सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - 21 वीं कड़ी - आओ कहें... दिल की बात : मैं एक औरत हूँ...

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आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी

 

मैं एक औरत हूँ

मैं एक औरत हूँ. बचपन में सबकी गोद में रहती थी. “घर में लक्ष्मी आई है” ये कहके सब खुद को तसल्ली देते थे. हकीकत तो ये है कि “अब इसकी शादी के लिये लक्ष्मी का इन्तजाम करना पड़ेगा” ऐसा सबके मन में रहता था. मैं लड़की थी इसलिये उतनी मायने नहीं रखती थी. भाई को ज्यादा प्यार मिलता था. मेरे बाद पैदा हुआ था. घर का चिराग था वो. और मैं एक पराया धन. जिसे शादी की उमर तक हिफ़ाजत से रखना था. और धन के साथ विदा करना था.

किशोरावस्था में पहुँची तो किसी की गन्दी नजर मुझपे पड़ी और मैं उसका शिकार बन गयी. इस तरह से पहली बार मेरा बलात्कार हुआ. लड़की की इज्जत उछालने से और खराब होती है इसलिये बात दबा दी गयी. थोड़ा बहुत हो-हल्ला हुआ मगर उससे क्या फ़रक पड़ता है. मेरा जो नुकसान हुआ था उसकी भरपाई तो किसी भी तरह से मुमकिन नहीं थी.

थोड़ी और बड़ी हुई तो माँ ने उठना-बैठना सिखाना शुरु कर दिया. अब सबकी नजरों से बचाकर रखती थी मुझे. मगर ऐसा कैसे हो सकता था. लोगों की नजर तो पड़ ही जाती है. किसी की नजर फ़िर मुझपे पड़ी. इस बार नजर प्यार भरी थी. इस बार मुझे भी उससे प्यार हो गया. अच्छा लड़का था. अपने अतीत को भूलकर जीना चाहती थी मैं उसके साथ. क्यूँकि उसे मेरे अतीत से कोई लेना-देना नहीं था.

कहते हैं प्यार छुपाये नहीं छुपता. इसलिये मेरा प्यार भी उजागर हो गया. सबकी बातें सुननी पड़ीं. किसी गुनहगार की तरह. मैं तब सोच रही थी “मैंने ऐसा क्या गलत किया है जो सब इतना कुछ सुना रहे हैं? क्या मुझे इतना भी हक नहीं कि अपनी जिन्दगी का हमसफ़र खुद तय कर सकूँ? फ़िर मुझे किसी ने कहा “तू पराया धन है. किसी और के घर की इज्जत बनेगी तू. इस तरह करेगी तो बदनाम हो जायेगी. फ़िर कौन करेगा तुझसे शादी?”

मैं हैरान इस बात पे थी कि “कौन किसकी इज्जत की बात कर रहा है? और क्यूँ कर रहा है? जब मेरी इज्जत लूट ली गयी तब तो किसी ने कुछ नहीं किया. आज जब मैं अपनी जिन्दगी खुद जीना चाहती हूँ तो मेरी जिन्दगी के इतने मालिक कहाँ से आ गये? और ये क्या बकवास कर रहे हैं कि कोई मुझसे शादी नहीं करेगा. क्या जिससे मेरी शादी होगी उसको पता है कि उनके घर की इज्जत पे दाग लग चुका है? क्या ये लोग उस इज्जतदार आदमी के साथ धोखा नहीं करेंगे? और जबकि मैं जिससे प्यार करती हूँ वो मुझे बाइज्जत अपनाने को तैयार है तब इन्हीं लोगों को क्या तकलीफ़ है? क्या इस बात की कि मैं अपनी मर्जी चला रही हूँ या इस बात की कि मैं उनकी बात नहीं मान रही. चाहे जो भी हो मगर मेरे साथ नाइन्साफ़ी हो रही थी.

लेकिन फ़िर भी कुर्बानी मुझे ही देनी थी क्यूँकि मैं एक लड़की थी. शादी से पहले प्यार पाप माना जाता था हमारे यहाँ. और इससे पहले जो पाप मेरे साथ हुआ उसका किसी ने कुछ नहीं किया. कोई करता भी क्या? औरत तो बनी ही है भोगने के लिये. कोई प्यार से पा लेता है तो कोई अधिकार से. और जिसके पास ये दोनों बातें नहीं होतीं वो बलात्कार से पा लेता है. लेकिन मिलती सबको एक औरत ही है. एक औरत जिससे कभी कोई ये नहीं पूछता कि “हे औरत, मुझे बता तू क्या चाहती है?” औरत किसी से कुछ नहीं चाह सकती मगर औरत से सब कुछ न कुछ जरुर चाहते हैं. बेटी थी तब सब्र चाहिये था. बहन थी तब शराफ़त चाहिये थी. प्रेमिका बनी तब कुर्बानी चाहिये थी. मैंने सब दिया. क्यूँकि मैं एक औरत थी. मेरा धर्म है देना और कुछ न चाहना.

