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लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड 11

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भूली बिसरी लोक कथाएँ सीरीज़–24


किस्सये चार दरवेश

अमीर खुसरो – 1300–1325


अंग्रेजी अनुवाद -

डन्कन फोर्ब्ज़ – 1857


हिन्दी अनुवाद -

सुषमा गुप्ता

अक्टूबर 2019

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खंड 11


6 आजाद बख्त की कहानी–दूसरा भाग[1]

जब उस नौजवान ने मेरी पूरी कहानी सुनी तो वह रो पड़ा। वह बोला — “अब तुम मेरी कहानी सुनो। मैं ज़रबाद देश[2] के राजा की बेटी हूँ। और वह नौजवान जो इस सोलोमन की जेल में बन्द था उसका नाम है बहरामन्द। [3] वह मेरे पिता के वजीर का बेटा है।

एक दिन महाराज ने हुकुम दिया कि सारे राजा और कुँवर यानी राजकुमार मैदान में इकठ्ठा हों जो जनानखाने की जालियों के पास ही था। वहाँ निशाना लगाने और चौगान[4] के खेल खेले जायेंगे ताकि लोगों की घुड़सवारी और निशाना लगाने की होशियारी जाँची जाये।

मैं रानी यानी अपनी माँ के पास बैठी हुई थी सबसे ऊँची मंजिल की जाली के पीछे दासियाँ और नौकर घूम रहे थे। मैं वहाँ से खेल देख रही थी।

वजीर का बेटा उन सबमें सुन्दर था और बहुत ही बढ़िया तरीके से अपने घोड़े को घुमा रहा था। वह मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं उसको अपना दिल दे बैठी। मैंने यह बात काफी दिनों तक छिपा कर रखी।

आखिर जब मैं बहुत बेचैन हो गयी तो मैंने यह बात अपनी निजी दासी से कही और उसकी सहायता लेने के लिये मैंने उसको बहुत सारी चीज़ें दीं। किसी तरह से वह उसे मेरे कमरे तक लाने में सफल हो गयी। इस तरह से वह भी मुझे प्यार करने लगा। इस प्यार के देने लेने में कई दिन बीत गये।

एक दिन आधी रात को एक सन्तरी ने उसको हथियारबन्द मेरे महल की तरफ आते देख लिया। उसने उसे पकड़ लिया और राजा से जा कर सारा मामला कहा। राजा ने उसको मौत की सजा सुना दी पर राज्य के सारे औफीसर आदि की विनती पर उसकी ज़िन्दगी तो बख्श दी गयी पर उसको सोलोमन की जेल में फेंक दिया गया।

और दूसरा आदमी जो उसके साथ जेल में फेंका गया वह उसका भाई है। वह जिस दिन पकड़ा गया था तो उसके साथ उसका भाई भी था। दोनों ही को कुँए में फेंक दिया गया था।

जब से वे कुँए में फेंके गये थे तबसे आज तक उनको तीन साल हो गये हैं पर किसी को आज तक यह पता नहीं चल सका कि वह नौजवान राजा के महल में क्यों घुसा था। अल्लाह ने मेरा चरित्र सँभाल कर रखा हुआ है।

पर उसकी अच्छाइयों के बदले में मैं अपना काम ठीक से कर रही हूँ कि मैं उन दोनों के लिये खाना पानी ले कर आती हूँ। जब से वे कुँए में फेंके गये हैं तभी से मैं वहाँ हर आठवें दिन जाती हूँ और आठ दिन का खाना पानी उनको दे आती हूँ।

पिछली रात में मैंने एक सपना देखा कि मुझे कोई सलाह दे रहा है कि “जल्दी उठ। एक घोड़ा ले एक पोशाक ले रस्सी की एक सीढ़ी ले खर्चे के लिये कुछ पैसे ले और सोलोमन की जेल जा कर वहाँ रह रहे बन्दियों को छुड़ा ले। ”

यह सुन कर मैं नींद से जाग गयी और बड़ी खुशी से मैं एक आदमी की पोशाक पहन कर तैयार हुई। एक छोटे से बक्से में जवाहरात और कुछ सोने के सिक्के भरे एक घोड़ा ले कर और कुछ पोशाक ले कर मैं वहाँ चल दी ताकि मैं उनको रस्सी की सीढ़ी की सहायता से बाहर निकाल सकूँ।

पर इस तरीके से कुँए में से बाहर निकलना तो केवल तुम्हारी किस्मत में था। किसी को नहीं पता कि मैंने क्या किया है। शायद वह कोई रक्षा करने वाला दूत था जिसने मुझे तुम्हें इस तरह से आजाद करने के लिये भेजा। खैर जो मेरी किस्मत में था वही हो रहा है। ”

इतना सुनाने के बन्द उसने अपने कपड़े में से कुछ नमकीन मठरी गेहूँ की रोटी दाल माँस निकाला। एक गिलास में उसने पानी में कुछ चीनी मिलायी और मुझे पीने के लिये दिया। मैंने पानी पिया कुछ नाश्ता किया।

कुछ देर के बाद उसने एक कपड़े का टुकड़ा निकाला और मेरी कमर में बाँध दिया और फिर मुझे नदी की तरफ ले चली। उसने कैंची से मेरे बाल काटे नाखून काटे। नहलाया और कपड़े पहनाये। इस तरह से उसने मुझे एक नया आदमी बना दिया। मैंने क़िबला की तरफ मुँह करके अल्लाह की प्रार्थना की। वह सुन्दर लड़की भी जो कुछ मैं करता रहा उसे देखती रही।

जब मैंने अपनी प्रार्थना खत्म कर ली तो उसने पूछा — “यह तुम इस तरीके से क्या कर रहे थे। ”

मैं बोला — “मैं अल्लाह की पूजा कर रहा था जिसने इस सारी दुनिया को बनाया और जिसने एक सुन्दर लड़की के द्वारा मुझे इस जेल से बचाया। उसके बराबर का कोई नहीं है। मैं उसी की पूजा कर रहा था और उसे धन्यवाद दे रहा था। ”

यह सुन कर वह बोली — “तो तुम मुसलमान हो। ”

मैं बोला — “अल्लाह का धन्यवाद है कि मैं हूँ। ”

वह बोली — “तुम्हारा इस तरह से पवित्र रहना मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे भी सिखाओ। मुझे भी सिखाओ कि कलमा कैसे पढ़ते हैं। ”

मैंने अपने दिल में कहा “अल्लाह का लाख लाख धन्यवाद है कि यह भी हमारा धर्म अपनाना चाह रही है। ”

मैंने उसको फिर अपना धर्म बताया — “और कोई अल्लाह नहीं है सिवाय अल्लाह के। मुहम्मद अल्लाह का धर्मदूत है। ” और उससे यह बार बार कहलवाया। फिर अपने अपने घोड़ों पर चढ़ कर हम वहाँ से चल दिये।

रात को जब हम रुके तो उसने केवल हमारे धर्म के बारे में ही बातें कीं और किसी बारे में नहीं। वह ये बातें करके बहुत खुश थी। इस तरह से हम दो महीनों तक दिन रात बराबर यात्रा करते रहे।

आखिर हम एक देश में पहुँचे जो ज़रबाद और सरनदीप[5] की हदों के बीच में पड़ता था। वहाँ हमें एक शहर दिखायी दिया जिसमें कौन्सटैनटिनोपिल से भी ज़्यादा लोग रहते थे। उसकी जलवायु बहुत अच्छी थी।

जब हमें यह पता चला कि वहाँ का राजा बहुत न्यायशाली था और वह उसी के लिये नौशेरवाँ से भी ज़्यादा मशहूर था। और साथ में वह अपनी जनता की रक्षा भी बहुत करता था। यह सुन कर मेरा दिल बहुत खुश हो गया।

वहाँ हमने एक घर खरीदा और उसमें रहने लगे। कुछ दिन बाद जब हमारी यात्रा की थकावट दूर हो गयी तो मैंने कुछ जरूरी चीज़ें खरीदीं और उस सुन्दर लड़की से मुसलमानी रीति रिवाजों से शादी कर ली।

तीन साल में ही मैं वहाँ की छोटी बड़ी सब चीज़ों को जान गया। मैंने अपनी साख भी जमा ली और बहुत अच्छी तरह से अपने व्यापार में लग गया। आखीर में मैं वहाँ के सब सौदागरों से आगे निकल गया।

एक दिन मैं वहाँ के वजीर को सलाम करने गया तो मैंने मैदान में बहुत बड़ी भीड़ इकठ्ठा देखी। मैंने वहाँ किसी से पूछा कि यह भीड़ वहाँ क्यों लगी हुई थी। तो पता चल कि दो लोग चोरी में लगे थे और शायद उन्होंने कत्ल भी किया था। इसलिये वे यहाँ लाये गये थे कि उनको तब तक पत्थर मारने थे जब तक वे मर न जायें।

यह सुन कर मुझे अपना मामला याद आ गया। मैं भी इसी तरह से ले जाया गया था और तब अल्लाह ने मुझे बचाया था। मैंने अपने मन में सोचा कि ये दो कौन हो सकते हैं जो इस तरह की मुसीबत में पड़े हुए हैं।

मुझे तो यह भी पता नहीं था कि उनको न्याय से सजा मिल रही थी या फिर मेरी तरह उन पर भी झूठा इलजाम लगा हुआ था। भीड़ में से घुसते हुए मैं उस जगह पहुँचा जहाँ वे खड़े थे तो मैंने देखा कि लो वे तो मेरे भाई थे।

उनके दोनों हाथ पीछे बँधे हुए थे और उनके सिर और पैर दोनों नंगे थे। उनको वहाँ देख कर मेरा खून खौल उठा और मेरा जिगर जलने लगा। मैंने पहरेदारों को कुछ सोने के सिक्के दिये और उनसे विनती की कि वह उनके मारने के समय को थोड़ा पीछे हटा दें। ऐसा करके मैं अपने घोड़े को तेज़ी से भगा कर गवर्नर के घर ले गया।

मैंने गवर्नर को एक बहुत ही कीमती लाल जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था भेंट में दिया और उन्हें छोड़ने की विनती की।

वह बोला — “एक आदमी ने उनकी शिकायत की है और उनके अपराध साबित किये जा चुके हैं। राजा का हुकुम सुनाया जा चुका है अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है। ”

आखिर बहुत विनती करने पर गवर्नर ने शिकायत करने वाले को बुला भेजा और उसको 5000 चाँदी के सिक्के दे कर उससे अपना कत्ल का इलजाम वापस लेने के लिये कहा। मैंने उसको वह पैसा गिन दिया और उनकी सजा का कागज वापस करा दिया। इस तरह उनको उस भारी मुसीबत से बचा लिया। जहाँपनाह। आप इनसे पूछ लें कि मैंने सच कहा है या झूठ।

दोनों भाई चुपचाप खड़े थे। उन दोनों ने अपने अपने सिर झुका रखे थे जैसे वे कह रहे हों कि “हाँ यह आदमी सच कह रहा है। ” और वे इन सब बातों पर शरमिन्दा हों।

खैर मैं उनको छुड़ाने के बाद उनको अपने घर ले आया। उन्हें नहलाया धुलाया नये कपड़े पहनाये पेट भर खाना खिलाया और उनको दीवानखाने में ठहरा दिया गया।

मैंने उस समय तक उनको अपनी पत्नी से नहीं मिलवाया था। उनकी सारी जरूरतें मैं पूरी करता था। मैं उन्हीं के साथ खाता पीता भी था केवल सोने के लिये ही अपने कमरे में जाता था।

इस तरह से उनकी सेवा करते करते मुझे तीन साल बीत गये। उनकी तरफ से भी कोई बुरा काम नहीं हुआ जो मुझे नाखुश करता। जब कभी मैं घोड़े पर सवार हो कर बाहर जाता तो वे घर पर ही रहते।

एक दिन ऐसा हुआ कि मेरी पत्नी नहाने के लिये गयी। जब वह दीवानखाने में आयी तो वहाँ किसी आदमी को न देख कर उसने अपने चेहरे से अपना परदा उठा दिया। पर शायद मेरा दूसरा भाई वहाँ लेटा हुआ था और जागा हुआ था सो जैसे ही उसने उसको देखा तो वह उस पर मोहित हो गया।

उसने यह घटना बड़े भाई को बतायी तो दोनों ने मिल कर एक बार फिर मेरे मारने का प्लान बनाया।

उधर मैं इन सब हालातों से बिल्कुल अनजान था। मैं कहा करता था “अल्लाह का लाख लाख धन्यवाद है कि इस बार सब ठीक चल रहा है। इन्होंने कोई ऐसा बुरा काम नहीं किया जैसा ये लोग पहले करते थे। लगता है कि इनका व्यवहार अब कुछ ठीक हो गया है। इनको कुछ शर्म आ गयी है। ”

एक दिन शाम को खाना खाने के बाद मेरा बड़ा भाई अपने देश को और ईरान[6] के आनन्द को याद करके रोने लगा। मेरा दूसरा भाई भी आहें भरने लगा। तो मैंने कहा कि अगर तुम घर वापस जाना चाहते हो तो जाओ। मैं तो केवल तुम्हारी खुशी चाहता हूँ। वैसे मेरी भी इच्छा यही है कि हम अपने देश वापस चलें। अगर अल्लाह ने चाहा तो मैं भी तुम्हारे साथ ही चलूँगा। ”

मैंने अपने भाइयों का दुख और साथ में अपना इरादा भी अपनी पत्नी से कहा। मेरी समझदार पत्नी ने कहा — “तुम ऐसा सोच सकते हो पर मुझे लगता है कि वे तुम्हारे खिलाफ फिर से कोई जाल रच रहे हैं। वे तुम्हारी जान के दुश्मन हैं।

वे तुम्हारी आस्तीन का साँप हैं। तुम अपनी आस्तीन में साँप का एक जोड़ा पाल रहे हो। जैसा तुम्हें अच्छा लगे तुम वैसा करो पर ऐसे नीच लोगों से सँभल कर रहना चाहिये। ”

खैर यात्रा की सब तैयारियाँ की गयीं। मैदान में तम्बू लगाये गये। एक बहुत बड़ा काफिला तैयार हो गया। और सबने मुझे काफिले का सरदार मान लिया। शुभ मुहूर्त निकाला गया और उस समय काफिला चल दिया।

जहाँ तक मेरा सवाल था मैं हमेशा अपने भाइयों की तरफ से सावधान रहा। हालाँकि मैं उनकी सब बातें मानता रहा और वही करता रहा जो उन्हें अच्छा लगता था।

जब हम अपनी जगह आ पहुँचे तो मेरा दूसरा भाई बोला कि यहाँ से एक फरसाख[7] दूर एक सलसाबिल[8] जैसा फव्वारा है जहाँ के मैदान में बहुत बहुत दूर तक लिली गुलाब ट्यूलिप आदि फूल खिले हुए हैं। वह जगह घूमने के लिये बहुत अच्छी है। अगर हम सबकी राय हो तो हम कल वहाँ घूमने चलें और अपने दिल खुश करें। इससे थोड़ी थकान भी दूर हो जायेगी। ”

मैंने कहा — “तुम लोग यहाँ मालिक हो। अगर तुम कहो तो कल हम लोग वहीं रुक जायेंगे। थोड़ा इधर उधर घूमेंगे। ”

वे बोले “इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। ”

मैंने हुकुम दिया कि सारे काफिले को कह दो कि कल हम रुकेंगे। फिर मैंने अपने रसोइये को नाश्ता बनाने का हुकुम दिया जिसमें मैंने उससे कई चीज़ें बनवायीं। क्योंकि हम लोग आनन्द मनाने के लिये जा रहे थे।

