सोमवार, 19 दिसंबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 13 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : डियर बाला दीदी

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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

डियर बाला दीदी,

बहुत दिनों से कुछ बातें हैं जो फांस की तरह मेरे दिल में चुभ रही हैं. सोचता हूँ अगर आपसे कह दूँ तो शायद दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाए.

दीदी, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. आपने तो पैसे की वजह से हमारे और अपने रिश्ते की नींव ही हिला दी.

दीदी, क्या दस हजार रुपये इतनी अहमियत रखते हैं कि एक बहन अपने भाई से ये कहे कि “अगर पैसे नहीं दे सकते तो अपने घर का कोई सामान दे दो या अपनी बीवी का कोई गहना दे दो.”

दीदी, क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में...? मैं तो हमेशा यही सोचता था कि “मेरी बाला दीदी मेरे साथ हैं.” लेकिन आपका प्यार इतना कमजोर था...काश...मैं समझ सकता.

दीदी, मैं तो आपका वही भाई था जो आपके एक बार बुलाने पे न दिन देखता था न रात...भाग कर आता था. मुझे तो बस इतना याद रहता था कि “बाला दीदी ने बुलाया है.”

मैं आप पर अपने से भी ज्यादा भरोसा करता था. अगर आप पर भरोसा न करता तो आपके पास अपनी छोटी बहन के सारे गहने क्यूँ रखता...?

वो गहने वापस आए तो घर पर सभी लोगों ने कहा कि “गहने बदल दिए गए हैं.” लेकिन मेरा आप पर इतना अटूट विश्वास था कि मैंने इस बात को बिल्कुल नहीं माना कि “आपने गहने बदले हैं.”

मैंने आपको कभी अपने बड़े पापा की बेटी नहीं माना. अपनी सगी बहनों से ज्यादा सम्मान आपको दिया. राखी बँधवाने मैं पहले आपके पास आता था.

लेकिन मेरी आँख तो उस वक्त खुली जब मेरी नौकरी छूट गई और उस मुश्किल वक्त में आपने साथ देने के बजाय अपने पैसे वापस मांगे.

उस वक्त मैं इस हालत में नहीं था कि आपके पैसे वापस कर सकता और आपने हमें भिखमंगा तक कह दिया. घर का सामान और जेवर तक माँगे.

दीदी, उस दिन अहसास हुआ “शायद यही वजह है कि लोग अपनों के लिए मरते हैं.”

मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया कि “अगर आप मेरी सगी बहन होतीं तो क्या ऐसा ही करतीं...? शायद नहीं...”

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कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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