फ़िर माँ-बाप की मर्जी से किसी और से मेरी शादी हो गयी. सबकी खुशी के लिये मुझे खुश रहना था क्यूँकि मैं एक लड़की से अब एक औरत बन चुकी थी. पति भी जैसे सबको मिलते हैं मुझे भी मिल गया. कुछ साल बाद अपनी माँ की तरह मैं भी माँ बन गयी. मैं पैदा हुए बच्चे को सम्भालने लगी. पति खुद को सम्भालने के लिये किसी और का मुँह देखने लगा. क्यूँकि मेरा ज्यादातर वक्त बच्चे को सम्भालने में निकल जाता था. और भी बहुत सारे काम होते हैं जो एक माँ को करने पड़ते हैं.

बच्चा पेशाब करता है तब माँ को ही बिस्तर बदलना पड़ता है. गीला बिस्तर पति को नहीं भाता था. बच्चे को गोद में लिये मैं भी गीली हो जाती थी इसलिये मैं भी पति को नहीं भाती थी अब. बच्चा बीमार हो जाये तब तो आफ़त ही है. बच्चे के साथ-साथ माँ भी बीमार हो जाती है. और बीमार के पास भला कौन आना चाहता है?

मेरा ज्यादातर वक्त अब बच्चे के साथ बीतने लगा था. पति अपनी दुनिया में मस्त. बेटा बड़ा होने लगा. और एक दिन इतना बड़ा हो गया कि अब उसे भी मैं बेकार लगने लगी थी. मेरा खयाल रखना उसे अब खलने लगा था. अब मेरा बेटा बड़ा जो हो गया था. और मेरा बेटा अब मेरे हाथ से जाता हुआ दिखाई दे रहा था.

कुछ दिन बाद मेरे बेटे की भी शादी हो गई. मेरी बहु बहुत सुन्दर थी. मैं खुश थी कि “चलो मेरे अकेलेपन में मेरी बहु मेरा साथ देगी” मगर ऐसा भी न हुआ. बहु बेटे की थी मेरी नहीं. और मेरा दखल उसे भी अच्छा नहीं लगता था. उन दोनों के लिये अब मैं बूढ़ी हो चुकी थी.

पति ने तब तक काफ़ी दुनिया देख ली थी और अब मैं अकेली अपने पति के अकेलेपन का सहारा थी. इसलिये मुझे अभी और जीना था. अपने पति के लिये. अपने बच्चे के लिये. उसके होने वाले बच्चे के लिये.

कुछ दिन बाद मैं दादी बन गई. तब घर में मेरी भी जरुरत महसूस की जाने लगी. मेरी भी अहमियत महसूस की जाने लगी. क्यूँकि तब मैं बच्चे को सम्भालने वाली दाई जो बन चुकी थी. खैर, मेरा पोता मेरे बेटे का बेटा था इसलिये मुझे प्यारा था.

अब मेरा काफ़ी वक्त अपने पोते के साथ बीतने लगा. मेरे साथ-साथ बूढ़े हो रहे मेरे पति को फ़िर अकेलापन महसूस होने लगा. मगर यहाँ भी समझना मुझे ही पड़ता था. मेरे पति ने जो कुछ किया उसका पछ्तावा उन्हें बहुत था. मगर माफ़ी माँग लेने से गुनाह कम नहीं हो जाता इसलिये उन्होनें माफ़ी नहीं माँगी. मुझे इसकी कोई जरुरत भी नहीं थी. लेकिन मेरे पति ने अब दुनिया से जाना ही ठीक समझा.

अब मैं एक बार फ़िर बेसहारा हो गई थी. लेकिन मेरे बेटे का घर था इसलिये रहने की तकलीफ़ नहीं थी. सर पे छत हो तो आदमी बारिश से बच जाता है लेकिन अकेला मन जब रोता है तब बड़ा सा घर भी आँसूओं से भर जाता है.

किसी तरह ये दिन भी बीत गये. मेरा पोता अब बड़ा हो गया था. वो मुझे बहुत मानता था. शायद मेरे बेटे ने जो कमी की थी अब मेरा पोता उसे पूरा कर रहा था. मैं खुश थी मेरा पोता खुश था. बाकी घर में कोई और खुश नहीं था. मुझे कहा गया “आपने सर पे चढ़ा रखा है इसे. आपकी जिन्दगी तो बीत गई. अब इसे तो खराब मत कीजिये. ये मेरा बेटा है. मैं जानती हूँ इसका अच्छा-बुरा.”

बहु की बात भी सही थी. अब तो बेटा बड़ा हो गया था. अब मेरी क्या जरुरत थी. मैं जिन्दा थी ये मेरी समस्या थी, किसी और की नहीं.

आज मैं भी इस दुनिया से विदा ले रही हूँ. एक औरत की जिन्दगी पूरी हुई. एक औरत एक औरत बनके रही. सबकुछ सहा. कभी कुछ नहीं कहा. सबकी सुनी. उसकी किसी ने न सुनी. औरत जिसका धर्म है चुप रहना और सब कुछ सहना. मैं ऐसी ही एक औरत हूँ.

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कैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

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