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कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 22 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात :

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  पिछली कड़ियाँ    - एक , दो , तीन , चार , पांच , छः , सात , आठ , नौ , दस , ग्यारह , बारह , तेरह , चौदह , पंद्रह , 16 , 17 , 18, . 19 ...

 

पिछली कड़ियाँ    - एक , दो , तीन, चार, पांच, छः , सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह , तेरह, चौदह, पंद्रह, 16, 17, 18, . 19, 20, 21
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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी


हे भगवान…वापस ले लो ये वरदान

हे भगवान,

मैंने ऐसा कौन सा पुण्य किया था जो तूने मुझे ऐसा वरदान दे दिया कि मैं कहीं भी जाऊं मुझे कोई न कोई लड़की या औरत मिल ही जाती है. मैं थक गया हूं भगवान...वापस ले लो ये वरदान. मेरी जगह किसी और को दे दो ये वरदान.

भगवान तेरी लीला अपरम्पार है. जो तरसता है उसे कुछ नहीं मिलता. और जो ऊब चुका है उसको इतना दिये जा रहा है कि भागने की जगह नहीं मिल रही.

भगवान, मेरे घरवाले मेरी जान ले लेंगे जिस दिन उन्हें मेरी किसी भी कारस्तानी का पता चला. सब मिलके मेरे पिछवाड़े लट्ठ बजा देंगे. मार-मार के मेरा पिछवाड़ा लाल कर देंगे. पिछवाड़ा, पिछवाड़ा नहीं बन्दर का पिछवाड़ा लगेगा.

मेरे घरवाले मेरी शादी ठीक करने में लगे हुए हैं. और मैं दनादन पाप किये जा रहा हूँ. मुझे पता है तू भी मेरे ऊपर हँस रहा होगा. तू भी सोच रहा होगा “क्या हुआ जतिन, पेट भर गया?”

भगवान, मेरा पेट तो जरुरत से ज्यादा भर गया है. अब ये सिलसिला नहीं रुका तो पेट फट जायेगा मेरा. बस करो भगवान. बस करो. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ. मजाक-मजाक में कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया तुमने.

कौन कहता है कि भगवान नहीं है? मैं कहता हूँ “तू है.” और तू जिसको चाहे इतना देता है कि वो सम्भाल नहीं पाये. तू धन्य है भगवान. बस अब एक सीधी-साधी लड़की से मेरी शादी फिट करादे. तेरी कसम किसी और की तरफ आँख भी उठा के नहीं देखूँगा.

इतना भुगता है कि मेरे होश ठिकाने आ गये हैं. जाट खोपड़ी वैसे तो कभी हार माने ना है. लेकिन मैं हारी मानता हूँ भगवान. ये सब बहुत हुआ. तेरा लाख-लाख शुक्र है कि मैंने जो कुछ किया सब ढ़के-छुपे है. मेरे घरवालों को पता नहीं है कि मैं यहाँ दिल्ली में क्या-क्या गुल खिला चुका हूँ.

एक विनती और है भगवान. अगले जनम में ड्राईवर मत बनाना मुझे. इसलिये नहीं कि ये काम गन्दा है. काम तो कोई गन्दा ना होवे है मेरी नजर में. बस तू कुछ और काम करा लेना मुझसे. मैंने अपनी ड्राईवरी में बहुत मजे किये. इतना कि क्या कोई करेगा.

ड्राईवरी में थोड़ी आसानी हो जावे है. और कुछ नहीं. कहीं भी टूर पे चले जाओ तो मेरा हनीमून फ्री-फ्री में मन जावे है. साली लड़कियों को भी जाने क्या दिखे है इस जतिन में? इसलिये कह रहा हूँ भगवान मुझे अगले जनम में ड्राईवर मत बनाना. मेरे किये हुए काण्ड एक-एक करके मेरी आँखों के सामने घूम जावे हैं जब भी कहीं बात छिड़ती है.

एमएनसी कम्पनियों के लड़के कुत्ते बने फिरे हैं लड़कियों के आगे. और वही लड़कियाँ जतिन के नीचे आ जावे हैं बिना किसी परेशानी के. हुनर क्या है जतिन में? बस यही कि ड्राईवर हूँ आज नहीं कल ड्यूटी बदल जायेगी. कोई नया ड्राईवर आ जायेगा. जतिन पीछे नहीं पड़ेगा. किसी से कहेगा भी नहीं. और फिर कह भी देगा तो ड्राईवर की बात का यकीन कौन करने लगा.