जब सुबह हुई तो मेरे दोनों भाइयों ने कपड़े पहने अपने अपने हथियार सँभाले और मुझसे भी जल्दी करने के लिये कहा ताकि हम लोग वहाँ ठंड ठंड में पहुँच कर आराम से घूम सकें।

मैंने अपने घोड़े को तैयार करने के हुकुम दिया। पर यह उन्होंने देख लिया तो बोले उसका आनन्द तो उसको पैदल घूम कर देखने में है। क्या वही आनन्द घोड़े पर सवार हो कर घूमने भी लिया जा सकता है। इसके बजाय सईसों को हुकुम दो कि वह हमारे पीछे पीछे घोड़े ले आयें। दो नौकर हुक्का और कौफी का बरतन लिये आ रहे थे।

जब हम सड़क पर जा रहे थे तो आनन्द के लिये तीर चलाते जा रहे थे। जब हम काफिले से थोड़ा दूर चले गये तो उन्होंने एक नौकर को किसी काम पर भेज दिया। हम और आगे बढ़े तो उन्होंने दूसरे नौकर को पहले वाले नौकर को लाने के लिये भेज दिया।

मेरी बदकिस्मती कि मैं चुप ही रहा। मेरा बोल ही नहीं निकला जैसे किसी ने मेरे होठों पर सील लगा दी हो। और उनकी जो इच्छा हुई वे वह करते रहे। मेरा ध्यान बात करने में बँटाते रहे। वे बराबर मुझसे आगे चलते रहे। खैर यह कुत्ता मेरे साथ ही रहा।

जब हम लोग काफी दूर निकल आये तो न तो मुझे कोई फव्वारा दिखायी दिया और न ही कोई बागीचा। वहाँ तो बस एक मैदान पड़ा हुआ था जिसमें काँटे ही काँटे थे।

ंवहाँ मुझे पेशाब लगी तो मैं वहीं बैठ गया। तभी मैंने अपने पीछे एक तलवार जैसी कोई चीज़ चमकती देखी तो मैंने पीछे देखा। जैसे ही मैंने पीछे देखा तो मेरे दूसरे भाई ने मेरे ऊपर तलवार से इतने ज़ोर से वार किया कि मेरे सिर के दो टुकड़े हो गये। [9]

इससे पहले कि मैं यह कहता कि “ओ जंगलियों। तुम लोग मुझे क्यों मारते हो। ” मेरे बड़े भाई ने मुझे मेरे कन्धे पर मारा। दोनों घाव बहुत गहरे थे। मैं काँपा और गिर गया। तब इन दोनों बेरहमों ने आराम से मुझे काटा पीटा और मुझे फिर मेरे ही खून में लिपटा वहीं छोड़ कर चले गये।

यह कुत्ता मुझे इस हालत में देख कर उन दोनों पर कूद पड़ा पर उन्होंने इसको भी घायल कर दिया।

इसके बाद इन्होंने अपने शरीर पर कुछ घाव किये और कैम्प की तरफ नंगे सिर और नंगे पैर भाग गये। वहाँ जा कर इन्होंने बोला कि मैदान में कुछ डाकू मिल गये थे जिन्होंने इनके भाई को मार दिया और इनके साथ भी कुछ वैसा ही व्यवहार किया पर ये केवल घायल ही हुए।

अब तुम लोग यहाँ से जल्दी चलो नहीं तो वे कारवाँ पर भी हमला बोल सकते हैं और फिर हम लोगों को भी परेशान कर सकते हैं। यह सुन कर वे बहुत डर गये उन्होंने जल्दी जल्दी सब सामान बाँधा और वहाँ से चल दिये।

मेरी पत्नी को इनके पहले कामों का इनके अनमोल गुणों का और बुरे कामों का जो इन्होंने मेरे साथ किये थे पहले से ही पता था सो वह यह समझ गयी कि ये लोग झूठ बोल रहे हैं उसने अपने सीने में छुरा मार कर अपने आपको खत्म कर लिया और अल्लाह के पास चली गयी। ”

आजाद बख्त आगे बोला — “ओ दरवेश। जब कुत्ता पूजने वाला ख्वाजा अपनी बदकिस्मती की कहानी यहाँ तक सुना चुका तो मेरी आँखों से आँसू निकल आये। सौदागर ने जब मेरा दुख देखा तो बोला — “जहाँपनाह। अगर आपकी बेइज़्ज़ती न हो तो मैं अपने कपड़े उतारना चाहूँगा और आपको अपना सारा शरीर दिखाना चाहूँगा। ”

इसके बाद यह दिखाने के लिये कि वह सच बोल रहा था या नहीं उसने अपने कपड़े कन्धे पर से फाड़ दिये और अपना सारा शरीर दिखा दिया। उसके सारे शरीर कहीं चार अंगुल जगह भी नहीं थी जहाँ घाव न हो। इसके अलावा उसकी खोपड़ी पर एक इतना गहरा गड्ढा था कि उसमें पूरा का पूरा अनार रखा जा सकता था।

यह देख कर राज्य के जितने भी औफीसर वहाँ मौजूद थे सबने अपनी आँखें बन्द कर लीं। उनके अन्दर इतनी भी ताकत नहीं थी कि वे इस दृश्य को दोबारा देखने की हिम्मत कर सकें।

इसके बाद ख्वाजा ने फिर अपना हाल बताना शुरू किया — “योर मैजेस्टी। जब इन भाइयों ने जैसा कि ये सोचते थे अपना काम खत्म कर लिया तो वहाँ से चले गये। मैं वहीं उसी जगह अधमरा सा लेटा रहा। मेरे साथ मेरा कुत्ता भी घायल पड़ा हुआ था।

मेरे शरीर से मेरा इतना सारा खून बह चुका था कि मेरे अन्दर ज़रा सी भी ताकत तो थी ही नहीं यहाँ तक कि महसूस करने की ताकत भी नहीं थी। मैं सोच ही नहीं सका कि मैं ज़िन्दा कैसे था।

clip_image002जिस जगह मैं लेटा हुआ था वह सरनदीप की सीमा के पास थी और एक बहुत बड़ा शहर उसके पास ही था। उस शहर में एक पगोडा था। उस देश के राजा की एक बेटी थी जो बहुत सुन्दर थी।

बहुत सारे राजा और राजकुमार उससे शादी करने के इच्छुक थे। वहाँ परदे का कोई रिवाज नहीं था सो वह राजकुमारी अपनी साथिनों के साथ वहाँ ऐसे ही खुले मुँह शिकार करती घूमती रहती थी।

उस जगह के पास जहाँ मैं लेटा हुआ था वहाँ एक शाही बागीचा था। उस दिन उसने अपने पिता से छुट्टी ली और इस बागीचे में घूमने के लिये आगयी। आनन्द के साथ घूमते हुए वह इधर मैदान की तरफ निकल आयी जहाँ मैं लेटा हुआ था।

कुछ दासियाँ भी उसके साथ थीं। वे जहाँ मैं लेटा हुआ था उस जगह के पास तक आयीं तो वहाँ उन्होंने कुछ कराहने की आवाजें सुनी। इधर उधर देखा तो मुझे वहाँ पड़ा पाया। इस दशा में मुझे वहाँ पड़ा देख कर वे इस बात को राजकुमारी को बताने गयीं।

उन्होंने कहा कि हमने एक बदकिस्मत को उसके ही खून में लिपटा पड़ा देखा है। उसके साथ एक कुत्ता भी वहीं पड़ा हुआ है। यह सुन कर राजकुमारी खुद मेरे पास आयी। मुझे देख कर वह खुद भी दुखी हो गयी और बोली देखो यह ज़िन्दा भी है या नहीं।

उसकी दो तीन साथिनें घोड़े से नीचे उतरीं और मेरी जाँच पड़ताल करके बोलीं — “इसकी साँस तो अभी भी चल रही है। ”

राजकुमारी ने उनको मुझे सावधानी से एक कालीन पर उठाने और बागीचे ले कर जाने के लिये कहा।

वे जब मुझे बागीचे में ले आयीं तो राजकुमारी ने शाही चीर फाड़ वाले डाक्टर को बुलवा भेजा। उसने मुझे और मेरे कुत्ते दोनों को ठीक होने के लिये कई इन्जैक्शन लगाये और हमें तसल्ली दी। डाक्टर ने मेरा शरीर धोया पोंछा घावें को सिला और प्लास्टर लगाया।

उसने फिर बदमुश्क विलो का सत्त[10] मँगवाया और पानी की जगह मेरे गले में वही डलवाया। राजकुमारी खुद मेरे बिस्तर के सिरहाने बैठी रहती थी और मेरी हर जरूरत का ख्याल रखती थी। दिन और रात में दो चार बार मुझे वह शर्बत बना कर देती और अपने हाथ से पिलाती।

आखिर जब मैं अपने होश में आया तो मैंने राजकुमारी को दुख के साथ कहते सुना — “क्या खूनी किस्म की यह बदकिस्मती तेरे ऊपर आ पड़ी है। किसने यह बेरहमी दिखायी है। क्या वह उस बड़ी मूर्ति[11] से भी नहीं डरा। ”

दस दिन के बदमुश्क और शरबतों के असर से मेरी आँखें कुछ खुलीं। मैंने अपने चारों तरफ देखा तो मुझे लगा कि मेरे चारों तरफ इन्द्र का दरबार लगा हुआ है। राजकुमारी मेरे बिस्तर के सिरहाने खड़ी हुई है। मैंने एक आह भरी और हिलना चाहा पर मेरे अन्दर इतनी ताकत ही नहीं थी कि मैं हिल भी सकता।

राजकुमारी ने दयापूर्वक कहा — “ओ फारस के रहने वाले। अब तुम खुश हो जाओ दुखी मत हो। हालाँकि किसी बेरहम ने तुम्हारा यह हाल किया है फिर भी बड़ी मूर्ति ने मेरे द्वारा तुम पर दया करवा दी है। अब तुम ठीक हो जाओगे। ”

“मैं उस अल्लाह की कसम खा कर कहता हूँ जो एक है और उसके जैसा दूसरा कोई नहीं है कि उसको देखने पर मैं फिर से बेहोश हो गया। उसने भी यह बात देखी तो उसने अपने हाथ में पकड़ी एक शीशी से मेरे ऊपर गुलाब जल छिड़का।

बीस दिन बाद मेरे सारे घाव भर गये। जब सब लोग सो जाते राजकुमारी रात को बराबर आती और मुझे खाना खिलाती। चालीस दिन बाद मैंने अपने बिल्कुल ठीक हो जाने की खुशी में पहली नमाज पढ़ी।

राजकुमारी बहुत खुश थी उसने डाक्टर को बहुत इनाम दिया और मुझे कई कीमती कपड़े दिये। अल्लाह की मेहरबानी से और राजकुमारी की देखभाल में अब मैं बिल्कुल तन्दुरुस्त हो गया था। मेरा कुत्ता भी मोटा हो गया था।

वह मुझे रोज वाइन पिलाती मेरा हाल सुनती और मुझसे खुश थी। मैं भी उसको छोटी छोटी कहानियाँ और भी कुछ कुछ सुना कर उसको खुश रखने की कोशिश करता।

एक दिन उसने मुझसे कहा — “मेहरबानी करके अपनी यात्रा के हाल सुनाओ। मुझे बताओ कि तुम कौन हो और यह हाल तुम्हारा किसने किया। ”

तब मैंने उसको शुरू से ले कर आखीर तक अपनी कहानी सुना दी। मेरी कहानी सुन कर वह रो दी। फिर बोली — “अब मैं तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करूँगी कि तुम अपनी सारी मुसीबतें भूल जाओगे। ”

मैंने कहा — “अल्लाह तुम्हें बनाये रखे। तुमने तो मुझे एक नयी ज़िन्दगी दी है। मैं तो सारा का सारा तुम्हारा हूँ। अल्लाह के लिये मेरे ऊपर मेहरबानियाँ करती हुई हमेशा मुझसे खुश रहो। ”

वह सारी सारी रात मेरे पास अकेली बैठी रहती। कभी कभी आया भी उसके साथ रहती और मेरी कहानियाँ सुनती रहती। कभी कभी वह अपनी कहानियाँ भी सुनाती। जब राजकुमारी चली जाती तब मैं अकेला रह जाता। उस समय एक कोने में छिप कर मैं अपनी पूजा करता नमाज पढ़ता।

एक बार ऐसा हुआ कि राजकुमारी अपने पिता के पास गयी हुई थी और मैं सुरक्षित रूप से बैठा हुआ अपनी प्रार्थना कर रहा था कि अचानक राजकुमारी अपनी आया से यह कहती हुई मेरे कमरे में घुसी — “चलो देखते हैं कि यह फारसी क्या कर रहा है। वह जाग रहा है या सो रहा है। ”

पर जब वह अन्दर आयी तो उसने देखा कि मैं तो अपनी जगह पर था ही नहीं। यह देख कर उसको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसके मुँह से निकला — “अरे यह कहाँ गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी और से प्यार करने लगा हो। ”

वह मुझे कमरे के हर छेद और कोने में ढूँढने लगी और फिर वहाँ आ पहुँची जहाँ मैं अपनी प्रार्थना कर रहा था। उसने इससे पहले कभी किसी को इस तरह से प्रार्थना करते नहीं देखा था। वह चुपचाप खड़ी रही और मुझे देखती रही।

जब मैंने अपनी प्रार्थना खत्म कर ली तो मैंने अल्लाह को धन्यवाद देने के लिये अपने हाथ उठाये और जमीन पर लेट गया। यह देख कर उसको हँसी आ गयी। वह बोली — “अरे यह आदमी क्या पागल हो गया है। यह कैसी कैसी शक्लें बनाता रहता है। ”

उसकी हँसी की आवाज सुन कर मैं चौंक गया। राजकुमारी आगे बढ़ी और उसने मुझसे पूछा — “ओ फारस के रहने वाले। यह तुम क्या कर रहे थे। ”

पहली बार तो मैं जवाब ही नहीं दे सका तो आया बोली — “क्या मैं आपकी बुराइयें का जिम्मा ले सकती हूँ और आपकी बलि बन सकती हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि यह आदमी मुसलमान है और लत और मनत[12] का दुश्मन है। यह एक अनदेखे अल्लाह की पूजा करता हैं। ”

यह सुनते ही राजकुमारी ने अपने दोनों हाथ एक दूसरे पर मारे और बड़े गुस्से में भर कर बोली — “मुझे नहीं पता थो कि यह तुर्क है और हमारे भगवानों में विश्वास नहीं करता। इसी लिये तो यह हमारी बड़ी मूर्ति के गुस्से में आ गया है। मैंने इसको गलती से बचा लिया और अपने घर में रखा। ” यह कह कर वह वहाँ से चली गयी।

उसके ये शब्द सुन कर मैं तो बहुत ही परेशान हो गया और यह सुन कर मुझको लगा कि अब वह पता नहीं मुझसे किस तरीके का व्यवहार करेगी। डर के मारे मेरी तो नींद ही उड़ गयी। मैं सारी रात रोता रहा और मेरा चेहरा आँसुओं से नहाता रहा।

इस तरह रोते हुए मुझे तीन दिन और तीन रात गुजर गये। एक बार भी मैं पलक नहीं झपका पाया। तीसरी रात को राजकुमारी मेरे कमरे में आयी। उसका चेहरा वाइन के नशे में चमक रहा था। साथ में उसकी आया भी थी।

