सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 14 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : बेटा जिग्नेश...तुम कहाँ हो...?

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

बेटा जिग्नेश...तुम कहाँ हो...?

बेटा जिग्नेश...! तुम कहाँ हो...? मैं, तुम्हारी माँ चन्दन, आज बीस साल से तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ. काश...! मेरी बात तुम तक पहुँच सके.

बेटा, लौट आओ. तुम एक छोटी सी बात पर इतना नाराज हुए कि घर ही छोड़ दिया...? मैंने तो तुम्हारी भलाई के लिए कहा था, जो भी कहा था. हर माँ अपने बच्चे को डाँटती है लेकिन हर बच्चा तुम्हारी तरह घर तो नहीं छोड़ देता ना...?

बेटा, अगर मुझे पता होता कि मेरी एक डाँट तुम्हें इतनी बुरी लगेगी तो मैं तुम्हें कभी नहीं डाँटती. और मैंने तो तुम्हें कितने अरमानों से पाला था. तुम बारह साल के थे उस वक्त जब तुमने घर छोड़ा था. आज इस बात को बीते लगभग बीस साल हो गए हैं. अब तो तुम तीस-बत्तीस साल के हो गए होगे. सात बहनों के तुम अकेले भाई थे. सबके लाडले थे तुम.

बेटा, हम अब भी अम्बोली में ही रहते हैं. तुम एक बार वापस आ जाओ. साल भर हुआ तुम्हारे पिताजी भगवान दास भी नहीं रहे. जाते-जाते उनकी तुम्हें देखने की इच्छा भी पूरी नहीं हुई.

बेटा, हमने तुम्हें बहुत ढूंढा. टीवी, अखबार, पुलिस हर जगह तुम्हारी खबर दी. मगर तुम्हारा कहीं पता नहीं चला. हम हारकर एक ज्योतिषी के पास भी गए. उसने बताया कि तुम जिन्दा हो. ठीक हो. किसी बेऔलाद माँ-बाप के पास हो.

बेटा, तुम जहाँ भी रहो. खुश रहो. बस एक बार आकर हमसे मिल लो. तुम्हारे पिताजी तो आस लगाए-लगाए ही चल बसे. वो तो अच्छा है तुम्हारे सामने ही तुम्हारी सातों बहनों की शादी हो गई थी. सबसे छोटी बहन की शादी के बाद ही तुमने घर छोड़ा फिर पलट कर नहीं आए. तुम उस वक्त छठी क्लास में पढ़ते थे.

अब मैं बची हूँ जिसे तुम्हारा इन्तजार है. बेटा, मुझे माफ कर दो. मुझसे गलती हो गई. बेटे के अरमान में मैंने सात बेटियों को जन्म दिया. उसके बाद तुम हुए. लेकिन मुझे क्या पता था कि इतने लाड-प्यार से जिसको पाल रही हूँ वो मेरी एक डाँट सुनकर घर छोड़ देगा.

बेटा, अपनी माँ से भला कोई इतना नाराज होता है...? बेटा, वैसे तो माँ अपने बेटे की हर गलती माफ कर देती है. ये मजबूर माँ तुझसे माफ़ी माँगती है. मुझे माफ कर दे बेटा. बस एक बार तू अपनी सूरत दिखा जा. फिर तू चले जाना जहाँ भी तू चाहे.

भगवान करे तू सदा सुखी रहे बेटा. अगर तू मुझसे अब भी नाराज है तो बस एक बार आजा...मैं तेरे आगे हाथ जोड़कर तुझसे माफ़ी मांगूंगी. तू बस लौट आ मेरे बच्चे. तू नहीं जानता एक माँ के कलेजे पर क्या बीतती है जब उसका बेटा उसकी आँखों के सामने न हो. और फिर तू तो अपनी माँ से नाराज होकर चला गया. मैं भी अब कुछ दिनों की मेहमान हूँ बेटा.

हो सके तो लौट आओ जिग्नेश...!

कैस जौनपुरी

 

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

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