अब डिम्पल को ही ले लो. साली हर बात पे जान देने की बात करती है. मुझे तो डर ही लगे है किसी दिन पागल ने कुछ कर-वर लिया तो मुसीबत हो जायेगी. अभी उमर ही क्या है उसकी? दसवीं में ही तो पढ़ती है. अब उसे कैसे समझाऊँ? कम उमर का जोश है और मेरा भी मन उसे दुखी ना करना चाहे है. लेकिन मैं करूँ भी तो क्या करूँ? किसी दिन उसके घरवालों को पता लगा तो मेरा सामान सड़क पे फेंक देंगे सब. किराये के मकान में मालिक तो मकान-मालिक ही होवे है. और भला हो उसकी बहन का कि उसकी शादी हो गयी है. डिम्पल को तो पता भी नहीं है कि उससे पहले मैं उसकी बड़ी बहन को भी भोग चुका हूँ. बहन ही क्या मैं तो उसकी माँ को भी भोग चुका हूँ. मेरे तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ये सोचके कि किसी दिन कुछ गड़बड़ हुई तो मेरे इतने टुकड़े होंगे कि मैं फेविकोल लेके जोड़ने पे भी नहीं जुड़ूँगा.

भगवान, तूने कैसे-कैसे करम करवाये हैं मुझसे. दुनिया क्या है? जिन्दगी क्या है? सब जतिन के आगे बेकार है. कभी-कभी लगता है कहीं मेरी घरवाली ऐसी ही मिल गयी तो क्या होगा? मैं तो यहाँ सुधर के अच्छे बच्चे की तरह अपना काम करूँ और मेरी घरवाली गाँव में मजे ले रही हो. साला गन्दा दिमाग और सोच भी क्या सके है?

इसलिये भगवान, अब सुधर जाने दो मुझे. अब मुझे कुछ नहीं चाहिये. मेरी भूख शान्त हो चुकी है अब. और अब चाहे स्कूल जाने वाली लड़की हो या शादी-शुदा औरत सबसे दूर रखना मुझे. और इन हरामी छ्क्कों से भी. साले पैसे माँगने के बहाने किसी भी हद तक उतर जावे हैं. खुलेआम कहते हैं “कर लो जो करना है.” अब फ्री-फ्री में मजा मिल रहा हो तो कौन इन्कार करेगा. पैसे तो वैसे भी बिना लिये वो मानेंगे नहीं. आनन्द विहार बस अड्डे के अन्धेरे का फायदा उठाना कोई इनसे सीखे. जाने कितनी बार मैंने आनन्द विहार बस अड्डे पे गाड़ी खड़ी करके मजे लिये हैं.

अपने सारे भेद बस मैं ही जानूँ और मेरे कुछ साथी ड्राईवर जाने हैं. और मेरी कैब में आने-जाने वाले कुछ बन्दे जाने हैं जैसे वो एक हितेन और एक दूसरा वो इरशाद मियाँ. पता नहीं लेकिन बहुत से बन्दे मेरी गाड़ी में आये-गये लेकिन इन दो बन्दों ने मुझे कभी ड्राईवर नहीं समझा. शायद इसीलिये साले मेरा भेद जान गये. अब पता नहीं कहाँ मजे ले रहे होंगे? साले जब तक मेरी कैब में आते थे खोद-खोद कर मुझसे पूछते थे “और जतिन महाराज, क्या काण्ड किया कल रात?” साले दोस्त जैसे बन गये थे दोनों. आदमी का भी कभी पता नहीं चले है कब कौन अच्छा लग जावे है. और कुछ चिरकुट तो ऐसे होवे हैं, मर जायेंगे मगर अपनी अकड़ नहीं भूलेंगे. जैसे एक था वो जितेन्द्र. साला, महाहरामी आदमी था. कभी सीधे मुँह बात ही नहीं करता था. खैर, हितेन और इरशाद काफी थे जतिन को खुश रखने के लिये. हम कहीं भी रुकके कुछ भी खाने लगते थे. दोस्ती गहरी हो गयी थी. मगर इरशाद बम्बई चला गया. हितेन ने वो कम्पनी छोड़ दी. कुछ दिनों बाद वो कम्पनी ही बन्द हो गयी. बड़ी अच्छी कम्पनी थी मगर जाने क्या हुआ? सब कुछ अचानक बन्द हो गया.