वह बहुत गुस्से में थी। उसके हाथ में तीर कमान थे। वह कमरे के बाहर ही चमन में बैठ गयी। उसने अपनी आया से एक गिलास वाइन माँगी। उसको पीने के बाद वह बोली — “ओ आया। क्या यह वही फारस का रहने वाला है जिस पर हमारी बड़ी मूर्ति नाराज है। यह मर गया है या अभी ज़िन्दा है। ”

आया बोली — “क्या में आपकी बुराइयाँ अपने जिम्मे ले सकती हूँ। अभी आपकी कुछ ज़िन्दगी बाकी है। ”

राजकुमारी बोली — “यह तो अब मेरे शक के घेरे में आ गया है। इससे कहो कि यह बाहर निकले। ”

आया ने मुझे पुकारा। मैं बाहर की तरफ भागा। मैंने देखा कि राजकुमारी का चेहरा गुस्से से लाल हो कर चमक रहा है। मेरे शरीर में तो जैसे जान ही नहीं थी। मैंने उसको सलाम किया। दोनों हाथ जोड़ कर चुपचाप उसके सामने खड़ा हो गया।

उसने मुझे गुस्से से देखा फिर आया से बोली — “मैं अपने धर्म के इस दुश्मन को तीर मार कर मार दूँगी। क्या हमारी बड़ी मूर्ति फिर मुझे माफ कर देगी। मैंने पहले से इसको अपने घर में रख कर और इसकी जरूरतों को पूरा करके एक बहुत बड़ा अपराध किया है। ”

आया बोली — “इसमें राजकुमारी जी की क्या गलती है। जब आपने इनको अपने घर में रखा तब आप तो इनको जानती भी नहीं थीं। आपने तो इन पर केवल दया की है। आपको भलाई का बदला भलाई ही मिलेगा। और इस आदमी को बड़ी मूर्ति के हाथों बुराई का फल भोगना पड़ेगा जो इसने की है। ”

यह सुन कर राजकुमारी बोली — “इससे बोलो कि यह बैठ जाये। ”

आया ने मुझे बैठने का इशारा किया सो मैं बैठ गया। राज्कुमारी ने एक गिलास वाइन और पी और आया से कहा — “इस नीच को भी एक गिलास वाइन दो। ”

मैं बिना हिचक के उसे एक साँस में ही खाली कर गया और फिर राजकुमारी को सलाम किया। उसने मुझे कभी सीधे नहीं देखा पर वह मुझे तिरछी निगाहों से मुझे जरूर देखती रही। जब मुझे वाइन थोड़ी चढ़ गयी तो मैंने कुछ कविताएँ कहनी शुरू कर दीं। मैंने एक कविता कही —

मैं तेरे काबू में हूँ और अगर ज़िन्दा भी हूँ तो क्या

छुरे के नीचे अगर कोई साँस लेता है तो क्या

कविता की ये लाइनें सुन कर वह मुस्कुरायी और आया की तरफ घूम कर बोली — “अरे तू सो गयी क्या। ”

आया ने राजकुमारी की बात समझ कर कहा — “हाँ मुझे नींद आ रही है। ” फिर उसने राजकुमारी से छुट्टी ली और चली गयी।

कुछ देर बाद राजकुमारी ने मुझसे एक गिलास वाइन के लिये कहा। मैंने तुरन्त ही उसका वाइन का गिलास भर दिया और उसको दे दिया। उसने बड़े सलीके से उसे मेरे हाथ से लिया और सारा पी गयी।

उसके बाद मैं उसके पैरों पर गिर पड़ा। उसने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोली — “ओ अज्ञानी आदमी। तुमने हमारी बड़ी मूर्ति में ऐसा क्या बुरा देखा जो तुम एक अनदेखे भगवान को पूजने लगे। ”

मैंने कहा — “नाराज न हो। सोच कर देखो कि वह जो अकेला है क्या तारीफ के लायक है जिसने एक बूँद से तुम जैसे सुन्दर प्राणी को बना दिया। और उसे इतनी सुन्दरता और सम्पूर्णता दी कि वह एक पल में ही हजारों आदमियों को अपनी तरफ खींच ले।

लेकिन इस बड़ी मूर्ति में ऐसा क्या जिसकी कोई पूजा करे। पत्थर काटने वालों ने एक पत्थर काट कर इसको एक मूर्ति की शक्ल दे दी है और बेवकूफ लोगों को यह कह कर जाल में फाँस लिया कि इसकी पूजा करो।

हम मुसलमान हैं हम केवल उसी की पूजा करते हैं जिसने हमें बनाया है। जो मूर्ति पूजा करते हैं उनके लिये उसने नरक बना रखा है पर जो उसमें विश्वास रखते हैं उनके लिये उसने स्वर्ग बनाया है।

अगर तुम अल्लाह में विश्वास करोगी तो तुमको स्वर्ग की खुशियाँ मिलेंगी। सच को गलत से अलग करके देखो तो तुम देखोगी कि तुम्हारी यह भक्ति झूठी है।

काफी देर के बाद ऐसी बातें सुन कर उस पत्थरदिल का दिल कुछ मुलायम हुआ और वह अल्लाह की मेहरबानी से रो पड़ी। वह बोली — “मुझे अपना धर्म सिखाओ। ”

तब मैंने उसे कलमा सिखाया। उसने वह अपने दिल से दोहराया और माफी की प्रार्थना की। वह अब सच्ची मुसलमान हो चुकी थी। मैं फिर उसके पैरों पर गिर पड़ा और उसे धन्यवाद दिया। सुबह तक वह कलमा ही पढ़ती रही और माफी माँगती रही।

वह फिर बोली — “मैंने तो तुम्हारा धर्म अपना लिया है पर मेरे माता पिता तो मूर्ति पूजा करने वाले हैं। उनके लिये क्या इलाज है। ”

मैंने कहा — “अब तुम्हें उससे क्या। जो जैसा करेगा वह वैसा भरेगा। ”

वह बोली — “मेरे माता पिता ने मेरी शादी मेरे चाचा के लड़के से तय कर दी है और वह मूर्ति पूजा करता है। अगर कल मेरी उससे शादी हो जाती है, अल्लाह न करे, और उस मूर्तिपूजक से मेरे बच्चे होते हैं तो यह तो बड़ी बदकिस्मती की बात होगी। हमें तुरन्त ही इसका कुछ उपाय सोचना चाहिये ताकि हम इस मुश्किल से बच सकें। ”

मैं बोला — “जो कुछ तुम कह रही हो वह बिल्कुल ठीक कह रही हो। जो तुम ठीक समझो वह करो। ”

वह बोली — “अब मैं यहाँ बिल्कुल नहीं रह सकती। अब मैं कहीं और चली जाऊँगी। ”

मैंने पूछा — “पर तुम यहाँ से जाओगी कैसे और कहाँ जाओगी। ”

वह बोली — “पहली बात तो यह कि तुम मुझे यहीं छोड़ कर सराय में मुसलमानों के साथ ठहर जाओ ताकि सबको इस बात का पता चल जाये और तुम्हारे ऊपर कोई शक न करे।

वहाँ रहते हुए तुम किसी जहाज़ पर नजर रखना और अगर कोई जहाज़ फारस की तरफ जाता हो तो मुझे बताना। इस काम के लिये मैं अपनी आया को तुम्हारे पास अक्सर भेजती रहूँगी। जब भी तुम मुझे यह बात बताओगे कि सब कुछ तैयार है तो मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगी और जहाज़ पर चढ़ कर यहाँ से भाग जाऊँगी। इस तरह से मुझे इन दूसरे धर्म वालों से छुट्टी मिल जायेगी। ”

मैंने कहा — “मैं तुम्हारी ज़िन्दगी और सुरक्षा के लिये अपनी जान भी दे सकता हूँ पर तुम अपनी आया का क्या करोगी। ”

वह बोली — “उसका मामला तो मैं आसानी से सुलझा सकती हूँ। उसको तो मैं एक प्याला बहुत तेज़ जहर पिला दूँगी। ”

इस तरह से प्लान तैयार कर लिया गया। अगले दिन सुबह ही मैं सराय चला गया। वहाँ मैंने एक कमरा किराये पर ले लिया और उसमें रहने लगा। उससे बिछड़ कर मैं तो बस इसी आशा में था कि अब हम कब मिलेंगे।

इस घटना के होने के दो महीने में जब रम सीरिया और इस्फाहान के सौदागर मिले तो उन्होंने पानी के रास्ते वापस लौट जाने का प्लान बनाया और अपना सामान जहाज़ पर रखना शुरू किया। एक साथ रहने की वजह से मैंने उनसे काफी जान पहचान कर ली थी। उन्होंने मुझसे पूछा — “जनाब आप हमारे साथ नहीं आयेंगे क्या। आप इन काफिरों के देश में कब तक रहेंगे। ”

मैंने जवाब दिया — “मेरे पास क्या है जिसे ले कर मैं अपने देश जाऊँ। मेरी सम्पत्ति तो यही है – एक दासी एक बक्सा और एक कुत्ता। अगर आप लोग मुझे रहने के लिये थोड़ी सी जगह दे सकें तो मुझे उसकी कीमत बता दें। तब मेरे दिमाग में शान्ति हो जायेगी और मैं भी जहाज़ पर चढ़ पाऊँगा। ”

सौदागरों ने मुझे एक केबिन दे दिया और मैंने उनको पैसे दे दिये। अब मेरा दिल शान्त था सो मैं आया के घर गया और उससे कहा — “ओ माँ। मैं आपसे विदा लेने आया हूँ। अब मैं अपने देश जा रहा हूँ। अगर आपकी मेहरबानी से मुझे राजकुमारी के एक बार दर्शन हो जायें तो मुझे बहुत खुशी होगी। ”

आया ने किसी तरह से मेरी बात मान ली और बोली — “मैं आज रात को फलाँ फलाँ जगह आऊँगी। ”

“ठीक है। ” कह कर और जगह तय करके मैं सराय वापस आ गया। वहाँ से मैंने अपना बक्सा और बिस्तर उठाया और उनको जहाज़ पर ले गया। वहाँ ले जा कर मैंने उनको जहाज़ वालों को सुरक्षित रूप से रखने के लिये दे दिया।

फिर मैंने कहा कि मैं अपनी दासी को कल सुबह ले कर आऊँगा। जहाज़ के मालिक ने कहा — “जल्दी ही ले कर आना क्योंकि हम कल सुबह जल्दी ही निकल जायेंगे। ”

मैंने कहा “ठीक है। ”

रात को में अपनी तय की हुई जगह पर पहुँचा। रात का एक प्रहर बीतने पर जनानखाने का दरवाजा खुला और राजकुमारी मैले से कपड़े पहन कर आयी। उसके हाथों में जवाहरातों का एक डिब्बा था। उसने वह डिब्बा मुझे दे दिया और मेरे साथ चल दी।

जैसे ही सुबह हुई हम लोग समुद्र के किनारे पहुँच गये और फिर जहाज़ पर चढ़ गये। यह वफादार कुत्ता भी मेरे साथ गया। जब दिन निकल आया तब हमने लंगर उठा दिया और वहाँ से चल दिये।

हम लोग सुरक्षित रूप से चले जा रहे थे कि किसी एक बन्दरगाह से एक तोप की आवाज सुनायी पड़ी। जहाज़ पर जितने भी लोग सवार थे सबको यह सुन कर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह तोप की आवाज कहाँ से और क्यों आयी। जहाज़ का लंगर फिर से डाल दिया गया।

लोगों ने आपस में सलाह की कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बन्दरगाह के गवर्नर ने कोई शरारत की हो वरना उस तोप को छोड़ने क्या जरूरत थी।

अब हुआ यह कि सभी सौदागरों के पास सुन्दर सुन्दर दासियाँ थीं। इस डर से कि बन्दरगाह का गवर्नर कहीं उनको पकड़ न ले सो उन सबने अपनी अपनी दासियों को बक्सों में बन्द कर दिया। मैंने भी वैसा ही किया। मैंने राजकुमारी को अपने बक्से में बन्द कर दिया और उसमें ताला लगा दिया।

इस बीच गवर्नर और उसके लोग जहाज़ पर चढ़ आये। इस सबका मतलब शायद यह था कि जब आया की मौत और राजकुमारी के गायब होने की खबर चारों तरफ फैली और राजा के पास पहुँची तो उसने अपनी बदनामी बचाने के लिये उसने यह हुकुम दे दिया —

“मैंने सुना है कि फारस के लोग जहाज़ पर सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ ले जा रहे हैं। मुझे अपनी बेटी के लिये कुछ सुन्दर दासियों की जरूरत है और मैं उनको खरीदना चाहता हूँ इसलिये इस जहाज़ को रोको और जितनी भी सुन्दर लड़कियाँ जहाज़ पर हों उन सबको शाही महल में भेजो। उनको देखने के बाद में मैं उनकी पूरी कीमत दे कर उन्हें खरीद लूँगा और बाकी बची हुई लड़कियाँ वापस कर दी जायेंगी। ”

सो राजा के हुकुम के अनुसार बन्दरगाह का गवर्नर बेचारा खुद जहाज़ पर आया। मेरे केबिन के बराबर में ही किसी दूसरे की बर्थ थी। उसके पास भी एक सुन्दर दासी थी जो उसने अपने बक्से में बन्द कर रखी थी।

गवर्नर उस बक्से पर बैठ गया और जहाज़ की सारी सुन्दर लड़कियों को इकठ्ठा करने लगा जो भी उसको वहाँ दिखायी दीं। मैंने अल्लाह की जय बोली और कहा “राजकुमारी का नाम कहीं नहीं लिया गया है। ”

गवर्नर के लोगों ने जो भी दासियाँ उनको मिलीं उन सबको अपने जहाज़ में रख लिया। गवर्नर ने हँसते हुए उस बक्से के मालिक से पूछा जिसके ऊपर वह बैठा हुआ था — “क्या तुम्हारे पास भी कोई दासी है। ”

वह खरदिमाग कुछ डर गया और बोला — “मैं आपके पैरों की कसम खा कर कहता हूँ कि इस ढंग से बरतने वाला मैं अकेला ही नहीं हूँ हम सबने डर के मारे अपनी अपनी दासियों को अपने अपने बक्सों में बन्द कर रखा है।

यह सुन कर गवर्नर ने सबके बक्से देखने शुरू किये। उसने मेरा बक्सा भी खोल कर देखा तो उसने उसमें से राजकुमारी को निकाल लिया और उसको दूसरों के साथ ही ले गया। मेरी तो अब बहुत ही खराब हालत हो गयी।

मैंने अपने मन में कहा “अब तो हालात कुछ ऐसे हो गये हैं कि तेरी तो ज़िन्दगी तो बेकार ही चली गयी और अब देखना यह है कि वे राजकुमारी के साथ कैसा व्यवहार करेंगे। ”

उसकी चिन्ता में मैं अपनी ज़िन्दगी की चिन्ता करनी भूल गया। सारा दिन सारी रात मैं बैठा बैठा प्रार्थना करता रहता। जब अगली सुबह हुई तो वे सब दासियों को अपने जहाज़ में वापस ले आये।

सौदागरों को यह देख कर बहुत खुशी हुई कि कोई उनमें से कोई दासी नहीं खरीदी गयी थी। हर सौदागर अपनी अपनी दासी को ले कर चला गया। सारी दासियाँ वापस आ गयीं थी बस एक राजकुमारी ही वहाँ नहीं थी।

मैंने पूछा — “इसकी क्या वजह है कि मेरी दासी वापस नहीं आयी। ”

उन्होंने जवाब दिया — “हमें नहीं पता। हो सकता है कि राजा ने उसे चुन लिया हो। ”

