सोमवार, 16 जनवरी 2012

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 17 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : दर्दनाक मौत

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी


दर्दनाक मौत


आराधना,
भगवान है कि नहीं, मैं नहीं जानती. लेकिन इतना जरुर जानती हूँ कि “इन्सान के अच्छे-बुरे कर्मों का फल यहीं पे मिलता है.”
जब मैं तुम्हें घुट-घुट के मरते हुए देखती थी, तब मैं यही दुआ करती थी, “हे भगवान, जो आराधना की इस हालत का जिम्मेदार है, उसे भी ऐसी ही सजा देना. मेरी दोस्त का कुसूर क्या था? सिर्फ यही कि वो किसी से बेइंतहा प्यार करती थी? दिन-रात उसके सपने देखती थी?”

तुम मुझसे कहती थी, “जब मेरी उससे शादी हो जायेगी तब देखना, मैं बहुत खुश रहूँगी. मुझे और कुछ नहीं चाहिए.” लेकिन वो बेरहम आदमी तुम्हारे साथ छल करता रहा. तुम्हारी भावनाओं के साथ खेलता रहा.
मुझे याद है, तुम उस वक्त बिल्कुल टूट गई थी जब तुम्हें पता चला कि सुरेन्द्र की पहले से ही अपनी बसी-बसाई दुनिया है. वो पहले से ही किसी के माँग का सिंदूर था.

फिर तो तुमने जीने की लालसा ही छोड़ दी. मैंने तुम्हें कितना समझाया था कि “आराधना, जिन्दगी यहीं पर खतम नहीं होगी. तुम नए सिरे से खड़ी हो जाओ.” लेकिन तुम कहती, “रूचि, किसके सहारे? मैं अब जीना ही नहीं चाहती.”

और फिर वो दिन आया जब तुमने शीशे से दोस्ती कर ली. तुम शीशा खाने लगी, शीशा पीने लगी. तुम्हारे शरीर से खून बहता रहता था. लेकिन तुम्हें कुछ असर नहीं होता था. तुमने तो ठान ही ली थी कि अब जिन्दगी खतम ही करनी है. तुमने उसी शीशे से सुरेन्द्र का नाम अपने सीने पे लिख दिया था. तुम पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी? तुम्हें तो दर्द भी नहीं होता था. मगर आराधना, तुम्हारी हालत देखने वालों का दिल दहल जाता था. उनमें से एक मैं भी थी.

जब मैं सुरेन्द्र को कुछ बुरा-भला कहती, तब तुम कहती थी, “रूचि, उसे कुछ मत कहो. मुझे बहुत तकलीफ होती है. वो जैसा भी है. मुझे आज भी उससे उतना ही प्यार है.”

लेकिन मैं सुरेन्द्र को कोसने से बाज नहीं आती थी, और सिर्फ बद्दुआ ही देती रहती थी उसे, “जैसे मेरी सहेली घुट-घुट कर मर रही है, वो भी ऐसा ही हो जाए. लोग उसकी तरफ देखें भी ना.” और ऐसा हुआ भी.
तुम तो कुछ दिन बाद इस दुनिया से चली गई. लेकिन तुम्हारा इस तरह तड़प-तड़प कर मरना ऊपरवाले को भी अच्छा न लगा. तुम्हारी ऐसी हालत करने वाले को उसने बहुत बुरी सजा दी.

कुछ दिनों बाद मैंने देखा, “सुरेन्द्र की बहुत बुरी हालत हो गई थी. उसके शरीर से बदबू आने लगी थी.”
मैं उस वक्त कुछ कह न सकी, सिर्फ खाली आसमान की तरफ देखा और दिल से आवाज आई, “ऊपरवाले के पास देर है, अंधेर नहीं.”

आराधना, तुम तो चली गई सुरेन्द्र को दुआ देके. लेकिन मेरा मन हमेशा उसे बद्दुआ ही देता रहा. और शायद तुम्हारी दुआ से ज्यादा ताकत मेरी बद्दुआ में थी, जो कुबूल हो गई. क्यूंकि मैंने देखा था तुम्हें तड़पते हुए, मरते हुए.

सुरेन्द्र की ऐसी देखकर तुम जरा भी खुश नहीं होगी. लेकिन मुझे माफ करना मेरी दोस्त, तुम्हारी ऐसी हालत देखकर मुझे बहुत दुःख होता था.

आज अगर तुम्हें याद करके मुझे दुःख होता है तो सुरेन्द्र को याद करके सुकून मिलता है.
तुम जहाँ भी हो, हो सके तो मुझे माफ कर देना.

तुम्हारी दोस्त,
रूचि
*************

कैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
www.qaisjaunpuri.com


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