सोमवार, 21 नवंबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें... दिल की बात : किश्त 9 मैं किससे कहूं...? क्या कहूँ...?



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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी



मैं किससे कहूँ...? क्या कहूँ...?

सब कहते थे, “मैं बड़ी सुन्दर हूँ. मुझे तो कोई राजकुमार मिलना चाहिए.” माँ-बाप ने बोझ समझकर जल्दी से अपना पीछा छुड़ाया. मेरी शादी हो गई तुमसे.

शादी की पहली ही रात मुझे पता चला कि, “मेरा राजकुमार शराब पीता है.” हमारे समाज में शराब को बहुत गन्दी नजर से देखते हैं. उसी समाज में पली-बढ़ी मैं पहले ही दिन से तुम्हें सुधारने की फ़िक्र में लग गई. दिन भर तो सब सही रहता था लेकिन शाम होते ही वही डर हावी होने लगता था कि, “कहीं आज तुम फिर शराब पी के आए तो...?”

आदमी शराब पीये इसमें कोई बुराई नहीं लेकिन जब यही बात लोगों को पता चल जाती है तो बुरी बन जाती है. “और फिर मैं भी तो एक नई-नई दुल्हन थी. भला कौन चाहेगा कि उसका पति शराबी हो और लोग उसे ताने मारें...?”

मैं डरती थी, “कहीं ये शराब किसी दिन मुसीबत न बन जाए...?” मुझे क्या पता था कि, “यही शराब तुम्हें मुझसे दूर कर देगी.” आज तुम नहीं हो तो लगता है कि, “भले ही तुम शराब पीते थे मगर मेरे पास तो रहते थे. आज सोचती हूँ, “मैं किससे कहूँ...? क्या कहूँ...? शराब पीना गलत बात है. क्या फरक पड़ता है इस बात से...?”
लेकिन इसी शराब ने तुम्हें मुझसे दूर किया. अब जब जी घबराता है तो सोचती हूँ, “कहाँ जाऊं...? कोई तो नहीं है जिससे अपना दुखड़ा सुनाऊं.” हमारे समाज में नियम भी तो कितने अच्छे-अच्छे बने हैं ना. पहले लड़की की शादी जल्दी कर देते हैं. फिर अगर लड़की कम उम्र में मेरी तरह विधवा हो जाए तो उससे जिन्दगी छीन ली जाती है. उसे खुश रहने का कोई अधिकार नहीं रहता. उसे तो बस एक लाचार की जिन्दगी जीना चाहिए. दूसरों के टुकड़ों पे पलना चाहिए. मैं पूछती हूँ “इसमें मेरी क्या गलती थी कि तुम शराब पीते थे.” तुम तो चले गए एक छोटी सी बच्ची मेरे पास छोड़कर. अब वो बच्ची बड़ी हो रही है. सवाल करती है, “मेरे पापा कब आएँगे...? मेरे पापा कहाँ गए हैं...?” तुम्हें क्या बताऊँ...! कलेजा मुँह को आता है. अपनी बेटी को गले से लगाके रोती हूँ. और अगर गलती से मेरे रोने की आवाज घर में किसी को सुनाई दे जाए तो लोग बिन बुलाए मेहमान की तरह उपदेश देने आ जाते हैं. और सब सिर्फ तुम्हारी याद दिलाते हैं और मुँह से कहते हैं, “अब क्या करोगी बेटी, जाने वाले कभी वापस नहीं आते.” जी तो करता है एक-एक का मुँह नोच लूँ. मुझे भी पता है जाने वाले कभी वापस नहीं आते. इसी बात का तो रोना है. सिर्फ हमदर्दी जताने के लिए लोग आते हैं. और सच कहूँ तो सिर्फ तकलीफ देके जाते हैं.

जिन्हें मेरी सच में फ़िक्र है वो मुझे सलाह देते हैं दूसरी शादी करने के लिए. जब मैं मना करती हूँ तो लोग मुझे मेरे और तुम्हारी बेटी के भविष्य की याद दिलाते हैं. कहते हैं “सास-ससुर आज हैं. कल नहीं रहेंगे. बेटी आज छोटी है. कल को बड़ी होगी.” और तुम तो जानते ही हो, इस दुनिया में बेटी की शादी मतलब “बहुत बड़ा काम.” और फिर मैं ठहरी एक औरत. क्या करुँगी...? कैसे करुँगी...?” तुम्हीं बताओ मुझे क्या करना चाहिए...? बोलो ना. कुछ तो बोलो...! दो साल के हमारे साथ में हमने कितनी बातें की थीं. आज तुम चुप क्यूँ हो...? जब भी तुमसे बात करने का मन होता है, तुम्हारी तस्वीर... हाँ, तुम्हारी वही तस्वीर है मेरे हाथ में जो मुझे सबसे ज्यादा पसन्द है. मगर तुम तो कुछ बोलते ही नहीं.

आज जब बेटी के लिए कोई खिलौना खुद खरीदती हूँ तो कोई खुशी नहीं होती. उल्टा मन दुखी हो जाता है. ये तो तुम्हारा काम था. अब मुझे करना पड़ता है. तुम तो चले गए. मगर तुम अपनी सारी जिम्मेदारियाँ मुझे दे गए. तुम्हें याद है तुम कहते थे, “इतना काम मत किया करो. खुद को देखो. वैसे ही हड्डी हो.”

तुम्हें पता है अब तो मैं नौकरी भी करने लगी हूँ. शुरू-शुरू में लगा था कि सास-ससुर हैं. जेठ-जेठानी भी हैं. इस घर की सबसे छोटी बहु को घर से बाहर निकलकर नौकरी करने की जरुरत नहीं पड़ेगी. क्यूंकि इस घर में कोई औरत नौकरी नहीं करती. लेकिन ये नियम भी सिर्फ कहने को था. तुम्हारे जाने के कुछ ही दिनों बाद मैं पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो गई. तुम्हारी बेटी खिलौनों के लिए दूसरों का मुँह ताकती थी. मुझसे ये सब देखा नहीं गया. और फिर इस तरह कब तक चलता...? जब कोई सहारा दिखे तब तो कोई आराम से बैठे ना.

मैं अब एक स्कूल में पढ़ाने जाती हूँ. जरुरत भर के पैसे मिल जाते हैं. कम से कम किसी के आगे हाथ तो फैलाना नहीं पड़ता है. तुम इस बात से बिल्कुल परेशान मत होना कि “तुम नहीं हो तो तुम्हारी बेटी का खयाल कौन रखेगा...?” अभी उसकी माँ जिन्दा है.
बस...! तुम्हारी याद बहुत आती है.



कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com

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