सोमवार, 28 नवंबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 10 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : मेरी बेटी

 

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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी


मेरी बेटी

मेरी बेटी,

मैं तुझसे क्या कहूँ...? किस तरह तुझे समझाऊं...? तू तो मेरी कोई भी बात मानने को तैयार ही नहीं होती है. मेरी हर बात का तो जवाब होता है तेरे पास.

तू अभी छोटी है मेरी बच्ची. तुझे कैसे बताऊँ कि मैं क्यों तेरे लिए इतनी चिन्ता करती हूँ. तुझे कैसे बताऊँ कि अब तू बड़ी हो रही है. मुझे डर लगता है. तू जिस तरह लड़कों से बिन्दास बात करती है किसी दिन कुछ हो गया तो मैं तो मर ही जाऊँगी रे...!

तुझे पता है तू जब नहीं थी तब हम बच्चे के लिए कितना तरसते थे. ऊपरवाले से बहुत मनाया तब जाके तू पैदा हुई थी. बड़े अरमानों से तुझे पाला है. ये बात अलग है कि तेरे बाद तेरा एक भाई भी हुआ लेकिन हमारे लिए तो तू ही हमारा पहला बच्चा है. हमने तुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी. फिर भी न जाने क्या कमी रह गई मेरी परवरिश में कि तू मुझसे ही इतनी चिढ़ी रहती है.

क्या करूँ रे...? मैं माँ हूँ ना...! एक औरत हूँ इसलिए डरती हूँ. तेरे लिए फ़िक्र करती हूँ ताकि तेरी जिन्दगी में कोई ऊँच-नीच न हो जाए. इसीलिए तेरे साथ तुझे ट्यूशन छोड़ने जाती हूँ और वापस लेने भी आती हूँ. मगर तुझे वो भी पसन्द नहीं है. तू कहती है तू बड़ी हो गई है लेकिन तेरी लापरवाहियाँ मुझे हैरान करती हैं.

तू घर में गाना तेज आवाज में सुनती है. जब देखो नाचती रहती है. कोई बात नहीं मानती. पढ़ने का मन तो कभी तेरा होता नहीं है. सिर्फ स्कूल और ट्यूशन से ही अगर पढ़ाई हो जाती है तो फिर तेरे नम्बर इतने कम क्यूँ आते हैं...? लोगों के सामने कहने में भी शर्म आती है. तुझे ये सब समझ में नहीं आएगा बेटी. तू तो उल्टा टीचर को दोष देने लगती है कि “मैंने तो सब सही-सही लिखा था उस टीचर का दिमाग खराब था जो उसने मुझे इतने कम नम्बर दिए.” तू ही बता क्या वो टीचर तेरी दुश्मन है...? या बाकी बच्चों की रिश्तेदार है जिनके अच्छे नम्बर आए हैं...?

मेरी बेटी...! तू कब समझेगी अपनी माँ की तकलीफ...? तेरा बाप तो तुझे कुछ कहता नहीं. मैंने सोचा चलो मैं ही तुझे सही बातें सिखाती हूँ. तेरे पापा तो दिन भर घर से बाहर रहते हैं. उन्हें तेरी हरकतों का तो पता भी नहीं है. फिर वो कहेंगे भी क्या...? तूने ही तो उन्हें बाप बनने का संजोग दिया. तू उन्हें बड़ी प्यारी जो है. लेकिन तू ये मत भूल कि मैंने तुझे अपने पेट में रखकर पाला है. मैं तेरी दुश्मन नहीं हूँ.

मैं तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ. तू पता नहीं क्या मोबाइल पे मैसेज भेजती रहती है. तुझे क्या लगता है मुझे कुछ पता नहीं है...? मुझे सब पता है. बस अपनी बेटी की गलतियों पे पर्दा डालती रहती हूँ. और मारूँ भी तो कितना...? मार खा-खा के भी तू कुछ नहीं समझती. अब तो मैंने तुझे मारना भी छोड़ दिया है. अब तो समझ ले मेरी बात...!