सारे सौदागर मुझे तसल्ली दे कर शान्त करने लगे। वे बोले — “जो हो गया वह हो गया। उसके लिये अब तुम दुखी न हो। हम सब मिल कर तुम्हें उसका पैसा दे देंगे। ”

पर मेरी इन्द्रियाँ तो बिल्कुल ही बेकार हो गयी थीं। मैं बोला — “मैं फारस नहीं जाऊँगा। ”

मैंने जहाज़ चलाने वाले से कहा — “तुम मुझे समुद्र के किनारे ले चलो और वहाँ छोड़ दो। ”

वे राजी हो गये। मैंने अपना जहाज़ छोड़ दिया और उनके जहाज़ में चला गया। मेरा कुत्ता भी मेरे साथ ही आ गया।

जब मैं बन्दरगाह पर पहुँचा तो मेरे पास केवल जवाहरातों का डिब्बा था जो राजकुमारी मुझे दे गयी थी। अपना बाकी का सामान मैंने गवर्नर के नौकरों को दे दिया था।

मैं राजकुमारी को ढूँढते हुए बहुत जगह घूमता फिरा कि शायद कहीं से मुझे राजकुमारी की कोई खबर मिल जाये पर न तो मुझे वह ही मिली और न ही उसकी कोई खबर ही मिली।

एक रात मैं चालाकी से राजा के जनानखाने में घुस गया और वहाँ उसको ढूँढता रहा पर वहाँ भी उसकी कोई खबर नहीं मिली। करीब एक महीने तक मैं उसको गली गली दरवाजे दरवाजे घर घर में छानता रहा पर वह नहीं मिली।

दुख की वजह से अब मैं मौत के दरवाजे पर खड़ा था। मैं पागलों की तरह से इधर उधर घूम रहा था। आखिर मुझे कुछ ऐसा लगा कि मेरी राजकुमारी गवर्नर के घर में होनी चाहिये और कहीं नहीं। सो फिर मैं गवर्नर के घर इस इरादे से पहुँचा कि मुझे उसके घर में घुसने का कोई भी रास्ता मिल जाये मैं उसी से उसमें घुस जाऊँगा।

वहाँ पहुँच कर मैंने देखा कि उसके घर में अन्दर जाने और बाहर निकलने के लिये एक पाइप ऊपर की तरफ जा रहा था। मैंने सोच लिया कि मैं इसी पाइप के सहारे गवर्नर के घर में घुस जाऊँगा।

मैंने कपड़े उतारे और उस गन्दे से पाइप में उतर गया। बहुत मुश्किलें झेल कर मैं उसके चोर महल यानी “निजी महल” में जा पहुँचा। वहाँ पहुँच कर मैंने एक स्त्री का वेश बनाया और चारों तरफ को घूम घूम कर उसे ढूँढने लगा।

एक कमरे से मुझे जल्दी जल्दी कुछ बोलने की आवाज आयी जैसे कोई जल्दी जल्दी प्रार्थना कर रहा हो। मैंने उधर देखा तो वह तो राजकुमारी थी। राजकुमारी बहुत ज़ोर ज़ोर से रो रही थी और अपने बनाने वाले के सामने लेटी हुई थी और यह प्रार्थना कर रही थी —

“तुम्हें तुम्हारे धर्मदूत और उसके बच्चों[13] की कसम। मुझे काफिरों के इस देश से बाहर निकालो और मुझे उस आदमी की शरण में ले चलो जिसने मुझे इस्लाम धर्म सिखाया। ”

यह देख कर मैं उसकी तरफ दौड़ पड़ा और उसके पैरों में जा गिरा। राजकुमारी ने उठा कर मुझे अपनी छाती से लगा लिया। उस समय हम दोनों की हालत खोयी खोयी सी हो रही थी। जब हम कुछ होश में आये तो मैंने उससे पूछा कि उसको क्या हुआ था।

उसने जवाब दिया — “जब बन्दरगाह का गवर्नर सब लड़कियों को राजा के पास ले गया तो मैं अल्लाह से यह प्रार्थना कर रही थी कि किसी को मेरा भेद न पता चलने पाये और साथ में तुम्हारी ज़िन्दगी को भी कोई खतरा न हो।

वह इतना बड़ा छिपाने वाला निकला कि किसी को यही पता नहीं चला कि मैं राजकुमारी हूँ। गवर्नर हर लड़की को खरीदने के ख्याल से सबको ध्यान से देख रहा था क्योंकि कुछ उसको अपने लिये भी खरीदनी थीं।

जब मेरी बारी आयी तो उसने मुझे चुन लिया और छिपा कर मुझे अपने घर भेज दिया। बाकी लड़कियों को उसने राजा के पास भेज दिया। जब मेरे पिता ने मुझे उन लड़कियों में नहीं देखा तो उन्होंने सारी लड़कियों को वापस भेज दिया। यह सब मेरी वजह से हुआ था।

अब उन्होंने कह दिया है कि राजकुमारी बहुत बीमार है। अब अगर मैं वहाँ कुछ समय तक नहीं गयी तो फिर सारे देश में मेरे मरने की खबर उड़ा दी जायेगी। तब राजा को शर्मिन्दगी नहीं उठानी पड़ेगी।

पर अब मैं बहुत परेशान हूँ क्योंकि गवर्नर मेरे लिये कुछ और सोच रहा है। हालाँकि वह मुझसे हमेशा अपने साथ रहने के लिये कहता है पर मैं उसकी इच्छाओं को नहीं मानती। पर वह मुझे प्यार बहुत करता है। वह अभी तक मेरी हाँ की इन्तजार में है इसलिये वह अभी तक चुप है।

पर मुझे डर है कि इस तरीके से यह मामला और कितना खींचा जा सकता है इसलिये मैंने यह तय किया है कि जब भी वह मेरे साथ कोई बुरा व्यवहार करने की कोशिश करेगा तो मैं अपने आपको मार लूँगी। पर अब क्योंकि अब मैं तुमसे मिल ली हूँ तो मैंने एक दूसरा ही तरीका ही सोच लिया है। अल्लाह ने चाहा तो इस तरीके से मैं यहाँ से भाग जाऊँगी। ”

मैं बोला — “तुम मुझे बताओ कि तुमने कौन सा तरीका सोचा है। ”

वह बोली — “अगर तुम थोड़ी सी मेहनत करो तो हमारा यह प्लान काम कर सकता है। ”

मैंने कहा — “मैं तुम्हारा हर हुकुम मानने के लिये तैयार हूँ। अगर तुम कहो तो मैं जलती हुई आग में कूद पड़ूँ। और अगर मुझे सीढ़ी मिल जाये तो मैं उसे लगा कर आसमान तक चला जाऊँ। मैं वही करूँगा जो तुम कहोगी। ”

राजकुमारी बोली — “तब तुम ऐसा करो कि बड़ी मूर्ति के मन्दिर जाओ और उस जगह जा कर जहाँ लोग अपने जूते उतारते हैं[14] देखना कि काले कैनवास का टुकड़ा पड़ा हुआ है।

इस देश का रिवाज यह है कि जो आदमी गरीब हो जाता है या अकेला हो जाता है वह उस काले कैनवास में अपने आपको लपेट कर वहाँ बैठ जाता है। सो जब लोग वहाँ पूजा करने जाते हैं तो वे सब उसको कुछ न कुछ देते हुए जाते हैं।

तीन चार दिनों में जब वह कुछ पैसे इकठ्ठा कर लेता है तब वहाँ का पुजारी उसको बड़ी मूर्ति की तरफ से एक खिलात देता है और उसको वहाँ से भगा देता है।

इस तरह से थोड़ा पैसे वाला हो कर वहाँ से चला जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता कि वह कौन था। तुम उस कैनवास को ओढ़ कर बैठ जाना और जब पुजारी जी और मूर्ति पूजा करने वाले तुम्हें खिलात दे दें और तुमसे जाने के लिये कहें पर तुम वहाँ से हिलना भी नहीं।

जब वे तुमसे बहुत विनती करें तो उनसे कहना कि “मुझे न पैसा चाहिये और न ही मुझे किसी ऐशो आराम की जरूरत है मैं तो एक चोट खाया हुआ आदमी हूँ और शिकायत करने आया हूँ।

अगर ब्राह्मणों की माँ न्याय करे तब तो ठीक है नहीं तो यह बड़ी मूर्ति मेरे साथ न्याय करेगी। यही बड़ी मूर्ति मेरी सहायता करेगी। यही मुझे दुख देने वाले के खिलाफ मेरी शिकायत सुनेगी। ”

जब तक ब्राह्मणों की माँ खुद वहाँ नहीं आ जाती कोई तुमसे वहाँ से जाने के लिये कितनी भी विनती क्यों न करे पर तुम वहाँ से हिलना नहीं।

आखिर मजबूर हो कर उसको खुद वहाँ आना पड़ेगा। वह बहुत बूढ़ी है – 240 साल की उम्र है उसकी और 36 बेटे हैं उसके जो उसी से पैदा हुए हैं। वे मन्दिर के बड़े पुजारी हैं। बड़ी मूर्ति उसकी बहुत इज़्ज़त करती है।

इसी लिये उसके पास इतनी ज़्यादा ताकतें हैं कि इस देश के छोटे बड़े सब उसका कहा मानते हैं। वह जो भी कहती है उसे सब दिल और आत्मा से मानते हैं।

तुम उसके स्कर्ट की झालर पकड़ कर लेट जाना और कहना — “ओ माँ। अगर आप मुझे तकलीफ देने वाले से न्याय नहीं दिलवायेंगी तो मैं बड़ी मूर्ति के सामने अपना सिर पटक पटक कर अपनी जान दे दूँगा। वह मेरे ऊपर दया जरूर करेगा और आपको भी बीच में पड़ने के लिये कहेगा। ”

इसके बाद जब वह तुमसे तुम्हारी शिकायत के बारे में पूछे तो उससे कहना — “मैं फारस का रहने वाला हूँ। मैं यहाँ बड़ी मूर्ति की पूजा करने बहुत दूर से आया हूँ। यहाँ आ कर मैंने आपके न्याय के बारे में बहुत कुछ सुना है।

कुछ दिन मैं यहाँ शान्ति से रहा। मेरी पत्नी भी मेरे साथ आयी है। मेरी पत्नी नौजवान है और बहुत सुन्दर है। मुझे नहीं मालूम कि किस तरह से बन्दरगाह के गवर्नर ने उसको देख लिया पर वह उसे मेरे पास से जबरदस्ती उठा कर ले गया और उसको अपने घर में बन्द कर लिया।

हम मुसलमानों में एक नियम है कि अगर कोई अजनबी हमारी किसी पत्नी को देख ले या उसे उठा कर ले जाये तो उसको मौत के घाट उतार दिया जाता है। यह किसी भी तरीके से पूरा किया जा सकता है और फिर उसकी पत्नी को वापस ले लिया जाता है।

अगर किसी वजह से ऐसा न हो सके तो आदमी को भूखे प्यासे ही रहना पड़ता है जब तक कि उसकी पत्नी अजनबी के पास रहती है। और फिर वह पत्नी अपने पति की भी नहीं रहती। और कोई रास्ता न देख कर मैं यहाँ आया हूँ। देखता हूँ कि आप मेरे साथ कैसा न्याय करती हैं। ”

जब राजकुमारी ने मुझे सब कुछ ठीक से समझा दिया तो मैंने उससे इजाज़त ली और उसी पाइप के सहारे बाहर आ गया। और लोहे की जाली उसके मुँह पर लगा दी।

जैसे ही सुबह हुई मैं मन्दिर गया और अपने आपको काले कैनवास से ढक कर वहीं बैठ गया। तीन दिन में ही मेरे पास सोने चाँदी के सिक्कों का बहुत सारे पैसों का और कपड़ों का ढेर लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे कोई छोटी सी दूकान लगी हो।

चौथे दिन पुजारी जी ने पूजा की और मुझे खिलात देने के लिये और मुझे वहाँ से वापस भेजने के लिये आये। पर मैं नहीं मान रहा था। मैं बड़ी मूर्ति को अपनी सहायता के लिये बुला रहा था।

मैंने कहा — “मैं यहाँ भीख माँगने नहीं आया मैं तो बड़ी मूर्ति और ब्राह्मणों की माँ से न्याय माँगने आया हूँ। और जब तक मुझे न्याय नहीं मिल जाता मैं यहाँ से हिलूँगा भी नहीं। ”

मेरा यह पक्का इरादा सुन कर वे बुढ़िया के पास गये और जो कुछ मैंने उनको बताया वह उन्होंने जा कर उसको बताया। उसके बाद एक ब्राह्मण मेरे पास आया और मुझसे बोला — “आइये माँ आपको बुला रही हैं। ”

मैंने तुरन्त ही उस काले कैनवास में अपने आपको लपेटा और उसके कमरे की देहरी पर जा पहुँचा। वहाँ पहुँच कर मैंने देखा कि बड़ी मूर्ति एक जवाहरात जड़े सोने के सिंहासन पर बैठी हैं जिसमें मोती लाल हीरे और मूँगे आदि जड़े हुए थे।

सोने की एक कुरसी के ऊपर एक बहुत कीमती कपड़ा बिछा हुआ है जिस पर काले कपड़े पहन कर एक बुढ़िया बड़ी शान के साथ तकियों के सहारे बैठी हुई थी। उसके पास ही 10–12 साल की उम्र के दो लड़के खड़े हुए थे। एक उसके दाँये हाथ को खड़ा था दूसरा उसके बाँये हाथ को।

उसने मुझे अपने सामने बुलाया तो मैं उसकी तरफ आगे बढ़ा और बहुत ही इज़्ज़त के साथ मैंने उसके सिंहासन के पाये को चूम लिया। फिर मैंने उसका स्कर्ट पकड़ लिया।

उसने मेरी कहानी पूछी। मैंने उसे वही कह दिया जो राजकुमारी ने मुझसे उससे कहने को कहा था।

कहानी सुन कर वह बोली — “क्या मुसलमान अपनी पत्नियों को इस तरह छिपा कर रखते हैं। ”

“जी। आपके बच्चे अच्छे रहें यह हमारा पुराना रिवाज है। ”

वह बोली — “तेरा यह अच्छा धर्म है। मैं तुरन्त ही यह हुकुम देती हूँ कि बन्दरगाह के गवर्नर को तेरी पत्नी के साथ साथ यहाँ लाया जाये। और मैं उस गधे को इस तरीके से सजा दूँगी कि वह ऐसा काम फिर दोबारा कभी नहीं करेगा और सजा देखने वाले भी काँप जायेंगे। ”

उसने अपने नौकरों से पूछा — “बन्दरगाह का गवर्नर कौन है। उसकी यह हिम्मत कैसे हुई कि वह किसी दूसरे आदमी की पत्नी को जबरदस्ती उठा कर ले जाये। ”

नौकरों ने जवाब दिया — “वह फलाँ फलाँ है। ”

उसका नाम सुन कर माँ ने अपने पास खड़े हुए दोनों लड़कों से कहा — “इस आदमी को तुरन्त ही यहाँ से ले जाओ और राजा से जा कर कहो — “माँ का कहना है कि बड़ी मूर्ति का यह हुकुम है कि बन्दरगाह के गवर्नर को लोगों पर बहुत ज़्यादा हिंसा का व्यवहार करने के लिये, जैसे कि उसने इस आदमी की पत्नी को जबरदस्ती उठा लिया और उसकी यह गलती बहुत बड़ी है, इसके लिये इसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाये और इस तुर्क को दे दी जाये नहीं तो तुम हमारे गुस्से के शिकार हो कर आज रात को ही नष्ट हो जाओगे। ”

