज़ की लाइब्रेरी में 3 साल कार्य किया। तत्पश्चात इनको दक्षिणी अफ्रीका के एक देश, लिसोठो के विश्वविद्यालय में इन्स्टीट्यूट औफ़ सदर्न अफ्रीकन स्टडीज़ में 1 साल कार्य करने का अवसर मिला। वहाँ से 1993 में ये यू ऐस ए आ गयीं जहाँ इन्होंने फिर से मास्टर औफ़ लाइब्रेरी एँड इनफौर्मेशन साइन्स किया। फिर 4 साल ओटोमोटिव इन्डस्ट्री एक्शन ग्रुप के पुस्तकालय में कार्य किया।

1998 में इन्होंने सेवा निवृत्ति ले ली और अपनी एक वेब साइट बनायी – www.sushmajee.com। तब से ये उसी वेब साइट पर काम कर रहीं हैं। उस वेब साइट में हिन्दू धर्म के साथ साथ बच्चों के लिये भी काफी सामग्री है।

भिन्न भि्ान्न देशों में रहने से इनको अपने कार्यकाल में वहाँ की बहुत सारी लोक कथाओं को जानने का अवसर मिला – कुछ पढ़ने से, कुछ लोगों से सुनने से और कुछ ऐसे साधनों से जो केवल इन्हीं को उपलब्ध थे। उन सबको देख कर इनको ऐसा लगा कि ये लोक कथाएँ हिन्दी जानने वाले बच्चों और हिन्दी में रिसर्च करने वालों को तो कभी उपलब्ध ही नहीं हो पायेंगी – हिन्दी की तो बात ही अलग है अंग्रेजी में भी नहीं मिल पायेंगीं।

इसलिये इन्होंने न्यूनतम हिन्दी पढ़ने वालों को ध्यान में रखते हुए उन लोक कथाओं को हिन्दी में लिखना पा्ररम्भ किया। इन लोक कथाओं में अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमेरिका के देशों की लोक कथाओं पर अधिक ध्यान दिया गया है पर उत्तरी अमेरिका और यूरोप के देशों की भी कुछ लोक कथाएँ सम्मिलित कर ली गयी हैं।

अभी तक 1200 से अधिक लोक कथाएँ हिन्दी में लिखी जा चुकी है। इनको “देश विदेश की लोक कथाएँ” क्रम में प्रकाशित करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि इस प्रकाशन के माध्यम से हम इन लोक कथाओं को जन जन तक पहुँचा सकेंगे।

विंडसर, कैनेडा

मई 2018


[1] The Little Mermaid – a folktale from Denmark, Europe, by Hans Christian Andersen.

Adapted from the Web Site : http://www.eastoftheweb.com/short-stories/UBooks/LitMer.shtml

This story seems less story and more description. It was first written in 1836 and first published by CA Reitzel in Copenhagen on 7 April 1837 in Fairy Tales Told for Children. First Collection. Third Booklet. 1837.

[2] Cornflower – a kind of flower which is bright blue in color – see its picture above.

[3] The Sea King or Mer-King

[4] Amber is the fossilized resin from ancient forests. Amber is not produced from tree sap, but rather from plant resin.

[5] Translated for the word “Oyesters” – see its picture above.

[6] Translated for the word “Sulphur”

[7] Translated for the word “Mermaid”.

[8] A kind of tree whose branches always grow downwards – see its picture above.

[9] Translated for the word “Reed” – see its picture above.

[10] Translated for the word “Witch” or “Sorcerer”.

[11] Translated for the word “Foundling” – foundling means an abandoned child

[12] Train is the part of a bride’s attire which is very long and somebody has to hold it while she is walking forward to save it going astray – see its picture above.

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3841,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2785,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1919,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: लोककथा // 8 छोटी मत्स्यकन्या // नौर्स देशों की लोक कथाएँ–1 // सुषमा गुप्ता
लोककथा // 8 छोटी मत्स्यकन्या // नौर्स देशों की लोक कथाएँ–1 // सुषमा गुप्ता
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