मैं तुझसे और कुछ नहीं चाहती. बस तू अपनी पढ़ाई ठीक से कर. ज्यादा नहीं मगर अच्छे नम्बरों से पास हो. बस इतना ही चाहती हूँ. मैं तो पढ़ न सकी. तू तो पढ़ ले. क्या तू भी मेरी ही तरह रहना चाहती है. माँ-बाप चाहे जैसे भी हों अपने बच्चों को हमेशा अच्छा ही बनाने की कोशिश करते हैं. पता नहीं क्यूँ तुझे इतनी सी बात समझ में नहीं आती...?

तू जहाँ भी जाती है कोई न कोई लड़का तेरा दोस्त बन जाता है. तू क्यूँ नहीं समझती...? मुझे डर लगता है रे...! तू इतनी छोटी है कि तुझसे खुलके कहने में भी शर्म आती है. तू खुद से समझ ले मेरी बच्ची...! मेरी परेशानी बस इतनी सी है.

तू कहती है स्कूल में सभी दोस्त बनाते हैं. तू भी बना. मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है. लेकिन तुझे तेरे दोस्तों के अलावा और कुछ दिखता ही नहीं है. मुझे बस इस बात की तकलीफ है. तू सरफिरी सी होती जा रही है. कोई बात नहीं मानती. दूसरों से अपनी बात कहती है. मैं तेरी माँ हूँ मगर तू मुझसे कुछ नहीं कहती. किसी लड़की के लिए उसकी माँ उसकी पहली दोस्त होती है. बाकी सब बाद में आते हैं. मगर तू मुझे सबसे बाद में रखती है. मेरे साथ तो मुझे लगता है तेरा दम घुटता है. तुझे अन्दाजा भी है ये सोचके मुझे कैसा लगता होगा...? मेरी बेटी...! मेरी बेटी होके भी तू मेरी बेटी नहीं है. मुझसे ही दूर भागती है तू. तेज आवाज में बात करती है. जब देखो भागती रहती है. घर में रहेगी तो हमेशा सोती रहेगी. या टीवी देखेगी. मगर कोई ढंग का काम नहीं करेगी. बस मेरा खून जलाती रहती है.

तू मेरे गहनों को देखती है. तुझे पता है ये सब मैं तेरे लिए इकठ्ठा कर रही हूँ. जब तेरी शादी होगी तो ये सब तेरा हो जाएगा. हम गरीब लोग हैं. एक साथ इतना सोना नहीं खरीद सकते. इसलिए थोड़ा-थोड़ा करके तेरे लिए...अपनी बेटी के लिए जुटा रही हूँ. एक तू है कि मुझे कुछ समझती ही नहीं है.

मुझे इस बात का भी अफ़सोस नहीं है. बस तू खुद को समझ कि तू एक लड़की है और एक लड़की की कुछ हदें होती हैं. हम हिन्दुस्तान में हैं. हम गरीब लोग हैं. जिस दिन किसी ने तेरे ऊपर उँगली उठा दी. तेरी माँ तो जीते जी मर जायेगी. मगर मेरी बेटी तू ये नहीं समझेगी. जब तू माँ बनेगी तब तुझे मेरी ये सारी बातें सही लगेंगी.

तू मेरी बेटी है. तू मेरा हिस्सा है. तुझे चोट लगती है तो मुझे भी दर्द होता है. अब भी वक्त है मेरी बेटी...! संभल जा...! तू कुछ भी कर. बस मेरी दो बातों का खयाल रख. एक तो ये कि तू पढ़ाई कर. स्कूल में अच्छे नम्बर ला. और दूसरा ये कि तू कोई भी काम कर तो बस इस बात का खयाल रख कि कोई तुझपे ऊँगली न उठा पाए.

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कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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