दोनों लड़के वहाँ से चल दिये। दोनों ने अपने अपने घोड़े लिये उस पर सवार हुए। सारे पुजारियों ने अपने अपने शंख बजाये और अपनी अपनी पोशाकें पहन कर वहाँ से चल दिये। घोड़े वालों के घोड़ों के खुरों से जो धूल उठ रही थी उसे शहर के सब छोटे बड़े अपनी अाँखों पर लगा रहे थे।

इस तरह से वे सब राजा के पास पहुँचे। राजा ने जब उनके आने की खबर सुनी तो वह नंगे पैर उनके स्वागत के लिये दौड़ा। वह उनको बड़ी इज़्ज़त के साथ अन्दर ले कर आया। उसने उनको अपने सिंहासन पर अपने पास बिठाया।

उसने उनसे कहा कि “आज मुझे किस हुकुम की इज़्ज़त दी जा रही है। ”

दोनों ब्राह्मणों ने वही दोहरा दिया जो उन्होंने माँ से सुना था। उनकी सारी बातें सुनी थीं और उसको बड़ी मूर्ति की नाराजगी की धमकी भी सुनायी।

यह सुन कर राजा बोला — “ठीक है। बन्दरगाह के गवर्नर और उस स्त्री को लाने के लिये मैं अभी कुछ न्याय के अधिकारियों को भेजता हूँ जो उन दोनों को यहाँ ले कर आयेंगे। तब मैं उसके अपराध की जाँच करूँगा और उसके अनुसार उसकी सजा निश्चित करूँगा। ”

यह सुन कर मैं बहुत परेशान हो गया। मैंने अपने मन में सोचा कि “यह मामला तो कुछ ठीक नहीं रहा। क्योंकि अगर राजकुमारी को बन्दरगाह के गवर्नर के साथ बुलाया गया तब तो यह मामला खुल जायेगा फिर मेरा क्या होगा। ”

मैं अपने मन में बहुत डर गया। मैंने अपने अल्लाह की तरफ देखा पर डर ने भक्ति को दबा लिया और मैं काँपने लगा। लड़कों ने जब मेरा रंग बदलते देखा तो उन्होंने महसूस किया कि शायद यह हुकुम इसको मान्य नहीं है इसकी इच्छा के अनुसार नहीं है।

वे तुरन्त ही बहुत गुस्सा हो गये और बड़े कठोर शब्दों में राजा से बोले — “क्या तू पागल हो गया है कि तू बड़ी मूर्ति का हुकुम मानने से इनकार करता है और तूने यह सोचा कि जो कुछ हमने कहा वह झूठ है।

तू उन दोनों को यहाँ बुला कर उनके मामले को जाँचना चाहता है पर ध्यान रखना तेरे ऊपर बड़ी मूर्ति पहले से ही बहुत गुस्सा है। हमने अपना काम कर दिया उनका हुकुम सुना दिया। इसके आगे तुझे क्या करना है यह देखना तेरा काम है वरना बड़ी मूर्ति तुझे देख लेगी। ”

यह सुन कर तो राजा बहुत ही सावधान हो गया और अपने दोनों हाथ जोड़ कर लड़कों के सामने खड़ा हो गया। बहुत ही नम्रता से उसने उन दोनों को शान्त करने की कोशिश की पर वे बैठे नहीं बस खड़े ही रहे।

इस बीच सब कुलीन लोग जो वहाँ मौजूद थे गवर्नर की बुराई करने लगे कि “वह तो सचमुच बहुत ही नीच आदमी है। वह तो इतना अत्याचार करता है और इतने सारे अपराध करता है कि हम उन्हें शाही दरबार में कह भी नहीं सकते।

ब्राह्मणों की माँ ने जो कुछ भी कहला कर भेजा है वह सब बिल्कुल सही है। और इसके अलावा यह बड़ी मूर्ति का फैसला है तो यह झूठ भी कैसे हो सकता है।

जब राजा ने वही कहानी दूसरे लोगों से सुनी तो उसको अपने कहे हुए पर बहुत शर्म आयी और बहुत पछतावा हुआ। उसने तुरन्त ही मुझे एक बहुत ही कीमती खिलात दिया। उसने अपने हाथ से एक हुकुमनामा लिखा और उसको अपनी निजी सील से बन्द किया[15] और उसे मुझे दिया।

उसने एक नोट ब्राह्मणों की माँ के नाम भी लिखा। ब्राह्मणों के लड़कों के सामने कई थाल भर कर सोना और जवाहरात रखे और उनको विदा किया। मैं भी खुशी खुशी मन्दिर लौट आया और बुढ़िया के पास गया।

राजा के पास से जो चिठ्ठी आयी थी उसमें साधारण अभिवादन के बाद लिखा था — “योर हाइनैस के हुकुम के अनुसार बन्दरगाह के गवर्नर का मामला इस मुसलमान को सौंप दिया गया है। एक खिलात भी उसको दे दी गयी है।

अब वह गवर्नर को मौत की सजा देने के लिये आजाद है। गवर्नर की सारी सम्पत्ति इस मुसलमान को दे दी जाये और यह मुसलमान फिर गवर्नर के साथ जो कुछ भी वह चाहे वह करे। आशा है कि मेरी गलती माफ कर दी जायेगी। ”

ब्राह्मणों की माँ इस चिठ्ठी को पढ़ कर बहुत खुश हुई और बोली पगोडा के “नौबतखाने[16] में संगीत का इन्तजाम करो। फिर उसने मेरे साथ 500 हथियारबन्द सिपाही कर दिये जो सभी बहुत अच्छे निशानेबाज थे।

उसने उनको हुकुम दिया कि वे बन्दरगाह के गवर्नर को जा कर पकड़ें और उसे मुझे सौंप दें ताकि मैं उसके साथ जैसा चाहूँ वैसा व्यवहार कर सकूँ। चाहे मैं उसे केवल तकलीफ दूँ या मार दूँ।

इसके अलावा वे यह भी ध्यान रखें कि गवर्नर के जनानखाने में केवल मैं ही जा सकूँ और दूसरा कोई नहीं और वह अपनी सारी सम्पत्ति इस मुसलमान को दे दे।

जब यह मुसलमान अपने आप ही उनको वहाँ से भेजे वे वहाँ से तभी जायें और जाने से पहले उससे अपने आजाद होने का कागज ले लें। उसके बाद तुम लोग मेरे पास वापस आना। ”

तब उसने मुझे बड़ी मूर्ति के कपड़ों में से एक पूरी पोशाक दी और उसको पहना कर मुझे विदा किया।

मैं जब बन्दरगाह पहुँचा तो मेरे साथ के आदमियों में से एक आदमी मेरे आगे आगे जा रहा था। उसने गवर्नर को मेरे आने की सूचना दी। वह ऐसे बैठा हुआ जैसे वह बहुत परेशान था।

clip_image004जब मैं वहाँ पहुँचा तो मैं तो बहुत पहले से ही गुस्से में था। बस मैंने अपनी तलवार निकाली और एक ही वार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उसका सिर मक्के के भुट्टे की तरह से टूट कर जा गिरा।

मैंने सबको हुकुम दे कर उसकी सारी सम्पत्ति अपने कब्जे में कर ली। उसके बाद मैं उसके जनानखाने में घुसा। वहाँ मैं राजकुमारी से मिला तो हम दोनों एक दूसरे को गले लगा कर बहुत रोये। फिर अल्लाह को धन्यवाद देते हुए एक दूसरे के आँसू पोंछे।

हम लोगों ने मसनद पर बैठ कर बन्दरगाह के औफीसरों को खिलात दी और उनको फिर से उनकी जगहों पर तैनात किया। नौकरों और दासों को मैंने ऊँचे ओहदे दिये। जो लोग मेरे साथ मन्दिर से आये थे उनको मैंने भेंटें दीं और कपड़े दे कर विदा किया।

उसके बाद मैं कीमती जवाहरात बढ़िया कपड़े शाल ब्रोकेड और बहुत सारा सामान साथ में ले कर राजा के पास गया। उनके कुलीन लोगों के लिये भी कुछ भेंटें थीं और पुजारियों और पुजारिनों के लिये भी।

एक हफ्ते बाद में फिर से बड़ी मूर्ति के मन्दिर गया अअैर वहाँ बुढ़िया को कुछ भेंट दे कर आया। उसने मुझे फिर से एक बहुत ही बढ़िया खिलात दिया और एक खिताब भी।

मैं फिर राजा के पास गया और अपनी पेशकश बतायी। मैंने योर मैजेस्टी से विनती की कि वह बन्दरगाह के इस गवर्नर की बुराइयों के जो नतीजे निकले हैं वह उन सबको दूर करे।

यह सुन कर राजा दरबार के कुलीन लोग और सौदागर सभी बहुत खुश हो गये। इसके लिये राजा ने मुझे भेंटें दीं। एक खिलात दिया एक घोड़ा दिया एक खिताब दिया और एक जागीर दी। और भी कई इज़्ज़तें बख्शीं।

जब मैं दरबार से लौट कर आया तो मैंने नौकरों आदि को सबको इतना दिया कि वे हर समय मेरे भले की इच्छा करने लगे। अब मेरी हालत यहाँ बहुत अच्छी हो गयी थी। यहाँ में कुछ समय बड़े ऐशो आराम से रहा। राजकुमारी से शादी करके मैं अक्सर इस बात के लिये अल्लाह को दुआ देता रहा।

मेरे शहर के रहने वाले भी मेरे बराबरी के नियमों से से बहुत खुश थे। महीने में एक बार मैं मन्दिर जाया करता था और कभी कभी राजा के पास भी। राजा ने मुझे बाद में और भी कई तरक्कियाँ दीं।

बाद में राजा ने मुझे अपना निजी सलाहकार बना लिया। अब वह मेरी सलाह के बिना कुछ नहीं करता था। मेरी ज़िन्दगी बड़ी खुशी में कटने लगी।

पर यह तो मेरा अल्लाह ही जानता है कि मैं अपने दोनों भाइयों को कितना याद करता था और उनके बारे में जानने के लिये इच्छुक भी रहता था कि वे कहाँ थे कैसे थे।

दो साल बाद ज़रबाद देश से फारस जाने वाला एक काफिला वहाँ आया। वे सब समुद्र के रास्ते अपने देश जाना चाहते थे। अब बन्दरगाह का नियम यह था कि जब कभी कोई कारवाँ यहाँ आता था तो उसके सरदार मुझे अलग अलग देशों की विचित्र विचित्र चीज़ें भेंट देने के लिये आते थे।

कारवाँ के बन्दरगाह पर आने पर उसके अगले दिन मैं सरदार के पास 10 परसैन्ट टैक्स लेने के लिये जाता जो उसके सामान पर लगता। टैक्स ले कर मैं उनको वहाँ से जाने की इजाज़त दे देता था।

सो जब यह ज़रबाद वाला कारवाँ आया तो उसका सरदार मेरे पास आया और मेरे लिये बहुत कीमती भेंटें लाया। दूसरे दिन मैं उनके तम्बुओं में गया तो वहाँ मैंने अपने सामने ही दो आदमी देखे जो फटे कपड़े पहने थे।

वे सामान के कुछ डिब्बे अपने सिर पर लादे हुए थे। जब मैंने उन डिब्बों को देख लिया तो वे उनको वापस ले गये। वे बहुत मेहनत कर रहे थे और उन पर निगाह रखी जा रही थी। मैंने उनकी तरफ ध्यान से देखा तो देखा कि वे तो वास्तव में मेरे ही भाई थे।

उस समय तो मेरा ओहदा और शर्म मुझे उनकी तरफ इस हालत में देखने से भी रोक रही थी पर जब मैं घर वापस आया तो मैंने अपने नौकरों से उन दोनों आदमियों को अपने पास बुलवाया। जब वे आ गये तो मैंने उनके लिये कपडे, बनवाये और उनको अपने पास ही रख लिया।

पर इन नीच लोगों ने मुझे मारने का फिर से प्लान बनाना शुरू कर दिया। एक दिन आधी रात के समय जब उनके ऊपर कोई शक नहीं किया जा रहा था तो वे चोर की तरह से मेरे सोने के कमरे में आये और मेरे बिस्तर के सिरहाने की तरफ आ गये।

मेरे सोने वाले कमरे के दरवाजे पर अपनी सुरक्षा के लिये मैंने एक पहरेदार रख रखा था। और यह वफादार कुत्ता मेरे बिस्तर के बराबर में सोया करता था। पर जैसे ही उन्होंने म्यान में से अपनी तलवारें खींची सबसे पहले कुत्ता जागा और वह उनके ऊपर कूद पड़ा।

इससे जो शोर हुआ उससे मैं चौंक कर उठ गया। पहरेदार ने उनको पकड़ लिया और मैंने भी उनको जान लिया कि ये लोग बाज़ नहीं आयेंगे। सब उनको बुरा भला कहने लगे कि मेरे उनके साथ इतनी मेहरबानी का व्यवहार करने के बाद भी इन लोगों ने मेरे साथ इतना बुरा व्यवहार किया।

ओ राजा आप शान्ति से रहें। अब मुझे अपनी ज़िन्दगी की चिन्ता होने लगी। एक बड़ी सामान्य कहावत है कि एक या दो गलतियाँ तो माफ कर दी जाती हैं पर तीसरी गलती पर तो सजा मिलती ही है।

इसके बाद मैंने अपने दिल में तय किया कि मैं उनको बन्द करके रखूँगा। पर अगर उनको मैंने जेल में रखा तो उनकी परवाह कौन करेगा। वे भूख और प्यास से मर भी सकते हैं या फिर कुछ और शरारत कर सकते हैं।

इसलिये मैंने इनको पिंजरे में बन्द रखने का फैसला किया ताकि ये हमेशा मेरी आँखों के सामने रहें इससे मेरे दिमाग को भी शान्ति रहेगी कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी आँखों से दूर रह कर फिर ये मेरे खिलाफ कोई और षड़यन्त्र् रचें।

जो इज़्ज़त मैं अपने इस कुत्ते को देता हूँ उसकी वजह है इसकी वफादारी। मैं इससे कभी उऋण नहीं हो सकता। जो एक वफादार से अपनी कृतज्ञता नहीं दिखा सकता वह एक वफादार बेरहम से भी गया बीता है।

ओ अल्लाह यही मेरी कहानी है जो मैंने योर मैजेस्टी को सुनायी। अब आप चाहें तो मुझे मौत की सजा दे दें या मेरी ज़िन्दगी बख्श दें। जैसा आप चाहें। ”

राजा आजाद बख्त अपनी कहानी सुनाते हुए बोला — “उस आदमी का यह हाल सुन कर मैंने उस इज़्ज़त वाले आदमी की बहुुत बड़ाई की और कहा — “तुम्हारी मेहरबानियों की तो कोई सीमा ही नहीं है और वे बीच में कभी टूटी भी नहीं हैं। और इन नीच लोगों के नीच कामों की कोई सीमा नहीं है।

यह सच ही है कि “कुत्ते की पूँछ चाहे 12 बरस गड्ढे में दबा कर रखो पर फिर जब भी निकालोगे तो टेढ़ी ही निकलेगी। ”

इसके बाद मैंने ख्वाजा से कहा कि वह मुझे उन 12 लाल की कहानी बताये जो उसके कुत्ते के कौलर में जड़े हुए थे।

वह बोला — “अल्लाह करे योर मैजेस्टी की उम्र 120 साल की हो। जब मुझे वहाँ के गवर्नर का काम करते हुए 3–4 साल हो गये तो एक दिन मैं अपने घर की छत पर बैठा हुआ समुद्र और मैदान देख कर आनन्द ले रहा था। मैं अपने घर के चारों तरफ देख रहा था।

