सोमवार, 23 जनवरी 2012

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 18 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : गर्भपात

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

गर्भपात

मैं अनीता, मैं अपनी सरकार, अपने कानून से कुछ कहना चाहती हूँ. मैं कहना चाहती हूँ कि मेरा होने वाला बच्चा एक नॉर्मल बच्चा नहीं है. वो पेट से ही अपाहिज है. मुझे न चाहते हुए भी इस बच्चे को जन्म देना पड़ेगा. क्यूंकि हमारा कानून ऐसा है.

हमने क्या गलत किया था? हमने तो सही रास्ता अपनाया था. कानून से गर्भपात की इजाजत माँगने चले गए थे. वैसे तो पूरे हिन्दुस्तान में लोग सौ-दो सौ रूपये देके गर्भपात कराते रहते हैं. उन्हें कोई नहीं पूछता. मगर हम खुद को थोड़े पढ़े-लिखे, समझदार समझ बैठे थे. और अपने अन्धे-बहरे कानून से इजाजत माँगने चले गए थे. मगर हम ये भूल गए थे कि हमारे यहाँ कानून की कुर्सी पे बैठने वालों को कानून की जरा भी तमीज नहीं है.

कानून इन्सान की भलाई के लिए होना चाहिए. कानून की वजह से किसी को जानबूझ के जिन्दगी भर अपाहिज की जिन्दगी जीने के लिए पैदा करना, कैसा कानून है? ऐसे कानून को आग लगा देना चाहिए.

मगर हमारा कानून सिर्फ किताबों में लिखी हुई पाबन्दियाँ हैं. हकीकत तो ये है कि कानून की कुर्सी पर बैठने वाले लोग सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं. अपनी नौकरी बचाते हैं. कोई इन्हें कुछ ना कहे. इनकी नौकरी बची रहे. बाकी जानता जाए भाड़ में.

हमने सोचा था हम सही तरीके से गर्भपात की इजाजत लेकर एक स्वस्थ बच्चा पैदा करेंगे. और ऐसा हमने खुद तय नहीं किया था. वो तो हमारे डॉक्टर लोग थे जिन्होंने हमें बताया कि पेट में पल रहा बच्चा एक स्वस्थ बच्चा नहीं है. और हम अपने उस बच्चे की जिन्दगी भर की मुसीबतों से उसे ही बचाने की कोशिश में लगे थे. क्यूंकि हमने देखा है अपाहिज बच्चों को. कितनी मुश्किलों का सामना करता पड़ता है उन्हें.

अलग रखा जाता है उन्हें. इससे बड़ी सजा और क्या होगी? सरकार अपाहिजों के लिए दुनिया भर की योजनाएँ बना सकती है. ढेर सारा पैसा बर्बाद कर सकती है लेकिन अपाहिजों की संख्या कम नहीं करना चाहती. हकीकत तो ये है कि इन्हीं योजनाओं के बहाने हमारी सरकार में बैठे लोग अपने खजाने भरते हैं. उन्हें लोगों की मुश्किलों से क्या लेना-देना?

हमारा होने वाला बच्चा खुद को कितना बेचारा महसूस करेगा मेरा तो यही सोचके जी घबराता है. डॉक्टर का कहना है मेरा बच्चा कभी खुद के पैरों पे नहीं चल सकेगा. और भी कई बातें हैं जो मेरे बच्चे को बीमारी की शकल में झेलनी पड़ेंगी. दुनिया में आके वो जिन्दगी भर दवाओं के सहारे रहेगा.

यही सब न हो इसी कोशिश में हम अपने कानून के पास गए थे मगर हमारा कानून अन्धा-बहरा है. उसे किसी के दुःख से कोई लेना-देना नहीं. वो किसी को मारने की इजाजत नहीं दे सकता. मगर वो किसी को पूरी उम्र घुट-घुट कर जीते हुए देख सकता है.

इससे तो अच्छा होता हम चुपचाप किसी अस्पताल में जाते, कुछ पैसे खर्च करते और अपने बच्चे को इस मुसीबत भरी जिन्दगी से बचा लेते.

कुछ लोग कहते हैं हम अपने अपाहिज बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे इसलिए गर्भपात कराना चाहते थे. इन लोगों को कौन बताए कि एक बच्चा अपने पैरों पे खड़ा नहीं हो सकता ये बात सुनके माँ-बाप पे क्या बीतती है. ये तो वही जाने जिसके साथ हो रहा है ये सब.

मैं तो बस इतना कहना चाहती हूँ कि ये बच्चा मेरी किस्मत में है और हमारी जिन्दगी अब इस बच्चे के लिए कुर्बान है.

बस कहना ये है कि इन्सान अपाहिज हो तो उसकी देखभाल कोई न कोई कर सकता है. लेकिन अगर हमारा कानून इसी तरह अपाहिज रहेगा तो इस देश की देखभाल कौन करेगा???

*************

कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

4 blogger-facebook:

  1. sach mei kanoon andha behra hi hai, hazaro log jo garbh paat karate hai unhe koi kanoon nahi pakadta par aisi condition mei kanoon ki taraf se itna rukha vyavahaar sach mei ise andha behra sabit karta hai

    sil ko choo jane wali rachna

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया गीता जी,
      जिस दिन लोग अपने काम से प्यार करने लगेंगे उस दिन हालात बदलने शुरू हो जाएँगे. चाहे वो कानून के रखवाले ही क्यूँ न हों.

      हटाएं
  2. बेनामी12:33 am

    Heart touching storey...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी12:33 am

    Heart touching storey...

    उत्तर देंहटाएं

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