एक तरह से अच्छा ही हुआ. उस कम्पनी के भी कई राज कम्पनी के साथ ही दफ़न हो गये. कितनी लड़कियाँ, उनके अफेयर के किस्से, कब वो किसके साथ पकड़ी गयीं सब जतिन के सीने में कैद हैं. उसी कम्पनी में थी एक वैशाली. गाजियाबाद से आती थी. साली गजब की हरामी थी. घर से कहके निकलती थी कि ओवरटाईम करना है और रास्ते में ही उतर जाती थी. ये लड़कियाँ भी ना, फोन पे बात करती हैं और सोचती हैं कि ड्राईवर को कुछ पता नहीं चलेगा. हमें सब पता रहता है. इसीलिये एक दिन जब वो अपने ब्वायफ्रेन्ड से मिलके आई तो मैंने पूछ लिया “क्यूँ मैडम? ओवरटाईम हो गया?” साली मुझसे भी ज्यादा हरामी निकली. कहती है “मुँह बन्द रखने का क्या लोगे?” बस फिर क्या था. जाट खोपड़ी टक्कर खा गयी. लेकिन मैं भी नाड़े का इतना कच्चा नहीं हूँ. मैंने भी कह दिया “मैडम, जतिन जूठी थाली में खाना नहीं खाता. किसी दिन थाली साफ दिखेगी तब बताऊँगा. बस मुकर मत जाना अपनी जुबान से.” लेकिन वो भी पक्की खाई-खेली थी. वो भी समझ गयी मैं क्य कह रहा हूँ और क्या चाह रहा हूँ. दिमाग पे तो वो चढ़ ही चुकी थी मेरे. मैंने भी मौका देख के एक दिन उसे गाड़ी में ही लिटा दी. उसको तो क्या फरक पड़ना था. मगर मुझे मजा आ गया था. एक एमएनसी कम्पनी में काम करने वाली लड़की अपनी कैब के ड्राईवर के साथ मजे कर रही थी. जतिन की किस्मत इससे ज्यादा क्या चमकेगी. ये लड़कियाँ भी ना, हमेशा मजबूत मरद ढ़ूढ़े हैं. और फिर जतिन तो है ही जाट का पट्ठा.

मगर भगवान, अति किसी भी चीज की बुरी होवे है इतना तो मैं जानूँ ही. बस, अब और कुछ नहीं कहना है. बस, अब मैं अपने करम-काण्ड की कथा और नहीं सुना रहा. बस तू ये वरदान वापस ले ले भगवान.

*************

कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

www.qaisjaunpuri.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 7
  1. बेनामी12:39 pm

    रचनाकार एर स्तरीय साहित्यिक वेबपत्रिका है, कृपया ऐसी निम्नस्तरीय
    रचना छाप कर रचनाकार का अपमान न करें।
    यह रचना रचनाकार के लिए शोभनीय नही है। ऐसी रचनाऐं तो नेट पर भरी पढी हैं।हम रचनाकार पर अच्छी साहित्यिक कृति के लिए ही क्लिक करते हैं।
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रिया शर्मा12:41 pm

    बड़ी बकवास और वाहियात रचना।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. Priya ji... Bakwaas aur Vahijaat ke saath-saath samaj ke aaina dikha rahi hai ye Rachana...!

      Hum 21vi shadi mei kaha jaa rahe hai...!
      Humari sanskiti 21vi shadi mei kaha jaa rahi hai...!

      ye sab bata rahi hai ye Rachana...!

      हटाएं
  3. Anuradha2:57 pm

    I agree with Priya Sharma.

    जवाब देंहटाएं
  4. sach bahut karua hota hai sab me bardast karne ki chamta nahi hoti hai. sach bakwash aur vahiyat hi lagta hai

    जवाब देंहटाएं
  5. Dilli NCR & Mumbai jaise Matro city ke har 100 mei se ek aadmi ki kahani hai ye...! Bas ye Jatin Driver hai aur baki log kuch aur...!

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 22 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात :
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