कि मैंने एक तरफ से जंगल से दो आदमी जैसे आते हुए देखे। वहाँ कोई सड़क नहीं थी। मैंने अपना दूरदर्शक यन्त्र् उठाया और उनको देखने की कोशिश की तो मुझे उनकी शक्ल कुछ अजीब सी दिखी। मैंने तुरन्त ही अपने कुछ आदमी उनको अपने सामने लाने के लिये भेजे।

जब वे आ गये तो मैंने देखा कि उनमें से एक आदमी था और एक स्त्री थी। स्त्री को तो मैंने राजकुमारी के पास जनानखाने में भेज दिया और आदमी को मैंने अपने पास बुलवा लिया। मैंने देखा कि वह 20–22 साल का एक नौजवान था।

उसके दाढ़ी मूँछ आनी शुरू हो गयी थीं पर उसके चेहरे का रंग तो बिल्कुल तवे की तरह काला था। उसके सिर के बाल और उँगलियों के नाखून गरमी की वजह से बहुत बढ़ गये थे। वह एक बिल्कुल ही जंगली किस्म का आदमी लग रहा थे।

उसके कन्धे पर एक 3–4 साल का लड़का बैठा था। उसकी किसी पोशाक की दो बाँहें किसी चीज़ से भरी हुई कौलर की तरह से उसकी गरदन के दोनों तरफ लटक रही थीं। वह दिखने में बहुत ही अजीब सा लग रहा था और उसने कपड़े भी अजीब से पहने हुए थे। मैं उसको देख कर आश्चर्यचकित रह गया।

मैंने पूछा — “दोस्त तुम कौन हो। किस देश के रहने वाले हो और किस अजीब से हाल में मैं तुम्हें देख रहा हूँ। ”

नौजवान बहुत ज़ोर से रो पड़ा। उसने अपनी गरदन से वे दोनों आस्तीनें निकालीं और मेरे पैरों के पास रख दीं और बोला — “भूख, भूख मुझे कुछ खाने को दो। मुझे जड़ और पत्ते खाते खाते बहुत दिन हो गये। अब मेरे अन्दर ताकत बिल्कुल नहीं रह गयी है। ” मैंने तुरन्त ही उसके लिये कुछ रोटी माँस और वाइन मँगवायी और वह भी उसके ऊपर जल्दी से टूट पड़ा।

इस बीच मेरा एक खास नौकर अन्दर से कई थैले और ले आया जो उस नौजवान की पत्नी के पास थे। मैंने उन्हें खोलने के लिये कहा तो उनमें तो बहुत सारे जवाहरात थे।

उनमें से हर एक की कीमत इतनी थी जितनी कि एक राजा की आमदनी होती है। हर एक एक दूसरे से वजन में शक्ल और चमक में पहले से ज़्यादा था। मेरा पूरा कमरा उनकी रंग बिरंगी रोशनियों से दमक रहा था।

जब नौजवान ने अपना खाना खत्म कर लिया और वाइन भी पी ली तब उसे कुछ होश सा आया। तब मैंने उससे पूछा कि उसको ये जवाहरात कहाँ से मिले।

वह बोला मैं अज़रबजान[17] का रहने वाला हूँ। मैं अपने घर और माता पिता से बचपन में ही अलग हो गया हूँ और जब से मैं अलग हुआ हूँ तबसे मैंने बहुत मुसीबतें झेली हैं। बहुत दिनों तक तो मैं ज़िन्दा ही दफ़न रहा। अक्सर मृत्युदूत के पंजों से बच निकला हूँ।

मैंने कहा — “तुम मुझे अपनी पूरी कहानी सुनाओ ताकि मैं तुम्हारी कहानी पर विचार कर सकूँ। ”

तब उसने मुझे अपनी यह कहानी सुनायी — “मेरे पिता एक सौदागर थे। वह बराबर हिन्दुस्तान आया करते थे और साथ में मुझे भी ले जाने की इच्छा रखते थे।

हालाँकि मेरी माँ और मेरी चाची ताइयों ने उनसे बहुत कहा कि यह अभी इतनी दूर जाने के लिये बच्चा है अभी यह यात्रा करने लायक बड़ा नहीं हुआ है। तुम इसे यात्रा पर ले जाओगे तो कब्र में भी पछताओगे पर मेरे पिता ने उनकी कोई बात नहीं सुनी।

उन्होंने उनसे कहा — “मैं अब बूढ़ा हो रहा हूँ अगर मैं इसको अपनी आँखों के सामने तैयार नहीं कर सका तब मुझे इस बात का पछतावा अपनी कब्र में जरूर रहेगा। यह एक मर्द का बेटा है। अगर यह अब नहीं सीखेगा तो फिर कब सीखेगा। ”

यह कह कर उनके कई बार मना करने पर भी उन्होंने मुझे भी साथ में लिया और हम चल दिये। यात्रा में कोई बीमार नहीं पड़ा और हम सुरक्षित हिन्दुस्तान पहुँच गये।

वहाँ पहुँच कर हमने अपना कुछ सामान बेचा और वहाँ से कुछ बहुत ही कीमती चीज़ें ले कर हम ज़रबाद देश के लिये चल दिये।

यह यात्रा भी हमारी सुरक्षित रूप से पूरी हुई। वहाँ भी हमने कुछ बेचा कुछ खरीदा और फिर अपने देश वापस आने के लिये एक जहाज़ पर चढ़े।

हम एक महीने तक चलते रहे फिर एक दिन समुद्र में तूफान आ गया। ऊँची ऊँची लहरें उठने लगीं। बारिश भी बहुत ज़ोर से बरसने लगी। सारी धरती और आसमान अँधेरा हो गया जैसे सारे में धुँआ फैल गया हो। हमारा जहाज़ टूटने लगा। जहाज़ के चलाने वाले और मालिक सभी अपना सिर पीटने लगे।

दस दिन का यह तूफान और हवाएँ हमको वहीं ले गयीं जहाँ इनका दिल चाहा। 11वें दिन हमारा जहाज़ एक चट्टान से टकरा गया और टुकड़े टुकड़े हो गया। मेरे पिता का उनके नौकरों का और हमारे सब सामान का क्या हुआ मुझे नहीं पता।

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको एक तख्ते पर पाया जो तीन दिन तीन रात तक समुद्र पर तैरता रहा। चौथे दिन जा कर वह किसी किनारे लगा। मैं बस ज़िन्दा था। मैं तख्ते पर से उतरा और किसी तरह घुटनों के बल खिसक खिसक कर सूखी जमीन पर पहुँचा।

कुछ दूर पर मुझे खेत दिखायी दिये। वहाँ बहुत सारे लोग जमा थे। पर वे सब काले थे और इतने नंगे थे जैसे जन्म के पहले दिन। उन्होंने मुझसे कुछ कहा जो मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आया। उनका वह चने का खेत था।

वहाँ लोगों ने एक बहुत बड़ी आग जलायी और उसमें उन चनों को भूना और खाया। तभी मुझे वहाँ कुछ घर भी दिखायी दिये। लगता था शायद यही उनका खाना था और यहीं वे रहते थे। मैंने भी वहाँ से कुछ चने की बालियाँ तोड़ीं और उनके भून कर खाया और पानी पिया। खा पी कर मैं खेत के कोने में सो गया।

कुछ देर के बाद जब मैं जागा तो उन आदमियों से एक मेरे पास आया और इशारों से मुझे सड़क दिखाने लगा। मुझे अपनी आँखों के आगे इतना बड़ा एक एकसार मैदान दिखायी दिया जितना कि जजमैन्ट के दिन[18] होता है। मैं चने खाता हुआ आगे बढ़ने लगा।

चार दिन तक चलने के बाद मुझे एक किला दिखायी दिया। जब मैं उसके पास पहुँचा तो मैंने देखा कि वह तो बहुत ऊँचा किला है। वह किला पूरा का पूरा पत्थर का बना हुआ था। उसका दरवाजा केवल एक पत्थर में से काट कर बनाया गया था। उसमें एक ताला लटका हुआ था।

पर वहाँ कोई आदमी नजर नहीं आ रहा था। मैं वहाँ से आगे बढ़ा तो मुझे एक पहाड़ी नजर आयी। जहाँ की जमीन सुरमे जैसी काली थी। मैं जब उस पहाड़ी पर चढ़ा तो वहाँ मुझे एक बहुत बड़ा शहर दिखायी दिया जिसके चारों तरफ दीवार था।

उसके एक तरफ एक बहुत चौड़ी नदी बह रही थी। आगे चलते चलते मैं एक दरवाजे के पास पहुँच गया था। अल्लाह का नाम ले कर मैं उसमें घुस गया।

वहाँ एक आदमी एक कुरसी पर बैठा हुआ था जिसने यूरोप के रहने वालों जैसे कपड़े पहने हुए थे। जैसे ही उसने मुझे देखा तो उसे लगा कि कोई विदेशी यात्री उसने मुझे अपने पास बुलाया तो मैं उसके पास चला गया और उसको सलाम किया।

उसने मेरे सामने तुरन्त ही मेज लगवायी जिस पर रोटी मक्खन भुनी हुई बतख और वाइन रखी हुई थी और बोला — “लो पेट भर कर खाओ। ” मैंने थोड़ा सा ही खाया थोड़ी सी वाइन पी और सो गया।

जब मेरी आँख खुली तो रात हो गयी थी। मैंने अपने हाथ पैर धोये। उसने मुझे खाने के लिये फिर से कुछ दिया और कहा — “बेटे। अब तुम मुझे अपनी कहानी सुनाओ। ” मैंने उसे जो कुछ हुआ था वह सब बता दिया।

उसने फिर पूछा — “तुम यहाँ आये क्यों हो। ”

मुझे कुछ गुस्सा सा आ गया तो मैं बोला — “लगता है कि तुम पागल हो। इतने दिनों तक तकलीफ सहने के बाद तो मैं कोई ऐसी जगह देख पाया हूँ जहाँ कोई आदमी रहता है। अल्लाह मुझे यहाँ तक ले कर आया है और तुम मुझसे यह पूछ रहे हो कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। ”

वह बोला — “जाओ और जा कर आराम करो। जो कुछ मुझे तुमसे कहना है उसे कहने लिये मैं तुम्हें कल बुलाऊँगा। ”

जब सुबह हुई तो उसने मुझे बुलाया और कहा — “इस कमरे में एक फावड़ा है एक छलनी है और एक चमड़े का थैला है। वे सब यहाँ ले आओ। ”

मैंने अपने मन में सोचा कि क्येंकि मैंने उसकी रोटी खायी है इसके लिये पता नहीं वह मुझसे क्या मेहनत करवायेगा। मैंने वे तीनों चीज़ें उठायीं और ला कर उसके सामने रख दीं। उसके बाद उसने मुझसे काली पहाड़ी पर जाने के लिये कहा जिससे मैं अभी हो कर आया था।

वहाँ जा कर करीब एक गज गहरा गड्ढा खोदने के लिये कहा और उसमें से जो कुछ निकले उसे छानने के लिये कहा। फिर उसने कहा कि जो कुछ चलनी में से न निकल पाये उसे इस चमड़े के थैले में भर कर तुम मेरे पास ले आना।

मैंने वे तीनों चीज़ें लीं और काली पहाड़ी की तरफ चल दिया। वहाँ जा कर मैंने एक गज गहरा गड्ढा खोदा और उससे निकली मिट्टी को छलनी में छान लिया। जो उसमें नहीं छन सका उसको मैंने चमड़े वाले थैले में उसके मुँह तक भर लिया और उसके पास ले गया।

उसने थैला मुझे दे कर कहा जो कुछ इस थैले में है वह तुम ले जाओ। और इसे ले कर तुम कहीं और चले जाओ अगर तुम यहाँ इस शहर में रुकोगे तो यह सब तुम्हारे काम नहीं आयेगा। ”

मैंने कहा — “योर वरशिप ने अपनी तरफ से मेरे लिये ये पत्थर के टुकड़े मुझे दे कर बहुत बड़ा काम किया है पर ये मेरे किस काम के। जब मुझे भूख लगेगी तब तो मैं इनको खा नहीं सकूँगा तो मैं अपना पेट कैसे भरूँगा। और अगर तुम मुझे ये और भी दे दोगे तो भी ये मेरे किस काम के। ”

वह आदमी मुस्कुराया और बोला — “मुझे तुम पर दया आती है क्योंकि तुम भी मेरी तरह फारस के रहने वाले हो। इसी वजह से मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम यहाँ मत रहो नहीं तो ये तुम्हारे पास ही रह जायेंगे।

अगर तुमने पक्का इरादा कर लिया है कि तुम्हें कितनी भी परेशानी क्यों न हो तुम्हें इस शहर में घुसना ही है तब तुम मेरी यह अँगूठी अपने साथ ले जाओ।

जब तुम शहर के बाजार के बीच के हिस्से में पहुँच जाओ तो वहाँ तुम्हें एक सफेद दाढ़ी वाला आदमी बैठा हुआ मिलेगा। उसका चेहरा और शक्ल भी मेरी ही जैसी है।

वह मेरे सबसे बड़े भाई हैं। तुम यह अँगूठी ले जा कर उनको दे देना तो वह तुम्हारी देखभाल करेंगे। जैसा वह कहें वैसा ही करना नहीं तो बेकार ही मारे जाओगे। मेरा अधिकार केवल इसी शहर तक है। मैं उस शहर में नहीं जा सकता। ”

मैंने उस आदमी से अँगूठी ली और उसको सलाम करके चल दिया। मैं उस शहर में घुसा तो देखा कि वह तो बड़ी शानदार जगह थी। सड़कें और बाजार सब साफ पड़े थे। स्त्री पुरुष एक दूसरे से छिपाये बिना चीज़ें खरीद और बेच रहे थे। सब बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थे।

मैं अपने दोनों तरफ देखता हुआ बढ़ता चला गया। जब मैं एक चौराहे पर पहुँचा तो वहाँ तो बहुत भीड़ लगी थी। अगर तुम पीतल की कोई तश्तरी फेंको तो वह तो केवल लोगों के सिर को ही छुएगी।

सब लोग इतनी करीब करीब चल रहे थे कि कोई भी उनके बीच से हो कर नहीं निकल सकता था। जब यह भीड़ ज़रा सी कम हुई तो लोगों को थोड़ा हटाता हुआ आगे बढ़ा। आगे चल कर मैंने देखा कि एक सफेद दाढ़ी वाला एक कुरसी पर बैठा हुआ है। उसके पास कीमती जवाहरात का एक चुम्मक[19] का सैट है।

मैं आगे बढ़ा मैंने उसे सलाम किया और उसके भाई की दी हुई अँगूठी उसको दे दी। उसने मेरी तरफ गुस्से से देखा और पूछा — “तुम यहाँ क्यों आये हो। क्या परेशानियों को भुगतने के लिये? क्या मेरे बेवकूफ भाई ने तुम्हें बताया नहीं कि तुमको यहाँ नहीं आना चाहिये था?”

मैंने कहा — “उन्होंने मुझे मना तो किया था पर मैंने ही उनकी बात पर ज़्यादा कुछ ध्यान नहीं दिया। ”

फिर मैंने उसको शुरू से ले कर अपना पूरा हाल बता दिया। वह आदमी वहाँ से उठा और मुझे अपने घर ले गया। उसका घर तो राजाओं के महल जैसा था उसके पास बहुत सारे नौकर चाकर थे।

जब वह अपने निजी कमरे में जा कर बैठ गया उसने मुझसे बहुत ही मुलायमियत से कहा — “देखो बेटा। जो बेवकूफी तुमने की है उससे अब तुम अपने ही पैरों पर चल कर अपनी कब्र में जाओगे। कोई खरदिमाग ही इस जादुई शहर में आता है। ”

मैंने कहा — “मैंने आपको अपनी पूरी कहानी बता दी है। ऐसा लगता है कि मेरी किस्मत ही मुझे यहाँ ले कर आयी है। पर मेहरबानी करके मुझे यहाँ के रस्मो रिवाज और तौर तरीकों के बारे में बताइये तभी मैं जान पाऊँगा कि क्यों आप लोग यानी आप और आपके भाई ने मुझे यहाँ ठहरने के लिये मना किया है। ”

वह भला आदमी बोला — “इस शहर का राजा और सारे कुलीन लोग समाज से निकाल दिये गये हैं। क्योंकि इनके व्यवहार तौर तरीके धर्म सब बहुत अलग हैं। यहाँ एक मूर्ति का मन्दिर है। उस मूर्ति के पेट से शैतान एक नाम बोलता है और उसके साथ उसका धर्म और विश्वास भी बोलता है। जो भी यात्री यहाँ आता है तो राजा के पास उसकी सूचना पहुँच जाती है।

वह उस यात्री को पगोडा ले जाता है और वहाँ ले जा कर उसको मूर्ति के सामने लेटने को कहता है। यहाँ तक तो ठीक है। नहीं तो उस बेचारे को नदी में डुबो दिया जाता है। और अगर वह नदी में से भागने की कोशिश करता है तो उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है। [20]

अल्लाह ने इस शहर में इसी तरह का विधान बनाया है। इसी लिये मुझे तुम्हारे यहाँ आने पर तुम्हारी नौजवानी पर बहुत दया आती है। पर तुम्हारे लिये मैंने एक तरकीब सोची है ताकि तुम इस परेशानी से बच जाओ और कुछ दिन ज़िन्दा रह सको। ”

मैंने पूछा — “वह क्या तरकीब है बताइये। ”

वह बोला — “मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी शादी हो जाये। और इसके लिये तुम्हें वजीर की बेटी मिले। ”

मैं बोला — “पर वह वजीर मुझ जैसे गरीब और अभागे को अपनी बेटी क्यों देने लगा। और यह सब तब होगा क्या जब मैं उसका धर्म अपनाऊँगा। यह तो मैं कभी नहीं कर सकता।

वह आदमी फिर बोला — “इस शहर की एक रीति और भी है कि जो कोई भी मूर्ति के सामने लेटता है तो चाहे वह भिखारी ही क्यों न हो अगर वह राजा की बेटी ही क्यों न माँगे राजा को उसे उसकी इच्छा पूरी करने के लिये उसे देना पड़ता है। फिर वह उसके लिये दुखी नहीं होता।

मैं आजकल राजा का विश्वासपात्र हूँ और वह मेरी बहुत इज़्ज़त करते हैं। इसी लिये यहाँ के कुलीन और औफीसर लोग भी मेरी बहुत इज़्ज़त करते हैं। हर हफ्ते वे पूजा करने के लिये पगोडा दो बार जाते हैं। अब वे लोग वहाँ कल मिलेंगे। कल मैं तुम्हें वहाँ अपने साथ ले जाऊँगा। ”

कह कर उसने मुझे कुछ खाना पीना दिया और सोने के लिये कहा। अगली सुबह वह मुझे अपने साथ पगोडा ले गया। जब हम वहाँ पहुँचे तो मैंने देखा कि बहुत सारे लोग वहाँ आ जा रहे थे और अपनी अपनी पूजा कर रहे थे।

राजा और कुलीन लोग पुजारी जी के पास मूर्ति के सामने बड़ी इज़्ज़त से बैठे हुए थे। उनके सिर खुले थे। बिना शादी शुदा लड़कियाँ और सुन्दर लड़,के, हूर और गिलमान की तरह से, चारों तरफ लाइन बना कर खड़े हुए थे।

उस भले बूढ़े ने मुझसे कहा — “अब तुम वही करना जो मैं कहूँ। ”

मैं बोला — “मैं वही करूँगा जो आप कहेंगे। ”

बूढ़ा बोला — “पहले राजा के हाथ और पैर चूमना। फिर वजीर की पोशाक पकड़ना। ”

मैंने ऐसा ही किया। राजा ने पूछा — “यह कौन है और क्या कहना चाहता है। ”

बूढ़ा बोला — “यह मेरा रिश्तेदार है। यह योर औनर के पैर चूमने के मौके की इज़्ज़त लेने के लिये बहुत दूर से इस आशा के साथ आया है कि वजीर उसको अपनी सेवा में रख कर इसकी इज़्ज़त बढ़ायेंगे – अगर बड़ी मूर्ति और आपकी मरजी हो तो। ”

राजा बोले — “अगर यह हमारा धर्म और हमारे रीति रिवाज स्वीकार कर लेता है तो तब तो यह तो बहुत ही अच्छा रहेगा।

तुरन्त ही पगोडा के नक्कारखाने में ढोलों की आवाज बज उठी और मुझे एक नया खिलात दिया गया। उसके बाद उन्होंने मेरे गले में एक काली रस्सी बाँधी और मुझे घसीटते हुए बड़ी मूर्ति के सामने ले गये। वहाँ मुझे उसके सामने लिटा दिया गय और फिर उठा लिया गया।

बड़ी मूर्ति से एक आवाज आयी — “ओ इज़्ज़तदार नौजवान। यह तूने बहुत अच्छा किया जो मेरी सेवा में आ गया। मेरे प्यार की और मेरी दया पर भरोसा किया। ”

यह सुन कर सारे लोग मूर्ति के सामने लेट गये और धरती पर लोटने लगे। और कहने लगे “तुम्हारी उम्र लम्बी हो और तुम बहुत दिनों तक खुशहाल रहो। और ऐसा क्यों न हो। ”

जब शाम हुई तो राजा और वजीर अपने अपने घोड़ों पर चढ़े और वजीर के घर पहुँचे और उन्होंने वजीर की बेटी की शादी अपने रस्मो रिवाज के अनुसार कर दी। उसको उन्होंने बहुत दहेज दिया और अपने आपको बहुत खुशनसीब समझा। उन्होंने कहा कि उसको उन्होंने मुझे अपनी बड़ी मूर्ति के कहने पर दिया है।

उन्होंने हमें एक घर में ठहरा दिया। जब मैंने वजीर की बेटी को देखा तो मुझे लगा कि वह तो एक परी जैसी सुन्दर है – ऊपर से ले कर नीचे तक। जितनी भी सुन्दरताएँ हमने सुनी थीं खास करके पद्मिनी[21] की वे सब सुन्दरताएँ उसमें मौजूद थीं। मैं उसके साथ आनन्द से रहने लगा।

सुबह को नहाने के बाद मैं राजा के दरबार में उनका इन्तजार करने लगा तो उन्होंने मुझे शादी की एक खिलात दी और मुझे हुकुम दिया कि मैं हमेशा उनके पुल की देखभाल करूँ। आखिर कुछ दिनों बाद मैं मैजेस्टी का सलाहकार बन गया।

राजा मेरे साथ बहुत आनन्द महसूस करता था। वह अक्सर मुझे खिलात और कई भेंटें दिया करता था। हालाँकि मेरे अपने पास बहुत सारा खजाना था क्योंकि मेरी पत्नी पास इतना सारा सोना था जायदाद थी कीमती जवाहरात थे जिसकी कोई हद नहीं।

इसी खुशी में आनन्द से रहते सहते दो साल बीत गये। अब ऐसा हुआ कि मेरी पत्नी यानी वजीर की बेटी को बच्चे की आशा हो गयी। जब आठ महीने गुजर गये तो उसे एक मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ। उसके जहर ने माँ के शरीर में भी जहर फैला दिया जिससे वह भी मर गयी।

मैं दुख से पागल सा हो गया और बोला “ओह यह कैसी आफत मेरे सिर पर आ कर पड़ी है। मैं उसके बिस्तर के सिरहाने की तरफ बैठा था और रोये जा रहा था। तभी रोने की आवाजें सारे घर में और ज़ोर से फैल गयीं।

स्त्रियों ने मुझे चारों तरफ से मारना शुरू कर दिया। हर स्त्री जैसे ही घर में घुसती अपने हाथ से एक या दो बार मेरे सिर पर मारती और फिर मेरे सामने आ कर खड़ी हो जाती और रोने लगती।

इस तरह से कई स्त्रियाँ मेरे चारों तरफ खड़ी हो गयीं। मैं उन सबसे करीब करीब ढक गया था उनके बीच मेरा दम घुटा जा रहा था।

इस बीच किसी ने पीछे से मेरा कौलर पकड़ लिया और घसीटना शुरू कर दिया। मैंने अपना सिर उठा कर देखा तो वह तो फारस का वही आदमी था जिसने वजीर की बेटी से मेरी शादी करवायी थी।

वह बोला — “ओ खरदिमाग। तू किसलिये रोता है। ”

मैं बोला — “ओ बेरहम। यह आप मुझसे कैसा सवाल पूछ रहे हैं। मैंने तो अपनी सारी सम्पत्ति खो दी है अब मैं अपने मकान में रह भी नहीं सकता और आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं क्यों रो रहा हूँ। ”

उसने मुस्कुराते हुए कहा — “अब तुम अपनी मौत पर रोओ। मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि शायद तुम्हारी बदकिस्मती तुम्हें यहाँ खींच लायी है। वैसा ही हो रहा है। सिवाय मौत के अब तुम्हारा और कोई अन्त नहीं है। ”

फिर लोगों ने मुझे पकड़ लिया और पकड़ कर पगोडा ले गये। वहाँ पहुँच कर मैंने देखा कि राजा, सारे कुलीन लोग, राजा के राज्य की 36 जनजातियाँ सभी वहाँ मौजूद थे। मेरी पत्नी की जायदाद और बाकी सब चीज़ें भी वहीं थी और जो जिसके मन में आ रहा था वह उसकी कीमत नकद में वही लगा रहा था।

उसकी सारी सम्पत्ति पैसे में बदल दी गयी। उस पैसे से कीमती जवाहरात खरीद लिये गये और एक बक्से में बन्द कर दिये गये। फिर उन्होंने एक बक्से में रोटी मिठाई भुना हुआ माँस मेवा फल और कुछ दूसरी खाने की चीज़ें भरीं।

एक और बक्से में उन्होंने मेरी पत्नी की लाश रखी और दोनों बक्सों को ऊँट के ऊपर दोनों तरफ लटकाया। मुझे उस ऊँट पर चढ़ाया जवाहरात का बक्सा मेरी गोद में रखा।

clip_image006सारे ब्राह्मण मेरे आगे आगे चले। वे प्रार्थनाएँ गाते जा रहे थे शंख बजाते जा रहे थे। मेरे पीछे पीछे भीड़ थी जो मेरे लिये खुशी की कामना करने के लिये चली आ रही थी।

इस तरह से मुझे शहर के बाहर उसी दरवाजे से बाहर ले जाया गया जिससे मैं पहले दिन इस शहर के अन्दर आया था।

जैसे ही वहाँ के पहरेदार ने मुझे देखा तो वह मुझे देख कर रो पड़ा और बोला — “ओ बदकिस्मत। आखिर तुझे मौत ने पकड़ ही लिया। तूने मेरी बात नहीं मानी। इस शहर में घुस कर तूने अपनी ज़िन्दगी बिना किसी मतलब के खो दी। मेरा इसमें कोई दोष नहीं है। मैंने तो तुझे पहले ही मना किया था। ”

उसने यह बात मुझसे यह बात कही पर मैं अपने में इतना खोया हुआ था कि मेरे मुँह से कोई जवाब ही निकला। असल में तो मेरी सारी इन्द्रियाँ ही काम नहीं कर रही थीं। उनको यह पता ही नहीं था कि आखीर में क्या होना था।

वे मुझे उसी किले तक ले गये जिसका दरवाजा मैंने पहले दिन बन्द देखा था। बहुत सारे लोगों ने मिल कर उस दरवाजे के ताले को खोला और वे लाश और खाने के बक्से को अन्दर ले गये।

एक पुजारी मेरे पास आया और मुझे यह कह कर तसल्ली देने लगा “आदमी एक दिन पैदा होता है और एक दिन मरता है। दुनिया की यही रीति है। अब ये, यानी तुम्हारी पत्नी और बेटा तुम्हारी सम्पत्ति और 40 दिन के लिये खाना यहाँ रखा जायेगा। जब तक बड़ी मूर्ति तुम्हारे ऊपर मेहरबान न हो जाये तब तक इनको लो और यहाँ रहो। ”

अपने गुस्से में मैंने बड़ी मूर्ति को वहाँ के रहने वालों को उनके रीति रिवाजों को उनकी मार को कोसना चाहा पर फारस के उसी आदमी ने अपनी भाषा में मुझे ऐसा करने से मना कर दिया।

उसने कहा — “ध्यान रखना अपने मुँह से कोई शब्द मत निकालना। अगर तुमने कुछ कहा तो ये लोग तुम्हें जला कर भस्म कर देंगे। जो तुम्हारी किस्मत था अब तो वह हो चुका अब अल्लाह की मेहरबानी पर भरोसा रखो। शायद वही तुम्हें इस जगह से ज़िन्दा निकालेगा। ”

मुझे वहाँ अकेले छोड़ कर सारे लोग किले से बाहर चले गये और दरवाजा बन्द कर गये। मैं अपने अकेलेपन और अपनी मजबूर हालत पर फूट फूट कर रो पड़ा और इसी हालत में उस स्त्री की लाश को बार बार पैर से ठोकर मारने लगा।

मैं बोला — “ओ बदकिस्मत लाश। अगर तुझे बच्चे के जन्म के समय ही मरना था तो तूने शादी ही क्यों की और फिर क्यों गर्भवती हुई। ”

खूब अच्छी तरह से उसे पीटने के बाद मैं फिर से चुपचाप बैठ गया। दिन आगे बढ़ने लगा और खूब गरम हो गया। मेरा दिमाग उबलने लगा। इस हालत में मेरी मरने जैसी हालत हो गयी।

मैं जिस तरफ भी देखता मुझे अपने चारों तरफ हड्डियाँ ही हड्डियाँ ही दिखायी देतीं और जवाहरातों के ढेर दिखायी देते। मैंने कुछ पुराने बक्सों को इकठ्ठा करके एक दूसरे पर रखा ताकि उससे मुझे दिन में कुछ छाया मिल सके और रात को ओस से बचाव हो सके।

फिर मैंने पानी ढूँढना शुरू किया तो एक तरफ को मुझे एक झरना दिखायी दे गया जो दीवार में से एक पत्थर काट कर निकल रहा था। उसका एक मुँह भी था। बस मुझे लगा कि मेरी ज़िन्दगी अब बच जायेगी। खाना उन लोगों ने बक्से में रख ही दिया था और पानी मुझे मिल गया था।

आखिर खाना खत्म हो गया था सो मुझे चिन्ता होने लगी और मैंने अल्लाह से इस बात की शिकायत की। अल्लाह मेरे ऊपर इतना मेहरबान हुआ कि उसी समय दीवार में से एक दरवाजा खुला और एक लाश और अन्दर लायी गयी। एक बूढ़ा उसके साथ था।

जब उसको लाने वाले उसको वहाँ छोड़ कर चले गये तो मेरे दिमाग में आया कि मैं उस बूढ़े को जान से मार दूँ और उसका खाना मैं ले लूँ। सो एक पुराने बक्से की एक टाँग उठा कर मैं उसके पीछे गया। वह बेचारा अपने घुटनों पर सिर रखे बैठा था।

मैं उसके पीछे से आया और उसके सिर पर इतनी ज़ोर से मारा कि उसकी खोपड़ी फट गयी और उसका दिमाग बाहर निकल आया। उसकी आत्मा तुरन्त ही अल्लाह के पास चली गयी थी।

अब मैं उसके खाने का अकेला मालिक था। अब मैंने उसमें से खाना खाना शुरू कर दिया था। इस तरह से कुछ दिन और निकल गये। फिर कोई लाश आयी और उसके साथ कोई जिन्दा आदमी लाया जाता मैं उसको मार कर उसका खाना खा लेता। मेरा काम ठीक चल रहा था।

एक दिन एक लाश के साथ एक छोटी लड़की लायी गयी। वह बहुत सुन्दर थी। मेरा दिल उसको मारने का नहीं किया जैसा कि मैं दूसरे लोगों के साथ करता आ रहा था। उसने मुझे देखा तो वह डर के मारे बेहोश हो गयी।

मैंने उसका खाना निकाला और वहाँ ले गया जहाँ मैं रहता था। पर मैंने उसको अकेले नहीं खाया। जब भी मैं भूखा होता तो मैं उसका कुछ खाना उसके पास ले जाता और हम दोनों साथ साथ ही खाते।

जब उस लड़की ने देखा कि मैं उसको परेशान नहीं कर रहा हूँ तो मुझसे उसकी हिचकिचाहट कम होती गयी और उसने मुझसे अपनी जान पहचान बढ़ा ली। अब वह मेरे शेड में भी आने लगी।

एक दिन मैंने उससे उसकी कहानी सुनाने के लिये कहा तो वह बोली — “मैं राजा के वकीलो मुतलक यानी प्रधान मन्त्र्ी की बेटी हूँ। मेरी शादी मेरे चाचा के लड़के से पक्की हो गयी थी।

शादी के दिन उसके पेट में बहुत तेज़ दर्द उठा। वह दर्द से बहुत परेशान था। इस परेशानी से ही वह मर गया। सो लोग मुझे उसकी लाश के साथ यहाँ ले आये हैं और मुझे यहाँ छोड़ गये हैं। ”

फिर उसने मुझे मेरी कहानी बताने के लिये कहा। मैंने भी उसे अपनी सारी कहानी बता दी और कहा — “लगता है अल्लाह ने तुम्हें यहाँ मेरे लिये भेजा है। ”

वह मुस्कुरायी और चुप रही।

इस तरह से हम दोनों के अन्दर एक दूसरे के लिये प्यार बढ़ने लगा। कुछ ही दिनों में मैंने उसको अपने मुसलमान धर्म की बहुत सारी बातें उसको सिखा दीं। उसको मैंने कलमा बोलना सिखा दिया। फिर हम लोगों ने शादी कर ली। उसको भी बच्चे की आशा हो गयी और उसके भी एक बेटा हो गया।

इस तरह रहते रहते हम लोगों को वहाँ तीन साल गुजर गये। जब उसने बच्चे को खाना खिलाना शुरू किया तो हमने आपस में कहा कि इस तरह से हम लोग यहाँ ज़िन्दगी कब तक गुजारेंगे। और हम यहाँ से बाहर कैसे निकलेंगे।

वह बोली — “जब अल्लाह हमें यहाँ से बाहर निकालेगा तभी हम यहाँ से बाहर निकल पायेंगे नहीं तो किसी दिन हम यहीं मर जायेंगे। ”

उसका कहा सुन कर मैं बहुत ज़ोर ज़ोर से रो पड़ा और थोड़ी देर तक रोता रहा। फिर मैं सो गया।

सपने में मैंने एक आदमी देखा जिसने मुझसे कहा — “नाले से हो कर बाहर जाने का रास्ता है सो तुम उससे बाहर निकल सकते हो। ”

मैं खुशी के मारे तुरन्त ही जाग गया। मैंने अपनी पत्नी से कहा — “यहाँ जो पुराने बक्से पड़े हुए हैं उनमें लगी पुरानी कीलें और ताले ले आओ ताकि मैं उनकी सहायता से इस नाले की चौड़ाई बढ़ा सकूँ। ”

उस नाले के मुँह पर एक बड़ी सी कील लगायी और उस पर पत्थर से उसको मारता रहा जब तक मैं थक नहीं गया। किसी तरह से एक साल के बाद मैं उसका मुँह इतना चौड़ा कर सका जिसमें से एक आदमी बाहर निकल सकता।

मैंने बहुत सारे जवाहरात मरे हुए लोगों के कपड़ों की आस्तीन में भरे और उन सबको अपने साथ ले कर हम तीनों उस नाले से हो कर बाहर निकल आये। मैंने हमको बाहर निकालने के लिये अल्लाह को धन्यवाद दिया बच्चे को अपने कन्धे पर बिठाया और हम बाहर निकल आये।

एक महीने से हमने डर के मारे कोई बड़ी सड़क नहीं ली है। हम केवल छोटी छोटी सड़कों से हो कर या जंगलों आदि से हो कर यहाँ तक आये हैं। हम लोग केवल घास और पत्तियों पर ज़िन्दा हैं। हमारे अन्दर बिल्कुल भी ताकत नहीं है। मैं अब इससे आगे एक शब्द भी नहीं बोल सकता। यही मेरी कहानी है जो आपने अभी सुनी ओ राजा। ”

ख्वाजा यह कहानी सुना कर बोला — “मुझे उस पर दया आ गयी। मैंने उसे नहलवाया उसको कपड़े पहनवाये खाना खिलाया और फिर उसको अपना डिपुटी रख लिया।

अपने घर में मेरे राजकुमारी से कई बच्चे हुए पर वे सब एक के बाद एक मर गये। जब मेरा एक बेटा पाँच साल की उम्र तक ज़िन्दा रहा पर फिर वह भी मर गया। इस दुख में मेरी पत्नी भी चल बसी। मुझे बहुत ज़्यादा दुख हुआ तो मुझे उस देश में रहने की कोई इच्छा नहीं रही और मैंने फारस लौटने का विचार किया।

मैंने राजा से विदा माँगी और अपना ओहदा उस नौजवान को दे देने के लिये कहा। फिर राजा भी मर गया। मैंने अपना कुत्ता लिया और सारे जवाहरात और पैसा लिया और नायशापुर आ गया ताकि मेरे भाइयों की कहानी कोई न जान सके।

यहाँ आ कर मैं कुत्ते के पुजारी के नाम से मशहूर हो गया। अपनी इसी बदनामी की वजह से मैं फारस के राजा को दोगुना टैक्स देता हूँ।

अब ऐसा हुआ कि यह नौजवान सौदागर नायशापुर गया तो इसी की वजह से मुझे आपके पैर चूमने की खुशकिस्मती मिली। ”

आजाद बख्त ने ख्वाजा से पूछा — “तो क्या यह तुम्हारा अपना बेटा नहीं है?”

ख्वाजा बोला — “नहीं जहाँपनाह नहीं। यह मेरा बेटा नहीं है। यह तो आप ही के लोगों में से एक है। पर अब यह मेरा मालिक है या समझो कि मेरा वारिस है या फिर जो कुछ भी आप समझें। ”

यह सुन कर आजाद बख्त ने उस लड़के को बुलाया और उससे पूछा — “तुम किस सौदागर के बेटे हो और तुम्हारे माता पिता कहाँ रहते हैं। ”

नौजवान सौदागर यानी राजा आजाद बख्त के वजीर की बेटी ने राजा के सामने की जमीन को चूमा और अपनी ज़िन्दगी बख्श देने की विनती करते हुए राजा से कहा — “यह गुलाम आपके वजीर की बेटी है। मेरे पिता के ऊपर इस ख्वाजा के लालों की वजह से शाही इलजाम था और योर मैजेस्टी का हुकुम था कि अगर एक साल के अन्दर मेरे पिता के शब्दों की सचाई साबित न की गयी तो उनको मौत की सजा दे दी जायेगी।

यह शाही फरमान सुन कर मैंने एक सौदागर का वेश बनाया और नायशापुर गयी। अल्लाह नें मेरी सहायता की और मैं ख्वाजा को उनके लाल और कुत्ते सहित यहाँ ले आयी। आपने सारा हाल सुन ही लिया है। मुझे पूरी आशा है कि अब आप मेरे पिता को छोड़ देंगे। ”

वजीर की बेटी से यह सब सुन कर ख्वाजा के मुँह से एक आह निकल गयी और वह नीचे गिर पड़ा। जब उसके चेहरे पर गुलाब जल छिड़का गया तब कहीं वह होश में आया।

वह बोला — “अरे यह तो मेरे साथ बहुत ही बुरा हुआ कि मैं इतनी दूर तक दुख सह कर आया केवल इस आशा में कि मैं इस नौजवान को अपना बेटा करके गोद ले लूँगा।

मैंने सोचा था कि मैं इसको अपनी सारी जायदाद सम्पत्ति दे दूँगा ताकि मेरा नाम खत्म न हो सके। सब लोग मुझे ख्वाजा ज़ाद कह सकें। पर अब तो मेरा पूरा सपना ही बेकार हो गया। यह तो सारा मामला ही उलट पलट हो गया।

इसने तो लड़की बन कर इस बूढ़े को बरबाद कर दिया। मैं तो लड़की के जाल में फँस गया और अब यह कहावत मेरे ऊपर सच बैठती है कि “तू घर में बैठा तीर्थयात्रा के लिये भी नहीं गया फिर भी तेरा सिर मुँड़ गया और तू सबकी हँसी का पात्र बना। ”[22]

राजा आजाद बख्त आगे बोला — “अब मैं अपनी कहानी को छोटा करता हूँ मुझे ख्वाजा के रोने पर दया आ गयी। मैंने उसको अपने पास बुला कर उसको कुछ खुशी की खबर सुनायी और कहा — “दुखी मत हो। मैं इसकी शादी तुमसे करा दूँगा और अगर अल्लाह की मेहरबानी हुई तो इससे तुम्हारे बच्चे हो जायेंगे और यह तुम्हारी मालिक हो जायेगी। ”

ये खुश करने वाले शब्द सुन कर ख्वाजा फिर से बहुत खुश और सामान्य हो गया। तब मैंने वजीर की बेटी को जनानखाने में भेजा। वजीर को जेल से बाहर निकाला।

वजीर को मैंने नहलवाया खिलाते सरफ़राज़ी यानी खास खिलात पहनवाया जो यह बताती थी कि उसकी इज़्ज़त फिर से वापस आ गयी है। और उसको अपने सामने लाने के लिये कहा।

जब वजीर आया तो उसका स्वागत करने के लिये मैं फर्श के आखीर तक गया[23] और उसको अपने से बड़ा मानते हुए मैंने उसे गले लगाया। मैंने उसको वजीर होने का एक नया लिखने का सामान दिया यानी कलमदान दिया। [24]

ख्वाजा को भी मैंने टाइटिल और जागीरें दीं। शुभ मुहूर्त निकलवा कर मैं वजीर की बेटी की शादी उससे कर दी।

कुछ सालों में उसके दो बेटे और एक बेटी हुई। उसका सबसे बड़ा बेटा मलीकुत तुज्जर और सबसे छोटा मेरे घर की देखभाल करते हैं।

ओ दरवेश। मैंने अपनी कहानी आप सबको इसलिये सुनायी क्योंकि कल रात मैंने आप में से दो लोगों की कहानी सुनी थी। अब आपमें से दो रह गये हैं। यह सोचते हुए कि मैं अभी भी वहीं हूँ जहाँ मैं कल रात था मैं आपका नौकर हूँ और मेरा घर आपका तकिया[25] है आप अपनी अपनी कहानियाँ बिना किसी डर और हिचक के सुनायें। आप कुछ दिन मेरे पास रुकें।”

जब दरवेशों ने देखा कि राजा बहुत दयालु है तो बोले — “जैसा योर मैजेस्टी चाहें। हम दोनों भी अपनी अपनी कहानी सुनाते हैं। आप सुन कर खुश हों। ”

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[1] Tale of Azad Bakht-Part Two (Tale No 3) – taken from :

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/baghobahar/04_azadbakht_b.html

[2] The name of the countries which lie, as the people of Hindustan term it, below Bengal, i.e., to the south-east of it; the name includes the kingdoms of Ava and Pegu.

[3] Baharamand

[4] The chaugan is a Persian sport performed on horseback, with a large ball like a foot-ball, which is knocked about with a long stick like a shepherd's crook; it is precisely the game called in Scotland "shintey," and in England "hockey," only that the players are mounted.

[5] Sarandip is the name for the island of Ceylon among the Arabs and Persians, as well as the Musalmans of India. The ancient Hindu name was Lanka, applied both to the island and its capital.

[6] Iran is the ancient name of Persia in its more extended sense, that is, the Persian Empire. Fars is sometimes used in the same sense. Strictly speaking, it denotes Persia proper, which is only a province of Iran. [Iran means Persia in its limited sense--i.e., Persia proper.]

[7] Farsakh is the measure of distance in Persia – about 3 ¾ miles.

[8] Salsabil is the name of a fountain of Paradise, according to Muhammadan belief.

[9] It is an exaggeration, but it means “hitting a little too strongly”

[10] The spirit drawn from the leaves of an aromatic tree which grows in Kashmir, called Bed-Mushk; it is a tonic and exhilarating.

[11] Big idol worshipped in Pagans.

[12] Lat and Manat were the two great idols of Hindu worship in former times. [See Dow's Hindoostan.]

[13] Prophet and 12 Immam

[14] The threshold of a pagoda or mosque. The oriental people uncover their feet, as we do our heads, on entering a place of worship.

[15] Asiatics do not sign their names, but put their seals to letters, bonds, paper; on the seal is engraven their names, titles etc.

[16] Name of the place where royal musicians sit and play music.

[17] Azurbaijan till recently was a province of Persia; the northern part of ancient Media. It is now, alas! fallen into the deadly grasp of the unholy Muscovite.

[18] The Muhammadans believe that on the day of judgment all who have died will assemble on a vast plain, to hear their sentences from the mouth of God; so the reader may naturally conceive the size of the plain.

[19] Chummak is the Turkish name for a kind of baton set (thin sticks such as with the orchestra conductor) with precious stones, and used by some of the officers of the palace as an insignia of state, like our rods, wands, etc

[20] I give this evil behavior in the footnote so that the main text remains clean. His private parts become elongated to such a degree that he has to drag them along the ground. This ludicrous idea is to be found in the veracious "Voiage and Travaile" of Sir John Maundevile, Kt.

[21] Padmini, the highest and most excellent of the four classes of women among the Hindus – not the Queen of Chittod Garh of Rajasthan. The four classes of women are – Padminini, Chatrani, Hastini, and Shankhini.

[22] When Musalmans go on pilgrimage to Mecca, they shave their heads on their arrival there; the ridicule here is, to have incurred the shaving without the merit of the pilgrimage.

[23] The farsh is the carpet or cloth which is spread in the room, where company is received, or the king's audience is held; for the king to advance to the end of the farsh to receive the Wazir, is a mark of respect, which Asiatic princes seldom pay, even to their equals.

[24] The insignia of the Wazir's office in India and Persia, is the qalumdan.

[25] Abode of a Faqir is called Takiya

(क्रमशः अगले खंडों में जारी...)

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,715,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,806,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,92,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,212,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड 11
लोक कथा - किस्सए चार दरवेश - सुषमा गुप्ता - खंड 11
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